श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
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व्याख्या —‘यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्’—यहाँ भगवान्ने दूसरोंके मत (तीसरा श्लोक)-को ठीक बताया है। भगवान् कठोर शब्दोंसे किसीके मतका खण्डन नहीं करते। आदर देनेके लिये भगवान् दूसरेके मतका वास्तविक अंश ले लेते हैं और उसमें अपना मत भी शामिल कर देते हैं। यहाँ भगवान्ने दूसरेके मतके अनुसार कहा कि यज्ञ, दान और तप रूपकर्म छोड़ने नहीं चाहिये। इसके साथ भगवान्ने अपना मत बताया कि इतना ही नहीं, प्रत्युत उनको न करते हो तो जरूर करना चाहिये—‘कार्यमेव तत्।’ कारण कि यज्ञ, दान और तप—तीनों कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।
‘यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्’ —यहाँ ‘चैव’ पदका तात्पर्य है कि नित्य, नैमित्तिक, जीविका-सम्बन्धी, शरीर-सम्बन्धी आदि जितने भी कर्तव्य-कर्म हैं, उनको भी जरूर करना चाहिये; क्योंकि वे भी मनीषियोंको
परिशिष्ट भाव —मनीषीका अर्थ है—विचारशील। जो कर्म अपनी कोई कामना न रखकर दूसरोंके हितके लिये किये जाते हैं, वे कर्म पवित्र करनेवाले हो जाते हैं अर्थात् दुर्गुण-दुराचार, पाप आदि मलको दूर करके महान् आनन्द देनेवाले हो जाते हैं। परन्तु वे ही कर्म अगर अपनी कामना रखकर और दूसरोंका अहित करनेके लिये किये जायें तो वे अपवित्र करनेवाले अर्थात् लोक-परलोक दोनोंमें महान् दुःख देनेवाले हो जाते हैं।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥
| पार्थ | = हे पार्थ ! | (कर्माको) | कर्तव्यानि | = करना चाहिये— |
|---|---|---|---|---|
| एतानि | = इन (यज्ञ, दान और तप रूपक) | सङ्गम् | = आसक्ति | इति |
| कर्माणि | = कर्मोंको | च | = और | मे |
| तु | = तथा | फलानि | = फलोंकी इच्छाका | निश्चितम् |
| अपि | = (दूसरे) भी | त्यक्त्वा | = त्याग करके | उत्तमम् |
| मतम् | = मत है। |
व्याख्या —‘एतान्यपि तु कर्माणि ..... निश्चितं मतमुत्तमम्’—यहाँ ‘एतानि’ पदसे पूर्वश्लोकमें कहे यज्ञ, दान और तप रूपकर्मोंकी तथा ‘अपि’ पदसे शास्त्रवहित पठन-पाठन, खेती-व्यापार आदि जीविका-सम्बन्धी कर्म; शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जागना आदि शारीरिक कर्म और परिस्थितिके अनुसार सामने आये अवश्य कर्तव्य-कर्म—इन सभी कर्मोंको लेना चाहिये। इन समस्त कर्मोंको आसक्ति और
पवित्र करनेवाले हैं।
जो मनुष्य समत्वबुद्धिसे युक्त होकर कर्मजन्य फलका त्याग कर देते हैं, वे मनीषी हैं—‘कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः’ (गीता २।५१)। ऐसे मनीषियोंको वे यज्ञादि कर्म पवित्र करते हैं। परन्तु जो वास्तवमें मनीषी नहीं हैं, जिनकी इन्द्रियां वशमें नहीं हैं अर्थात् अपने सुखभोगके लिये ही जो यज्ञ, दानादि कर्म करते हैं, उनको वे कर्म पवित्र नहीं करते, प्रत्युत वे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं।
इस श्लोकके पूर्वार्धमें ‘यज्ञदानतपःकर्म’—ऐसा समासयुक्त पद दिया है और उत्तरार्धमें ‘यज्ञो दानं तपः’—ऐसे अलग-अलग पद दिये हैं, इसका तात्पर्य है कि भगवान्ने समासयुक्त पदसे यह बताया है कि यज्ञ, दान और तपका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इनको जरूर करना चाहिये और अलग-अलग पदोंसे यह बताया है कि इनमेंसे एक-एक कर्म भी मनीषीको पवित्र करनेवाला है।
जो कर्म अपनी कोई कामना न रखकर दूसरोंके हितके लिये किये जाते हैं, वे कर्म पवित्र करनेवाले हो जाते हैं अर्थात् दुर्गुण-दुराचार, पाप आदि मलको दूर करके महान् आनन्द देनेवाले हो जाते हैं। परन्तु वे ही कर्म अगर अपनी कामना रखकर और दूसरोंका अहित करनेके लिये किये जायें तो वे अपवित्र करनेवाले अर्थात् लोक-परलोक दोनोंमें महान् दुःख देनेवाले हो जाते हैं।
फलेच्छाका त्याग करके जरूर करना चाहिये। अपनी कामना, ममता और आसक्तिका त्याग करके कर्मोंको केवल प्राणिमात्रके हितके लिये करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारके लिये और योग अपने लिये हो जाता है। परन्तु कर्मोंको अपने लिये करनेसे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं—अपने व्यक्तत्वको नष्ट नहीं होने देते।
गीतामें कहीं संग-(आसक्ति-) के त्यागकी बात आती है और कहीं कर्मोंके फलके त्यागकी बात आती है। इस