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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक १९-२० ]

  • साधक-संजीवनी *

१०८७

नहीं रह सकता और सौम्यभाव भी हरदम नहीं रह सकता। कामनाके कारण उसके मनमें संकल्प-विकल्प होते रहेंगे। वह केवल सत्कार, मान, पूजा और दम्भके लिये ही तप करता है, तो उसके भावकी संशुद्धि कैसे होगी अर्थात् उसके भाव शुद्ध कैसे होंगे? अतः राजस मनुष्य तीन प्रकारके तपको सांगोपांग नहीं कर सकता।

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥ १९॥

यत् = जो, तपः = तप, मूढग्राहेण = मूढतापूर्वक हठसे, आत्मनः = अपनेको, पीडया = पीडा देकर, क्रियते = किया जाता है, वा = अथवा, परस्य = दूसरोंको, उत्सादनार्थम् = कष्ट देनेके लिये, तत् = वह (तप), तामसम् = तामस, उदाहृतम् = कहा गया है।

व्याख्या—'मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः'—तामस तपमें मूढतापूर्वक आग्रह होनेसे अपने-आपको पीडा देकर तप किया जाता है। तामस मनुष्योंमें मूढताकी प्रधानता रहती है; अतः जिसमें शरीरको, मनको कष्ट हो, उसीको वे तप मानते हैं। 'परस्योत्सादनार्थं वा'—अथवा वे दूसरोंके दुःख देनेके लिये तप करते हैं। उनका भाव रहता है कि शक्ति प्राप्त करनेके लिये तप (संयम आदि) करनेमें मुझे भले ही कष्ट सहना पड़े, पर दूसरोंको नष्ट-भ्रष्ट तो करना ही है। तामस मनुष्य दूसरोंको दुःख देनेके लिये उन तीन (कायिक, वाचिक और मानसिक) तपोंके आंशिक भागके सिवाय मनमाने ढंगसे उपवास करना, शीत-घामको सहना आदि तप भी कर सकता है। 'तत्तामसमुदाहृतम्'—तामस मनुष्यका उद्देश्य ही दूसरोंको कष्ट देनेका, उनका अनिष्ट करनेका रहता है। अतः ऐसे उद्देश्यसे किया गया तप तामस कहलाता है। [सात्त्विक मनुष्य फलकी इच्छा न रखकर परमश्रद्धासे तप करता है, इसलिये वास्तवमें वही मनुष्य कहलानेलायक है। राजस मनुष्य सत्कार, मान, पूजा तथा दम्भके लिये तप करता है, इसलिये वह मनुष्य कहलानेलायक नहीं है; क्योंकि सत्कार, मान आदि तो पशु-पक्षियोंको भी प्रिय लगते हैं और वे बेचारे दम्भ भी नहीं करते! तामस मनुष्य तो पशुओंसे भी नीचे हैं; क्योंकि पशु-पक्षी स्वयं दुःख पाकर दूसरोंको दुःख तो नहीं देते, पर यह तामस मनुष्य तो स्वयं दुःख पाकर दूसरोंको दुःख देता है।]

परिशिष्ट भाव—'मूढग्राहेण' में तो शुद्ध तमोगुण है, पर 'परस्योत्सादनार्थम्' में रजोगुण मिला हुआ है। मूढता तमोगुण है और स्वार्थभाव, क्रोध आदि राजस हैं। क्रोध रजोगुणसे पैदा होकर तमोगुणमें चला जाता है—'क्रोधाद्भवति सम्मोहः' (गीता २।६३)।

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस दानके लक्षण बताते हैं।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥ २०॥

दातव्यम् = दान देना कर्तव्य है—इति = ऐसे भावसे, यत् = जो, दानम् = दान, देशे = देश, काले = काल, च = तथा, च = और, पात्रे = पात्रके प्राप्त होनेपर, अनुपकारिणे = अनुपकारीको अर्थात् निष्कामभावसे, दीयते = दिया जाता है, तत् = वह, दानम् = दान, सात्त्विकम् = सात्त्विक, स्मृतम् = कहा गया है।

१०८८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

व्याख्या—इस श्लोकमें दानके दो विभाग हैं—

(१) 'दातव्यमिति यद्दानं दीयते अनुपकारिणे' और

(२) 'देशे काले च पात्रे च।'

'दातव्यमिति ..... देशे काले च पात्रे च'— केवल देना ही मेरा कर्तव्य है। कारण कि मैंने वस्तुओंको स्वीकार किया है अर्थात् उन्हें अपना माना है। जिसने वस्तुओंको स्वीकार किया है, उसीपर देनेकी जिम्मेवारी होती है। अतः देनामात्र मेरा कर्तव्य है—इस भावसे दान करना चाहिये। उसका यहाँ क्या फल होगा और परलोकमें क्या फल होगा—यह भाव बिलकुल नहीं होना चाहिये। 'दातव्य' का तात्पर्य ही त्यागमें है।

अब किसको दिया जाय? तो कहते हैं—'दीयते-उनुपकारिणे' अर्थात् जिसने पहले कभी हमारा उपकार किया ही नहीं, अभी भी उपकार नहीं करता है और आगे हमारा उपकार करेगा, ऐसी सम्भावना भी नहीं है—ऐसे 'अनुपकारी' को निष्कामभावसे देना चाहिये। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जिसने हमारा उपकार किया है, उसको न दे, प्रत्युत जिसने हमारा उपकार किया है, उसे देनेमें दान न माने। कारण कि केवल देनेमात्रसे सच्चे उपकारका बदला नहीं चुकाया जा सकता। अतः 'उपकारी' की भी अवश्य सेवा-सहायता करनी चाहिये, पर उसको दानमें भरती नहीं करना चाहिये। उपकारको आशा रखकर देनेसे वह दान राजसी हो जाता है।

'देशे काले च पात्रे च' पदोंके दो अर्थ होते हैं—(१) जिस देशमें जो चीज नहीं है और उस चीजकी आवश्यकता है, उस देशमें वह चीज देना; जिस समय जिस चीजकी आवश्यकता है, उस समय वह चीज देना; और

परिशिष्ट भाव—यह सात्त्विक दान वास्तवमें त्याग है। यह वह दान नहीं है, जिसके लिये कहा गया है—'एक गुना दान, सहस्रगुना पुण्य'; क्योंकि उस दानसे (सहस्रके साथ) सम्बन्ध जुड़ता है। परन्तु त्यागसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। दानके बदलेमें कुछ पानेकी कामना करनेसे वह राजस हो जाता है—'यत्तु प्रत्युपकारार्थम्' (गीता १७।२१)। इस राजसभावका निषेध करनेके लिये यहाँ 'अनुपकारिणे' पद आया है।

गीतामें वर्णित सात्त्विक गुण त्यागकी तरफ जाता है, इसलिये इसको भगवान्ने 'अनामय' कहा है (चौदहवें अध्यायका छठा श्लोक)। सत्त्वगुण सम्बन्ध-विच्छेद (त्याग) करता है, रजोगुण सम्बन्ध जोड़ता है और तमोगुण मूढ़ता लाता है।

१-यहाँ देश, काल और पात्र—तीनोंमें 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' इस सूत्रसे सप्तमी की गयी है।

२-सुपात्रदानाच्च भवेद्ब्रह्मादयो धनप्रभावेण करोति पुण्यम्।

पुण्यप्रभावात्पुरलोकवासी पुनर्धनादयः पुनरेव भोगी॥

कुपात्रदानाच्च भवेहरिद्रो दारिद्र्यदोषेण करोति पापम्।

पापप्रभावान्नरकं प्रयाति पुनर्दिरिः पुनरेव पापी॥

जिसके पास जो चीज नहीं है और उसकी आवश्यकता है, उस अभावग्रस्तको वह चीज देना।

(२) गंगा, यमुना, गोदावरी आदि नदियाँ और कुरुक्षेत्र, प्रयागराज, काशी आदि पवित्र देश प्राप्त होनेपर दान देना; अमावस्या, पूर्णिमा, व्यतिपात, अक्षय तृतीया, संक्रान्ति आदि पवित्र काल प्राप्त होनेपर दान देना; और वेदपाठी ब्राह्मण, सदगुणी-सदाचारी भिक्षुक आदि उत्तम पात्र प्राप्त होनेपर दान देना।

'देशे काले च पात्रे च' पदोंसे उपर्युक्त दोनों ही अर्थ लेने चाहिये।

'तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्'—ऐसा दिया हुआ दान सात्त्विक कहा जाता है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण सृष्टिकी जितनी चीजें हैं, वे सबकी हैं और सबके लिये हैं, अपनी व्यक्तिगत नहीं हैं। इसलिये अनुपकारी व्यक्तिको भी जिस चीज—वस्तुकी आवश्यकता हो, वह चीज उसीकी समझकर उसको देनी चाहिये। जिसके पास वह वस्तु पहुँचेगी, वह उसीका हक है; क्योंकि यदि उसकी वस्तु नहीं है, तो दूसरा व्यक्ति चाहते हुए भी उसे वह वस्तु दे सकेगा नहीं। इसलिये पहलेसे यह समझे कि उसकी ही वस्तु उसको देनी है, अपनी वस्तु (अपनी मानकर) उसको नहीं देनी है। तात्पर्य यह है कि जो वस्तु अपनी नहीं है और अपने पास है अर्थात् उसको हमने अपनी मान रखी है, उस वस्तुको अपनी न माननेके लिये उसकी समझकर उसीको देनी है।

इस प्रकार जिस दानको देनेसे वस्तु, फल और क्रियाके साथ अपना सम्बन्ध-विच्छेद होता है, वह दान सात्त्विक कहा जाता है।

श्लोक २१-२२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०८९

गीताके अनुसार दूसरेके हितके लिये कर्म करना 'यज्ञ' है, हरदम प्रसन्न रहना 'तप' है और उसकी चीज उसीको दे देना 'दान' है। स्वार्थबुद्धिपूर्वक अपने लिये यज्ञ-तप-दान करना आसुरी अथवा राक्षसी स्वभाव है।

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।

दीयते च परिकिलष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥

तु= किन्तुवा= अथवातत्= वह
यत्= जो (दान)फलम्= फल-प्राप्तिकादानम्= दान
परिकिलष्टम्= क्लेशपूर्वकउद्दिश्य= उद्देश्य बनाकरराजसम्= राजस
= औरपुनः= फिरस्मृतम्= कहा
प्रत्युपकारार्थम्= प्रत्युपकारके लियेदीयते= दिया जाता है,जाता है ।

व्याख्या—'यत्तु प्रत्युपकारार्थम्' —राजस दान प्रत्युपकारके लिये दिया जाता है; जैसे—राजस पुरुष किसी विशेष अवसरपर दानकी चीजोंको गिन करके निकालता है, तो वह विचार करता है कि हमारे सगे-सम्बन्धीके जो कुल-पुरोहित हैं, उनको हम दान करेंगे, जिससे कि हमारे सगे-सम्बन्धी हमारे कुल-पुरोहितको दान करें और इस प्रकार हमारे कुल-पुरोहितके पास धन आ जायगा। अमुक पण्डितजी बड़े अच्छे हैं और ज्योतिष भी जानते हैं, उनको हम दान करेंगे, जिससे वे कभी यात्राका, पुत्रोंका तथा कन्याओंके विवाहका, नया मकान बनवानेका, कुओं खुदवानेका मुहूर्त निकाल देंगे। हमारे सम्बन्धी हैं अथवा हमारा हित करनेवाले हैं, उनको हम सहायतारूपमें पैसे देंगे, तो वे कभी हमारी सहायता करेंगे, हमारा हित करेंगे। हमें दवाई देनेवाले जो पण्डितजी हैं; उनको हम दान करेंगे; क्योंकि दानसे राजी होकर वे हमें अच्छी-अच्छी दवाईयाँ देंगे, आदि-आदि। इस प्रकार प्रतिफलकी भावना रखकर अर्थात् इस लोकके साथ सम्बन्ध जोड़कर जो दान किया जाता है, वह 'प्रत्युपकारार्थ' कहा जाता है।

