श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
११०९
फल और आसक्ति का त्याग करके सावधानीके साथ तत्परतापूर्वक करना चाहिये—‘कर्तव्यानि’। कर्मयोगमें विधि-निषेधको लेकर ‘अमुक काम करना है और अमुक काम नहीं करना है’—ऐसा विचार तो करना ही है; परन्तु ‘अमुक काम बड़ा है और अमुक काम छोटा है’—ऐसा विचार नहीं करना है। कारण कि जहाँ कर्म और उसके फलसे अपना कोई सम्बन्ध ही नहीं है, वहाँ यह कर्म बड़ा है, यह कर्म छोटा है; इस कर्मका फल बड़ा है, इस कर्मका फल छोटा है—ऐसा विचार हो ही नहीं सकता। कर्मका बड़ा या छोटा होना फलकी इच्छाके कारण ही दीखता है, जब कि कर्मयोगमें फलेच्छाका त्याग होता है।
कर्म करना राग-प्रीतिके लिये भी होता है और राग-निवृत्तिके लिये भी। कर्मयोगी राग-निवृत्तिके लिये अर्थात् करनेका राग मिटानेके लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करता है—‘आरुरुक्षोमुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते’ (गीता ६।३), ‘न कर्मणामनारम्भानैकम्व्यं पुरुषोऽश्रुते’ (गीता ३।४)। अपने लिये कर्म करनेसे करनेका राग बढ़ता है। इसलिये कर्मयोगी कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता, प्रत्युत केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है। उसके स्थूलशरीरमें होनेवाली ‘क्रिया’, सूक्ष्मशरीरमें होनेवाला ‘परहित-चित्तन’ तथा कारणशरीरमें होनेवाली ‘स्थिरता’—तीनों ही दूसरोंके हितके लिये होती हैं, अपने लिये नहीं। इसलिये उसका करनेका राग सुगमतासे मिट जाता है।
परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें कर्मासक्ति और फलासक्ति—दोनोंके त्यागकी बात आयी है। कर्मासक्ति और फलासक्ति ही खास बन्धन है, जिससे छूटनेपर ही मनुष्य योगारूढ़ होता है—‘यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जे……’ (गीता ६।४)।
शुभ कर्म भी निष्कामभाव होनेसे ही कल्याण करनेवाले होते हैं। अगर निष्कामभाव न हो तो शुभ कर्म भी बन्धनकारक होते हैं—‘आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता ८।१६)।
सम्बन्ध—इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने तीन प्रकारके त्यागकी बात कही थी। अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसी त्रिविध त्यागका वर्णन करते हैं।
परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें संसारका राग ही बाधक है। अतः राग मिटनेपर कर्मयोगीको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति अपने-आप हो जाती है (गीता—चौथे अध्यायका अङ्गीसर्वां श्लोक)।
‘कर्तव्य’ शब्दका अर्थ होता है—जिसको हम कर सकते हैं तथा जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि जरूर होती है। उद्देश्य वही कहलाता है, जो नित्यसिद्ध और अनुत्पन्न है अर्थात् जो अनादि है और जिसका कभी विनाश नहीं होता। उस उद्देश्यकी सिद्धि मनुष्यजन्ममें ही होती है और उसकी सिद्धिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है, न कि कर्मजन्म परिस्थितिरूप सुख-दुःख भोगनेके लिये। कर्मजन्म परिस्थिति वह होती है, जो उत्पन्न और नष्ट होती हो। वह परिस्थिति तो मनुष्यके अलावा पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता, नारकीय-स्वर्गीय आदि योनियोंके प्राणियोंको भी मिलती है, जहाँ कर्तव्यका कोई प्रश्न ही नहीं है और जहाँ उद्देश्यकी प्रतिका अधिकार भी नहीं है।
भगवान्के द्वारा अपने मतको ‘निश्चितम्’ कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं है, यह मत अटल है अर्थात् यह किंचिन्मात्र भी इधर-उधर नहीं हो सकता; और ‘उत्तमम्’ कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें शास्त्रीय दृष्टिसे कोई कमी नहीं है, प्रत्युत यह पूर्णताको प्राप्त करानेवाला है।
नियतस्य तु सन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥
| नियतस्य | = नियत | न, उपपद्यते | = उचित नहीं है। | परित्यागः | = त्याग करना |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्मणः | = कर्मका | तस्य | = उसका | तामसः | = तामस |
| तु | = तो | मोहात् | = मोहपूर्वक | परिकीर्तितः | = कहा गया है। |
| सन्यासः | = त्याग करना |
१११०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
व्याख्या —[ तीन तरहके त्यागका वर्णन भगवान् इसलिये करते हैं कि अर्जुन कर्माका स्वरूपसे त्याग करना चाहते थे—‘श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके’ (गीता २।५); अतः त्रिविध त्याग बताकर अर्जुनको चेत कराना था, और आगेके लिये मनुष्यमात्रको यह बताना था कि नियत कर्माका स्वरूपसे त्याग करना भगवान्को मान्य (अभीष्ट) नहीं है। भगवान् तो सात्त्विक त्यागको ही वास्तवमें त्याग मानते हैं। सात्त्विक त्यागसे संसारके सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है।
दूसरी बात, सत्रहवें अध्यायमें भी भगवान् गुणोंके अनुसार श्रद्धा, आहार आदिके तीन-तीन भेद कहकर आये हैं, इसलिये यहाँ भी अर्जुनद्वारा त्यागका तत्त्व पृष्ठनेपर भगवान्ने त्यागके तीन भेद कहे हैं।]
‘नियतस्य तु सन्यासः कर्मणो नोपपद्यते’ —पूर्व-श्लोकमें भगवान्ने त्यागके विषयमें अपना जो निश्चित उत्तम मत बताया है, उससे यह तामस त्याग बिलकुल ही विपरीत है और सर्वथा निकृष्ट है, यह बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पद आया है।
नियत कर्माका त्याग करना कभी भी उचित नहीं है; क्योंकि वे तो अवश्यकर्तव्य हैं। बलिवैश्वदेव आदि यज्ञ करना, कोई अतिथि आ जाय तो गृहस्थ-धर्मके अनुसार उसको अन्न, जल आदि देना, विशेष पर्वमें या श्राद्ध-तर्पणके दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराना और दक्षिणा देना, अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार प्रातः और सायंकालमें सन्ध्या करना आदि कर्मोंको न मानना और न करना ही नियत कर्माका त्याग है।
‘मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः’ —ऐसे नियत कर्मोंको मूढ़तासे अर्थात् बिना विवेक-विचारके छोड़ देना तामस त्याग कहा जाता है। सत्संग, सभा, समिति आदिमें जाना आवश्यक था, पर आलस्यमें पड़े रहे, आराम करने लग गये अथवा सो गये; घरमें माता-पिता बीमार हैं, उनके लिये वैद्यको बुलाने या औषधि लानेके लिये जा रहे थे, रास्तेमें कहींपर लोग ताश-चौपड़ आदि खेल रहे थे, उनको देखकर खुद भी खेलमें लग गये और वैद्यको बुलाना या औषधि लाना भूल गये; कोर्टमें मुकदमा चल रहा है, उसमें हाजिर होनेके समय हँसी-दिल्लगी, खेल-तमाशा आदिमें लग गये और समय बीत गया; शरीरके लिये शौच-स्नान आदि जो आवश्यक कर्तव्य हैं, उनको आलस्य और प्रमादके कारण छोड़ दिया—यह सब तामस त्यागके उदाहरण हैं।
विहित कर्म और नियत कर्ममें क्या अन्तर है? शास्त्रोंने जिन कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी है, वे सभी ‘विहित कर्म’ कहलाते हैं। उन सम्पूर्ण विहित कर्मोंका पालन एक व्यक्ति कर ही नहीं सकता; क्योंकि शास्त्रोंमें सम्पूर्ण वारों तथा तिथियोंके व्रतका विधान आता है। यदि एक ही मनुष्य सब वारोंमें या सब तिथियोंमें व्रत करेगा तो फिर वह भोजन कब करेगा? इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके लिये सभी विहित कर्म लागू नहीं होते। परन्तु उन विहित कर्मोंमें भी वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुसार जिसके लिये जो कर्तव्य आवश्यक होता है, उसके लिये वह ‘नियत कर्म’ कहलाता है। जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—चारों वर्णोंमें जिस-जिस वर्णके लिये जीविका और शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी जितने भी नियम हैं, उस-उस वर्णके लिये वे सभी ‘नियत कर्म’ हैं।
नियत कर्माका मोहपूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग ‘तामस’ हो जाता है तथा सुख और आरामके लिये त्याग करनेसे वह त्याग ‘राजस’ हो जाता है। सुखेच्छा, फलेच्छा तथा आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग ‘सात्त्विक’ हो जाता है। तात्पर्य यह है कि मोहमें उलझ जाना तामस पुरुषका स्वभाव है, सुख-आराममें उलझ जाना राजस पुरुषका स्वभाव है और इन दोनोंसे रहित होकर सावधानीपूर्वक निष्कामभावसे कर्तव्य-कर्म करना सात्त्विक पुरुषका स्वभाव है। इस सात्त्विक स्वभाव अथवा सात्त्विक त्यागसे ही कर्म और कर्मफलसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है, राजस और तामस त्यागसे नहीं; क्योंकि राजस और तामस त्याग वास्तवमें त्याग है ही नहीं।
