श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १९-२० ]
- साधक-संजीवनी *
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नहीं रह सकता और सौम्यभाव भी हरदम नहीं रह सकता। कामनाके कारण उसके मनमें संकल्प-विकल्प होते रहेंगे। वह केवल सत्कार, मान, पूजा और दम्भके लिये ही तप करता है, तो उसके भावकी संशुद्धि कैसे होगी अर्थात् उसके भाव शुद्ध कैसे होंगे? अतः राजस मनुष्य तीन प्रकारके तपको सांगोपांग नहीं कर सकता।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥ १९॥
यत् = जो, तपः = तप, मूढग्राहेण = मूढतापूर्वक हठसे, आत्मनः = अपनेको, पीडया = पीडा देकर, क्रियते = किया जाता है, वा = अथवा, परस्य = दूसरोंको, उत्सादनार्थम् = कष्ट देनेके लिये, तत् = वह (तप), तामसम् = तामस, उदाहृतम् = कहा गया है।
व्याख्या—'मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः'—तामस तपमें मूढतापूर्वक आग्रह होनेसे अपने-आपको पीडा देकर तप किया जाता है। तामस मनुष्योंमें मूढताकी प्रधानता रहती है; अतः जिसमें शरीरको, मनको कष्ट हो, उसीको वे तप मानते हैं। 'परस्योत्सादनार्थं वा'—अथवा वे दूसरोंके दुःख देनेके लिये तप करते हैं। उनका भाव रहता है कि शक्ति प्राप्त करनेके लिये तप (संयम आदि) करनेमें मुझे भले ही कष्ट सहना पड़े, पर दूसरोंको नष्ट-भ्रष्ट तो करना ही है। तामस मनुष्य दूसरोंको दुःख देनेके लिये उन तीन (कायिक, वाचिक और मानसिक) तपोंके आंशिक भागके सिवाय मनमाने ढंगसे उपवास करना, शीत-घामको सहना आदि तप भी कर सकता है। 'तत्तामसमुदाहृतम्'—तामस मनुष्यका उद्देश्य ही दूसरोंको कष्ट देनेका, उनका अनिष्ट करनेका रहता है। अतः ऐसे उद्देश्यसे किया गया तप तामस कहलाता है। [सात्त्विक मनुष्य फलकी इच्छा न रखकर परमश्रद्धासे तप करता है, इसलिये वास्तवमें वही मनुष्य कहलानेलायक है। राजस मनुष्य सत्कार, मान, पूजा तथा दम्भके लिये तप करता है, इसलिये वह मनुष्य कहलानेलायक नहीं है; क्योंकि सत्कार, मान आदि तो पशु-पक्षियोंको भी प्रिय लगते हैं और वे बेचारे दम्भ भी नहीं करते! तामस मनुष्य तो पशुओंसे भी नीचे हैं; क्योंकि पशु-पक्षी स्वयं दुःख पाकर दूसरोंको दुःख तो नहीं देते, पर यह तामस मनुष्य तो स्वयं दुःख पाकर दूसरोंको दुःख देता है।]
परिशिष्ट भाव—'मूढग्राहेण' में तो शुद्ध तमोगुण है, पर 'परस्योत्सादनार्थम्' में रजोगुण मिला हुआ है। मूढता तमोगुण है और स्वार्थभाव, क्रोध आदि राजस हैं। क्रोध रजोगुणसे पैदा होकर तमोगुणमें चला जाता है—'क्रोधाद्भवति सम्मोहः' (गीता २।६३)।
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस दानके लक्षण बताते हैं।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥ २०॥
दातव्यम् = दान देना कर्तव्य है—इति = ऐसे भावसे, यत् = जो, दानम् = दान, देशे = देश, काले = काल, च = तथा, च = और, पात्रे = पात्रके प्राप्त होनेपर, अनुपकारिणे = अनुपकारीको अर्थात् निष्कामभावसे, दीयते = दिया जाता है, तत् = वह, दानम् = दान, सात्त्विकम् = सात्त्विक, स्मृतम् = कहा गया है।