'फलमुद्दिश्य वा पुनः' —फलका उद्देश्य रखकर अर्थात् परलोकके साथ सम्बन्ध जोड़कर जो दान किया जाता है, उसमें भी राजस मनुष्य देश (गंगा, यमुना, कुरुक्षेत्र आदि), काल (अमावस्या, पूर्णिमा, ग्रहण आदि) और पात्र (वेदपात्री ब्राह्मण आदि)—को देखेगा तथा शास्त्रीय

विधि-विधानको देखेगा; परन्तु इस प्रकार विचारपूर्वक दान करनेपर भी फलकी कामना होनेसे वह दान राजस हो जाता है। अब उसके लिये दूसरे विधि-विधानका वर्णन करनेकी भगवान्ने आवश्यकता नहीं समझी, इसलिये राजस दानमें 'देशे काले च पात्रे' पदोंका प्रयोग नहीं किया।

यहाँ 'पुनः' पद कहनेका तात्पर्य है कि जिससे कुछ उपकार पाया है अथवा जिससे भविष्यमें कुछ-न-कुछ मिलनेकी सम्भावना है, उसका विचार राजस पुरुष पहले करता है, फिर पीछे दान देता है।

'दीयते च परिकिलष्टम्' —राजस दान बहुत क्लेशपूर्वक दिया जाता है; जैसे—वक्त आ गया है, इसलिये देना पड़ रहा है। इतनी चीजें देंगे तो इतनी चीजें कम हो जायँगी। इतना धन देंगे तो इतना धन कम हो जायगा। वे समयपर हमारे काम आते हैं, इसलिये उनको देना पड़ रहा है। इतनेमें ही काम चल जाय तो बहुत अच्छी बात है। इतनेसे काम तो चल ही जायगा, फिर ज्यादा क्यों दें? ज्यादा देंगे तो और कहाँसे लायेंगे? और ज्यादा देनेसे लेनेवालेका स्वभाव बिगड़ जायगा। ज्यादा देनेसे हमारेको घाटा लग जायेगा, तो काम कैसे चलेगा? पर इतना तो देना ही पड़ रहा है, आदि-आदि। इस प्रकार राजस मनुष्य दान तो थोड़ा-सा देते हैं, पर कसाकसी करके देते हैं।

'तद्दानं राजसं स्मृतम्' —उपर्युक्त प्रकारसे दिया जानेवाला दान राजस कहा गया है।

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।

असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥

१०९०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

यत्= जोअवज्ञातम्= अवज्ञापूर्वकदीयते= दिया जाता है,
दानम्= दानअदेशकाले= अयोग्य देश औरतत्= वह (दान)
असक्ततम्= बिना सत्कारकेकालमेंतामसम्= तामस
= तथाअपात्रेभ्यः= कुपात्रकोउदाहतम्= कहा गया है।

व्याख्या—‘असक्ततमवज्ञातम्’ —तामस दान असत्कार और अवज्ञापूर्वक दिया जाता है; जैसे—तामस मनुष्यके पास कभी दान लेनेके लिये ब्राह्मण आ जाय, तो वह तिरस्कारपूर्वक उसको उलाहना देगा कि देखो पण्डितजी! जब हमारी माताका शरीर शान्त हुआ, तब भी आप नहीं आये; परन्तु क्या करें; आप हमारे घरके गुरु हो इसलिये हमें देना ही पड़ता है! इतनेमें ही घरका दूसरा आदमी बोल पड़ता है कि तुम क्यों ब्राह्मणोंके झंडटमें पड़ते हो? किसी गरीबको दे दो। जिसको कोई नहीं देता, उसको देना चाहिये। वास्तवमें वही दान है। ब्राह्मणको तो और कोई भी दे देगा, पर बेचारे गरीबको कौन देगा? पण्डितजी क्या आ गया, यह तो कुत्ता आ गया; टुकड़ा डाल दो, नहीं तो भौंकेंगा आदि—आदि। इस प्रकार शास्त्रविधिका, ब्राह्मणोंका तिरस्कार करनेके कारण यह दान तामस कहलाता है।

‘अदेशकाले यदानम्’ —मुद्दताके कारण तामस मनुष्यको अपने मनकी बातें ही जँचती हैं; जैसे—दान करनेके लिये देश—कालकी क्या जरूरत है? जब चाहे, तब कर दिया। जब किसी विशेष देश और कालमें ही पुण्य होगा, तो क्या यहाँ पुण्य नहीं होगा? इसके लिये अमुक समय आयेगा, अमुक पर्व आयेगा—इसकी क्या आवश्यकता? अपनी चीज खर्च करनी है, चाहे कभी दो, आदि—आदि। इस प्रकार तामस मनुष्य शास्त्रविधिका अनादर, तिरस्कार करके दान करते हैं। कारण कि उनके हृदयमें शास्त्रविधिका महत्त्व नहीं होता, प्रत्युत रूपयोंका महत्त्व होता है।

‘अपात्रेभ्यश्च दीयते’ —तामस दान अपात्रको किया जाता है। तामस मनुष्य कई प्रकारके तर्क—वितर्क करके पात्रका विचार नहीं करते; जैसे—शास्त्रोंमें देश, काल और पात्रकी बातें यों ही लिखी गयी हैं; कोई यहाँ दान लेगा तो क्या यहाँ उसका पेट नहीं भरेगा? तृप्ति नहीं होगी? जब पात्रको देनेसे पुण्य होता है, तो इनको देनेसे क्या पुण्य नहीं होगा? क्या ये आदमी नहीं हैं? क्या इनको देनेसे पाप लगेगा? अपनी जीविका चलानेके लिये, अपना मतलब सिद्ध करनेके लिये ही ब्राह्मणोंने शास्त्रोंमें ऐसा लिख दिया है, आदि—आदि।

‘ततामसमुदाहतम्’ —उपर्युक्त प्रकारसे दिया जानेवाला

दान तामस कहा गया है।

शंका— गीतामें तामस—कर्मका फल अधोगति बताया है—‘अधो गच्छन्ति तामसाः ’ (१४।१८) और रामचरितमानसमें बताया है कि जिस—किसी प्रकारसे भी दिया हुआ दान कल्याण करता है—

‘जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्याण॥’

(मानस ७।१०३ ख)

इन दोनोंमें विरोध आता है?

समाधान— तामस मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं—यह कानून दानके विषयमें लागू नहीं होता। कारण कि धर्मके चार चरण हैं—‘सत्यं दया तपो दानमिति ’ (श्रीमद्भा० १२।३।१८)। इन चारों चरणोंमेंसे कलियुगमें एक ही चरण ‘दान’ है—‘दानमेकं कलौ युगे ’ (मनुस्मृति १।८६)। इसलिये गोस्वामीजी महाराजने कहा—

प्रगत चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।

जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्याण॥

(मानस ७।१०३ ख)

ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि किसी प्रकार भी दान दिया जाय, उसमें वस्तु आदिके साथ अपनेपनका त्याग करना ही पड़ता है। इस दृष्टिसे तामस दानमें भी आंशिक त्याग होनेसे दान देनेवाला अधोगतिके योग्य नहीं हो सकता।

दूसरी बात, इस कलियुगके समय मनुष्योंका अन्तःकरण बहुत मलिन हो रहा है। इसलिये कलियुगमें एक छूट है कि जिस—किसी प्रकार भी किया हुआ दान कल्याण करता है। इससे मनुष्यका दान करनेका स्वभाव तो बन ही जायगा, जो आगे कभी किसी जन्ममें कल्याण भी कर सकता है। परन्तु दानकी क्रिया ही बन्द हो जायगी, तो फिर देनेका स्वभाव बननेका कोई अवसर ही प्राप्त नहीं होगा। इसी दृष्टिसे एक संतने ‘श्रद्धया देयमश्रद्धयादेयम् ’ (तैत्तिरीयो० १।११) —इस श्रुतिकी व्याख्या करते हुए कहा था कि इसमें पहले पदका अर्थ तो यह है कि श्रद्धासे देना चाहिये, पर दूसरे पदका अर्थ ‘अश्रद्धया अदेयम् ’ (अश्रद्धासे नहीं देना चाहिये) —ऐसा न लेकर ‘अश्रद्धया देयम् ’ (श्रद्धा न हो, तो भी देना चाहिये) —इस प्रकार लेना चाहिये।

श्लोक २२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०११

दान-सम्बन्धी विशेष बात

अन्न, जल, वस्त्र और औषध—इन चारोंके दानमें पात्र-कुपात्र आदिका विशेष विचार नहीं करना चाहिये। इनमें केवल दूसरेको आवश्यकताको ही देखना चाहिये। इसमें भी देश, काल, और पात्र मिल जाय, तो उत्तम बात और न मिले, तो कोई बात नहीं। हमें तो जो भूखा है, उसे अन्न देना है; जो प्यासा है, उसे जल देना है; जो वस्त्रहीन है, उसे वस्त्र देना है और जो रोगी है, उसे औषध देनी है। इसी प्रकार कोई किसीको अनुचितरूपसे भयभीत कर रहा है, दुःख दे रहा है, तो उससे उसको छुड़ाना और उसे अभयदान देना हमारा कर्तव्य है।

हाँ, कुपात्रको अन्न-जल इतना नहीं देना चाहिये कि जिससे वह पुनः हिंसा आदि पापोंमें प्रवृत्त हो जाय; जैसे कोई हिंसक मनुष्य अन्न-जलके बिना मर रहा है, तो उसको उतना ही अन्न-जल दे कि जिससे उसके प्राण रह जायँ, वह जी जाय। इस प्रकार उपर्युक्त चारोंके दानमें पात्रता नहीं देखनी है, प्रत्युत आवश्यकता देखनी है।

भगवान्का भक्त भी वस्तु देनेमें पात्र नहीं देखता, वह तो दिये जाता है; क्योंकि वह सबमें अपने प्यारे प्रभुको ही देखता है कि इस रूपमें तो हमारे प्रभु ही आये हैं। अतः वह दान नहीं करता, कर्तव्य-पालन नहीं करता, प्रत्युत पूजा करता है—‘स्वकर्माणा तमभ्यच्च’ (गीता १८।४६)। तात्पर्य यह है कि भक्तकी सम्पूर्ण क्रियाओंका सम्बन्ध भगवान्के साथ होता है।

कर्मफल-सम्बन्धी विशेष बात

ग्यारहवेंसे बाईसवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें जो सात्त्विक यज्ञ, तप और दान आये हैं, वे सब-के-सब ‘दैवी-सम्पत्ति’ हैं और जो राजस तथा तामस यज्ञ, तप और दान आये हैं, वे सब-के-सब ‘आसुरी-सम्पत्ति’ हैं।

१-राजसके दृष्टका कालान्तरिक फल और अदृष्टका लौकिक फल—दोनों एक-जैसे दीखते हुए भी इनमें अन्तर है; जैसे—भोजनके परिणामस्वरूप जो रोग आदि होंगे, वह भौतिक (कालान्तरिक) फल है अर्थात् वह सीधे भोजनका ही परिणाम है और पुत्रेष्टि यज्ञ आदिका जो फल होगा, वह आधिदैविक (लौकिक) फल है अर्थात् वह प्रारब्ध बनकर फल (पुत्रादि)-के रूपमें आता है।

२-यदि राजस पुरुषोंका दम्भ (सत्रहवें अध्यायका बारहवाँ और अठारहवाँ श्लोक) अधिक बढ़ जाय, तो वे नरकोंमें भी जा सकते हैं।

३-स्वर्गमें भी यज्ञ आदि पुण्यकर्मोंके अनुसार उच्च, मध्यम और कनिष्ठ—ऐसी तीन तरहकी श्रेणियाँ होती हैं। उनमें भी उच्च श्रेणीवाले जब अपने समान श्रेणीवालोंको देखते हैं, तब उन्हें ईर्ष्या होती है कि वे हमारे समान पदपर क्यों आये?