लोग सामान्य रीतिसे स्वरूपसे कर्मोंको छोड़ देनेको ही त्याग मानते हैं; क्योंकि उन्हें प्रत्यक्षमें वही त्याग दीखता है। कौन व्यक्ति कौन-सा काम किस भावसे कर रहा है, इसका उन्हें पता नहीं लगता। परन्तु भगवान् भीतरकी कामना-ममता-आसक्तिके त्यागको ही त्याग मानते हैं; क्योंकि ये ही जन्म-मरणके कारण हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।
यदि बाहरके त्यागको ही असली त्याग माना जाय तो सभी मरनेवालोंका कल्याण हो जाना चाहिये; क्योंकि उनकी तो सम्पूर्ण वस्तुएँ छूट जाती हैं; और तो क्या, अपना कहलानेवाला शरीर भी छूट जाता है और उनको वे वस्तुएँ प्रायः यादतक नहीं रहतीं! अतः भीतरका त्याग ही असली त्याग है। भीतरका त्याग होनेसे बाहरसे वस्तुएँ अपने पास रहे या न रहे, मनुष्य उनसे बँधता नहीं।
श्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
११११
परिशिष्ट भाव —‘विहित’ की अपेक्षा ‘नियत’ कर्ममें व्यक्ति की विशेष जिम्मेवारी होती है। जैसे, किसीको पहलेपर खड़ा कर दिया अथवा जल पिलानेके लिये प्याऊपर बैठा दिया तो यह उसके लिये नियत कर्म हो गया, जिसकी उसपर विशेष जिम्मेवारी है। नियत कर्मके त्यागका ज्यादा दोष लगता है। नियतका त्याग करनेसे विप्लव होता है। अतः पैसे कम मिलें या ज्यादा, आराम कम मिले या ज्यादा, अपने नियत कर्मका कभी त्याग नहीं करना चाहिये। नियत कर्म न करनेके कारण ही आजकल समाजमें अन्व्यवस्था हो रही है। जिसकी जिस कामके लिये नियुक्त कर दी, वह उस कामको नहीं करेगा तो क्या दशा होगी? नियतका मोहपूर्वक त्याग करना तामस है, जिसका फल अधोगतिकी प्राप्ति है—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४।१८)।
दुःखमित्येव यत्कर्म कायकलेशभयात्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥
| यत् | = जो कुछ | कायकलेशभयात्= शारीरिक | त्यागम् | = त्याग |
|---|---|---|---|---|
| कर्म | = कर्म है, (वह) | परिश्रमके भयसे | कृत्वा | = करके |
| दुःखम् | = दुःखरूप | (उसका) | एव | = भी |
| एव | = ही है— | त्यजेत् | = त्याग कर दे, (तो) | त्यागफलम् |
| इति | = ऐसा (समझकर) | सः | = वह | न |
| कोई) | राजसम् | = राजस | लभेत् | = पाता। |
व्याख्या —‘दुःखमित्येव यत्कर्म’—यज्ञ, दान आदि शास्त्रीय नियत कर्मोंको करनेमें केवल दुःख ही भोगना पड़ता है और उनमें है ही क्या? क्योंकि उन कर्मोंको करनेके लिये अनेक नियमोंमें बँधना पड़ता है और खर्चा भी करना पड़ता है—इस प्रकार राजस पुरुषको उन कर्मोंमें केवल दुःख-ही-दुःख दीखता है। दुःख दीखनेका कारण यह है कि उनका परलोकपर, शास्त्रीय, शास्त्रविहित कर्मोंपर और उन कर्मोंके परिणामपर श्रद्धा-विश्वास नहीं होता।
‘कायकलेशभयात्यजेत्’ —राजस मनुष्यको शास्त्र-मर्यादा और लोक-मर्यादाके अनुसार चलनेसे शरीरमें कलेश अर्थात् परिश्रमका अनुभव होता है*। राजस मनुष्यको अपने वर्ण, आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेमें और माता-पिता, गुरु, मालिक आदिकी आज्ञाका पालन करनेमें पराधीनता और दुःखका अनुभव होता है तथा उनकी आज्ञा भंग करके जैसी मरजी आये, वैसा करनेमें स्वाधीनता और सुखका अनुभव होता है। राजस मनुष्योंके विचार यह होते हैं कि ‘गृहस्थमें आराम नहीं मिलता, स्त्री-पुत्र आदि हमारे अनुकूल नहीं हैं अथवा सब कुटुम्बी मर गये हैं, घरमें काम करनेके लिये कोई रहा नहीं, खुदको तकलीफ उठानी
पड़ती है, इसलिये साधु बन जायँ तो आरामसे रहेंगे, रोटी, कपड़ा आदि सब चीजें मुफ्तमें मिल जायँगी, परिश्रम नहीं करना पड़ेगा; कोई ऐसी सरकारी नौकरी मिल जाय, जिससे काम कम करना पड़े और रुपये आरामसे मिलते रहें, हम काम न करें तो भी उस नौकरीसे हमें कोई छुड़ा न सके, हम नौकरी छोड़ देंगे तो हमें पेंशन मिलती रहेगी’, इत्यादि। ऐसे विचारोंके कारण उन्हें घरका काम-धन्ध करना अच्छा नहीं लगता और वे उसका त्याग कर देते हैं।
यहाँ शंका होती है कि ज्ञानप्राप्तिके साधनोंमें दुःख और दोषको बार-बार देखनेकी बात कही है (गीता—तेरहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक) और यहाँ कर्मोंमें दुःख देखकर उनका त्याग करनेको राजस त्याग कहा है अर्थात् कर्मोंके त्यागका निषेध किया है—इन दोनों बातोंमें परस्पर विरोध प्रतीत होता है। इसका समाधान है कि वास्तवमें इन दोनोंमें विरोध नहीं है, प्रत्युत इन दोनोंका विषय अलग-अलग है। वहाँ (गीता—तेरहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें) भोगोंमें दुःख और दोषको देखनेकी बात है और यहाँ नियत कर्तव्य-कर्मोंमें दुःखको देखनेकी बात है। इसलिये वहाँ भोगोंका त्याग करनेका विषय है और यहाँ कर्तव्य-कर्मोंका
- कलेशका अनुभव होनेमें शरीरकी ममता और आसक्ति ही कारण है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
त्याग करनेका विषय है। भोगोंका तो त्याग करना चाहिये, पर कर्तव्य-कर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। कारण कि जिन भोगोंमें सुखबुद्धि और गुणबुद्धि हो रही है, उन भोगोंमें बार-बार दुःख और दोषको देखनेसे भोगोंसे वैराग्य होगा, जिससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होगी; परन्तु नियत कर्तव्य-कर्मोंमें दुःख देखकर उन कर्मोंका त्याग करनेसे सदा पराधीनता और दुःख भोगना पड़ेगा— ‘यथार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’ (गीता ३।९)। तात्पर्य यह हुआ कि भोगोंमें दुःख और दोष देखनेसे भोगासक्ति छूटेगी, जिससे कल्याण होगा और कर्तव्योंमें दुःख देखनेसे कर्तव्य छूटेगा, जिससे पतन होगा। कर्तव्य-कर्मोंका त्याग करनेमें तो राजस और तामस—ये दो भेद होते हैं, पर परिणाम—(आलस्य, प्रमाद, अतिनिद्रा आदि—) में दोनों एक हो जाते हैं अर्थात् परिणाममें दोनों ही तामस हो जाते हैं, जिसका फल अधोगति होता है— ‘अधोगच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४।१८)।
एक शंका यह भी हो सकती है कि सत्संग, भगवत्-कथा, भक्तचरित्र सुननेसे किसीको वैराग्य हो जाय तो वह प्रभुको पानेके लिये आवश्यक कर्तव्य-कर्मोंको भी छोड़ देता है और केवल भगवान्के भजनमें लग जाता है।
परिशिष्ट भाव —त्यागका फल ‘शान्ति’ है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२।१२) और रागका फल ‘दुःख’ है—‘रजसस्तु फलं दुःखम्’ (गीता १४।१६)। राजस मनुष्यको त्यागका फल ‘शान्ति’ तो नहीं मिलती, पर रागका फल ‘दुःख’ तो मिलता ही है।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥
| अर्जुन | = हे अर्जुन! | नियतम् | = शास्त्रविहित | त्यक्त्वा | = त्याग करके |
|---|---|---|---|---|---|
| कार्यम्, एव | = ‘केवल कर्तव्यमात्र करना है’— | कर्म | = कर्म | क्रियते | = किया जाता है, |
| इति | = ऐसा (समझकर) | सङ्गम् | = आसक्ति | सः, एव | = वही |
| यत् | = जो | च | = और | सात्त्विकः | = सात्त्विक |
| फलम् | = फलेच्छका | त्यागः मतः | = त्याग माना गया है। |
व्याख्या —‘कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियते-र्जुन’—यहाँ ‘कार्यम्’ पदके साथ ‘इति’ और ‘एव’ ये दो अव्यय लगानेसे यह अर्थ निकलता है कि केवल कर्तव्यमात्र करना है। इसको करनेमें कोई फलासक्ति नहीं, कोई स्वार्थ नहीं और कोई क्रियाजय सुखभोग भी नहीं। इस प्रकार कर्तव्यमात्र करनेसे कर्ताका उस कर्मसे सम्बन्ध-
इसलिये उसका वह कर्तव्य-कर्मोंका त्याग राजस कहा जाना चाहिये? ऐसी बात नहीं है। सांसारिक कर्मोंको छोड़कर जो भजनमें लग जाता है, उसका त्याग राजस या तामस नहीं हो सकता। कारण कि भगवान्को प्राप्त करना मनुष्य-जन्मका ध्येय है; अतः उस ध्येयकी सिद्धिके लिये कर्तव्य-कर्मोंका त्याग करना वास्तवमें कर्तव्यका त्याग करना नहीं है, प्रत्युत असली कर्तव्यको करना है। उस असली कर्तव्यको करते हुए आलस्य, प्रमाद आदि दोष नहीं आ सकते; क्योंकि उसकी रुचि भगवान्में रहती है। परन्तु राजस और तामस त्याग करनेवालोंमें आलस्य, प्रमाद आदि दोष आयेंगे ही; क्योंकि उसकी रुचि भोगोंमें रहती है।
‘स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्’ —त्यागका फल ‘शान्ति’ है। राजस मनुष्य त्याग करके भी त्यागके फल—(शान्ति—) को नहीं पाता। कारण कि उसने जो त्याग किया है, वह अपने सुख-आरामके लिये ही किया है। ऐसा त्याग तो पशु-पक्षी आदि भी करते हैं। अपने सुख-आरामके लिये शुभ-कर्मोंका त्याग करनेसे राजस मनुष्यको शान्ति तो नहीं मिलती, पर शुभ-कर्मोंके त्यागका फल दण्डरूपसे जरूर भोगना पड़ता है।
