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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

श्लोकमें संग और फल—दोनोंके त्यागकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि गीतामें जहाँ संगके त्यागकी बात कही है, वहाँ उसके साथ फलके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये और जहाँ फलके त्यागकी बात कही है, वहाँ उसके साथ संगके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये। यहाँ अर्जुनने त्यागके तत्त्वकी बात पूछी है; अतः भगवान्ने त्यागका यह तत्त्व बताया है कि संग (आसक्ति) और फल—दोनोंका ही त्याग करना चाहिये, जिससे साधकको यह जानकारी स्पष्ट हो जाय कि आसक्ति न तो कर्ममें रहनी चाहिये और न फलमें ही रहनी चाहिये। आसक्ति न रहनेसे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि कर्म करनेके औजारों—(करणों—)में तथा प्राप्त वस्तुओंमें ममता नहीं रहती (गीता—पाँचवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।

संग (आसक्ति या सम्बन्ध) सूक्ष्म होता है और फलेच्छा स्थूल होती है। संग या आसक्तिकी सूक्ष्मता वहाँतक है, जहाँ चेतन-स्वरूपने नाशवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ा है। वहाँसे आसक्ति पैदा होती है, जिससे जन्म-मरण आदि सब अनर्थ होते—‘करणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजम्भसु’ (गीता १३।२१)। आसक्तिका त्याग करनेसे नाशवान्के साथ जोड़े हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और स्वतः—स्वाभाविक रहनेवाली असंगताका अनुभव हो जाता है।

इस विषयमें एक और बात समझनेकी है कि कई दार्शनिक इस नाशवान् संसारको असत् मानते हैं; क्योंकि यह पहले भी नहीं था और पीछे भी नहीं रहेगा, इसलिये वर्तमानमें भी यह नहीं है; जैसे—स्वप्न। कई दार्शनिकोंका यह मत है कि संसार परिवर्तनशील है, हरदम बदलता रहता है, कभी एक रूप नहीं रहता; जैसे—अपना शरीर। कई यह मानते हैं कि परिवर्तनशील होनेपर भी संसारका कभी अभाव नहीं होता, प्रत्युत तत्त्वसे सदा रहता है; जैसे—जल (जल ही बर्फ, बादल, भाप और परमाणुरूपसे हो जाता है, पर स्वरूपसे वह मिटता नहीं)। इस तरह अनेक मतभेद हैं; किन्तु नाशवान् जड़का अपने अविनाशी चेतन-स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इसमें किसी भी दार्शनिकका मतभेद नहीं है। ‘संगं त्यक्त्वा’ पदोंसे भगवान्ने उसी सम्बन्धका त्याग कहा है।

प्रकृति सत् है या असत् है अथवा सत्-असत्से विलक्षण है? अनादि-सान्त है या अनादि-अनन्त है? इस झगड़ेमें पड़कर साधकको अपना अमूल्य समय खर्च नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इस प्रकृतिसे तथा प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहिये, जो कि स्वतः हो ही रहा है। स्वतः होनेवाले सम्बन्ध-विच्छेदका केवल अनुभव करना है कि शरीर तो प्रतिक्षण बदलता ही रहता है और स्वयं निर्विकाररूपसे सदा ज्यों-का-त्यों रहता है।

अब प्रश्न यह होता है कि फल क्या है? प्रारब्ध-कर्मके अनुसार अभी हमें जो परिस्थिति, वस्तु, देश, काल आदि प्राप्त हैं, वह सब कर्मोंका ‘प्राप्त फल’ है और भविष्यमें जो परिस्थिति, वस्तु आदि प्राप्त होनेवाली है, वह सब कर्मोंका ‘अप्राप्त फल’ है। प्राप्त तथा अप्राप्त फलमें आसक्ति रहनेके कारण ही प्राप्तमें ममता और अप्राप्तकी कामना होती है। इसलिये भगवान्ने ‘त्यक्त्वा फलानि च’ कहकर फलोंका त्याग करनेकी बात कही है।

कर्मफलका त्याग क्यों करना चाहिये? क्योंकि कर्मफल हमारे साथ रहनेवाला है ही नहीं। कारण यह है कि जिन कर्मोंसे फल बनता है, उन कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है; अतः उनका फल भी प्राप्त और नष्ट होनेवाला ही है। इसलिये कर्मफलका त्याग करना है। फलके त्यागमें वस्तुतः फलकी आसक्तिका, कामनाका ही त्याग करना है। वास्तवमें आसक्ति हमारे स्वरूपमें है नहीं, केवल मानी हुई है।

दूसरी बात, जो अपना स्वरूप होता है, उसका त्याग नहीं होता; जैसे—प्रज्वलित अग्नि उष्णता और प्रकाशका त्याग नहीं कर सकती। जो चीज अपनी नहीं होती, उसका भी त्याग नहीं होता; जैसे—संसारमें अनेक वस्तुएँ पड़ी हैं; परन्तु उनका हम त्याग करें—ऐसा कहना भी नहीं बनता; क्योंकि वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं। इसलिये त्याग उसीका होता है, जो वास्तवमें अपना नहीं है, पर जिसको अपना मान लिया है। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदि हमारे नहीं हैं, फिर भी उनको हम अपना मानते हैं, तो इस अपनेपनकी मान्यताका ही त्याग करना है।

मनुष्यके सामने कर्तव्यरूपसे जो कर्म आ जाय, उसको

  • यहाँ ‘फलानि’ शब्दमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि सकामभावसे कर्म करनेवालोंमें बहुत-से फलोंकी इच्छा होती है—‘बहुगुणशा हानन्ताश्च बुद्ध्योऽव्यवसायिनाम्’ (गीता २।४९)। वे इस लोकमें सुख-आराम, मान-सम्मान, यश-प्रतिष्ठा आदि चाहते हैं और परलोकमें स्वर्ग आदिकी प्राप्ति चाहते हैं। भगवान्के मतमें इन सभी फलोंकी इच्छाओंका त्याग है।