सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1091, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1091

१०९०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

यत्= जोअवज्ञातम्= अवज्ञापूर्वकदीयते= दिया जाता है,
दानम्= दानअदेशकाले= अयोग्य देश औरतत्= वह (दान)
असक्ततम्= बिना सत्कारकेकालमेंतामसम्= तामस
= तथाअपात्रेभ्यः= कुपात्रकोउदाहतम्= कहा गया है।

व्याख्या—‘असक्ततमवज्ञातम्’ —तामस दान असत्कार और अवज्ञापूर्वक दिया जाता है; जैसे—तामस मनुष्यके पास कभी दान लेनेके लिये ब्राह्मण आ जाय, तो वह तिरस्कारपूर्वक उसको उलाहना देगा कि देखो पण्डितजी! जब हमारी माताका शरीर शान्त हुआ, तब भी आप नहीं आये; परन्तु क्या करें; आप हमारे घरके गुरु हो इसलिये हमें देना ही पड़ता है! इतनेमें ही घरका दूसरा आदमी बोल पड़ता है कि तुम क्यों ब्राह्मणोंके झंडटमें पड़ते हो? किसी गरीबको दे दो। जिसको कोई नहीं देता, उसको देना चाहिये। वास्तवमें वही दान है। ब्राह्मणको तो और कोई भी दे देगा, पर बेचारे गरीबको कौन देगा? पण्डितजी क्या आ गया, यह तो कुत्ता आ गया; टुकड़ा डाल दो, नहीं तो भौंकेंगा आदि—आदि। इस प्रकार शास्त्रविधिका, ब्राह्मणोंका तिरस्कार करनेके कारण यह दान तामस कहलाता है।

‘अदेशकाले यदानम्’ —मुद्दताके कारण तामस मनुष्यको अपने मनकी बातें ही जँचती हैं; जैसे—दान करनेके लिये देश—कालकी क्या जरूरत है? जब चाहे, तब कर दिया। जब किसी विशेष देश और कालमें ही पुण्य होगा, तो क्या यहाँ पुण्य नहीं होगा? इसके लिये अमुक समय आयेगा, अमुक पर्व आयेगा—इसकी क्या आवश्यकता? अपनी चीज खर्च करनी है, चाहे कभी दो, आदि—आदि। इस प्रकार तामस मनुष्य शास्त्रविधिका अनादर, तिरस्कार करके दान करते हैं। कारण कि उनके हृदयमें शास्त्रविधिका महत्त्व नहीं होता, प्रत्युत रूपयोंका महत्त्व होता है।

‘अपात्रेभ्यश्च दीयते’ —तामस दान अपात्रको किया जाता है। तामस मनुष्य कई प्रकारके तर्क—वितर्क करके पात्रका विचार नहीं करते; जैसे—शास्त्रोंमें देश, काल और पात्रकी बातें यों ही लिखी गयी हैं; कोई यहाँ दान लेगा तो क्या यहाँ उसका पेट नहीं भरेगा? तृप्ति नहीं होगी? जब पात्रको देनेसे पुण्य होता है, तो इनको देनेसे क्या पुण्य नहीं होगा? क्या ये आदमी नहीं हैं? क्या इनको देनेसे पाप लगेगा? अपनी जीविका चलानेके लिये, अपना मतलब सिद्ध करनेके लिये ही ब्राह्मणोंने शास्त्रोंमें ऐसा लिख दिया है, आदि—आदि।

‘ततामसमुदाहतम्’ —उपर्युक्त प्रकारसे दिया जानेवाला

दान तामस कहा गया है।

शंका— गीतामें तामस—कर्मका फल अधोगति बताया है—‘अधो गच्छन्ति तामसाः ’ (१४।१८) और रामचरितमानसमें बताया है कि जिस—किसी प्रकारसे भी दिया हुआ दान कल्याण करता है—

‘जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्याण॥’

(मानस ७।१०३ ख)

इन दोनोंमें विरोध आता है?

समाधान— तामस मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं—यह कानून दानके विषयमें लागू नहीं होता। कारण कि धर्मके चार चरण हैं—‘सत्यं दया तपो दानमिति ’ (श्रीमद्भा० १२।३।१८)। इन चारों चरणोंमेंसे कलियुगमें एक ही चरण ‘दान’ है—‘दानमेकं कलौ युगे ’ (मनुस्मृति १।८६)। इसलिये गोस्वामीजी महाराजने कहा—

प्रगत चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।

जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्याण॥

(मानस ७।१०३ ख)

ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि किसी प्रकार भी दान दिया जाय, उसमें वस्तु आदिके साथ अपनेपनका त्याग करना ही पड़ता है। इस दृष्टिसे तामस दानमें भी आंशिक त्याग होनेसे दान देनेवाला अधोगतिके योग्य नहीं हो सकता।

दूसरी बात, इस कलियुगके समय मनुष्योंका अन्तःकरण बहुत मलिन हो रहा है। इसलिये कलियुगमें एक छूट है कि जिस—किसी प्रकार भी किया हुआ दान कल्याण करता है। इससे मनुष्यका दान करनेका स्वभाव तो बन ही जायगा, जो आगे कभी किसी जन्ममें कल्याण भी कर सकता है। परन्तु दानकी क्रिया ही बन्द हो जायगी, तो फिर देनेका स्वभाव बननेका कोई अवसर ही प्राप्त नहीं होगा। इसी दृष्टिसे एक संतने ‘श्रद्धया देयमश्रद्धयादेयम् ’ (तैत्तिरीयो० १।११) —इस श्रुतिकी व्याख्या करते हुए कहा था कि इसमें पहले पदका अर्थ तो यह है कि श्रद्धासे देना चाहिये, पर दूसरे पदका अर्थ ‘अश्रद्धया अदेयम् ’ (अश्रद्धासे नहीं देना चाहिये) —ऐसा न लेकर ‘अश्रद्धया देयम् ’ (श्रद्धा न हो, तो भी देना चाहिये) —इस प्रकार लेना चाहिये।