विच्छेद हो जाता है। ऐसा होनेसे वह कर्म बन्धनकारक नहीं होता अर्थात् संसारके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता। कर्म तथा उसके फलमें आसक्त होनेसे ही बन्धन होता है— ‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)।
शास्त्रविहित कर्मोंमें भी देश, काल, वर्ण, आश्रम, परिस्थितिके अनुसार जिस-जिस कर्ममें जिस-जिसकी
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
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नियुक्ति की जाती है, वे सब नियत कर्म कहलाते हैं; जैसे—साधुको ऐसा करना चाहिये, गृहस्थको ऐसा करना चाहिये, ब्राह्मणको अमुक काम करना चाहिये, क्षत्रियको अमुक काम करना चाहिये इत्यादि। उन कर्मोंको प्रमाद, आलस्य, उपेक्षा, उदासीनता आदि दोषोंसे रहित होकर तत्परता और उत्साहपूर्वक करना चाहिये। इसीलिये भगवान्ने कर्मयोगके प्रसंगमें जगह-जगह ‘समाचर’ शब्द दिया है (गीता—तीसरे अध्यायका नवों और उन्नीसवों श्लोक)।
‘संगं त्यक्त्वा फलं चैव’—संगके त्यागका तात्पर्य है कि कर्म, कर्म करनेके औजार (साधन) आदिमें आसक्ति, प्रियता, ममता आदि न हो और फलके त्यागका तात्पर्य है कि कर्मके परिणामके साथ सम्बन्ध न हो अर्थात् फलकी इच्छा न हो। इन दोनोंका तात्पर्य है कि कर्म और फलमें आसक्ति तथा इच्छाका त्याग हो।
‘स त्यागः सात्त्विको मतः’१—कर्म और फलमें आसक्ति तथा कामनाका त्याग करके कर्तव्यमात्र समझकर
परिशिष्ट भाव—तमोगुणमें मूढ़ता (बेसमझी) है और रजोगुणमें स्वार्थबुद्धि है, पर सत्त्वगुणमें न मूढ़ता है, न स्वार्थबुद्धि है, प्रत्युत सम्बन्ध-विच्छेद है। सात्त्विक मनुष्य कर्तव्यमात्र समझकर सब नियत कर्म करता है। एक मार्मिक बात है कि कर्तव्यमात्र समझकर जो भी कर्म किया जाता है, उससे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। लौकिक साधन (कर्मयोग और ज्ञानयोग) में शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद मुख्य है। इसलिये साधकको प्रत्येक कर्म कर्तव्यमात्र समझकर करना चाहिये। स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करनेसे तो बन्धन होता है, पर सम्बन्ध न जोड़कर कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे मुक्ति होती है।१
१-गीताभरमें जहाँ कहीं (सातवें अध्यायके बारहवें, चौदहवें अध्यायके पाँचवेंसे अठारहवें, और बाईसवें, सत्रहवें अध्यायके पहले, दूसरे, आठवेंसे दसवें, ग्यारहवेंसे तेरहवें, सत्रहवेंसे बाईसवें और अठारहवें अध्यायके बीसवेंसे अड़ईसवें, तीसवेंसे पैंतीसवें तथा सैंतीसवेंसे उन्नालीसवें श्लोकोंमें) गुणोंका वर्णन हुआ है, वहाँ सत्त्व, रज और तम—यही क्रम रखा गया है। केवल यहीं (१८।७—१९में) व्यतिक्रम हुआ है अर्थात् तम, रज और सत्त्व—ऐसा क्रम रखा गया है। इसका कारण है—(१) यदि छठे श्लोकके बाद ही (सातवें श्लोकमें) सात्त्विक त्यागका वर्णन करते तो भगवान्ने निश्चित मतमें और सात्त्विक त्यागमें पुनरुक्तिका दोष आ जाता। (२) किसी वस्तुकी उत्तमता तभी सिद्ध होती है, जब उसके पहले अनुत्तम वस्तुका वर्णन किया जाय। इसलिये भगवान् सात्त्विक त्यागकी उत्तमता सिद्ध करनेके लिये पहले अनुत्तम तामस और राजस त्यागका वर्णन करते हैं। (३) आगे दसवेंसे बारहवें श्लोकतक ‘सात्त्विक त्यागी’ का वर्णन हुआ है। यदि सात्त्विक त्यागका वर्णन सात्त्विक त्यागीके पास (नवें श्लोकमें) न देते तो तामस त्यागके पास होनेसे सात्त्विक त्यागीका सम्बन्ध न जुड़ता।
२-अलौकिक साधन (भक्तियोग) में भगवान्ने सम्बन्ध जोड़ना मुख्य है। इसलिये भक्तको जप, ध्यान, कीर्तन आदि कर्तव्य समझकर नहीं करने चाहिये, प्रत्युत अपने प्रियतमका काम (सेवा-पूजन) समझकर उनकी प्रसन्नताके लिये प्रेमपूर्वक करने चाहिये। भगवान्की होके वस्तु (नाम, रूप आदि) प्रिय लगनी चाहिये। भगवान्का काम करनेमें आनन्द आना चाहिये। जैसे, दवा कर्तव्य समझकर ली जाती है, पर भोजन कर्तव्य समझकर नहीं किया जाता, प्रत्युत अपनी भूख मिटानेके लिये किया जाता है। इसलिये भक्तको जप, ध्यान आदि कर्तव्यमात्र समझकर त्यागके उद्देश्यसे नहीं करने चाहिये, प्रत्युत भगवान्के साथ सम्बन्ध जाग्रत करनेके लिये करने चाहिये। अगर वह जप, ध्यान आदि भी कर्तव्य समझकर करेगा तो भगवत्सम्बन्ध जाग्रत नहीं होगा, प्रेमका उदय नहीं होगा।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
यहाँ शंका हो सकती है कि प्रस्तुत श्लोकमें तो कर्म करनेकी बात आयी है, त्यागकी बात आयी ही नहीं, फिर यह 'सात्त्विक त्याग' कैसे हुआ? इसका समाधान है कि सात्त्विक कर्तामें न मोह है, न स्वार्थ है, न आसक्ति है, न फलेच्छा है, केवल कर्तव्यमात्र है, इसलिये कर्मके साथ कर्ताका कुछ भी सम्बन्ध न होनेसे यह 'त्याग' हुआ। कर्तव्यमात्र जड़-विभागमें ही रहा, चेतनके साथ सम्बन्ध नहीं हुआ। जब चेतन (शरीरी) शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब शरीरसे होनेवाले कर्मोंके साथ उसका सम्बन्ध जुड़ जाता है। अगर वह शरीरके साथ सम्बन्ध न जोड़े, केवल कर्तव्यमात्र करे तो उसका कर्मोंके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ेगा। शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेके कारण इसका नाम 'त्याग' हुआ। इसमें कर्म और फल दोनोंके साथ सम्बन्ध-विच्छेद है।
सम्बन्ध—छठे श्लोकमें 'एतानि' और 'अपि तु' पदोंसे कहे गये यज्ञ, दान, तप आदि शास्त्रविहित कर्मोंके करनेमें और शास्त्रनिषिद्ध तथा काम्य कर्मोंका त्याग करनेमें क्या भाव होना चाहिये? यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
| अकुशलम् | = (जो) अकुशल | न, अनुषज्जते | = आसक्त नहीं | छिन्नसंशयः | = सन्देहरहित |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्म | = कर्मसे | होता, | (और) | ||
| न, द्वेष्टि | = द्वेष नहीं करता | त्यागी | = (वह) | सत्त्व- | |
| (और) | त्यागी, | समाविष्टः | = अपने स्वरूपमें | ||
| कुशले | = कुशल कर्ममें | मेधावी | = बुद्धिमान्, | स्थित है। |
व्याख्या—'न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म' —जो शास्त्रविहित शुभ-कर्म फलकी कामनासे किये जाते हैं और परिणाममें जिनसे पुनर्जन्म होता है (गीता—दूसरे अध्यायके बयालीसवेंसे चौवालीसवें तक और नवें अध्यायका बीसवाँ-इककीसवाँ श्लोक) तथा जो शास्त्रनिषिद्ध पाप-कर्म हैं और परिणाममें जिनसे नीच योनियों तथा नरकोंमें जाना पड़ता है (गीता—सोलहवें अध्यायके सातवेंसे बीसवें श्लोकतक), वे सब-के-सब कर्म 'अकुशल' कहलाते हैं। साधक ऐसे अकुशल कर्मोंका त्याग तो करता है, पर द्वेषपूर्वक नहीं। कारण कि द्वेषपूर्वक त्याग करनेसे कर्मोंसे तो सम्बन्ध छूट जाता है, पर द्वेषके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है, जो शास्त्रविहित काम्य-कर्मोंसे तथा शास्त्र-निषिद्ध पाप-कर्मोंसे भी भयंकर है।
'कुशले नानुषज्जते' —शास्त्रविहित कर्मोंमें भी जो वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिके अनुसार नियत हैं और जो आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके किये जाते हैं
तथा परिणाममें जिनसे मुक्ति होती है, ऐसे सभी कर्म 'कुशल' कहलाते हैं। साधक ऐसे कुशल कर्मोंको करते हुए भी उनमें आसक्त नहीं होता।
'त्यागी' —कुशल कर्मोंके करनेमें जिसका राग नहीं होता और अकुशल कर्मोंके त्यागमें जिसका द्वेष नहीं होता, वही असली त्यागी है*। परन्तु वह त्याग पूर्णतया तब सिद्ध होता है, जब कर्मोंको करने अथवा न करनेसे अपनेमें कोई फरक न पड़े अर्थात् निरन्तर निलिप्तता बनी रहे (गीता—तीसरे अध्यायका अठारहवाँ और चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। ऐसा होनेपर साधक योगारूढ़ हो जाता है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)।
'मेधावी' —जिसके सम्पूर्ण कार्य सांगोपांग होते हैं और संकल्प तथा कामनासे रहित होते हैं तथा ज्ञानरूप अग्निसे जिसने सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म कर दिया है, उसे पण्डित भी पण्डित (मेधावी अथवा बुद्धिमान्) कहते हैं (गीता—चौथे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।
- दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधानं निवर्तते। गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथाभक्तः ॥ (श्रीमद्भा० ११।७।११)
