सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1107, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1107

११०६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

४-'यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम्'—त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ, दान और तप रूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं, उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।

त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥

भरतसत्तम= हे भरतवंशियोंमेंमे= मेरात्यागः= त्याग
श्रेष्ठ अर्जुन! (तू)निश्चयम्= निश्चयत्रिविधः= तीन
तत्र= संन्यास और त्यागशृणु= सुन;प्रकारका
—इन दोनोंमेंसे पहलेहि= क्योंकिसम्प्रकीर्तितः= कहा
त्यागे= त्यागके विषयमेंपुरुषव्याघ्र= हे पुरुषश्रेष्ठ!गया है।

व्याख्या—[ इस श्लोकके पूर्वार्धकी व्याख्याके रूपमें भगवान्ने पाँचवें और छठे श्लोकमें अपना मत बताया है और उत्तरार्धकी व्याख्याके रूपमें सातवेंसे नवें श्लोकतक तीन प्रकारके त्यागका वर्णन किया है।

जिस प्रकार शरीर और शरीरीका विवेक सभी योगियोंके लिये परम आवश्यक होनेके कारण भगवान्ने उसका वर्णन गीतामें सबसे पहले (दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) किया है, उसी प्रकार फलकी कामना और कर्मकी आसक्तिका त्याग सभी योगियोंके लिये अत्यन्त आवश्यक होनेके कारण यहाँ भगवान् 'त्याग' का वर्णन सबसे पहले आरम्भ करते हैं।]

'निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम'— हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं संन्यास और

है—यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इनको न करते हों, तो जरूर करना चाहिये; और इनके अतिरिक्त तीर्थ, व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (अठारहवें अध्यायका पाँचवाँ-छठा श्लोक)।

त्याग—दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें अपना मत कहता हूँ, उसको तुम सुनो।

'त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः'— हे पुरुषव्याघ्र! त्याग तीन तरहका कहा गया है—सात्त्विक, राजस और तामस। वास्तवमें भगवान्के मतमें सात्त्विक त्याग ही 'त्याग' है; परन्तु उसके साथ राजस और तामस त्यागका भी वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि उनके बिना भगवान्के अभीष्ट सात्त्विक त्यागकी श्रेष्ठता स्पष्ट नहीं होती; क्योंकि परीक्षा या तुलना करके किसी भी वस्तुकी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये दूसरी वस्तुएँ सामने रखनी ही पड़ती हैं।

तीन प्रकारका त्याग बतानेका तात्पर्य यह भी है कि साधक सात्त्विक त्यागको ग्रहण करे और राजस तथा तामस त्यागका त्याग करे।

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥

यज्ञदान-तत्= उनको तो= और
तपःकर्मकार्यम्, एव= करना हीतपः= तप—ये तीनों
तप रूप कर्मोंकाचाहिये;एव= ही (कर्म)
न, त्याज्यम्(क्योंकि)मनीषिणाम्= मनीषियोंको
करनायज्ञः= यज्ञ,पावनानि= पवित्र
चाहिये, (प्रत्युत)दानम्= दानकरनेवाले हैं।