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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1094, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1094

श्लोक २३-२४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०९३

सम्बन्ध-सोलहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें दैवी-सम्पत्ति मोक्षके लिये और आसुरी-सम्पत्ति बन्धनके लिये बतायी है। दैवी-सम्पत्तिको धारण करनेवाले सात्त्विक मनुष्य परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे जो यज्ञ, तप और दानरूप कर्म करते हैं, उन कर्मोंमें होनेवाली (भाव, विधि, क्रिया आदिकी) कमीकी पूर्तिके लिये क्या करना चाहिये? इसे बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥

ॐ = ॐ, तत् = तत्, सत् = सत्—, इति = इन, त्रिविधः = तीन प्रकारके नामोंसे, ब्रह्मणः = (जिस) परमात्माका, निर्देशः = निर्देश (संकेत) किया गया है, स्मृतः = किया गया है, तेन = उसी परमात्मासे, पुरा = सृष्टिके आदिमें, वेदाः = वेदों, च = तथा, ब्राह्मणाः = ब्राह्मणों, च = और, यज्ञाः = यज्ञोंकी, विहिताः = रचना हुई है।

व्याख्या-'ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः'—ॐ, तत् और सत्—यह तीन प्रकारका परमात्माका निर्देश है अर्थात् परमात्माके तीन नाम हैं (इन तीनों नामोंकी व्याख्या भगवान्ने आगेके चार श्लोकोंमें की है)। 'ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा'—उस परमात्माने पहले (सृष्टिके आरम्भमें) वेदों, ब्राह्मणों और यज्ञोंको बनाया। इन तीनोंमें विधि बतानेवाले वेद हैं, अनुष्ठान करनेवाले ब्राह्मण हैं और क्रिया करनेके लिये यज्ञ हैं। अब इनमें यज्ञ, तप, दान आदिकी क्रियाओंमें कोई कमी रह जाय, तो क्या करें? परमात्माका नाम लें तो उस कमीकी पूर्ति हो जायगी। जैसे रसोई बनानेवाला जलसे आटा सानता (गूँधता) है, तो कभी उसमें जल अधिक पड़ जाय, तो वह क्या करता है? आटा और मिला लेता है। ऐसे ही कोई निष्कामभावसे यज्ञ, दान आदि शुभकर्म करे और उनमें कोई कमी-अंग-वैगुण्य रह जाय, तो जिस भगवान्से यज्ञ आदि रचे गये हैं, उस भगवान्का नाम लेनेसे वह अंग-वैगुण्य ठीक हो जाता है, उसकी पूर्ति हो जाती है।

परिशिष्ट भाव-'महानिर्वाणतन्त्र' में आया है— ॐ तत्सदिति मन्त्रेण यो यत्कर्म समाचरेत्। गृहस्थो वाप्युदासीनस्तस्याभीष्टाय तद् भवेत्॥ जपो होमः प्रतिष्ठा च संस्काराद्यखिलाः क्रियाः। ॐ तत्समन्त्रनिष्पन्नाः सम्पूर्णाः स्युर्न संशयः॥ (१४। १५४-१५५) 'ॐ तत् सत्'—इस मन्त्रसे गृहस्थ अथवा उदासीन (साधु) जो भी कर्म आरम्भ करता है, उसको इससे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। जप, होम, प्रतिष्ठा, संस्कार आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ 'ॐ तत् सत्'—इस मन्त्रसे सफल हो जाती हैं, इसमें सन्देह नहीं है।

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥

तस्मात् = इसलिये, ब्रह्मवादिनाम् = वैदिक सिद्धान्तोंको माननेवाले पुरुषोंकी, विधानोक्ताः = शास्त्रविधिसे नियत, यज्ञदानतपःक्रियाः = यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ, सततं = सदा, ओम् = 'ॐ', इति = इस परमात्माके नामका, उदाहृत्य = उच्चारण करके (ही), प्रवर्तन्ते = आरम्भ होती हैं।