'जो पुरुष अनुकूलता-प्रतिकूलतारूप द्वन्द्वोंसे ऊँचा उठ जाता है, वह शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंका त्याग करता है, पर द्वेषबुद्धिसे नहीं और शास्त्रविहित कर्मोंको करता है, पर गुणबुद्धिसे अर्थात् रागपूर्वक नहीं। जैसे घुटनोंके बलपर चलनेवाले बच्चोंकी निर्बुद्धि और प्रवृत्ति राग-द्वेषपूर्वक नहीं होती, वैसे ही उभयातीतो पुरुषकी निर्बुद्धि और प्रवृत्ति भी राग-द्वेषपूर्वक नहीं होती (बच्चोंमें तो अज्ञता रहती है, पर राग-द्वेषसे रहित पुरुषमें विज्ञता रहती है)।'
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
१११५
कारण कि कर्मोंको करते हुए भी कर्मोंसे लिपायमान न होना बड़ी बुद्धिमत्ता है।
इसी मेधावीको चौथे अध्यायके अठारहवें श्लोकमें 'स बुद्धिमान्मनुष्येषु' पदोंसे सम्पूर्ण मनुष्योंमें बुद्धिमान् बताया गया है।
'छिन्नसंशयः'—उस त्यागी पुरुषमें कोई सन्देह नहीं रहता। तत्त्वमें अभिन्नभावसे स्थित रहनेके कारण उसमें किसी तरहका संदेह रहनेकी सम्भावना
परिशिष्ट भाव—इस श्लोकका तात्पर्य राग-द्वेषका त्याग करनेमें है। मनुष्यका स्वभाव है कि वह रागपूर्वक ग्रहण और द्वेषपूर्वक त्याग करता है। राग और द्वेष—दोनोंसे ही संसारसे सम्बन्ध जुड़ता है। भगवान् कहते हैं कि वास्तवमें वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो शुभ कर्मका ग्रहण तो करता है, पर रागपूर्वक नहीं और अशुभ कर्मका त्याग तो करता है, पर द्वेषपूर्वक नहीं।
सम्बन्ध—कर्मोंको करनेमें राग न हो और छोड़नेमें द्वेष न हो—इतनी झंझट क्यों की जाय? कर्मोंका सर्वथा ही त्याग क्यों न कर दिया जाय?—इस शंकाको दूर करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
न हि देहभूता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
| हि | = कारण कि | न, शक्यम् | = सम्भव | त्यागी है, |
|---|---|---|---|---|
| देहभूता | = देहधारी | नहीं है। | सः | |
| मनुष्यके द्वारा | तु | = इसलिये | त्यागी | = त्यागी है— |
| अशेषतः | = सम्पूर्ण | यः | = जो | इति |
| कर्माणि | = कर्मोंका | कर्मफल- | अभिधीयते | |
| त्यक्तुम् | = त्याग करना | त्यागी | = कर्मफलका |
व्याख्या—'न हि देहभूता* शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः'—देहधारी अर्थात् देहके साथ तादात्म्य रखनेवाले मनुष्योंके द्वारा कर्मोंका सर्वथा त्याग होना सम्भव नहीं है; क्योंकि शरीर प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति स्वतः क्रियाशील है। अतः शरीरके साथ तादात्म्य (एकता) रखनेवाला क्रियासे रहित कैसे हो सकता है? हाँ, यह हो सकता है कि मनुष्य यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि कर्मोंको छोड़ दे; परन्तु वह खाना-पीना, चलना-फिरना, आना-जाना, उठना-बैठना, सोना-जागना आदि आवश्यक शारीरिक क्रियाओंको कैसे छोड़ सकता है?
दूसरी बात, भीतरसे कर्मोंका सम्बन्ध छोड़ना ही
ही नहीं रहती। सन्देह तो वहीं रहता है, जहाँ अधूरा ज्ञान होता है अर्थात् कुछ जानते हैं और कुछ नहीं जानते।
'सत्त्वसमाविष्टः'—आसक्ति आदिका त्याग होनेसे उसकी अपने स्वरूपमें, चिन्मयतामें स्वतः स्थिति हो जाती है। इसलिये उसे 'सत्त्वसमाविष्टः' कहा गया है। इसीको पाँचवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें 'तस्मादब्रह्मणि ते स्थिताः' पदोंसे परमात्मामें स्थित बताया गया है।
वास्तवमें छोड़ना है। बाहरसे सम्बन्ध नहीं छोड़ा जा सकता। यदि बाहरसे सम्बन्ध छोड़ भी दिया जाय तो वह कबतक छूटा रहेगा? जैसे कोई समाधि लगा ले तो उस समय बाहरकी क्रियाओंका सम्बन्ध छूट जाता है। परन्तु समाधि भी एक क्रिया है, एक कर्म है; क्योंकि इसमें प्रकृतिजन्म कारण-शरीरका सम्बन्ध रहता है। इसलिये समाधिसे भी व्युत्थान होता है।
कोई भी देहधारी मनुष्य कर्मोंका स्वरूपसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं कर सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मता (योगनिष्ठा) प्राप्त नहीं होती और कर्मोंका त्याग करनेमात्रसे सिद्धि
- यहाँ 'देहभूता' पदको देहाभिमानी अर्थात् देहके साथ तादात्म्य माननेवाले सामान्य पुरुषोंका ही वाचक समझना चाहिये। गुणातीत महापुरुषकी देहसे भी क्रियाएँ होती रहती हैं; परन्तु देहके साथ तादात्म्य न रहनेसे उसका उन क्रियाओंसे कोई सम्बन्ध नहीं होता अर्थात् वह उन क्रियाओंका कर्ता नहीं बनता।
११९६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
(सांख्यनिष्ठा) भी प्राप्त नहीं होती (गीता—तीसरे अध्यायका चौथा श्लोक)।
मार्मिक बात
पुरुष (चेतन) सदा निर्विचार और एकरस रहनेवाला है; परन्तु प्रकृति विकारी और सदा परिवर्तनशील है। जिसमें अच्छी रीतिसे क्रियाशीलता हो, उसको 'प्रकृति' कहते हैं—'प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युद्) इति प्रकृतिः।'
उस प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ जबतक पुरुष अपना सम्बन्ध (तादात्म्य) मानता रहेगा, तबतक वह कर्मोंका सर्वथा त्याग कर ही नहीं सकता। कारण कि शरीरमें अहंता-ममता होनेके कारण मनुष्य शरीरसे होनेवाली प्रत्येक क्रियाको अपनी क्रिया मानता है, इसलिये वह कभी किसी अवस्थामें भी क्रियारहित नहीं हो सकता।
दूसरी बात, केवल पुरुषने ही प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ा है। प्रकृतिने पुरुषके साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा है। जहाँ विवेक रहता है, वहाँ पुरुषने विवेककी उपेक्षा करके प्रकृतिसे सम्बन्धकी सद्भावना कर ली अर्थात् सम्बन्धको सत्य मान लिया। सम्बन्धको सत्य माननेसे ही बन्धन हुआ है। वह सम्बन्ध दो तरहका होता है—अपनेको शरीर मानना और शरीरको अपना मानना। अपनेको शरीर माननेसे 'अहंता' और शरीरको अपना माननेसे 'ममता' होती है। इस अहंता-ममतारूप सम्बन्धका घनिष्ठ होना ही देहधारीका स्वरूप है। ऐसा देहधारी मनुष्य कर्मोंको सर्वथा नहीं छोड़ सकता।
'यस्तु* कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते'—जो किसी भी कर्म और फलके साथ अपना सम्बन्ध नहीं रखता, वही त्यागी है। जबतक मनुष्य कुशल-अकुशलके साथ, अच्छे-मन्देके साथ अपना सम्बन्ध रखता है, तबतक वह त्यागी नहीं है।
यह पुरुष जिस प्राकृत क्रिया और पदार्थको अपना मानता है, उसमें उसकी प्रियता हो जाती है। उसी प्रियताका नाम है—आसक्ति। यह आसक्ति ही वर्तमानके कर्मोंको लेकर 'कर्मसक्ति' और भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छाको लेकर 'फलासक्ति' कहलाती है। जब मनुष्य फल-त्यागका उद्देश्य बना लेता है, तब उसके सब कर्म
संसारके हितके लिये होने लगते हैं, अपने लिये नहीं। कारण कि उसको यह बात अच्छी तरहसे समझमें आ जाती है कि कर्म करनेकी सब-की-सब सामग्री संसारसे मिली है और संसारकी ही है, अपनी नहीं। इन कर्मोंका भी आदि और अन्त होता है तथा उनका फल भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है; परन्तु स्वयं सदा निर्विचार रहता है; न उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है और न कभी विकृत ही होता है। ऐसा विवेक होनेपर फलेच्छाका त्याग सुगमतासे हो जाता है। फलका त्याग करनेमें उस विवेकी मनुष्यमें कभी अभिमान भी नहीं आता; क्योंकि कर्म और उसका फल—दोनों ही अपनेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रहे हैं; अतः उनके साथ हमारा सम्बन्ध वास्तवमें है ही कहाँ? इसीलिये भगवान् कहते हैं कि जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी कहा जाता है।
निर्विचारका विकारी कर्मफलके साथ सम्बन्ध कभी था नहीं, है नहीं, हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं है। केवल अविवेकके कारण सम्बन्ध माना हुआ था। उस अविवेकके मिटनेसे मनुष्यकी अभिधा अर्थात् उसका नाम 'त्यागी' हो जाता है—'स त्यागीत्यभिधीयते।'
माने हुए सम्बन्धके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक बात कही जाती है। एक व्यक्ति घर-परिवारको छोड़कर सच्चे हृदयसे साधु-संन्यासी हो जाता है तो उसके बाद घरवालोंकी कितनी ही उन्नति अथवा अवनति हो जाय अथवा सब-के-सब मर जायें, उनका नामोनिशान भी न रहे, तो भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता। इसमें विचार करें कि उस व्यक्तिका परिवारके साथ जो सम्बन्ध था, वह दोनों तरफसे माना हुआ था अर्थात् वह परिवारको अपना मानता था और परिवार उसको अपना मानता था। परन्तु पुरुष और प्रकृतिका सम्बन्ध केवल पुरुषकी तरफसे माना हुआ है, प्रकृतिकी तरफसे माना हुआ नहीं! जब दोनों तरफसे माना हुआ (व्यक्ति और परिवारका) सम्बन्ध भी एक तरफसे छोड़नेपर छूट जाता है, तब केवल एक तरफसे माना हुआ (पुरुष और प्रकृतिका) सम्बन्ध छोड़नेपर छूट जाय, इसमें कहना ही क्या है!