आसुरी सम्पत्तिमें आये हुए ‘राजस’ यज्ञ, तप और दानके फलके दो विभाग हैं—दृष्ट और अदृष्ट। इनमें भी दृष्टके दो फल हैं—तात्कालिक और कालान्तरिक। जैसे—राजस भोजनके बाद तृप्तिका होना तात्कालिक फल है और रोग आदिका होना कालान्तरिक फल है। ऐसे ही अदृष्टके भी दो फल हैं—लौकिक और पारलौकिक। जैसे—दम्भपूर्वक ‘दम्भार्थमपि चैव यत्’ (१७।१२), सत्कार-मान-पूजाके लिये ‘सत्कारमानपूजार्थम्’ (१७।१८) और प्रत्युपकारके लिये ‘प्रत्युपकारार्थम्’ (१७।२१) किये गये राजस यज्ञ, तप और दानका फल ‘लौकिक’ है और वह इसी लोकमें, इसी जन्ममें, इसी शरीरके रहते-रहते ही मिलनेकी सम्भावनावाला होता है। स्वर्गको ही परम प्राप्य वस्तु मानकर उसकी प्राप्तिके लिये किये गये यज्ञ आदिका फल ‘पारलौकिक’ होता है। परन्तु राजस यज्ञ ‘अभिधन्धाय तु फलम्’ (१७।१२) और दान ‘फलमुदिश्य वा पुनः’ (१७।२१) का फल लौकिक तथा पारलौकिक—दोनों ही हो सकता है। इसमें भी स्वर्ग-प्राप्तिके लिये यज्ञ आदि करनेवाले (दूसरे अध्यायका बयालीसवाँ-तैतालीसवाँ और नवें अध्यायका बीसवाँ-इक्कीसवाँ श्लोक) और केवल दम्भ, सत्कार, मान, पूजा, प्रत्युपकार आदिके लिये यज्ञ, तप और दान करनेवाले (सत्रहवें अध्यायका बारहवाँ, अठारहवाँ और इक्कीसवाँ श्लोक) दोनों प्रकारके राजस पुरुष जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं। परन्तु तामस यज्ञ और तप करनेवाले (सत्रहवें अध्यायका तेरहवाँ और उन्नीसवाँ श्लोक) तामस पुरुष तो अधोगतिमें जाते हैं—‘अधोगच्छन्ति तामसाः’ (१४।१८), ‘पतन्ति नरकेऽशुचौ’ (१६।१६), ‘आसुरीष्वेव योनिषु’ (१६।१९) ‘ततो यान्यधर्मा गतिम्’ (१६।२०)।

जो मनुष्य यज्ञ करके स्वर्गमें जाते हैं, उनको स्वर्गमें भी दुःख, जलन, ईर्ष्या आदि होते हैं। जैसे—शतक्रतु

१०९२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

इन्द्रको भी असुरोंके अत्याचारोंसे दुःख होता है, कोई तपस्या करे तो उसके हृदयमें जलन होती है, वह भयभीत होता है। इसे पूर्वजन्मके पापोंका फल भी नहीं कह सकते; क्योंकि उनके स्वर्गप्राप्तिके प्रतिबन्धकरूप पाप नष्ट हो जाते हैं—‘पूतपापाः’ (९।२०) और वे यज्ञके पुण्योंसे स्वर्गलोकको जाते हैं। फिर उनको दुःख, जलन, भय आदिका होना किन पापोंका फल है? इसका उत्तर यह है कि यह सब यज्ञमें की हुई पशु-हिंसाके पापका ही फल है।

दूसरी बात, यज्ञ आदि सकामकर्म करनेसे अनेक तरहके दोष आते हैं। गीतामें आया है—‘सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः’ (१८।४८) अर्थात् धूपोंसे अग्निकी तरह सभी कर्म किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं। जब सभी कर्मोंके आरम्भमात्रमें भी दोष रहता है, तब सकामकर्मोंमें तो (सकामभाव होनेसे) दोषोंकी सम्भावना ज्यादा ही होती है और उनमें अनेक तरहके दोष बनते ही हैं। इसलिये शास्त्रोंमें यज्ञ करनेके बाद प्रायश्चित्त करनेका विधान है। प्रायश्चित्त-विधानसे यह सिद्ध होता है कि यज्ञमें दोष (पाप) अवश्य होते हैं। अगर दोष न होते, तो प्रायश्चित्त किस बातका? परन्तु वास्तवमें प्रायश्चित्त करनेपर भी सब दोष दूर नहीं होते, उनका कुछ अंश रह जाता है; जैसे—मैल लगे वस्त्रको साबुनसे धोनेपर भी उसके तन्तुओंके भीतर थोड़ी मैल रह जाती है। इसी कारण इन्द्रादिक देवताओंको भी प्रतिकूल-परिस्थितिजन्य दुःख

परिशिष्ट भाव —शास्त्रमें आया है कि कलियुगमें दान ही एकमात्र धर्म है; अतः जिस-किसी प्रकारसे भी दान दिया जाय, वह कल्याण ही करता है। इसका तात्पर्य है कि कलियुगमें यज्ञ, दान, तप, व्रत आदि शुभकर्म विधिपूर्वक करने कठिन हैं; अतः किसी तरहसे देनेकी, त्याग करनेकी आदत पड़ जाय। इसलिये जिस-किसी प्रकारसे भी दान देते रहना चाहिये।

और मध्यम तथा कनिष्ठ श्रेणीवालोंको देखकर उनके मनमें अभिमान होता है कि हम कितने बड़े हैं!

मध्यम श्रेणीवाले जब अपनेसे उच्च श्रेणीवालोंको देखते हैं, तो उनकी भोग-सामग्री, पद, अधिकार आदिको देखकर उन्हें जलन होती है और कनिष्ठ श्रेणीवालोंको देखकर अभिमान होता है।

कनिष्ठ श्रेणीवालोंमें उच्च और मध्यम श्रेणीवालोंको देखकर असहिष्णुता होती है, जलन होती है कि उनके पास इतनी भोग-सामग्री क्यों है? वे इतने ऊँचे पद-अधिकारपर क्यों गये हैं? और अपने समान श्रेणीवालोंको देखकर ईर्ष्या होती है कि वे हमारे समान कैसे आकर बैठे हैं, तथा जो स्वर्गमें नहीं आये हैं, उनको देखकर अभिमान होता है कि हम कितने उच्च स्थान—स्वर्गमें हैं!

स्वर्गमें जो स्थिति है, वह भी तो नित्य नहीं है; क्योंकि किसी भी श्रेणीवाले क्यों न हों, पुण्य क्षीण हो जानेपर उनको भी मृत्युलोकमें आना पड़ता है—‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशिन्ति’ (गीता ९।२१) और इसकी चिन्ता, इसका भय सदा बना रहता है कि यह स्थिति हमारी रहेगी नहीं, एक दिन चली जायगी।

  • दूसरोंकी उन्नति सही न जाय, ईर्ष्या हो जाय आदि जितने भी दोष हैं, वे पूर्वकृत कर्मोंके फल नहीं हैं। वे सब दोष अन्तःकरणकी अशुद्धिके कारण ही होते हैं। शास्त्रविहित सकाम कर्मोंको करनेसे अन्तःकरणकी सर्वथा शुद्धि नहीं होती, प्रत्युत आंशिक शुद्धि होती है, जिससे स्वर्गादि लोकोंके भोगोंको भोगते हैं। अन्तःकरणकी अशुद्धि सर्वथा तभी मिटती है, जब उद्देश्य केवल भगवान्का ही हो।

भोगना पड़ता है।

वास्तवमें दोषोंकी पूर्ण निवृत्ति तो निष्कामभावपूर्वक कर्तव्य-कर्म करके उन कर्मोंको भगवान्के अर्पण कर देनेसे ही होती है। इसलिये निष्कामभावसहित किये गये कर्म ही श्रेष्ठ हैं। सबसे बड़ी शुद्धि (दोष-निवृत्ति) होती है—‘मैं तो केवल भगवान्का ही हूँ’, इस प्रकार अहंता-परिवर्तनपूर्वक भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य बनानेसे। इससे जितनी शुद्धि होती है, उतनी कर्मोंसे नहीं होती*। भगवान्ने कहा है—

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।

जन्म कोटि अध नासहिं तबहीं॥

(मानस ५।४४।१)

तीसरी बात, गीतामें अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी पापका आचरण क्यों करता है? तो उत्तरमें भगवान्ने कहा—‘काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः’ (३।३७)। तात्पर्य है कि रजोगुणसे उत्पन्न कामना ही पाप कराती है। इसलिये कामनाको लेकर किये जानेवाले राजस यज्ञकी क्रियाओंमें पाप हो सकते हैं।

राजस तथा तामस यज्ञ आदि करनेवाले आसुरी-सम्पत्तिवाले हैं और सात्त्विक यज्ञ आदि करनेवाले दैवी-सम्पत्तिवाले हैं; परन्तु दैवी-सम्पत्तिके गुणोंमें भी यदि ‘राग’ हो जाता है, तो रजोगुणका धर्म होनेसे वह राग भी बन्धनकारक हो जाता है (गीता—चौदहवें अध्यायका छठा श्लोक)।

श्लोक २३-२४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०९३

सम्बन्ध-सोलहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें दैवी-सम्पत्ति मोक्षके लिये और आसुरी-सम्पत्ति बन्धनके लिये बतायी है। दैवी-सम्पत्तिको धारण करनेवाले सात्त्विक मनुष्य परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे जो यज्ञ, तप और दानरूप कर्म करते हैं, उन कर्मोंमें होनेवाली (भाव, विधि, क्रिया आदिकी) कमीकी पूर्तिके लिये क्या करना चाहिये? इसे बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥

