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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1110

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

११०९

फल और आसक्ति का त्याग करके सावधानीके साथ तत्परतापूर्वक करना चाहिये—‘कर्तव्यानि’। कर्मयोगमें विधि-निषेधको लेकर ‘अमुक काम करना है और अमुक काम नहीं करना है’—ऐसा विचार तो करना ही है; परन्तु ‘अमुक काम बड़ा है और अमुक काम छोटा है’—ऐसा विचार नहीं करना है। कारण कि जहाँ कर्म और उसके फलसे अपना कोई सम्बन्ध ही नहीं है, वहाँ यह कर्म बड़ा है, यह कर्म छोटा है; इस कर्मका फल बड़ा है, इस कर्मका फल छोटा है—ऐसा विचार हो ही नहीं सकता। कर्मका बड़ा या छोटा होना फलकी इच्छाके कारण ही दीखता है, जब कि कर्मयोगमें फलेच्छाका त्याग होता है।

कर्म करना राग-प्रीतिके लिये भी होता है और राग-निवृत्तिके लिये भी। कर्मयोगी राग-निवृत्तिके लिये अर्थात् करनेका राग मिटानेके लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करता है—‘आरुरुक्षोमुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते’ (गीता ६।३), ‘न कर्मणामनारम्भानैकम्व्यं पुरुषोऽश्रुते’ (गीता ३।४)। अपने लिये कर्म करनेसे करनेका राग बढ़ता है। इसलिये कर्मयोगी कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता, प्रत्युत केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है। उसके स्थूलशरीरमें होनेवाली ‘क्रिया’, सूक्ष्मशरीरमें होनेवाला ‘परहित-चित्तन’ तथा कारणशरीरमें होनेवाली ‘स्थिरता’—तीनों ही दूसरोंके हितके लिये होती हैं, अपने लिये नहीं। इसलिये उसका करनेका राग सुगमतासे मिट जाता है।

परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें कर्मासक्ति और फलासक्ति—दोनोंके त्यागकी बात आयी है। कर्मासक्ति और फलासक्ति ही खास बन्धन है, जिससे छूटनेपर ही मनुष्य योगारूढ़ होता है—‘यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जे……’ (गीता ६।४)।

शुभ कर्म भी निष्कामभाव होनेसे ही कल्याण करनेवाले होते हैं। अगर निष्कामभाव न हो तो शुभ कर्म भी बन्धनकारक होते हैं—‘आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता ८।१६)।

सम्बन्ध—इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने तीन प्रकारके त्यागकी बात कही थी। अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसी त्रिविध त्यागका वर्णन करते हैं।

परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें संसारका राग ही बाधक है। अतः राग मिटनेपर कर्मयोगीको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति अपने-आप हो जाती है (गीता—चौथे अध्यायका अङ्गीसर्वां श्लोक)।

‘कर्तव्य’ शब्दका अर्थ होता है—जिसको हम कर सकते हैं तथा जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि जरूर होती है। उद्देश्य वही कहलाता है, जो नित्यसिद्ध और अनुत्पन्न है अर्थात् जो अनादि है और जिसका कभी विनाश नहीं होता। उस उद्देश्यकी सिद्धि मनुष्यजन्ममें ही होती है और उसकी सिद्धिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है, न कि कर्मजन्म परिस्थितिरूप सुख-दुःख भोगनेके लिये। कर्मजन्म परिस्थिति वह होती है, जो उत्पन्न और नष्ट होती हो। वह परिस्थिति तो मनुष्यके अलावा पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता, नारकीय-स्वर्गीय आदि योनियोंके प्राणियोंको भी मिलती है, जहाँ कर्तव्यका कोई प्रश्न ही नहीं है और जहाँ उद्देश्यकी प्रतिका अधिकार भी नहीं है।

भगवान्के द्वारा अपने मतको ‘निश्चितम्’ कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं है, यह मत अटल है अर्थात् यह किंचिन्मात्र भी इधर-उधर नहीं हो सकता; और ‘उत्तमम्’ कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें शास्त्रीय दृष्टिसे कोई कमी नहीं है, प्रत्युत यह पूर्णताको प्राप्त करानेवाला है।

नियतस्य तु सन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।

मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥

नियतस्य= नियतन, उपपद्यते= उचित नहीं है।परित्यागः= त्याग करना
कर्मणः= कर्मकातस्य= उसकातामसः= तामस
तु= तोमोहात्= मोहपूर्वकपरिकीर्तितः= कहा गया है।
सन्यासः= त्याग करना