- यहाँ 'तु' अव्ययका प्रयोग करनेका तात्पर्य है कि जो सामान्य संसारी पुरुष हैं, उनकी अपेक्षा कर्मफलका त्याग करनेवाला पुरुष श्रेष्ठ है, विलक्षण है। कारण कि उसका उद्देश्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करनेका अर्थात् अपना कल्याण करनेका होता है।
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
१११७
परिशिष्ट भाव—यह श्लोक कर्मयोगकी दृष्टिसे कहा गया है। कर्मयोगमें कर्मफलकी इच्छाका त्याग होता है और ज्ञानयोगमें कर्तृत्वाभिमानका त्याग होता है।
‘कर्मफलत्याग’ का तात्पर्य है—कर्मफलकी इच्छाका त्याग। कारण कि कर्मफलका त्याग हो ही नहीं सकता, जैसे—शरीर भी कर्मफल है, फिर उसका त्याग कैसे होगा ? भोजन करनेपर तृप्तिका त्याग कैसे होगा ! खेती करनेपर अन्नका त्याग कैसे होगा ? अतः साधकको कर्मफलकी इच्छाका त्याग करना है। फलेच्छाका त्याग करनेसे साधक सुखी-दुःखी नहीं होगा। इसलिये गीतामें फलेच्छाके त्यागको ही फलका त्याग कहा गया है।
बाहरका त्याग वास्तवमें त्याग नहीं है, प्रत्युत भीतरका त्याग ही त्याग है। अगर कोई बाहरसे त्याग करके एकान्तमें चला जाय तो भी संसारका बीज शरीर तो उसके साथ है ही। मरनेवालेका अपने शरीरसहित सब वस्तुओंका त्याग हो जाता है, पर उससे मुक्ति नहीं होती। अतः हमारी कामना-ममता-आसक्ति ही बाँधनेवाले हैं, संसार नहीं। इसलिये अपने लिये कुछ न करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है—‘यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’ (गीता ४।२३)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि कर्मफलका त्याग करनेवाला ही वास्तवमें त्यागी है। अगर मनुष्य कर्मफलका त्याग न करे तो क्या होता है—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्॥ १२॥
अत्यागिनाम् = कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको
कर्मणः = कर्मोंका
इष्टम् = इष्ट,
अनिष्टम् = अनिष्ट
च = और
मिश्रम् = मिश्रित—
त्रिविधम् = (ऐसे) तीन प्रकारका
फलम् = फल
प्रेत्य = मरनेके बाद (भी)
भवति = होता है;
तु = परन्तु
सन्न्यासिनाम् = कर्मफलका त्याग करनेवालोंको
क्वचित् = कहीं भी
न = नहीं होता।
व्याख्या—‘अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्’—कर्मका फल तीन तरहका होता है—इष्ट, अनिष्ट और मिश्र। जिस परिस्थितिको मनुष्य चाहता है, वह ‘इष्ट’ कर्मफल है, जिस परिस्थितिको मनुष्य नहीं चाहता, वह ‘अनिष्ट’ कर्मफल है और जिसमें कुछ भाग इष्टका तथा कुछ भाग अनिष्टका है, वह ‘मिश्र’ कर्मफल है। वास्तवमें देखा जाय तो संसारमें प्रायः मिश्रित ही फल होता है; जैसे—धन होनेसे अनुकूल (इष्ट) और प्रतिकूल (अनिष्ट)—दोनों ही स्थितियाँ आती हैं; धनसे निर्वाह होता है—यह अनुकूलता है और टैक्स लगता है, धन नष्ट हो जाता है, छिन जाता है—यह प्रतिकूलता है। तात्पर्य है कि इष्टमें भी आंशिक अनिष्ट और अनिष्टमें भी आंशिक इष्ट रहता ही है। कारण कि सम्पूर्ण संसार त्रिगुणात्मक है (गीता—अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक); यहाँ जन्म भी दुःखालय (आठवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक) और सुखरहित (नवें अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक) है। अतः चाहे इष्ट (अनुकूल) परिस्थिति हो, चाहे अनिष्ट (प्रतिकूल) परिस्थिति हो, वह सर्वथा अनुकूल या प्रतिकूल होती ही नहीं। यहाँ इष्ट और अनिष्ट कहनेका मतलब यह है कि इष्टमें अनुकूलताकी और अनिष्टमें प्रतिकूलताकी प्रधानता होती है। वास्तवमें कर्मोंका फल मिश्रित ही होता है; क्योंकि कोई भी कर्म सर्वथा निर्दोष नहीं होता (अठारहवें अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक)।
‘भवत्यत्यागिनां प्रेत्य’—उपर्युक्त सभी फल अत्यागियोंको अर्थात् फलकी इच्छा रखकर कर्म करनेवालोंको ही मिलते हैं, सन्न्यासियोंको नहीं। कारण कि जितने भी कर्म होते हैं, वे सब प्रकृतिके द्वारा अर्थात् प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिके द्वारा ही होते हैं तथा फलरूप परिस्थिति भी प्रकृतिके द्वारा ही बनती है। इसलिये कर्मोंका और उनके फलोंका सम्बन्ध केवल प्रकृतिके साथ है, ‘स्वयं’-(चेतनस्वरूप-) के साथ नहीं। परन्तु जब ‘स्वयं’ उनसे सम्बन्ध तोड़ लेता है, तो फिर वह भोगी नहीं बनता, प्रत्युत त्यागी हो जाता है।
अत्यागीका मतलब है—पीछेके दो (दसवें-ग्यारहवें)
१११८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
श्लोकोंमें जिन त्यागियोंकी बात आयी है, उनके समान जो त्यागी नहीं है अर्थात् जिन्होंने कर्मफलका त्याग नहीं किया है, ऐसे अत्यागी मनुष्योंके सामने इष्ट, अनिष्ट और मिश्र—तीनों कर्मफल अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें आते रहते हैं, जिनसे वे सुखी-दुःखी होते रहते हैं। उनसे सुखी-दुःखी होना ही वास्तवमें बन्धन है।
वास्तवमें अनुकूलतासे सुखी होना ही प्रतिकूलतामें दुःखी होनेका कारण है; क्योंकि परिस्थितिजन्य सुख भोगनेवाला कभी दुःखसे बच ही नहीं सकता। जबतक वह सुख भोगता रहेगा, तबतक वह प्रतिकूल परिस्थितियोंमें दुःखी होता ही रहेगा। चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग आदि उसको कभी छोड़ नहीं सकते और वह भी इनसे कभी छूट नहीं सकता।
‘प्रेत्य भवति ’ कहनेका तात्पर्य है कि जो कर्म-फलके त्यागी नहीं हैं, उनको इष्ट, अनिष्ट और मिश्र—ये तीनों कर्मफल मरनेके बाद जरूर मिलते हैं। परन्तु इसके साथ ‘न तु सन्यासिनां क्वचित् ’ पदोंमें कहा गया है कि जो कर्मफलके त्यागी हैं, उनको कहीं भी अर्थात् यहाँ और मरनेके बाद भी कर्मफल नहीं मिलता। इससे सिद्ध होता है कि अत्यागियोंको मरनेके बाद तो कर्मफल मिलता ही है, पर यहाँ जीते-जी भी कर्मफल मिल सकता है।
‘न तु सन्यासिनां क्वचित् ’—संन्यासियों—(त्यागियों—) को कहीं भी अर्थात् इस लोकमें या परलोकमें, इस जन्ममें या मरनेके बाद भी कर्मफल भोगना नहीं पड़ता। हाँ, पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार इस जन्ममें उनके सामने अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति तो आती है, पर वे अपने विवेकके बलसे उन परिस्थितियोंके भोगी नहीं बनते, उनसे सुखी-दुःखी नहीं होते अर्थात् सर्वथा निलिप्त रहते हैं।
संन्यासियों अर्थात् त्यागियोंको फल क्यों नहीं भोगना पड़ता? कारण कि वे अपने लिये कुछ भी नहीं करते। उनको अच्छी तरहसे यह विवेक हो जाता है कि अपना जो सत्स्वरूप है, उसके लिये किसी भी क्रिया और वस्तुकी आवश्यकता है ही नहीं। अपने लिये पानेकी इच्छासे साधक कुछ भी करता है तो वह अपने व्यक्तित्वको ही स्थिर रखता है; क्योंकि वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग मानता है। जब वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग नहीं मानता अर्थात् सबके हितमें ही अपना हित मानता है, तब वह स्वतः ‘सर्वभूतहिते रताः ’ हो जाता है। फिर उसके स्थूलशरीरसे होनेवाली
क्रियाएँ, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला परहित-चिन्तन और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरता—तीनों ही संसारके मात्र प्राणियोंके हितके लिये होती हैं। कारण कि शरीर आदि सब-की-सब सामग्री संसारसे अभिन्न है। उस सामग्रीसे अपना हित चाहता है—यही गलती होती है, जो कि अपनी परिच्छिन्नतामें हेतु है।
