श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1086, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १७]
- साधक-संजीवनी *
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सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस तपका वर्णन करते हैं।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्विविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥
| परया | = परम | नरैः | = मनुष्योंके द्वारा | तपः | = तप |
|---|---|---|---|---|---|
| श्रद्धया | = श्रद्धासे | (जो) | तप्तम् | = किया जाता है, | |
| युक्तैः | = युक्त | त्रिविधम् | = तीन प्रकार | तत् | = उसको |
| अफला- | (शरीर, वाणी और | सात्त्विकम् | = सात्त्विक | ||
| काङ्क्षिभिः | = फलेच्छारहित | मन)-का | परिचक्षते | = कहते हैं। |
व्याख्या—‘श्रद्धया परया तप्तम्’— शरीर, वाणी और मनके द्वारा जो तप किया जाता है, वह तप ही मनुष्योंका सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य है और यही मानव-जीवनके उद्देश्यकी पूर्तिका अचूक उपाय है* तथा इसको सांगोपांग—अच्छी तरहसे करनेपर मनुष्यके लिये कुछ करना बाकी नहीं रहता अर्थात् जो वास्तविक तत्त्व है, उसमें स्वतः स्थिति हो जाती है—ऐसे अटल विश्वासपूर्वक श्रेष्ठ श्रद्धा करके बड़े-बड़े विघ्न और बाधाओंकी कुछ भी परवाह न करते हुए उत्साह एवं आदरपूर्वक तपका आचरण करना ही परम श्रद्धासे युक्त मनुष्योंद्वारा उस तपको करना है।
‘अफलाकाङ्क्षिभिः युक्तैः नरैः’— यहाँ इन दो विशेषणोंसहित ‘नरैः’ पद देनेका तात्पर्य यह है कि आंशिक सदगुण-सदाचार तो प्राणिमात्रमें रहते ही हैं; परन्तु मनुष्यमें यह विशेषता है कि वह सदगुण-सदाचारोंको सांगोपांग एवं विशेषतासे अपनेमें ला सकता है और दुर्गुण-दुराचार, कामना, मूढ़ता आदि दोषोंको सर्वथा मिटा सकता है। निष्कामभाव मनुष्योंमें ही हो सकता है।
सात्त्विक तपमें तो ‘नर’ शब्द दिया है; परन्तु राजस-तामस तपमें मनुष्यवाचक शब्द दिया ही नहीं। तात्पर्य यह है कि अपना कल्याण करनेके उद्देश्यसे मिले हुए अमूल्य शरीरको पाकर भी जो कामना, दम्भ, मूढ़ता आदि दोषोंको पकड़े हुए हैं, वे मनुष्य कहलानेके लायक ही नहीं हैं।
फलकी इच्छा न रखकर निष्कामभावसे तपका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंके लिये यहाँ उपर्युक्त पद आये हैं।
‘तपस्तत्त्विविधम्’— यहाँ केवल सात्त्विक तपमें ‘त्रिविध’ पद दिया है और राजस तथा तामस तपमें ‘त्रिविध’ पद
न देकर ‘यत्-तत्’ पद देकर ही काम चलाया है। इसका आशय यह है कि शारीरिक, वाचिक और मानसिक—तीनों तप केवल सात्त्विकमें ही सांगोपांग आ सकते हैं, राजस तथा तामसमें तो आंशिकरूपसे ही आ सकते हैं। इसमें भी राजसमें कुछ अधिक लक्षण आ जायेंगे, क्योंकि राजस मनुष्यका शास्त्रविधिकी तरफ खयाल रहता है। परन्तु तामसमें तो उन तपोंके बहुत ही कम लक्षण आयेंगे; क्योंकि तामस मनुष्योंमें मूढ़ता, दूसरोंको कष्ट देना आदि दोष रहते हैं।
दूसरी बात, तेरहवें अध्यायमें सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक जो ज्ञानके बीस साधनोंका वर्णन आया है, उनमें भी शारीरिक तपके तीन लक्षण—शौच, आर्जव और अहिंसा तथा मानसिक तपके दो लक्षण—मौन और आत्मविनिग्रह आये हैं। ऐसे ही सोलहवें अध्यायमें पहलेसे तीसरे श्लोकतक जो दैवी-सम्पत्तिके छब्बीस लक्षण बताये गये हैं, उनमें भी शारीरिक तपके तीन लक्षण—शौच, अहिंसा और आर्जव तथा वाचिक तपके दो लक्षण—सत्य और स्वाध्याय आये हैं। अतः ज्ञानके जिन साधनोंसे तत्त्वबोध हो जाय तथा दैवी-सम्पत्तिके जिन गुणोंसे मुक्ति हो जाय, वे लक्षण या गुण राजस-तामस नहीं हो सकते। इसलिये राजस और तामस तपमें शारीरिक, वाचिक और मानसिक—यह तीनों प्रकारका तप सांगोपांग नहीं लिया जा सकता। वहाँ तो ‘यत्-तत्’ पदोंसे आंशिक जितना-जितना आ सके, उतना-उतना ही लिया जा सकता है।
तीसरी बात, भगवद्गीताका आदिसे अन्ततक अध्ययन करनेपर यह असर पड़ता है कि इसका उद्देश्य केवल जीवका कल्याण करनेका है। कारण कि अर्जुनका जो प्रश्न
- शरीर, वाणी और मनका तप सांगोपांग-रूपसे तभी सम्पन्न होता है, जब नाशवान् वस्तुओंसे सम्बन्ध-विच्छेदका उद्देश्य रहता है।