श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1096, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २६ ] * साधक-संजीवनी * १०९५
अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्य यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, जप, स्वाध्याय, ध्यान, समाधि आदि जो भी क्रियाएँ करते हैं, वे सब भगवान्के लिये, भगवान्की प्रसन्नताके लिये, भगवान्की आज्ञा-पालनके लिये ही करते हैं, अपने लिये नहीं। कारण कि जिनसे क्रियाएँ की जाती हैं, वे शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदि सभी परमात्माके ही हैं,
हमारे नहीं हैं। जब शरीर आदि हमारे नहीं हैं, तो घर, जमीन-जायदाद, रुपये-पैसे, कुटुम्ब आदि भी हमारे नहीं हैं। ये सभी प्रभुके हैं और इनमें जो सामर्थ्य, समझ आदि है, वह भी सब प्रभुकी है और हम खुद भी प्रभुके ही हैं। हम प्रभुके हैं और प्रभु हमारे हैं-इस भावसे वे सब क्रियाएँ प्रभुकी प्रसन्नताके लिये ही करते हैं।
परिशिष्ट भाव-परमात्माके लिये परोक्षवाचक 'तत्' (वह) पदके प्रयोगका तात्पर्य है कि परमात्मा अलौकिक हैं-'उत्तम: पुरुषस्त्वन्य:' (गीता १५। १७)। वे विचारके विषय नहीं हैं, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासके विषय हैं।
सम्बन्ध-चौबीसवें श्लोकमें 'ॐ' की और पचीसवें श्लोकमें 'तत्' शब्दकी व्याख्या करके अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें पाँच प्रकारसे 'सत्' शब्दकी व्याख्या करते हैं।
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते॥ २६॥
पार्थ = हे पार्थ! सत् = 'सत्'- इति = ऐसा एतत् = यह परमात्माका नाम सद्भावे = सत्तामात्रमें
च = और साधुभावे = श्रेष्ठ भावमें प्रयुज्यते = प्रयोग किया जाता है तथा = तथा
प्रशस्ते = प्रशंसनीय कर्मणि = कर्मके साथ सत् = 'सत्' शब्द: = शब्द युज्यते = जोड़ा जाता है।
व्याख्या-'सद्भावे'-'परमात्मा हैं' इस प्रकार परमात्माकी सत्ता-(होनेपन-) का नाम 'सद्भाव' है। उस परमात्माके सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि जितने रूप हैं और सगुण-साकारमें भी उसके विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि जितने अवतार हैं, वे सब-के-सब 'सद्भाव' के अन्तर्गत हैं। इस प्रकार जिसका किसी देश, काल, वस्तु आदिमें कभी अभाव नहीं होता, ऐसे परमात्माके जो अनेक रूप हैं, अनेक नाम हैं, अनेक तरहकी लीलाएँ हैं, वे सब-के-सब 'सद्भाव' के अन्तर्गत हैं।
नहीं होता-ऐसे परमात्माके लिये और उस परमात्माकी प्राप्तिके लिये दैवी-सम्पत्तिके जो सत्य, क्षमा, उदारता, त्याग आदि श्रेष्ठ गुण हैं, उनके लिये 'सत्' शब्दका प्रयोग किया जाता है; जैसे-सत्-तत्त्व, सद्गुण, सद्भाव आदि।
'साधुभावे'-परमात्मप्राप्तिके लिये अलग-अलग सम्प्रदायोंमें अलग-अलग जितने साधन बताये गये हैं, उनमें हृदयके जो दया, क्षमा आदि श्रेष्ठ, उत्तम भाव हैं, वे सब-के-सब 'साधुभाव' के अन्तर्गत हैं।
'प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते'-परमात्मप्राप्तिके लिये अलग-अलग सम्प्रदायोंमें अलग-अलग जितने साधन बताये गये हैं, उनमें क्रियारूपसे जितने श्रेष्ठ आचरण हैं, वे सब-के-सब 'प्रशस्ते कर्मणि' के अन्तर्गत हैं। इसी प्रकार शास्त्रविधिके अनुसार यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कार; अन्नदान, भूमिदान, गोदान आदि दान; और कुआँ-बावड़ी खुदवाना, धर्मशाला बनवाना, मन्दिर बनवाना, बगीचा लगवाना आदि श्रेष्ठ कर्म भी 'प्रशस्ते कर्मणि' के अन्तर्गत आते हैं। इन सब श्रेष्ठ आचरणोंमें, श्रेष्ठ कर्मोंमें 'सत्' शब्दका प्रयोग किया जाता है; जैसे-सदाचार, सत्कर्म, सतसेवा, सद्व्यवहार आदि।
'सदित्येतत्प्रयुज्यते'-सत्तामें और श्रेष्ठतामें 'सत्' शब्दका प्रयोग किया जाता है अर्थात् जो सदा है, जिसमें कभी किंचिन्मात्र भी कमी और अभाव
परिशिष्ट भाव-परमात्माके अस्तित्व या होनेपनको 'सद्भाव' कहते हैं, जिसका कभी अभाव नहीं होता-'नाभावो विद्यते सत:' (गीता २। १६)। प्राय: सभी आस्तिक यह भाव तो मानते ही हैं कि सर्वोपरि सर्वनियन्ता