यहाँ ‘सन्यासिनाम् ’ पदमें त्यागी (कर्मयोगी) और संन्यासी (सांख्ययोगी)—दोनोंकी एकता की गयी है; जैसे—कर्मयोगी कर्मोंसे असंग रहता है तो सांख्ययोगी भी कर्मोंसे सर्वथा निलिप्त रहता है। कर्मयोगी (निष्कामभावसे) कर्म करते हुए भी फलके साथ सम्बन्ध नहीं रखता तो सांख्ययोगी कर्ममात्रके साथ किंचित् भी सम्बन्ध नहीं रखता। कर्मयोगी फलसे सम्बन्ध-विच्छेद करता है अर्थात् ममताका त्याग करता है तो सांख्ययोगी कर्तृत्वाभिमान अर्थात् अहंताका त्याग करता है। ममताका त्याग होनेपर अहंताका भी स्वतः त्याग हो जाता है और अहंताका त्याग होनेपर ममताका भी स्वतः त्याग हो जाता है। इसलिये भगवान्ने कर्मयोगमें ममताके त्यागके बाद अहंताका त्याग बताया है—‘निर्मयो निर्हंकारः ’ (२।७१) और सांख्ययोगमें अहंताके त्यागके बाद ममताका त्याग बताया है—‘अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः ’ (१८।५३)। इन दोनोंकी इस त्याग करनेकी प्रक्रियामें तो फरक है; परन्तु परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिका कार्य—इनमेंसे किसीके भी साथ इन दोनोंका सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् तत्त्वमें कर्मयोगी और सांख्ययोगी—दोनों एक हो जाते हैं।
पहले अर्जुनने यह पूछा था कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ; अतः भगवान्ने यहाँ ‘सन्यासिनाम् ’ पदसे दोनोंका यह तत्त्व बताया कि कर्मयोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है, अपने लिये कुछ नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ नहीं करना है। ऐसे ही सांख्ययोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है और अपने लिये कुछ नहीं चाहिये। सांख्ययोगी प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध नहीं मानता, इसलिये उसके लिये ‘अपने लिये कुछ नहीं करना है’—यह कहना ही नहीं बनता।
यहाँ ‘त्यागिनाम् ’ पद न देकर ‘सन्यासिनाम् ’ पद देनेका यह तात्पर्य है कि जो निलिप्तता सांख्ययोगसे होती है, वही निलिप्तता त्यागसे अर्थात् कर्मयोगसे भी होती है (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। दूसरी बात,
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
११११
यहाँतक भगवान्ने कर्मयोगसे निर्लिप्तता बतायी, अब ‘सन््यासिनाम् ’ पद कहकर आगे सांख्ययोगसे निर्लिप्तता बतानेका बीज भी डाल देते हैं।
कर्म-सम्बन्धी विशेष बात
पुरुष और प्रकृति—ये दो हैं। इनमेंसे पुरुषमें कभी परिवर्तन नहीं होता और प्रकृति कभी परिवर्तनरहित नहीं होती। जब यह पुरुष प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब प्रकृतिकी क्रिया पुरुषका ‘कर्म’ बन जाती है; क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे तादात्म्य हो जाता है। तादात्म्य होनेसे जो प्राकृत वस्तुएँ प्राप्त हैं, उनमें ममता होती है और उस ममताके कारण अप्राप्त वस्तुओंकी कामना होती है। इस प्रकार जबतक कामना, ममता और तादात्म्य रहता है, तबतक जो कुछ परिवर्तनरूप क्रिया होती है, उसका नाम ‘कर्म’ है।
तादात्म्यके टूटनेपर वही कर्म पुरुषके लिये ‘अकर्म’ हो जाता है अर्थात् वह कर्म क्रियामात्र रह जाता है, उसमें फलजनकता नहीं रहती—यह ‘कर्ममें अकर्म’ है। अकर्म-अवस्थामें अर्थात् स्वरूपका अनुभव होनेपर उस महापुरुषके शरीरसे जो क्रिया होती रहती है, वह ‘अकर्ममें कर्म’ है (गीता—चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि अपने निर्लिप्त स्वरूपका अनुभव न होनेपर भी वास्तवमें सब क्रियाएँ प्रकृति और उसके कार्य शरीरमें होती हैं; परन्तु प्रकृति या शरीरसे अपनी पृथक्ताका अनुभव न होनेसे वे क्रियाएँ ‘कर्म’ बन जाती हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सताईसवाँ और तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)।
कर्म तीन तरहके होते हैं—क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध। अभी वर्तमानमें जो कर्म किये जाते हैं, वे ‘क्रियमाण ’ कर्म कहलाते हैं*। वर्तमानसे पहले इस जन्ममें किये हुए अथवा पहलेके अनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म संगृहीत हैं, वे ‘संचित ’ कर्म कहलाते हैं। संचितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये प्रस्तुत (उन्मुख) हो गये हैं अर्थात् जन्म, आयु और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें परिणत होनेके लिये सामने आ गये हैं, वे ‘प्रारब्ध ’ कर्म कहलाते हैं।
- जो भी नये कर्म और उनके संस्कार बनते हैं, वे सब केवल मनुष्यजन्ममें ही बनते हैं (गीता—चौथे अध्यायका बारहवाँ और पन्द्रहवें अध्यायका दूसरा श्लोक), पशु-पक्षी आदि योनियोंमें नहीं; क्योंकि वे योनियाँ केवल कर्मफल-भोगके लिये ही मिलती हैं।
क्रियमाण कर्म
क्रियमाण कर्म
graph TD
A[क्रियमाण कर्म] --> B[फल-अंश]
A --> C[संस्कार-अंश]
B --> D[दृष्ट]
B --> E[अदृष्ट]
D --> F[तात्कालिक]
D --> G[कालान्तरिक]
E --> H[लौकिक]
E --> I[पारलौकिक]
C --> J[शुद्ध]
C --> K[अशुद्ध]
क्रियमाण कर्म दो तरहके होते हैं—शुभ और अशुभ। जो कर्म शास्त्रानुसार विधि-विधानसे किये जाते हैं, वे शुभकर्म कहलाते हैं और काम, क्रोध, लोभ, आसक्ति आदिको लेकर जो शास्त्र-निषिद्ध कर्म किये जाते हैं, वे अशुभकर्म कहलाते हैं।
शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक क्रियमाण कर्मका एक तो फल-अंश बनता है और एक संस्कार-अंश। ये दोनों भिन्न-भिन्न हैं।
क्रियमाण कर्मके फल-अंशके दो भेद हैं—दृष्ट और अदृष्ट। इनमेंसे दृष्टके भी दो भेद होते हैं—तात्कालिक और कालान्तरिक। जैसे, भोजन करते हुए जो रस आता है, सुख होता है, प्रसन्नता होती है और तृप्ति होती है—यह दृष्टका ‘तात्कालिक’ फल है और भोजनके परिणाममें आयु, बल, आरोग्य आदिका बढ़ना—यह दृष्टका ‘कालान्तरिक’ फल है। ऐसे ही जिसका अधिक मिर्च खानेका स्वभाव है, वह जब अधिक मिर्चवाले पदार्थ खाता है, तब उसको प्रसन्नता होती है, सुख होता है और मिर्चकी तीक्ष्णताके कारण मुँहमें, जीभमें जलन होती है, आँखोंसे और नाकसे पानी निकलता है, सिरसे पसीना निकलता है—यह दृष्टका ‘तात्कालिक’ फल है और कुपथ्यके कारण परिणाममें पेटमें जलन और रोग, दुःख आदिका होना—यह दृष्टका ‘कालान्तरिक’ फल है।
इसी प्रकार अदृष्टके भी दो भेद होते हैं—लौकिक और पारलौकिक। जीते-जी ही फल मिल जाय—इस भावसे यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, मन्त्र-जप आदि शुभकर्मोंको
११२०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
विधि-विधानसे किया जाय और उसका कोई प्रबल प्रतिबन्ध न हो तो यहाँ ही पुत्र, धन, यश, प्रतिष्ठा आदि अनुकूलकी प्राप्ति होना और रोग, निर्धनता आदि प्रतिकूलकी निवृत्ति होना—यह अदृष्टका 'लौकिक' फल है' और मरनेके बाद स्वर्ग आदिकी प्राप्ति हो जाय—इस भावसे यथार्थ विधि-विधान और श्रद्धा-विश्वासपूर्वक जो यज्ञ, दान, तप आदि शुभकर्म किये जायँ तो मरनेके बाद स्वर्ग आदि लोकोकी प्राप्ति होना—यह अदृष्टका 'पारलौकिक' फल है। ऐसे ही डाका डालने, चोरी करने, मनुष्यकी हत्या करने आदि अशुभकर्मोंका फल यहाँ ही कैद, जुर्माना, फाँसी आदि होना—यह अदृष्टका 'लौकिक' फल है और पापोंके कारण मरनेके बाद नरकोंमें जाना और पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि बनना—यह अदृष्टका 'पारलौकिक' फल है। पाप-पुण्यके इस लौकिक और पारलौकिक फलके विषयमें एक बात और समझनेकी है कि जिन पापकर्मोंका फल यहाँ कैद, जुर्माना, अपमान, निन्दा आदिके रूपमें