ॐ = ॐ, तत् = तत्, सत् = सत्—, इति = इन, त्रिविधः = तीन प्रकारके नामोंसे, ब्रह्मणः = (जिस) परमात्माका, निर्देशः = निर्देश (संकेत) किया गया है, स्मृतः = किया गया है, तेन = उसी परमात्मासे, पुरा = सृष्टिके आदिमें, वेदाः = वेदों, च = तथा, ब्राह्मणाः = ब्राह्मणों, च = और, यज्ञाः = यज्ञोंकी, विहिताः = रचना हुई है।

व्याख्या-'ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः'—ॐ, तत् और सत्—यह तीन प्रकारका परमात्माका निर्देश है अर्थात् परमात्माके तीन नाम हैं (इन तीनों नामोंकी व्याख्या भगवान्ने आगेके चार श्लोकोंमें की है)। 'ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा'—उस परमात्माने पहले (सृष्टिके आरम्भमें) वेदों, ब्राह्मणों और यज्ञोंको बनाया। इन तीनोंमें विधि बतानेवाले वेद हैं, अनुष्ठान करनेवाले ब्राह्मण हैं और क्रिया करनेके लिये यज्ञ हैं। अब इनमें यज्ञ, तप, दान आदिकी क्रियाओंमें कोई कमी रह जाय, तो क्या करें? परमात्माका नाम लें तो उस कमीकी पूर्ति हो जायगी। जैसे रसोई बनानेवाला जलसे आटा सानता (गूँधता) है, तो कभी उसमें जल अधिक पड़ जाय, तो वह क्या करता है? आटा और मिला लेता है। ऐसे ही कोई निष्कामभावसे यज्ञ, दान आदि शुभकर्म करे और उनमें कोई कमी-अंग-वैगुण्य रह जाय, तो जिस भगवान्से यज्ञ आदि रचे गये हैं, उस भगवान्का नाम लेनेसे वह अंग-वैगुण्य ठीक हो जाता है, उसकी पूर्ति हो जाती है।

परिशिष्ट भाव-'महानिर्वाणतन्त्र' में आया है— ॐ तत्सदिति मन्त्रेण यो यत्कर्म समाचरेत्। गृहस्थो वाप्युदासीनस्तस्याभीष्टाय तद् भवेत्॥ जपो होमः प्रतिष्ठा च संस्काराद्यखिलाः क्रियाः। ॐ तत्समन्त्रनिष्पन्नाः सम्पूर्णाः स्युर्न संशयः॥ (१४। १५४-१५५) 'ॐ तत् सत्'—इस मन्त्रसे गृहस्थ अथवा उदासीन (साधु) जो भी कर्म आरम्भ करता है, उसको इससे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। जप, होम, प्रतिष्ठा, संस्कार आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ 'ॐ तत् सत्'—इस मन्त्रसे सफल हो जाती हैं, इसमें सन्देह नहीं है।

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥

तस्मात् = इसलिये, ब्रह्मवादिनाम् = वैदिक सिद्धान्तोंको माननेवाले पुरुषोंकी, विधानोक्ताः = शास्त्रविधिसे नियत, यज्ञदानतपःक्रियाः = यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ, सततं = सदा, ओम् = 'ॐ', इति = इस परमात्माके नामका, उदाहृत्य = उच्चारण करके (ही), प्रवर्तन्ते = आरम्भ होती हैं।

१०९४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

व्याख्या—‘तस्मादोमित्युदाहृत्य’ ”ब्रह्मवादिनाम्”—वेदवादीके लिये अर्थात् वेदोंको मुख्य माननेवाला जो वैदिक सम्प्रदाय है, उसके लिये ‘ॐ’ का उच्चारण करना खास बताया है। वे ‘ॐ’ का उच्चारण करके ही वेदपाठ, यज्ञ, दान, तप आदि शास्त्रविहित क्रियाओंमें प्रवृत्त होते हैं; क्योंकि जैसे गायें साँड़के बिना फलवती नहीं होतीं, ऐसे ही वेदकी जितनी ऋचाएँ हैं, श्रुतियाँ हैं, वे सब ‘ॐ’ का उच्चारण किये बिना फलवती नहीं होतीं अर्थात् फल नहीं देतीं।

‘ॐ’ का सबसे पहले उच्चारण क्यों किया जाता है? कारण कि सबसे पहले ‘ॐ’—प्रणव प्रकट हुआ है। उस प्रणवकी तीन मात्राएँ हैं। उन मात्राओंसे त्रिपदा गायत्री प्रकट हुई है और त्रिपदा गायत्रीसे ऋक्, साम और यजुः—यह वेदत्रयी प्रकट हुई है। इस दृष्टिसे ‘ॐ’ सबका मूल है और इसीके अन्तर्गत गायत्री भी है तथा सब-के-सब वेद भी हैं। अतः जितनी वैदिक क्रियाएँ की जाती हैं, वे सब ‘ॐ’ का उच्चारण करके ही की जाती हैं।

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।

दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥ २५ ॥

तत्= ‘तत्’ नामसे कहे जानेवाले परमात्माके लिये ही सब कुछ है—मोक्षकाङ्क्षिभिः = मुक्ति चाहनेवाले मनुष्योंद्वारायज्ञतपः-
इति= ऐसा मानकरफलम् = फलकीक्रियाः = यज्ञ और तपरूप क्रियाएँ
अनभिसन्धाय = इच्छासे रहित होकरच = तथा
विविधाः = अनेक प्रकारकीदानक्रियाः = दानरूप क्रियाएँ
क्रियन्ते = की जाती हैं।

व्याख्या—‘तदित्यनभिसन्धाय ’ ” मोक्षकाङ्क्षिभिः”—केवल उस परमात्माकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे, किंचिन्मात्र भी फलकी इच्छा न रखकर शास्त्रीय यज्ञ, तप, दान आदि शुभकर्म किये जायें। कारण कि विहित-निषिद्ध, शुभ-अशुभ आदि क्रियामात्रका आरम्भ होता है और समाप्ति होती है। ऐसे ही उस क्रियाका जो फल होता है, उसका भी संयोग होता है और वियोग होता है अर्थात् कर्मफलके भोगका भी आरम्भ होता है और समाप्ति होती है। परन्तु परमात्मा तो उस क्रिया और फलभोगके आरम्भ होनेसे पहले भी हैं तथा क्रिया और फलभोगकी समाप्तिके बाद भी हैं एवं क्रिया और फलभोगके समय भी वैसे-के-वैसे हैं। परमात्माकी सत्ता नित्य-निरन्तर है। नित्य-निरन्तर रहनेवाली इस सत्ताकी तरफ ध्यान दिलानेमें ही ‘तत् इति’ पदोंका तात्पर्य है; और उत्पत्ति-विनाशशील फलकी तरफ ध्यान न देनेमें ही ‘अनभिसन्धाय फलम्’ पदोंका तात्पर्य है; अर्थात् नित्य-निरन्तर रहनेवाले तत्त्वकी स्मृति रहनी चाहिये और नाशवान् फलकी अभिसंधि (इच्छा) बिलकुल नहीं रहनी चाहिये।

नित्य-निरन्तर वियुक्त होनेवाले, प्रतिक्षण अभावमें

जानेवाले इस संसारमें जो कुछ देखने, सुनने और जाननेमें आता है, उसीको हम प्रत्यक्ष, सत्य मान लेते हैं और उसीकी प्राप्तिमें हम अपनी बुद्धिमानी और बलको सफल मानते हैं। इस परिवर्तनशील संसारको प्रत्यक्ष माननेके कारण ही सदा-सर्वदा सर्वत्र परिपूर्ण रहता हुआ भी वह परमात्मा हमें प्रत्यक्ष नहीं दीखता। इसलिये एक परमात्माप्राप्तिका ही उद्देश्य रखकर उस संसारका अर्थात् अहंता-ममता (मैं-मेरेपन)-का त्याग करके, उन्हींकी दी हुई शक्तिसे, यज्ञ आदिको उन्हींका मानकर निष्कामभावपूर्वक उन्हींके लिये यज्ञ आदि शुभकर्म करने चाहिये। इसीमें ही मनुष्यकी वास्तविक बुद्धिमानी और बल-(पुरुषार्थ-) की सफलता है। तात्पर्य यह है कि जो संसार प्रत्यक्ष प्रतीत हो रहा है, उसका तो निराकरण करना है और जिसको अप्रत्यक्ष मानते हैं, उस ‘तत्’ नामसे कहे जानेवाले परमात्माका अनुभव करना है, जो नित्य-निरन्तर प्राप्त है।

भगवानुके भक्त (भगवान्का उद्देश्य रखकर) ‘तत्’ पदके बोधक राम, कृष्ण, गोविन्द, नारायण, वासुदेव, शिव आदि नामोंका उच्चारण करके सब क्रियाएँ आरम्भ करते हैं।

श्लोक २६ ] * साधक-संजीवनी * १०९५

अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्य यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, जप, स्वाध्याय, ध्यान, समाधि आदि जो भी क्रियाएँ करते हैं, वे सब भगवान्‌के लिये, भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये, भगवान्‌की आज्ञा-पालनके लिये ही करते हैं, अपने लिये नहीं। कारण कि जिनसे क्रियाएँ की जाती हैं, वे शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदि सभी परमात्माके ही हैं,

हमारे नहीं हैं। जब शरीर आदि हमारे नहीं हैं, तो घर, जमीन-जायदाद, रुपये-पैसे, कुटुम्ब आदि भी हमारे नहीं हैं। ये सभी प्रभुके हैं और इनमें जो सामर्थ्य, समझ आदि है, वह भी सब प्रभुकी है और हम खुद भी प्रभुके ही हैं। हम प्रभुके हैं और प्रभु हमारे हैं-इस भावसे वे सब क्रियाएँ प्रभुकी प्रसन्नताके लिये ही करते हैं।

परिशिष्ट भाव-परमात्माके लिये परोक्षवाचक 'तत्' (वह) पदके प्रयोगका तात्पर्य है कि परमात्मा अलौकिक हैं-'उत्तम: पुरुषस्त्वन्य:' (गीता १५। १७)। वे विचारके विषय नहीं हैं, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासके विषय हैं।

सम्बन्ध-चौबीसवें श्लोकमें 'ॐ' की और पचीसवें श्लोकमें 'तत्' शब्दकी व्याख्या करके अब भगवान्‌ आगेके दो श्लोकोंमें पाँच प्रकारसे 'सत्' शब्दकी व्याख्या करते हैं।

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते॥ २६॥

पार्थ = हे पार्थ! सत् = 'सत्'- इति = ऐसा एतत् = यह परमात्माका नाम सद्भावे = सत्तामात्रमें

च = और साधुभावे = श्रेष्ठ भावमें प्रयुज्यते = प्रयोग किया जाता है तथा = तथा

प्रशस्ते = प्रशंसनीय कर्मणि = कर्मके साथ सत् = 'सत्' शब्द: = शब्द युज्यते = जोड़ा जाता है।

व्याख्या-'सद्भावे'-'परमात्मा हैं' इस प्रकार परमात्माकी सत्ता-(होनेपन-) का नाम 'सद्भाव' है। उस परमात्माके सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि जितने रूप हैं और सगुण-साकारमें भी उसके विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि जितने अवतार हैं, वे सब-के-सब 'सद्भाव' के अन्तर्गत हैं। इस प्रकार जिसका किसी देश, काल, वस्तु आदिमें कभी अभाव नहीं होता, ऐसे परमात्माके जो अनेक रूप हैं, अनेक नाम हैं, अनेक तरहकी लीलाएँ हैं, वे सब-के-सब 'सद्भाव' के अन्तर्गत हैं।

