श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १७ ]
व्याख्या—‘तस्मादोमित्युदाहृत्य’ ”ब्रह्मवादिनाम्”—वेदवादीके लिये अर्थात् वेदोंको मुख्य माननेवाला जो वैदिक सम्प्रदाय है, उसके लिये ‘ॐ’ का उच्चारण करना खास बताया है। वे ‘ॐ’ का उच्चारण करके ही वेदपाठ, यज्ञ, दान, तप आदि शास्त्रविहित क्रियाओंमें प्रवृत्त होते हैं; क्योंकि जैसे गायें साँड़के बिना फलवती नहीं होतीं, ऐसे ही वेदकी जितनी ऋचाएँ हैं, श्रुतियाँ हैं, वे सब ‘ॐ’ का उच्चारण किये बिना फलवती नहीं होतीं अर्थात् फल नहीं देतीं।
‘ॐ’ का सबसे पहले उच्चारण क्यों किया जाता है? कारण कि सबसे पहले ‘ॐ’—प्रणव प्रकट हुआ है। उस प्रणवकी तीन मात्राएँ हैं। उन मात्राओंसे त्रिपदा गायत्री प्रकट हुई है और त्रिपदा गायत्रीसे ऋक्, साम और यजुः—यह वेदत्रयी प्रकट हुई है। इस दृष्टिसे ‘ॐ’ सबका मूल है और इसीके अन्तर्गत गायत्री भी है तथा सब-के-सब वेद भी हैं। अतः जितनी वैदिक क्रियाएँ की जाती हैं, वे सब ‘ॐ’ का उच्चारण करके ही की जाती हैं।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥ २५ ॥
| तत् | = ‘तत्’ नामसे कहे जानेवाले परमात्माके लिये ही सब कुछ है— | मोक्षकाङ्क्षिभिः = मुक्ति चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा | यज्ञतपः- |
|---|---|---|---|
| इति | = ऐसा मानकर | फलम् = फलकी | क्रियाः = यज्ञ और तपरूप क्रियाएँ |
| अनभिसन्धाय = इच्छासे रहित होकर | च = तथा | ||
| विविधाः = अनेक प्रकारकी | दानक्रियाः = दानरूप क्रियाएँ | ||
| क्रियन्ते = की जाती हैं। |
व्याख्या—‘तदित्यनभिसन्धाय ’ ” मोक्षकाङ्क्षिभिः”—केवल उस परमात्माकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे, किंचिन्मात्र भी फलकी इच्छा न रखकर शास्त्रीय यज्ञ, तप, दान आदि शुभकर्म किये जायें। कारण कि विहित-निषिद्ध, शुभ-अशुभ आदि क्रियामात्रका आरम्भ होता है और समाप्ति होती है। ऐसे ही उस क्रियाका जो फल होता है, उसका भी संयोग होता है और वियोग होता है अर्थात् कर्मफलके भोगका भी आरम्भ होता है और समाप्ति होती है। परन्तु परमात्मा तो उस क्रिया और फलभोगके आरम्भ होनेसे पहले भी हैं तथा क्रिया और फलभोगकी समाप्तिके बाद भी हैं एवं क्रिया और फलभोगके समय भी वैसे-के-वैसे हैं। परमात्माकी सत्ता नित्य-निरन्तर है। नित्य-निरन्तर रहनेवाली इस सत्ताकी तरफ ध्यान दिलानेमें ही ‘तत् इति’ पदोंका तात्पर्य है; और उत्पत्ति-विनाशशील फलकी तरफ ध्यान न देनेमें ही ‘अनभिसन्धाय फलम्’ पदोंका तात्पर्य है; अर्थात् नित्य-निरन्तर रहनेवाले तत्त्वकी स्मृति रहनी चाहिये और नाशवान् फलकी अभिसंधि (इच्छा) बिलकुल नहीं रहनी चाहिये।
नित्य-निरन्तर वियुक्त होनेवाले, प्रतिक्षण अभावमें
जानेवाले इस संसारमें जो कुछ देखने, सुनने और जाननेमें आता है, उसीको हम प्रत्यक्ष, सत्य मान लेते हैं और उसीकी प्राप्तिमें हम अपनी बुद्धिमानी और बलको सफल मानते हैं। इस परिवर्तनशील संसारको प्रत्यक्ष माननेके कारण ही सदा-सर्वदा सर्वत्र परिपूर्ण रहता हुआ भी वह परमात्मा हमें प्रत्यक्ष नहीं दीखता। इसलिये एक परमात्माप्राप्तिका ही उद्देश्य रखकर उस संसारका अर्थात् अहंता-ममता (मैं-मेरेपन)-का त्याग करके, उन्हींकी दी हुई शक्तिसे, यज्ञ आदिको उन्हींका मानकर निष्कामभावपूर्वक उन्हींके लिये यज्ञ आदि शुभकर्म करने चाहिये। इसीमें ही मनुष्यकी वास्तविक बुद्धिमानी और बल-(पुरुषार्थ-) की सफलता है। तात्पर्य यह है कि जो संसार प्रत्यक्ष प्रतीत हो रहा है, उसका तो निराकरण करना है और जिसको अप्रत्यक्ष मानते हैं, उस ‘तत्’ नामसे कहे जानेवाले परमात्माका अनुभव करना है, जो नित्य-निरन्तर प्राप्त है।
भगवानुके भक्त (भगवान्का उद्देश्य रखकर) ‘तत्’ पदके बोधक राम, कृष्ण, गोविन्द, नारायण, वासुदेव, शिव आदि नामोंका उच्चारण करके सब क्रियाएँ आरम्भ करते हैं।