भोग लिया है, उन पापोंका फल मरनेके बाद भोगना नहीं पड़ेगा। परन्तु व्यक्तिके पाप कितनी मात्राके थे और उनका भोग कितनी मात्रामें हुआ अर्थात् उन पापकर्मोंका फल उसने पूरा भोगा या अधूरा भोगा—इसका पूरा पता मनुष्यको नहीं लगता; क्योंकि मनुष्यके पास इसका कोई माप-तौल नहीं है। परन्तु भगवान्को इसका पूरा पता है; अतः उनके कानूनके अनुसार उन पापोंका फल यहाँ जितने अंशमें कम भोगा गया है, उतना इस जन्ममें या मरनेके बाद भोगना ही पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये कि मेरा पाप तो कम था, पर दण्ड अधिक भोगना पड़ा अथवा मैंने पाप तो किया नहीं, पर दण्ड मुझे मिल गया! कारण कि यह सर्वज्ञ, सर्वसुहृद, सर्वसमर्थ भगवान्का विधान है कि पापसे अधिक दण्ड कोई नहीं भोगता और जो दण्ड मिलता है, वह किसी-न-किसी पापका ही फल होता है।
इसी तरह धन-सम्पत्ति, मान, आदर, प्रशंसा, नीरोगता
१-यहाँ दृष्टका 'कालान्तरिक' फल और अदृष्टका 'लौकिक' फल—दोनों फल एक समान ही दीखते हैं, फिर भी दोनोंमें अन्तर है। जो 'कालान्तरिक' फल है, वह सीधे मिलता है, प्रारब्ध बनकर नहीं; परन्तु जो 'लौकिक' फल है, वह प्रारब्ध बनकर ही मिलता है।
२-एक सुनी हुई घटना है। किसी गाँवमें एक सज्जन रहते थे। उनके घरके सामने एक सुनारका घर था। सुनारके पास सोना आता रहता था और वह गढ़कर देता रहता था। ऐसे वह पैसे कमाता था। एक दिन उसके पास अधिक सोना जमा हो गया। रात्रिमें पहरा लगानेवाले सिपाहीको इस बातका पता लग गया। उस पहरेदारने रात्रिमें उस सुनारको मार दिया और जिस बक्समें सोना था, उसे उठाकर चल दिया। इसी बीच सामने रहनेवाले सज्जन लघुशंकाके लिये उठकर बाहर आये। उन्होंने पहरेदारको पकड़ लिया कि तू इस बक्सको कैसे ले जा रहा है? तो पहरेदारने कहा—'तू चुप रह, हल्ला मत कर। इसमेंसे कुछ तू ले ले और कुछ मैं ले लूँ।' सज्जन बोले—'मैं कैसे ले लूँ? मैं चोर थोड़े ही हूँ।' पहरेदारने कहा—'देख, तू समझ जा, मेरी बात मान ले, नहीं तो दुःख पायेगा।' पर वे सज्जन माने नहीं। तब पहरेदारने बक्सा नीचे रख दिया और उस सज्जनको पकड़कर जोरसे सीटी बजा दी। सीटी सुनते ही और जगह पहरा लगानेवाले सिपाही दौड़कर वहाँ आ गये। उसने सबसे कहा कि 'यह इस घरसे बक्सा लेकर आया है और मैंने इसको पकड़ लिया है।' तब सिपाहियोंने घरमें घुसकर देखा कि सुनार मरा पड़ा है। उन्होंने उस सज्जनको पकड़ लिया और राजकीय आदमियोंके हवाले कर दिया। जजके सामने बहस हुई तो उस सज्जनने कहा कि 'मैंने नहीं मारा है, उस पहरेदार सिपाहीने मारा है।' सब सिपाही आपसमें मिले हुए थे, उन्होंने कहा कि 'नहीं इसीने मारा है, हमने खुद रात्रिमें इसे पकड़ा है।' इत्यादि।
मुकदमा चला। चलते-चलते अन्तमें उस सज्जनके लिये फाँसीका हुक्म हुआ। फाँसीका हुक्म होते ही उस सज्जनके मुखसे निकला—'देखो, सरासर अन्याय हो रहा है! भगवान्के दरबारमें कोई न्याय नहीं! मैंने मारा नहीं, मुझे दण्ड हो और जिसने मारा है, वह बेदाग छूट जाय, जुर्माना भी नहीं; यह अन्याय है।' जजपर उसके वचनोंका असर पड़ा कि वास्तवमें यह सच्चा बोल रहा है, इसकी किसी तरहसे जाँच होनी चाहिये। ऐसा विचार करके उस जजने एक षड्यन्त्र रचा।
सुबह होते ही एक आदमी रोता-चिल्लाता हुआ आया और बोला—'हमारे भाईकी हत्या हो गयी, सरकार! इसकी जाँच होनी चाहिये।' तब जजने उसी सिपाहीको और कैदी सज्जनको मरे व्यक्तिकी लाश उठाकर लानेके लिये भेजा। दोनों उस आदमीके साथ वहाँ गये, जहाँ लाश पड़ी थी। खाटपर लाशके ऊपर कपड़ा बिछा था। खून बिखरा पड़ा था। दोनोंने उस खाटको उठाया और उठाकर ले चले। साथका दूसरा आदमी खबर देनेके बहाने दौड़कर आगे चला गया। तब चलते-चलते सिपाहीने कैदीसे कहा—'देख, उस दिन तू मेरी बात मान लेता तो सोना मिल जाता और फाँसी भी नहीं होती, अब देख लिया सच्चाईका फल?' कैदीने कहा—'मैंने तो अपना काम सच्चाईका ही किया था, फाँसी हो गयी तो हो गयी! हत्या की तूने और दण्ड भोगना पड़ा मेरेको! भगवान्के यहाँ न्याय नहीं!'
खाटपर झूठमूठ मरे हुएके समान पड़ा हुआ आदमी उन दोनोंकी बातें सुन रहा था। जब जजके सामने खाट रखी गयी
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
११२१
आदि अनुकूल परिस्थितिके रूपमें पुण्य-कर्मोंका जितना फल यहाँ भोग लिया है, उतना अंश तो यहाँ नष्ट हो ही गया और जितना बाकी रह गया है, वह परलोकमें फिर भोगा जा सकता है। यदि पुण्यकर्मोंका पूरा फल यहाँ भोग लिया गया है तो पुण्य यहींपर समाप्त हो जायेंगे।
क्रियमाण-कर्मके संस्कार-अंशके भी दो भेद हैं—शुद्ध एवं पवित्र संस्कार और अशुद्ध एवं अपवित्र संस्कार। शास्त्रविहित कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं, वे शुद्ध एवं पवित्र होते हैं और शास्त्र, नीति, लोकमर्यादाके विरुद्ध कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं, वे अशुद्ध एवं अपवित्र होते हैं।
इन दोनों शुद्ध और अशुद्ध संस्कारोंको लेकर स्वभाव (प्रकृति, आदत) बनता है। उन संस्कारोंमेंसे अशुद्ध अंशका सर्वथा नाश करनेपर स्वभाव शुद्ध, निर्मल, पवित्र हो जाता है; परन्तु जिन पूर्वकृत कर्मोंसे स्वभाव बना है, उन कर्मोंकी भिन्नताके कारण जीवन्मुक्त पुरुषोंके स्वभावोंमें भी भिन्नता रहती है। इन विभिन्न स्वभावोंके कारण ही उनके द्वारा विभिन्न कर्म होते हैं, पर वे कर्म दोषी नहीं होते, प्रत्युत सर्वथा शुद्ध होते हैं और उन कर्मोंसे दुनियाका कल्याण होता है।
तो खूनभरे पकड़ोंको हटाकर वह उठ खड़ा हुआ और उसने सारी बात जजको बता दी कि रास्तेमें सिपाही यह बोला और कैदी यह बोला। यह सुनकर जजको बड़ा आश्चर्य हुआ। सिपाही भी हल्का-बल्का रह गया। सिपाहीको पकड़कर कैद कर लिया गया। परन्तु जजके मनमें सन्तोष नहीं हुआ। उसने कैदीको एकान्तमें बुलाकर कहा कि 'इस मामलेमें तो मैं तुम्हें निर्दोष मानता हूँ, पर सच-सच बताओ कि इस जन्ममें तुमने कोई हत्या की है क्या?' वह बोला—बहुत पहलेकी घटना है। एक दुष्ट था, जो छिपकर मेरे घर मेरी स्त्रीके पास आया करता था। मैंने अपनी स्त्रीको तथा उसको अलग-अलग खूब समझाया। पर वह माना नहीं। एक रात वह घरपर था और अचानक मैं आ गया। मेरेको गुस्सा आया हुआ था। मैंने तलवारसे उसका गला काट दिया और घरके पीछे जो नदी है, उसमें फेंक दिया। इस घटनाका किसीको पता नहीं लगा। यह सुनकर जज बोला—तुम्हारेको इस समय फाँसी होगी ही; मैंने भी सोचा कि मैंने किसीसे घूस (रिश्त) नहीं खाया, कभी बेईमानी नहीं की, फिर मेरे हाथसे इसके लिये फाँसीका हुक्म लिखा कैसे गया? अब सन्तोष हुआ। उसी पापका फल तुम्हें यह भोगना पड़ेगा। सिपाहीको अलग फाँसी होगी।'
[ उस सज्जनेने चोर सिपाहीको पकड़कर अपने कर्तव्यका पालन किया था। फिर उसको जो दण्ड मिला है, वह उसके कर्तव्य-पालनका फल नहीं है, प्रत्युत उसने बहुत पहले जो हत्या की थी, उस हत्याका फल है। कारण कि मनुष्यको अपनी रक्षा करनेका अधिकार है, मारनेका अधिकार नहीं। मारनेका अधिकार रक्षक क्षत्रियका, राजाका है। अतः कर्तव्यका पालन करनेके कारण उस पाप-(हत्या-) का फल उसको यहाँ मिल गया और परलोकके भयंकर दण्डसे उसका छुटकारा हो गया। कारण कि इस लोकमें जो दण्ड भोग लिया जाता है, उसका थोड़ेंमें ही छुटकारा हो जाता है, थोड़ेंमें ही शुद्ध हो जाती है, नहीं तो परलोकमें बड़ा भयंकर (व्याजसहित) दण्ड भोगना पड़ता है।]