नहीं होता-ऐसे परमात्माके लिये और उस परमात्माकी प्राप्तिके लिये दैवी-सम्पत्तिके जो सत्य, क्षमा, उदारता, त्याग आदि श्रेष्ठ गुण हैं, उनके लिये 'सत्' शब्दका प्रयोग किया जाता है; जैसे-सत्-तत्त्व, सद्गुण, सद्भाव आदि।

'साधुभावे'-परमात्मप्राप्तिके लिये अलग-अलग सम्प्रदायोंमें अलग-अलग जितने साधन बताये गये हैं, उनमें हृदयके जो दया, क्षमा आदि श्रेष्ठ, उत्तम भाव हैं, वे सब-के-सब 'साधुभाव' के अन्तर्गत हैं।

'प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते'-परमात्मप्राप्तिके लिये अलग-अलग सम्प्रदायोंमें अलग-अलग जितने साधन बताये गये हैं, उनमें क्रियारूपसे जितने श्रेष्ठ आचरण हैं, वे सब-के-सब 'प्रशस्ते कर्मणि' के अन्तर्गत हैं। इसी प्रकार शास्त्रविधिके अनुसार यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कार; अन्नदान, भूमिदान, गोदान आदि दान; और कुआँ-बावड़ी खुदवाना, धर्मशाला बनवाना, मन्दिर बनवाना, बगीचा लगवाना आदि श्रेष्ठ कर्म भी 'प्रशस्ते कर्मणि' के अन्तर्गत आते हैं। इन सब श्रेष्ठ आचरणोंमें, श्रेष्ठ कर्मोंमें 'सत्' शब्दका प्रयोग किया जाता है; जैसे-सदाचार, सत्कर्म, सतसेवा, सद्व्यवहार आदि।

'सदित्येतत्प्रयुज्यते'-सत्तामें और श्रेष्ठतामें 'सत्' शब्दका प्रयोग किया जाता है अर्थात् जो सदा है, जिसमें कभी किंचिन्मात्र भी कमी और अभाव

परिशिष्ट भाव-परमात्माके अस्तित्व या होनेपनको 'सद्भाव' कहते हैं, जिसका कभी अभाव नहीं होता-'नाभावो विद्यते सत:' (गीता २। १६)। प्राय: सभी आस्तिक यह भाव तो मानते ही हैं कि सर्वोपरि सर्वनियन्ता

१०९६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

कोई विलक्षण शक्ति सदासे है और वह अपरिवर्तनशील है। जो संसार प्रत्यक्ष प्रतिक्षण बदलता है तथा जिसका अभाव होता है, उसको 'है' अथवा स्थिर कैसे कहा जाय? कारण कि इन्द्रियों, बुद्धि आदिसे जिसको देखते, जानते हैं, वह संसार पहले नहीं था, आगे भी नहीं रहेगा और वर्तमानमें भी जा रहा है—यह सभीका अनुभव है। जिनसे संसारको देखते, जानते हैं, वे इन्द्रियाँ, बुद्धि आदि भी संसारके ही हैं। फिर भी आश्चर्य यह है कि 'नहीं' होते हुए भी संसार 'है' के रूपमें स्थिर दिखायी दे रहा है! अगर संसार वास्तवमें होता तो बदलता नहीं और बदलता है तो 'है' नहीं। अतः यह 'होनापन' संसार शरीरादिका नहीं है, प्रत्युत सत्-तत्त्व (परमात्मा)-का है, जिससे नहीं होते हुए भी संसार 'है' दीखता है।

अन्तःकरणके श्रेष्ठ भावोंको 'साधुभाव' कहते हैं। परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले होनेसे श्रेष्ठ भावोंके लिये 'सत्' शब्दका प्रयोग किया जाता है। श्रेष्ठ भाव अर्थात् सद्गुण-सदाचार दैवी-सम्पत्ति है। दैवी-सम्पत्ति 'सत्' है और आसुरी-सम्पत्ति 'असत्' है। मुक्ति देनेवाले सब साधन 'सत्' हैं और बन्धनकारक सब कर्म 'असत्' हैं। दुर्गुण-दुराचार 'असत्' हैं, पर उनका त्याग 'सत्' है। असत्का त्याग भी 'सत्' है और सत्का ग्रहण भी 'सत्' है। वास्तवमें असत्के त्यागकी जितनी जरूरत है, उतनी 'सत्' को ग्रहण करनेकी जरूरत नहीं है। 'असत्' का त्याग किये बिना लाया गया 'सत्' ऊपरसे चिपकाया जाता है, जो ठहरता नहीं। परन्तु असत्का त्याग करनेसे 'सत्' भीतरसे उदय होता है। अतः जिसको हम असत्-रूपसे जानते हैं, उसका त्याग करनेसे 'सत्' का अनुभव हो जाता है।

यज्ञ, तप, दान, तीर्थ, व्रत, पूजा-पाठ, विवाह आदि जितने भी शास्त्रविहित शुभकर्म हैं, वे स्वयं ही प्रशंसनीय होनेसे सत्कर्म हैं। परन्तु इन प्रशंसनीय कर्मोंका सम्बन्ध अगर भगवान्के साथ न हो तो ये 'सत्' न कहलाकर केवल शास्त्रविहित कर्ममात्र रह जाते हैं। यद्यपि दैत्य-दानव भी तपस्या आदि प्रशंसनीय कर्म करते हैं, तथापि असद्भाव अर्थात् अपने स्वार्थ और दूसरेके अहितका भाव होनेसे वे बाँधनेवाले असत्-कर्म हो जाते हैं। (इसी अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। उनसे अगर ब्रह्मलोककी प्राप्ति भी हो जाय तो वहाँसे लौटकर आना पड़ता है—'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन' (गीता ८।१६)। भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करनेवाले मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होते—'न हि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गतिं तात गच्छति' (गीता ६।४०); क्योंकि उसका फल 'सत्' होता है। जो कर्म स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके प्राणिमात्रके हितके भावसे किये जाते हैं, वही वास्तवमें प्रशंसनीय सत्कर्म होते हैं।

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।

कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥

यज्ञे= यज्ञएव= (वह) भीजानेवाला
= तथासत्= 'सत्'—कर्म
तपसि= तपइति= ऐसेएव
= औरउच्यते= कही जाती हैसत्
दाने= दानरूप क्रियामें
(जो)= औरइति= ऐसा
स्थितिः= स्थिति (निष्ठा) है,तदर्थीयम्= उस परमात्माके
निमित्त कियाअभिधीयते= कहा
जाता है।

व्याख्या —'यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते'—यज्ञ, तप और दानरूप प्रशंसनीय क्रियाओंमें जो स्थिति (निष्ठा) होती है, वह 'सत्' कही जाती है। जैसे, किसीकी सात्त्विक यज्ञमें, किसीकी सात्त्विक तपमें और किसीकी सात्त्विक दानमें जो स्थिति—निष्ठा है अर्थात् इनमेंसे एक-एक चीजके प्रति हृदयमें जो श्रद्धा है और इन्हें करनेकी जो तत्परता है, वह 'सन्निष्ठा' (सत्-निष्ठा) कही जाती है।

'च' पद देनेका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार लोगोंकी सात्त्विक यज्ञ, तप और दानमें श्रद्धा—निष्ठा होती है, ऐसे ही किसीकी वर्णधर्ममें, किसीकी आश्रमधर्ममें, किसीकी सत्यव्रत-पालनमें, किसीकी अतिथि-सत्कारमें, किसीकी सेवामें, किसीकी आज्ञा-पालनमें, किसीकी पातिव्रत-धर्ममें और किसीकी गंगाजीमें, किसीकी यमुनाजीमें, किसीकी प्रयागराज आदि विशेष तीर्थोंमें जो हृदयसे श्रद्धा है, उनमें जो रुचि,

श्लोक २८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०९७

विश्वास और तत्परता है, वह भी 'सनिष्ठा' कही जाती है। 'कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते' —उन प्रशंसनीय कर्मोंके अलावा कर्मोंके दो तरहके स्वरूप होते हैं—लौकिक (स्वरूपसे ही संसार-सम्बन्धी) और पारमार्थिक (स्वरूपसे ही भगवत्सम्बन्धी):—

(१) वर्ण और आश्रमके अनुसार जीविकाके लिये यज्ञ, अध्यापन, व्यापार, खेती आदि व्यावहारिक कर्तव्य-कर्म और खाना-पीना, उठना-बैठना, चलना-फिरना, सोना-जगना आदि शारीरिक कर्म—ये सभी 'लौकिक' हैं।

(२) जप-ध्यान, पाठ-पूजा, कथा-कीर्तन, श्रवण-मनन, चिन्तन-ध्यान आदि जो कुछ किया जाय, सब 'पारमार्थिक' हैं। इन दोनों प्रकारके कर्मोंको अपने सुख-आराम आदिका उद्देश्य न रखकर निष्कामभाव एवं श्रद्धा-विश्वाससे केवल भगवान्के लिये अर्थात् भगवत्तीर्थ किये जायें तो वे सब-के-सब 'तदर्थीय कर्म' हो जाते हैं। भगवर्द्ध होनेके कारण उनका फल 'सत्' हो जाता है अर्थात् सत्स्वरूप परमात्माके साथ सम्बन्ध होनेसे वे सभी 'दैवी-सम्पत्ति' हो जाते हैं, जो कि मुक्ति देनेवाली है।

जैसे अग्निमें टीकरी रख दी जाय तो अग्नि उसको अग्निरूप बना देती है। यह सब अग्निकी ही विशेषता

परिशिष्ट भाव —पचीसवें श्लोकमें निष्कामभावसे अब यहाँ भगवान्के लिये कर्म करनेकी बात आयी है। 'मोक्षकादुक्षिभिः' (गीता १७।२५) और भक्ति चाहनेवाले भगवान्के लिये कर्म करते हैं (गीता—नवें अध्यायका छब्बीसवाँ, सताईसवाँ, अठ्ठाईसवाँ श्लोक)।

भगवान्का सम्बन्ध होनेसे भी कर्म 'सत्' अर्थात् सत्-फल देनेवाला हो जाता है और असत्के सम्बन्धका त्याग होनेसे भी कर्म 'सत्' हो जाता है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें आया कि परमात्माके उद्देश्यसे किये गये कर्म 'सत्' हो जाते हैं। परन्तु परमात्माके उद्देश्यसे रहित जो कर्म किये जाते हैं, उनकी कौन-सी संज्ञा होगी? इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

अश्रद्धया हृतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥

पार्थ= हे पार्थ!यत्= (और भी) जो कुछइह= यहाँ होता है
अश्रद्धया= अश्रद्धासेकृतम्= किया जाय, (वह सब)= और
हृतम्= किया हुआ हवन,असत्= 'असत्'—= न
दत्तम्= दिया हुआ दान (और)इति= ऐसाप्रेत्य= मरनेके बाद ही होता है अर्थात् उसका
तप्तम्= तपा हुआउच्यते= कहा जाता है।कहीं भी सत्
तपः= तपतत्= उसका (फल)फल नहीं
= तथानो= न तोहोता।

