श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
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दान-सम्बन्धी विशेष बात
अन्न, जल, वस्त्र और औषध—इन चारोंके दानमें पात्र-कुपात्र आदिका विशेष विचार नहीं करना चाहिये। इनमें केवल दूसरेको आवश्यकताको ही देखना चाहिये। इसमें भी देश, काल, और पात्र मिल जाय, तो उत्तम बात और न मिले, तो कोई बात नहीं। हमें तो जो भूखा है, उसे अन्न देना है; जो प्यासा है, उसे जल देना है; जो वस्त्रहीन है, उसे वस्त्र देना है और जो रोगी है, उसे औषध देनी है। इसी प्रकार कोई किसीको अनुचितरूपसे भयभीत कर रहा है, दुःख दे रहा है, तो उससे उसको छुड़ाना और उसे अभयदान देना हमारा कर्तव्य है।
हाँ, कुपात्रको अन्न-जल इतना नहीं देना चाहिये कि जिससे वह पुनः हिंसा आदि पापोंमें प्रवृत्त हो जाय; जैसे कोई हिंसक मनुष्य अन्न-जलके बिना मर रहा है, तो उसको उतना ही अन्न-जल दे कि जिससे उसके प्राण रह जायँ, वह जी जाय। इस प्रकार उपर्युक्त चारोंके दानमें पात्रता नहीं देखनी है, प्रत्युत आवश्यकता देखनी है।
भगवान्का भक्त भी वस्तु देनेमें पात्र नहीं देखता, वह तो दिये जाता है; क्योंकि वह सबमें अपने प्यारे प्रभुको ही देखता है कि इस रूपमें तो हमारे प्रभु ही आये हैं। अतः वह दान नहीं करता, कर्तव्य-पालन नहीं करता, प्रत्युत पूजा करता है—‘स्वकर्माणा तमभ्यच्च’ (गीता १८।४६)। तात्पर्य यह है कि भक्तकी सम्पूर्ण क्रियाओंका सम्बन्ध भगवान्के साथ होता है।
कर्मफल-सम्बन्धी विशेष बात
ग्यारहवेंसे बाईसवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें जो सात्त्विक यज्ञ, तप और दान आये हैं, वे सब-के-सब ‘दैवी-सम्पत्ति’ हैं और जो राजस तथा तामस यज्ञ, तप और दान आये हैं, वे सब-के-सब ‘आसुरी-सम्पत्ति’ हैं।
१-राजसके दृष्टका कालान्तरिक फल और अदृष्टका लौकिक फल—दोनों एक-जैसे दीखते हुए भी इनमें अन्तर है; जैसे—भोजनके परिणामस्वरूप जो रोग आदि होंगे, वह भौतिक (कालान्तरिक) फल है अर्थात् वह सीधे भोजनका ही परिणाम है और पुत्रेष्टि यज्ञ आदिका जो फल होगा, वह आधिदैविक (लौकिक) फल है अर्थात् वह प्रारब्ध बनकर फल (पुत्रादि)-के रूपमें आता है।
२-यदि राजस पुरुषोंका दम्भ (सत्रहवें अध्यायका बारहवाँ और अठारहवाँ श्लोक) अधिक बढ़ जाय, तो वे नरकोंमें भी जा सकते हैं।
३-स्वर्गमें भी यज्ञ आदि पुण्यकर्मोंके अनुसार उच्च, मध्यम और कनिष्ठ—ऐसी तीन तरहकी श्रेणियाँ होती हैं। उनमें भी उच्च श्रेणीवाले जब अपने समान श्रेणीवालोंको देखते हैं, तब उन्हें ईर्ष्या होती है कि वे हमारे समान पदपर क्यों आये?
आसुरी सम्पत्तिमें आये हुए ‘राजस’ यज्ञ, तप और दानके फलके दो विभाग हैं—दृष्ट और अदृष्ट। इनमें भी दृष्टके दो फल हैं—तात्कालिक और कालान्तरिक। जैसे—राजस भोजनके बाद तृप्तिका होना तात्कालिक फल है और रोग आदिका होना कालान्तरिक फल है। ऐसे ही अदृष्टके भी दो फल हैं—लौकिक और पारलौकिक। जैसे—दम्भपूर्वक ‘दम्भार्थमपि चैव यत्’ (१७।१२), सत्कार-मान-पूजाके लिये ‘सत्कारमानपूजार्थम्’ (१७।१८) और प्रत्युपकारके लिये ‘प्रत्युपकारार्थम्’ (१७।२१) किये गये राजस यज्ञ, तप और दानका फल ‘लौकिक’ है और वह इसी लोकमें, इसी जन्ममें, इसी शरीरके रहते-रहते ही मिलनेकी सम्भावनावाला होता है। स्वर्गको ही परम प्राप्य वस्तु मानकर उसकी प्राप्तिके लिये किये गये यज्ञ आदिका फल ‘पारलौकिक’ होता है। परन्तु राजस यज्ञ ‘अभिधन्धाय तु फलम्’ (१७।१२) और दान ‘फलमुदिश्य वा पुनः’ (१७।२१) का फल लौकिक तथा पारलौकिक—दोनों ही हो सकता है। इसमें भी स्वर्ग-प्राप्तिके लिये यज्ञ आदि करनेवाले (दूसरे अध्यायका बयालीसवाँ-तैतालीसवाँ और नवें अध्यायका बीसवाँ-इक्कीसवाँ श्लोक) और केवल दम्भ, सत्कार, मान, पूजा, प्रत्युपकार आदिके लिये यज्ञ, तप और दान करनेवाले (सत्रहवें अध्यायका बारहवाँ, अठारहवाँ और इक्कीसवाँ श्लोक) दोनों प्रकारके राजस पुरुष जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं। परन्तु तामस यज्ञ और तप करनेवाले (सत्रहवें अध्यायका तेरहवाँ और उन्नीसवाँ श्लोक) तामस पुरुष तो अधोगतिमें जाते हैं—‘अधोगच्छन्ति तामसाः’ (१४।१८), ‘पतन्ति नरकेऽशुचौ’ (१६।१६), ‘आसुरीष्वेव योनिषु’ (१६।१९) ‘ततो यान्यधर्मा गतिम्’ (१६।२०)।
जो मनुष्य यज्ञ करके स्वर्गमें जाते हैं, उनको स्वर्गमें भी दुःख, जलन, ईर्ष्या आदि होते हैं। जैसे—शतक्रतु