श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १७ ]
है, वह निश्चित श्रेय- (कल्याण-) का है (दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरे अध्यायका दूसरा और पाँचवें अध्यायका पहला श्लोक)। भगवान्ने भी उत्तरमें जितने साधन बताये हैं, वे 'सब जीवोंका निश्चित कल्याण हो जाय'—इस लक्ष्यको लेकर ही बताये हैं। इसलिये गीतामें जहाँ-कहीं सात्त्विक, राजस और तामस भेद किया गया है, वहाँ जो सात्त्विक विभाग है, वह ग्राह्य है; क्योंकि वह मुक्ति देनेवाला है—'दैवी सम्पद्भिर्भोक्षाय' और जो
राजस-तामस विभाग है, वह त्याज्य है; क्योंकि वह बाँधनेवाला है—'निबन्ध्यायसुरी मता'। इसी आशयसे भगवान् यहाँ सात्त्विक तपमें शारीरिक, वाचिक और मानसिक—इन तीनों तपोंका लक्ष्य करानेके लिये 'त्रिविधम्' पद देते हैं।
'सात्त्विकं परिचक्षते'—परम श्रद्धासे युक्त, फलको न चाहनेवाले मनुष्योंके द्वारा जो तप किया जाता है, वह सात्त्विक तप कहलाता है।
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्वुवम् ॥ १८ ॥
| यत् | = जो | दम्भेन | = दिखानेके | चलम् | = अनिश्चित |
|---|---|---|---|---|---|
| तपः | = तप | भावसे | (और) | ||
| सत्कारमान- | एव | = भी | अध्वुवम् | = नाशवान् फल | |
| पूजार्थम् | = सत्कार, मान | क्रियते | = किया जाता है, | देनेवाला (तप) | |
| और पूजाके लिये | तत् | = वह | राजसम् | = राजस | |
| च | = तथा | इह | = इस लोकमें | प्रोक्तम् | = कहा गया है। |
व्याख्या—'सत्कारमानपूजार्थं तपः क्रियते'— राजस मनुष्य सत्कार, मान और पूजाके लिये ही तप किया करते हैं; जैसे—हम जहाँ-कहीं जायेंगे, वहाँ हमें तपस्वी समझकर लोग हमारी अगबानीके लिये सामने आयेंगे। गाँवभरमें हमारी सवारी निकालेंगे। जगह-जगह लोग हमें उत्थान देंगे, हमें बैठनेके लिये आसन देंगे, हमारे नामका जयघोष करेंगे, हमसे मीठा बोलेंगे, हमें अभिनन्दनपत्र देंगे इत्यादि बाह्य क्रियाओंद्वारा हमारा 'सत्कार' करेंगे। लोग हृदयसे हमें श्रेष्ठ मानेंगे कि ये बड़े संयमी, सत्यवादी, अहिंसक सज्जन हैं, वे सामान्य मनुष्योंकी अपेक्षा हमारेमें विशेष भाव रखेंगे इत्यादि हृदयके भावोंसे लोग हमारा 'मान' करेंगे। जीते-जी लोग हमारे चरण धोयेंगे, हमारे मस्तकपर फूल चढ़ायेंगे, हमारे गलेमें माला पहनायेंगे, हमारी आरती उतारेंगे, हमें प्रणाम करेंगे, हमारी चरणरजको सिरपर चढ़ायेंगे और मरनेके बाद हमारी वैकुण्ठी निकालेंगे, हमारा स्मारक बनायेंगे और लोग उसपर श्रद्धा-भक्तिसे पत्र, पुष्प, चन्दन, वस्त्र, जल आदि चढ़ायेंगे, हमारे स्मारककी परिक्रमा करेंगे इत्यादि क्रियाओंसे हमारी 'पूजा' करेंगे।
'दम्भेन चैव यत्'—भीतरसे तपपर श्रद्धा और भाव न होनेपर भी बाहरसे केवल लोगोंको दिखानेके लिये आसन लगाकर बैठ जाना, माला घुमाने लग जाना, देवता
आदिका पूजन करने लग जाना, सीधे-सरल चलना, हिंसा न करना आदि।
'तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्वुवम्'—राजस तपका फल चल और अध्वुव कहा गया है। तात्पर्य है कि जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये किया जाता है, उस राजस तपका फल यहाँ 'चल' अर्थात् नाशवान् कहा गया है और जो तप केवल दिखावटीपनके लिये किया जाता है, उसका फल यहाँ 'अध्वुव' अर्थात् अनिश्चित (फल मिले या न मिले, दम्भ सिद्ध हो या न हो) कहा गया है।
'इह प्रोक्तम्' पदोंका तात्पर्य यह है कि इस राजस तपका इष्ट फल प्रायः यहाँ ही होता है। कारण कि सात्त्विक पुरुषोंका तो ऊर्ध्वलोक है, तामस मनुष्योंका अधोलोक है और राजस मनुष्योंका मध्यलोक है (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। इसलिये राजस तपका फल न स्वर्ग होगा और न नरक होगा; किन्तु यहाँ ही महिमा होकर, प्रशंसा होकर खत्म हो जायगा।
राजस मनुष्यके द्वारा शारीरिक, वाचिक और मानसिक तप हो सकता है क्या? फलेच्छा होनेसे वह देवता आदिका पूजन कर सकता है। उसमें कुछ सीधा-सरलपन भी रह सकता है। ब्रह्मचर्य रहना मुश्किल है। अहिंसा भी मुश्किल है। पुस्तक आदि पढ़ सकता है। उसका मन हरदम प्रसन्न