१०९८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

व्याख्या —‘अश्रद्धया हृतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्’—अश्रद्धापूर्वक यज्ञ, दान और तप किया जाय, और ‘कृतं च यत्’* अर्थात् जिसकी शास्त्रमें आज्ञा आती है, ऐसा जो कुछ कर्म अश्रद्धापूर्वक किया जाय—वह सब ‘असत्’ कहा जाता है।

‘अश्रद्धया’ पदमें श्रद्धाके अभावका वाचक ‘नञ्’ समास है, जिसका तात्पर्य है कि आसुरलोग परलोक, पुनर्जन्म, धर्म, ईश्वर आदिमें श्रद्धा नहीं रखते।

बरन धर्मं नहीं आश्रम चारी।

श्रुति विरोध रत सब नर नारी॥

(मानस ७।१८।१)

—इस प्रकारके विरुद्ध भाव रखकर वे यज्ञ, दान आदि क्रियाएँ करते हैं।

जब वे शास्त्रमें श्रद्धा ही नहीं रखते, तो फिर वे यज्ञ आदि शास्त्रीय कर्म क्यों करते हैं? वे उन शास्त्रीय कर्मोंको इसलिये करते हैं कि लोगोंमें उन क्रियाओंका ज्यादा प्रचलन है, उनको करनेवालोंका लोग आदर करते हैं तथा उनको करना अच्छा समझते हैं। इसलिये समाजमें अच्छा बननेके लिये और जो लोग यज्ञ आदि शास्त्रीय कर्म करते हैं, उनकी श्रेणीमें गिने जानेके लिये वे श्रद्धा न होनेपर भी शास्त्रीय कर्म कर देते हैं।

‘असदित्युच्यते पार्थ न च तत्तत्प्येव नो इह’ —अश्रद्धापूर्वक यज्ञ आदि जो कुछ शास्त्रीय कर्म किया जाय, वह सब ‘असत्’ कहा जाता है। उसका न इस लोकमें फल होता है और न परलोकमें—जन्म-जन्मान्तरमें ही फल होता है। तात्पर्य यह कि सकामभावसे श्रद्धा एवं विधिपूर्वक शास्त्रीय कर्मोंको करनेपर यहाँ धन-वैभव, स्त्री-पुत्र आदिकी प्राप्ति और मरनेके बाद स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति हो सकती है और उन्हीं कर्मोंको निष्कामभावसे श्रद्धा एवं विधिपूर्वक करनेपर अन्तःकरणकी शुद्धि होकर परमात्मप्राप्ति हो जाती है; परन्तु अश्रद्धापूर्वक कर्म करनेवालोंको इनमेंसे कोई भी फल प्राप्त नहीं होता।

यदि यहाँ यह कहा जाय कि अश्रद्धापूर्वक जो कुछ भी किया जाता है, उसका इस लोकमें और परलोकमें कुछ भी फल नहीं होता, तो जितने पाप-कर्म किये जाते हैं, वे सभी अश्रद्धासे ही किये जाते हैं, तब तो उनका भी कोई फल नहीं होना चाहिये! और मनुष्य भोग भोगने तथा संग्रह करनेकी

इच्छाको लेकर अन्याय, अत्याचार, झूठ, कपट, धोखेबाजी आदि जितने भी पाप-कर्म करता है, उन कर्मोंका फल दण्ड भी नहीं चाहता! पर वास्तवमें ऐसी बात है नहीं। कारण कि कर्मोंका यह नियम है कि रागी पुरुष रागपूर्वक जो कुछ भी कर्म करता है, उसका फल कर्ताके न चाहनेपर भी कर्ताको मिलता ही है। इसलिये आसुरी-सम्पदावालोंको बन्धन और आसुरी योनियों तथा नरकोंकी प्राप्ति होती है।

छोटे-से-छोटा और साधारण-से-साधारण कर्म भी यदि उस परमात्माके उद्देश्यसे ही निष्कामभावपूर्वक किया जाय, तो वह कर्म ‘सत्’ हो जाता है अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला हो जाता है; परन्तु बड़े-से-बड़ा यज्ञादि कर्म भी यदि श्रद्धापूर्वक और शास्त्रीय विधि-विधानसे सकामभावपूर्वक किया जाय, तो वह कर्म भी फल देकर नष्ट हो जाता है; परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला नहीं होता तथा वे यज्ञादि कर्म यदि अश्रद्धापूर्वक किये जायें, तो वे सब असत् हो जाते हैं अर्थात् ‘सत्’ फल देनेवाले नहीं होते। तात्पर्य यह है कि परमात्माकी प्राप्तिमें क्रियाकी प्रधानता नहीं है, प्रत्युत श्रद्धाभावकी ही प्रधानता है।

पूर्वोक्त सद्भाव, साधुभाव, प्रशस्त कर्म, सत्-स्थिति और तदर्थीय कर्म—ये पाँचों परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले होनेसे अर्थात् ‘सत्’—परमात्माके साथ सम्बन्ध जोड़नेवाले होनेसे ‘सत्’ कहे जाते हैं।

अश्रद्धासे किये गये कर्म ‘असत्’ क्यों होते हैं? वेदोंने, भगवान्ने और शास्त्रोंने कृपा करके मनुष्योंके कल्याणके लिये ही ये शुभकर्म बताये हैं, पर जो मनुष्य इन तीनोंपर अश्रद्धा करके शुभकर्म करते हैं, उनके ये सब कर्म ‘असत्’ हो जाते हैं। इन तीनोंपर की हुई अश्रद्धाके कारण उनको नरक आदि दण्ड मिलने चाहिये; परन्तु उनके कर्म शुभ (अच्छे) हैं, इसलिये उन कर्मोंका कोई फल नहीं होता—यही उनके लिये दण्ड है।

मनुष्यको उचित है कि वह यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि शास्त्रविहित कर्मोंको श्रद्धापूर्वक और निष्कामभावसे करे। भगवान्ने विशेष कृपा करके मानव-शरीर दिया है और इसमें शुभकर्म करनेसे अपनेको और सब लोगोंको लाभ होता है। इसलिये जिससे अभी और परिणाममें सबका हित हो—ऐसे श्रेष्ठ कर्तव्य-कर्म श्रद्धापूर्वक और भगवान्की प्रसन्नताके लिये करते रहना चाहिये।

  • यहाँ ‘सहचरित।सहचरितयोर्मध्ये सहचरितस्थैव ग्रहणम्’—व्याकरणके इस न्यायके अनुसार यज्ञ, दान और तपके साहचर्यसे ‘कृतम्’ पदसे शास्त्रीय कर्म ही लिये जायेंगे।

श्लोक २८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०९९

परिशिष्ट भाव— ‘कृतं च यत्’ पदोंमें नामजप, कीर्तन आदि नहीं आयेगे; क्योंकि उनमें भगवान्का सम्बन्ध होनेसे वे ‘कर्म’ नहीं हैं, प्रत्युत ‘उपासना’ है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्,—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतापनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘श्रद्धात्रयविभागयोग’ नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥

इस अध्यायमें श्रद्धाके तीन विभाग किये गये हैं—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। इस विभागको जो ठीक-ठीक जान लेगा, वह सात्त्विकी श्रद्धाका ग्रहण और राजसी-तामसी श्रद्धाका त्याग कर देगा। राजसी-तामसी श्रद्धाका त्याग करते ही (सात्त्विकी श्रद्धासे) भगवान्के साथ स्वतःसिद्ध नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जायगा। इसलिये इस अध्यायका नाम ‘श्रद्धात्रयविभागयोग’ रखा गया है।

सत्रहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें ‘अथ सप्तदशोऽध्यायः’ के तीन, ‘अर्जुन उवाच’ आदि पदोंके चार, श्लोकोंके तीन सौ अड़तीस और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग तीन सौ अड़वावन है।

(२) इस अध्यायमें ‘अथ सप्तदशोऽध्यायः’ के आठ, ‘अर्जुन उवाच’ आदि पदोंके तेरह, श्लोकोंके आठ सौ छियानबे और पुष्पिकाके इक्यावन अक्षर हैं। इस प्रकार

सम्पूर्ण अक्षरोंका योग नौ सौ अड़सठ है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें दो उवाच हैं—‘अर्जुन उवाच’ और ‘श्रीभगवानुवाच’।

सत्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके अट्ठाईस श्लोकोंमेंसे तीसरे श्लोकके पहले चरणमें ‘मगण’ और तीसरे चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘संकीर्ण-विपुला’; दसवें और बारहवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा पचीसवें-छब्बीसवें श्लोकोंके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’; सोलहवें-सत्रहवें श्लोकोंके प्रथम चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; ग्यारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’; और उन्नीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उन्नीस श्लोक ठीक ‘पथ्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

चित्र: भगवान श्रीकृष्ण

(चित्र: A circular illustration of Lord Krishna playing a flute, surrounded by 'श्रीरामचंद्राय नमः')

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथाष्टादशोऽध्यायः

अवतरणिका—

श्रीभगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें ‘एषा तेऽभहिता साङ्ख्ये बुद्धियोगे त्विमां शृणु’ पदोंसे जिस सांख्ययोग और कर्मयोगकी बात कही है, उसीको तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठाके नामसे कहा है। उन दोनों निष्ठाओंके तत्त्वको अलग-अलग रूपसे ठीक जाननेकी इच्छा अर्जुनके मनमें थी। परन्तु जिस प्रकार भगवान्को सातवेंसे पंद्रहवें अध्यायतक दैवी-सम्पत्ति और आसुरी-सम्पत्तिको कहनेका अवसर प्राप्त नहीं हुआ, उसी प्रकार अर्जुनको भी तीसरेसे सत्रहवें अध्यायतक उन दोनों निष्ठाओंके विषयमें अपनी जिज्ञासा प्रकट करनेका अवसर प्राप्त नहीं हुआ।

तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें दो निष्ठाओंको कहकर भगवान्ने चौथे अध्यायके पहले श्लोकमें बताया कि मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। इसपर अर्जुनने प्रश्न किया कि आपका जन्म तो अभीका है, फिर आपने सृष्टिके आदिमें सूर्यको कैसे उपदेश दिया? उत्तरमें भगवान्ने अपने अवतार और कर्मयोगके तत्त्वका वर्णन किया। चौथे अध्यायके ही चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको ज्ञान प्राप्त करनेकी आज्ञा दी—‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेव्या’ और बयालीसवें श्लोकमें योगमें स्थित होनेकी आज्ञा दी—‘छिन्त्वैन संशयं योगमातिष्ठोतिष्ठ भारत’ इन दो अलग-अलग आज्ञाओंके कारण अर्जुनने पाँचवें अध्यायके आरम्भमें दोनोंमें अपने लिये एक निश्चित कल्याणकारक साधन पूछा। उसके उत्तरमें भगवान्ने पाँचवें अध्यायका विषय पूरा कहकर अपनी ओरसे ही छठे अध्यायका विषय आरम्भ किया।

