सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1090, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1090

श्लोक २१-२२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०८९

गीताके अनुसार दूसरेके हितके लिये कर्म करना 'यज्ञ' है, हरदम प्रसन्न रहना 'तप' है और उसकी चीज उसीको दे देना 'दान' है। स्वार्थबुद्धिपूर्वक अपने लिये यज्ञ-तप-दान करना आसुरी अथवा राक्षसी स्वभाव है।

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।

दीयते च परिकिलष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥

तु= किन्तुवा= अथवातत्= वह
यत्= जो (दान)फलम्= फल-प्राप्तिकादानम्= दान
परिकिलष्टम्= क्लेशपूर्वकउद्दिश्य= उद्देश्य बनाकरराजसम्= राजस
= औरपुनः= फिरस्मृतम्= कहा
प्रत्युपकारार्थम्= प्रत्युपकारके लियेदीयते= दिया जाता है,जाता है ।

व्याख्या—'यत्तु प्रत्युपकारार्थम्' —राजस दान प्रत्युपकारके लिये दिया जाता है; जैसे—राजस पुरुष किसी विशेष अवसरपर दानकी चीजोंको गिन करके निकालता है, तो वह विचार करता है कि हमारे सगे-सम्बन्धीके जो कुल-पुरोहित हैं, उनको हम दान करेंगे, जिससे कि हमारे सगे-सम्बन्धी हमारे कुल-पुरोहितको दान करें और इस प्रकार हमारे कुल-पुरोहितके पास धन आ जायगा। अमुक पण्डितजी बड़े अच्छे हैं और ज्योतिष भी जानते हैं, उनको हम दान करेंगे, जिससे वे कभी यात्राका, पुत्रोंका तथा कन्याओंके विवाहका, नया मकान बनवानेका, कुओं खुदवानेका मुहूर्त निकाल देंगे। हमारे सम्बन्धी हैं अथवा हमारा हित करनेवाले हैं, उनको हम सहायतारूपमें पैसे देंगे, तो वे कभी हमारी सहायता करेंगे, हमारा हित करेंगे। हमें दवाई देनेवाले जो पण्डितजी हैं; उनको हम दान करेंगे; क्योंकि दानसे राजी होकर वे हमें अच्छी-अच्छी दवाईयाँ देंगे, आदि-आदि। इस प्रकार प्रतिफलकी भावना रखकर अर्थात् इस लोकके साथ सम्बन्ध जोड़कर जो दान किया जाता है, वह 'प्रत्युपकारार्थ' कहा जाता है।

'फलमुद्दिश्य वा पुनः' —फलका उद्देश्य रखकर अर्थात् परलोकके साथ सम्बन्ध जोड़कर जो दान किया जाता है, उसमें भी राजस मनुष्य देश (गंगा, यमुना, कुरुक्षेत्र आदि), काल (अमावस्या, पूर्णिमा, ग्रहण आदि) और पात्र (वेदपात्री ब्राह्मण आदि)—को देखेगा तथा शास्त्रीय

विधि-विधानको देखेगा; परन्तु इस प्रकार विचारपूर्वक दान करनेपर भी फलकी कामना होनेसे वह दान राजस हो जाता है। अब उसके लिये दूसरे विधि-विधानका वर्णन करनेकी भगवान्ने आवश्यकता नहीं समझी, इसलिये राजस दानमें 'देशे काले च पात्रे' पदोंका प्रयोग नहीं किया।

यहाँ 'पुनः' पद कहनेका तात्पर्य है कि जिससे कुछ उपकार पाया है अथवा जिससे भविष्यमें कुछ-न-कुछ मिलनेकी सम्भावना है, उसका विचार राजस पुरुष पहले करता है, फिर पीछे दान देता है।

'दीयते च परिकिलष्टम्' —राजस दान बहुत क्लेशपूर्वक दिया जाता है; जैसे—वक्त आ गया है, इसलिये देना पड़ रहा है। इतनी चीजें देंगे तो इतनी चीजें कम हो जायँगी। इतना धन देंगे तो इतना धन कम हो जायगा। वे समयपर हमारे काम आते हैं, इसलिये उनको देना पड़ रहा है। इतनेमें ही काम चल जाय तो बहुत अच्छी बात है। इतनेसे काम तो चल ही जायगा, फिर ज्यादा क्यों दें? ज्यादा देंगे तो और कहाँसे लायेंगे? और ज्यादा देनेसे लेनेवालेका स्वभाव बिगड़ जायगा। ज्यादा देनेसे हमारेको घाटा लग जायेगा, तो काम कैसे चलेगा? पर इतना तो देना ही पड़ रहा है, आदि-आदि। इस प्रकार राजस मनुष्य दान तो थोड़ा-सा देते हैं, पर कसाकसी करके देते हैं।

'तद्दानं राजसं स्मृतम्' —उपर्युक्त प्रकारसे दिया जानेवाला दान राजस कहा गया है।

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।

असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