छठे अध्यायके तैंतीसवें-चौंतीसवें श्लोकोंमें अर्जुनने मनकी चंचलताके विषयमें प्रश्न किया। उसका भगवान्ने बहुत संक्षेपसे उत्तर दिया। फिर अर्जुनने सैंतीसवेंसे उन्तालीसवें श्लोकतक योगभ्रष्ट पुरुषकी गतिके विषयमें प्रश्न किया। उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने छठे अध्यायका विषय समाप्त किया। छठे अध्यायके अन्तिम श्लोकमें भगवान्ने अपने भक्तको सम्पूर्ण योगियोंमें परम श्रेष्ठ बताया। उसीको लेकर भगवान्ने सातवें अध्यायका विषय आरम्भ किया और उसमें भक्तिका विशेष वर्णन किया।

सातवें अध्यायके अन्तमें आये हुए ब्रह्म, अध्यात्म आदिको लेकर अर्जुनने आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न किये। उनमेंसे छः प्रश्नोंका उत्तर संक्षेपसे देकर अन्तकालीन गति-विषयक सातवें प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने विस्तारपूर्वक आठवें अध्यायका विषय कहा। फिर सातवें अध्यायमें जो विषय छूट गया था, उसी विषयका वर्णन नवें अध्यायमें तथा दसवें अध्यायमें ग्यारहवें श्लोकतक किया। दसवें अध्यायके नवें, दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें भक्त और उनपर कृपाकी बात सुनकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए और प्रभावित भी हुए। अतः अर्जुनने बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक भगवान्की स्तुति की और अपनी विभूतियोंको विस्तारसे कहनेके लिये प्रार्थना की। अपनी मुख्य-मुख्य विभूतियोंको कहते हुए भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तमें कहा कि ‘हे अर्जुन! तेरको बहुत जाननेकी क्या जरूरत है? मैं सम्पूर्ण संसारको अपने एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ। इसी बातको लेकर ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने भगवान्से अपना विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना की। अपना विश्वरूप दिखकर भगवान्ने ग्यारहवें अध्यायके अन्तमें कहा कि अनन्य भक्तिसे मेरा दर्शन, ज्ञान और मेरेमें प्रवेश—ये तीनों हो जाते हैं।

ग्यारहवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने भक्तकी महिमा कही और उससे पहले (चौथे अध्यायके चौंतीसवेंसे सैंतीसवें श्लोकतक, पाँचवें अध्यायके तेरहवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक, छठे अध्यायके चौबीसवेंसे अट्ठाईसवें श्लोकतक और आठवें अध्यायके ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक) निर्गुण-तत्त्वकी उपासनाकी महिमा कही। उन

१२०२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है—इस बातको अर्जुनने बारहवें अध्यायके आरम्भमें पूछा। उत्तरमें भगवान्ने बारहवें अध्यायमें भक्तिकी और तेरहवें-चौदहवें अध्यायोंमें निर्गुण-साधनाकी बात कही। चौदहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने गुणातीतके लक्षण, आचरण और गुणातीत होनेका उपाय पूछा तो भगवान्ने गुणातीतके लक्षण और आचरण बताकर अपनी अव्यभिचारिणी भक्तिकी गुणातीत होनेका उपाय बताया। उसी-(अव्यभिचारिणी भक्ति-) के वर्णनमें भगवान्ने पंद्रहवें अध्यायका विषय कहा। पंद्रहवें अध्यायके अन्तमें 'स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत' पदोंसे यह बात कही कि दैवी-सम्पत्तिवाले पुरुष मेरा भजन करते हैं और अर्थात्तरमें आसुरी-सम्पत्तिवाले पुरुष मेरा भजन नहीं करते। इससे पहले भी सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें और नवें अध्यायके बारहवें-तेरहवें श्लोकोंमें संकेतरूपसे दैवी और आसुरी-सम्पत्तिका वर्णन हुआ था। अतः दैवी और आसुरी-सम्पत्तिका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये सोलहवें अध्यायका आरम्भ हुआ।

सोलहवें अध्यायके उपान्त्य श्लोकको लेकर अर्जुनने सत्रहवें अध्यायके आरम्भमें निष्ठाके विषयमें प्रश्न किया। उत्तरमें भगवान्ने तीन प्रकारकी श्रद्धाका वर्णन करते हुए अध्यायका विषय पूरा कर दिया। सत्रहवें अध्यायके बाद अब अर्जुन तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कही दो निष्ठाओंके तत्त्वको अलग-अलग स्पष्ट जाननेके लिये भगवान्के सामने अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हैं।

अर्जुन उवाच

सन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।

**त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥ ***

  • अर्जुनकी इस जिज्ञासाके समाधानमें भगवान्ने जो-जो बातें कही हैं, उनके आधारपर अर्जुनके मनमें आयी अन्य जिज्ञासाओंका भी अनुमान लगाया जा सकता है, जो इस प्रकार हैं—

(क) सन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्—

(१) संन्यास किसे कहते हैं?—

किसी भी कर्मके साथ कर्तापनका भाव न रहना और बुद्धिका कहीं भी लिप्त न होना (१८।१७)।

(२) संन्यासी कैसा होना चाहिये?—

रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहसे युक्त तथा सिद्धि-असिद्धिमें निर्बिंकार होना चाहिये (१८।२६)।

(३) संन्यासका साधन कैसा होना चाहिये?—

सात्त्विकी बुद्धिवाला, वैराग्यवान्, एकात्मका सेवन करनेवाला, इन्द्रियोंका नियमन करनेवाला, शरीर-वाणी-मनको संयत करनेवाला आदि होना चाहिये (१८।५१-५३)।

(४) संन्यासीके आचरण कैसे होने चाहिये?—

कर्तृत्वाभिमान और राग-द्वेषसे रहित होकर कर्म करना (१८।२३)।

(५) संन्यासीका भाव कैसा होना चाहिये?—

सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक परमात्मतत्त्वको देखना (१८।२०)।

(६) संन्यासका फल क्या होता है?—

परमात्मतत्त्वमें प्रविष्ट होना (१८।५५)।

(ख) त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन—

(१) त्याग किसे कहते हैं?—

कर्म और कर्मफलकी आसक्तिका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करना (१८।६)।

(२) त्यागी कैसा होना चाहिये?—

कर्मफलका त्यागी होना चाहिये (१८।११)।

(३) त्यागका साधन कैसा होना चाहिये?—

कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग (१८।९)।

श्लोक १ ]

  • साधक-संजीवनी *

११०३

अर्जुन बोले—

महाबाहो= हे महाबाहो != औरपृथक्= अलग-अलग
हृषीकेश= हे हृषीकेश !
केशिनिषूदन= हे केशिनिषूदन !त्यागस्य= त्यागकावेदितुम्= जानना
सन्यासस्य= (मैं) संन्यासतत्त्वम्= तत्त्वइच्छामि= चाहता हूँ।

व्याख्या —‘सन्त्यासस्य महाबाहो’……‘पृथक्केशिनिषूदन’—यहाँ ‘महाबाहो’ सम्बोधन सामर्थ्यका सूचक है। अर्जुनद्वारा इस सम्बोधनका प्रयोग करनेका भाव यह है कि आप सम्पूर्ण विषयोंको कहनेमें समर्थ हैं; अतः मेरी जिज्ञासाका समाधान आप इस प्रकार करें, जिससे मैं विषयको सरलतासे समझ सकूँ।

‘हृषीकेश’ सम्बोधन अन्तर्यामीका वाचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ; अतः इस विषयमें जो-जो आवश्यक बातें हों, उनको आप (मेरे पूछे बिना भी) कह दें।

‘केशिनिषूदन’ सम्बोधन विघ्नोंको दूर करनेवालेका सूचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि जिस प्रकार आप अपने भक्तोंके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर कर देते हैं, उसी प्रकार मेरे भी सम्पूर्ण विघ्नोंको अर्थात् शंकाओं और संशयोंको दूर कर दें।

जिज्ञासा प्रायः दो प्रकारसे प्रकट की जाती है—

(१) अपने आचरणमें लानेके लिये और (२) सिद्धान्तको समझनेके लिये। जो केवल पढ़ाई करनेके लिये (सीखनेके लिये) सिद्धान्तको समझते हैं, वे केवल पुस्तकोंके विद्वान् बन सकते हैं और नयी पुस्तक भी बना सकते हैं, पर अपना कल्याण नहीं कर सकते*। अपना कल्याण तो वे ही कर सकते हैं, जो सिद्धान्तको समझकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये तत्पर हो जाते हैं।

यहाँ अर्जुनकी जिज्ञासा भी केवल सिद्धान्तको जाननेके लिये ही नहीं है, प्रत्युत सिद्धान्तको जानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये है।

(४) त्यागीके आचरण कैसे होने चाहिये?—

अकुशल कर्मसे द्वेष न करना और कुशल कर्ममें आसक्त न होना (१८।१० पूर्वार्ध)।

(५) त्यागीका भाव कैसा होना चाहिये?—

कर्तव्यमात्र करना (१८।९)।

(६) त्यागका फल क्या होता है?—

परमात्मतत्त्वमें स्थित होना (१८।१० उत्तरार्ध)।

  • असत्को असत् जाननेपर भी तबतक सत्की प्राप्ति नहीं होती, जबतक मनुष्य सत्की प्राप्तिको ही अपने जीवनका सर्वोपरि लक्ष्य नहीं बना लेता।

‘एषा तेऽभिहिता साइक्ष्ये’ (गीता २।३९) में आये ‘सांख्य’ पदको ही यहाँ ‘संन्यास’ पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी सांख्य और संन्यासको पर्यायवाची माना है; जैसे—पाँचवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें ‘सन्त्यासः’, चौथे श्लोकमें ‘साइक्ष्ययोगौ’, पाँचवें श्लोकमें ‘यत्साइक्ष्यैः’ और छठे श्लोकमें ‘सन्त्यासस्तु’ पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने सांख्यको ही संन्यास कहा है।

इसी प्रकार ‘बुद्धियोगे त्विमां शृणु’ (गीता २।३९) में आये ‘योग’ पदको ही यहाँ ‘त्याग’ पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी योग (कर्मयोग) और त्यागको पर्यायवाची माना है; जैसे—दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें ‘संगं त्यक्त्वा’ तथा इक्यावनवें श्लोकमें ‘फलं त्यक्त्वा’, तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें ‘कर्मयोगेन योगिनाम्’, चौथे अध्यायके बीसवें श्लोकमें ‘त्यक्त्वा कर्मफलसंगम्’, पाँचवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘योगौ’, पाँचवें श्लोकमें ‘तद्वोगैरपि गम्यते’, ग्यारहवें श्लोकमें ‘संगं त्यक्त्वा’ तथा बारहवें श्लोकमें ‘कर्मफलं त्यक्त्वा’, बारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें ‘त्यागात्’ पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने कर्मयोगको ही त्याग कहा है।

अच्छी तरहसे रखनेका नाम ‘संन्यास’ है—‘सम्यक् न्यासः सन्त्यासः’। तात्पर्य है कि प्रकृतिकी चीज सर्वथा प्रकृतिमें देने (छोड़ देने) और विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेनेका नाम ‘संन्यास’ है।

कर्म और फलकी आसक्तिको छोड़नेका नाम ‘त्याग’ है। छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें आया है कि जो कर्म और फलमें आसक्त नहीं होता, वह योगारूढ़ हो जाता है।

११०४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

परिशिष्ट भाव —कर्मयोग और ज्ञानयोगके विषयमें अर्जुनने तीसरे अध्यायके आरम्भमें भगवान्को उलाहना दिया है, पाँचवें अध्यायके आरम्भमें यह जानना चाहै है कि दोनोंमें श्रेष्ठ कौन है, और यहाँ वे दोनोंका तत्त्व जानना चाहते हैं।

सम्बन्ध —अर्जुनकी जिज्ञासाके उत्तरमें पहले भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अन्य दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बताते हैं।

श्रीभगवानुवाच

काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥ त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥

श्रीभगवान् बोले—

कवयः= (कई) विद्वान्त्यागम्= त्यागत्याज्यम्= छोड़ देना चाहिये
काम्यानाम्= काम्यप्राहुः= कहते हैं।= और
कर्मणाम्= कर्मकेएके= कईअपरे= कई विद्वान्
न्यासम्= त्यागकोमनीषिणः= विद्वान्इति= ऐसा
सन्यासम्= संन्यासइति= ऐसा(कहते हैं कि)
विदुः= समझते हैं (और)प्राहुः= कहते हैंयज्ञदानतपःकर्म= यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका
विचक्षणाः= (कई) विद्वान्किन, त्याज्यम्= त्याग नहीं करना चाहिये।
सर्वकर्मफलत्यागम्= सम्पूर्ण कर्मके फलके त्यागकोकर्म= कर्मोंको

व्याख्या —दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं—

१-‘काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः’—कई विद्वान् कहते हैं कि काम्य-कर्मोंके त्यागका नाम ‘संन्यास’ है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनका त्याग करनेका नाम ‘संन्यास’ है।

२-‘सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः’—कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम ‘त्याग’ है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्य-कर्मोंको करते रहनेका नाम ‘त्याग’ है।

३-‘त्याज्यं दोष*वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः’—कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़

देना चाहिये।

४-‘यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे’—अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें, पर यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।

उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं—पहला और तीसरा मत ‘संन्यास’-(सांख्ययोग-)का है तथा दूसरा और चौथा मत ‘त्याग’-(कर्मयोग-)का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ा-थोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्य-कर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और

  • ‘दोषवत्’ पद व्याकरणके ‘वति’ और ‘मतुप्’ दोनों प्रत्ययोंसे बनता है; परन्तु दोनोंका अर्थ दो तरहका होता है। ‘वति’ प्रत्यय करनेसे ‘दोषवत्’ पदका अर्थ होता है—कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और ‘मतुप्’ प्रत्यय करनेसे ‘दोषवत्’ पदका अर्थ होता है—दोषवाले कर्म छोड़ देने चाहिये। परन्तु यहाँ ‘वति’ प्रत्ययका ही अर्थ लेना चाहिये, ‘मतुप्’ प्रत्ययका नहीं; क्योंकि ‘मतुप्’ प्रत्ययका अर्थ भगवान्के मतके अनुसार है (गीता—अठारहवें अध्यायका अङ्गुलीसर्वां श्लोक), दार्शनिकोंके मतके अनुसार नहीं।

दूसरा अन्तर यह है कि ‘वति’ प्रत्यय अव्यय बनकर क्रियाका विशेषण होता है और ‘मतुप्’ प्रत्यय कर्ता और कर्मका विशेषण बनता है।

श्लोक २-३ ]

  • साधक-संजीवनी *

११०५

चौथे मतमें यज्ञ, दान और तपस्व कर्मके त्यागका निषेध है। दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्या-क्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्या-क्या विलक्षणताएँ हैं, इसका विवेचन इस प्रकार है—

१-‘काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासम्’ — संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्य-कर्मोंका त्याग बताया गया है; परन्तु इसके अलावा भी नित्य, नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्य-कर्म बाकी रह जाते हैं। अतः यह मत पूर्ण नहीं है; क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; जैसे—इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती’—ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और ‘अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे, तो भी न मारता है, न बंधता है’—ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है।

१-कर्म पाँच प्रकारके होते हैं—

(१) नित्यकर्म—शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार प्रतिदिन जो आवश्यक दैनिक कर्म किये जाते हैं, उनको ‘नित्यकर्म’ कहते हैं; जैसे—संध्या, गायत्री आदि।

(२) नैमित्तिक कर्म—देश, काल, परिस्थिति आदि किसी निमित्तको लेकर जो कर्म किये जाते हैं, उनको नैमित्तिक कर्म कहते हैं, जैसे गंगा, प्रयाग, नैमिषारण्य, पुष्कर आदि तीर्थोंमें जाकर जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे ‘देशकृत नैमित्तिक कर्म’ हैं; एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, व्यतिपात, ग्रहण, होली, दीपावली, अक्षयतृतीया आदिके समय जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे ‘कालकृत नैमित्तिक कर्म’ हैं; पुत्रके उत्थान होनेपर, पुत्र या पुत्रीका विवाह होनेपर, किसीकी मृत्यु होनेपर, संत-महात्माओंका सत्संग मिलनेपर जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे ‘परिस्थितिकृत नैमित्तिक कर्म’ हैं।

(३) काम्य कर्म—हमारा मान-सम्मान हो जाय, लोगोंमें हमारी प्रसिद्धि हो जाय, हमारा पुत्र हो जाय, हमें बहुत-सा धन मिल जाय, हमारी मनचाही हो जाय आदि इष्टकी प्राप्तिके लिये और हमारा रोग मिट जाय, आफत मिट जाय, कर्जा दूर हो जाय आदि अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो शास्त्रीय अनुष्ठान किये जाते हैं, वे सब ‘काम्य कर्म’ कहलाते हैं।

(४) प्रायश्चित्त कर्म—हमारे द्वारा बने हुए पापोंको दूर करनेके लिये जो कर्म किये जाते हैं, वे सब ‘प्रायश्चित्त कर्म’ कहलाते हैं। इसके दो भेद हैं—विशेष प्रायश्चित्त और सामान्य प्रायश्चित्त। जैसे, किसीके हाथसे चूहा, बिल्ली, कबूतर आदि मर जाय तो इन ज्ञात पापोंको दूर करनेके लिये धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु आदि धर्म-ग्रन्थोंमें बताये गये प्रायश्चित्त कर्मोंका अनुष्ठान करना ‘विशेष प्रायश्चित्त कर्म’ कहलाते हैं, और ज्ञात-अज्ञात सब पापोंको दूर करनेके लिये गंगास्नान, एकादशीव्रत, नामजप, सेवा आदि जो शुभ-कर्म किये जाते हैं, वे ‘सामान्य प्रायश्चित्त कर्म’ कहलाते हैं।

(५) आवश्यक कर्तव्य-कर्म—खेती, व्यापार, नौकरी आदि जीविकाके लिये और खाना-पीना, सोना-जागना आदि शरीरके लिये जो कर्म किये जाते हैं, वे ‘आवश्यक कर्तव्य-कर्म’ कहलाते हैं।

२-जहाँ फलके त्यागकी बात कही गयी है, वहाँ फलकी कामनाका त्याग ही समझना चाहिये; क्योंकि फलका त्याग हो ही नहीं सकता। यह नियम है कि प्रत्येक कर्म फलके रूपमें परिणत होता है। जैसे, कोई खेती करता है तो वह अनाजका त्याग कैसे करेगा? व्यापार करता है तो मुनाफेका त्याग कैसे करेगा? जैसे अनाज होना खेतीका फल है, वैसे ही अनाज न होना भी खेतीका फल है। जैसे मुनाफा होना व्यापारका फल है, वैसे ही घाटा होना भी व्यापारका फल है। परन्तु कामनाका त्याग करनेसे फलसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है (गीता—अठारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। इसीलिये भगवान्ने सिद्धि और असिद्धि दोनोंमें सम रहनेको योग अर्थात् समता कहा है (गीता—दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक); क्योंकि सिद्धि और असिद्धि दोनों कर्मका फल है। सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनेका तात्पर्य है—कर्मफलमें ममता-आसक्ति न करना अथवा कर्मफलसे अपना सम्बन्ध न जोड़ना।

२-‘त्याज्यं दोषवदित्येके’ —संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवन-निर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता—तीसरे अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इसलिये भगवान्ने नियत कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजस-तामस त्याग बताया है (अठारहवें अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)।

३-‘सर्वकर्मफलत्यागम्’ —त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है। ममता-आसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते; क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति—दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है—‘संगं त्यक्त्वा फलानि च’ (गीता १८।६)।

११०६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

४-'यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम्'—त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ, दान और तप रूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं, उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।

त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥

भरतसत्तम= हे भरतवंशियोंमेंमे= मेरात्यागः= त्याग
श्रेष्ठ अर्जुन! (तू)निश्चयम्= निश्चयत्रिविधः= तीन
तत्र= संन्यास और त्यागशृणु= सुन;प्रकारका
—इन दोनोंमेंसे पहलेहि= क्योंकिसम्प्रकीर्तितः= कहा
त्यागे= त्यागके विषयमेंपुरुषव्याघ्र= हे पुरुषश्रेष्ठ!गया है।

व्याख्या—[ इस श्लोकके पूर्वार्धकी व्याख्याके रूपमें भगवान्ने पाँचवें और छठे श्लोकमें अपना मत बताया है और उत्तरार्धकी व्याख्याके रूपमें सातवेंसे नवें श्लोकतक तीन प्रकारके त्यागका वर्णन किया है।

जिस प्रकार शरीर और शरीरीका विवेक सभी योगियोंके लिये परम आवश्यक होनेके कारण भगवान्ने उसका वर्णन गीतामें सबसे पहले (दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) किया है, उसी प्रकार फलकी कामना और कर्मकी आसक्तिका त्याग सभी योगियोंके लिये अत्यन्त आवश्यक होनेके कारण यहाँ भगवान् 'त्याग' का वर्णन सबसे पहले आरम्भ करते हैं।]

'निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम'— हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं संन्यास और

है—यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इनको न करते हों, तो जरूर करना चाहिये; और इनके अतिरिक्त तीर्थ, व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (अठारहवें अध्यायका पाँचवाँ-छठा श्लोक)।

त्याग—दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें अपना मत कहता हूँ, उसको तुम सुनो।

'त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः'— हे पुरुषव्याघ्र! त्याग तीन तरहका कहा गया है—सात्त्विक, राजस और तामस। वास्तवमें भगवान्के मतमें सात्त्विक त्याग ही 'त्याग' है; परन्तु उसके साथ राजस और तामस त्यागका भी वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि उनके बिना भगवान्के अभीष्ट सात्त्विक त्यागकी श्रेष्ठता स्पष्ट नहीं होती; क्योंकि परीक्षा या तुलना करके किसी भी वस्तुकी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये दूसरी वस्तुएँ सामने रखनी ही पड़ती हैं।

तीन प्रकारका त्याग बतानेका तात्पर्य यह भी है कि साधक सात्त्विक त्यागको ग्रहण करे और राजस तथा तामस त्यागका त्याग करे।

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥

यज्ञदान-तत्= उनको तो= और
तपःकर्मकार्यम्, एव= करना हीतपः= तप—ये तीनों
तप रूप कर्मोंकाचाहिये;एव= ही (कर्म)
न, त्याज्यम्(क्योंकि)मनीषिणाम्= मनीषियोंको
करनायज्ञः= यज्ञ,पावनानि= पवित्र
चाहिये, (प्रत्युत)दानम्= दानकरनेवाले हैं।