इस कहानीसे यह पता लगता है कि मनुष्यके कब किये हुए पापका फल कब मिलेगा—इसका कुछ पता नहीं। भगवान्का विधान विचित्र है। जबतक पुराने पुण्य प्रबल रहते हैं, तबतक उग्र पापका फल भी तत्काल नहीं मिलता। जब पुराने पुण्य खत्म होते हैं, तब उस पापकी बारी आती है। पापका फल (दण्ड) तो भोगना ही पड़ता है, चाहे इस जन्ममें भोगना पड़े या जन्मान्तरमें।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। नाभूक्तं क्षीयते कर्म जन्मकोटिशतैरपि॥
- व्याघ्रस्तुष्यति कानने सुगहनां सिंहो गुहां सेवते हंसो वाज्छति पञ्चिनीं कुसुमितां गृध्रः श्मशाने स्थले।
साधुः सत्कृतिसाधुमेव भजते नीचोऽपि नीचं जनं या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते॥
'व्याघ्र घने वनमें संतुष्ट रहता है, सिंह गहन गुफाका सेवन करता है, हंस खिली हुई कमलिनियों चाहता है, ग्रीध्र श्मशान-भूमिमें रहना पसंद करता है, सज्जन पुरुष अच्छे आचरणोंवाले सज्जन पुरुषोंमें और नीच पुरुष नीच लोगोंमें ही रहना चाहते हैं। सच है, स्वभावसे पैदा हुई जिसकी जैसी प्रकृति है, उस प्रकृतिको कोई नहीं छोड़ता।
११२२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
बना हुआ जो स्वभाव है, उसको कोई बदल नहीं सकता; अतः वह स्वभाव दोषी नहीं है, निर्दोष है। जैसे, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है, वह स्वभाव नहीं बदल सकता और उसको बदलनेकी आवश्यकता भी नहीं है तथा उसको बदलनेके लिये शास्त्र भी नहीं कहता। परन्तु उस स्वभावमें जो अशुद्ध-अंश (राग-द्वेष) है, उसको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने मनुष्यको दी है। अतः जिन दोषोंसे मनुष्यका स्वभाव अशुद्ध बना है, उन दोषोंको मिटाकर मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक अपने स्वभावको शुद्ध बना सकता है। मनुष्य चाहे तो कर्मयोगकी दृष्टिसे अपने प्रयत्नसे राग-द्वेषको मिटाकर स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता—तीसरे अध्यायका चौतीसवाँ श्लोक), चाहे भक्तियोगकी दृष्टिसे सर्वथा भगवान्के शरण होकर अपना स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता—अठारहवें अध्यायका बासठवाँ श्लोक)। इस प्रकार प्रकृति-(स्वभाव-) की प्रबलता भी सिद्ध हो गयी और मनुष्यकी स्वतन्त्रता भी सिद्ध हो गयी। तात्पर्य यह हुआ कि शुद्ध स्वभावको रखनेमें प्रकृतिकी प्रबलता है और अशुद्ध स्वभावको मिटानेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता है।
जैसे, लोहेकी तलवारको पारस छुआ दिया जाय तो तलवार सोना बन जाती है; परन्तु उसकी मार, धार और आकार—ये तीनों नहीं बदलते। इस प्रकार सोना बनानेमें पारसकी प्रधानता रही और 'मार-धार-आकार' में तलवारकी प्रधानता रही। ऐसे ही जिन लोगोंने अपने स्वभावको परम शुद्ध बना लिया है, उनके कर्म भी सर्वथा शुद्ध होते हैं। परन्तु स्वभावके शुद्ध होनेपर भी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, साधन-पद्धति, मान्यता आदिके अनुसार आपसमें उनके कर्मोंकी भिन्नता रहती है। जैसे, किसी ब्राह्मणको तत्त्वबोध हो जानेपर भी वह खान-पान आदिमें पवित्रता रखेगा और अपने हाथसे बनाया हुआ भोजन ही ग्रहण करेगा; क्योंकि उसके स्वभावमें पवित्रता है। परन्तु किसी हरिजन आदि साधारण वर्णवालेको तत्त्वबोध हो जाय तो वह खान-पान आदिमें पवित्रता नहीं रखेगा और दूसरोंकी जूठन भी खा लेगा; क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा पड़ा हुआ है। पर ऐसा स्वभाव उसके लिये दोषी नहीं होगा।
जीवका अस्तुके साथ सम्बन्ध जोड़नेका स्वभाव अनादि-कालसे बना हुआ है, जिसके कारण वह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ा हुआ है और बार-बार ऊँच-नीच योनियोंमें जाता है। उस स्वभावको मनुष्य शुद्ध कर सकता है अर्थात् उसमें जो कामना, ममता और तादात्म्य है, उनको मिटा सकता है। कामना, ममता और तादात्म्यके मिटनेके
बाद जो स्वभाव रहता है, वह स्वभाव दोषी नहीं रहता। इसलिये उस स्वभावको मिटाना नहीं है और मिटानेकी आवश्यकता भी नहीं है।
जब मनुष्य अहंकारका आश्रय छोड़कर सर्वथा भगवान्के शरण हो जाता है, तब उसका स्वभाव शुद्ध हो जाता है; जैसे—लोहा पारसके स्पर्शसे शुद्ध सोना बन जाता है। स्वभाव शुद्ध होनेसे फिर वह स्वभावज कर्म करते हुए भी दोषी और पापी नहीं बनता (गीता—अठारहवें अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक)। सर्वथा भगवान्के शरण होनेके बाद भक्तका प्रकृतिके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता। फिर भक्तके जीवनमें भगवान्का स्वभाव काम करता है। भगवान् समस्त प्राणियोंके सुहृद् हैं—'सुहृद् सर्वभूतानाम्' (गीता ५।२९) तो भक्त भी समस्त प्राणियोंका सुहृद् हो जाता है—'सुहृद्: सर्वदेहिनाम्' (श्रीमद्भा० ३।२५।२१)।
इसी तरह कर्मयोगकी दृष्टिसे जब मनुष्य राग-द्वेषको मिटा देता है, तब उसके स्वभावकी शुद्धि हो जाती है, जिससे अपने स्वार्थका भाव मिटकर केवल दुनियाके हितका भाव स्वतः हो जाता है। जैसे भगवान्का स्वभाव प्राणिमात्रका हित करनेका है, ऐसे ही उसका स्वभाव भी प्राणिमात्रका हित करनेका हो जाता है। जब उसकी सब चेष्टाएँ प्राणिमात्रके हितमें हो जाती हैं, तब उसकी भगवान्की सर्वभूतसुहृत्ता-शक्तिके साथ एकता हो जाती है। उसके उस स्वभावमें भगवान्की सुहृत्ता-शक्ति कार्य करने लगती है।
वास्तवमें भगवान्की वह सर्वभूतसुहृत्ता-शक्ति मनुष्य-मात्रके लिये समान रीतिसे खुली हुई है; परन्तु अपने अहंकार और राग-द्वेषके कारण उस शक्तिमें बाधा लग जाती है अर्थात् वह शक्ति कार्य नहीं करती। महापुरुषोंमें अहंकार (व्यक्तित्व) और राग-द्वेष नहीं रहते, इसलिये उनमें यह शक्ति कार्य करने लग जाती है।
संचित कर्म
संचित कर्म
graph TD
A[संचित कर्म] --> B[फल-अंश]
A --> C[संस्कार-अंश]
B --> D[प्रारब्ध]
C --> E[स्फुरणा]
अनेक मनुष्य-जन्मोंमें किये हुए जो कर्म (फल-अंश और संस्कार-अंश) अन्तःकरणमें संगृहीत रहते हैं, वे संचित कर्म कहलाते हैं। उनमें फल-अंशसे तो 'प्रारब्ध' बनता है और संस्कार-अंशसे 'स्फुरणा' होती रहती है। उन स्फुरणाओंमें भी वर्तमानमें किये गये जो नये क्रियमाण
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
११२३
कर्म संचितमें भरती हुए हैं, प्रायः उनकी ही स्फुरणा होती है। कभी-कभी संचितमें भरती हुए पुराने कर्मोंकी स्फुरणा भी हो जाती है; जैसे किसी बर्तनमें पहले प्याज डाल दें और उसके ऊपर क्रमशः गेहूँ, चना, ज्वार, बाजरा डाल दें तो निकालते समय जो सबसे पीछे डाला था, वही (बाजरा) सबसे पहले निकलेगा, पर बीचमें कभी-कभी प्याजका भी भभका आ जायगा। परन्तु यह दृष्टान्त पूरा नहीं घटता; क्योंकि प्याज, गेहूँ आदि सावयव पदार्थ हैं और संचित कर्म निरवयव हैं। यह दृष्टान्त केवल इतने ही अंशमें बतानेके लिये दिया है कि नये क्रियमाण कर्मोंकी स्फुरणा ज्यादा होती है और कभी-कभी पुराने कर्मोंकी भी स्फुरणा होती है।
इसी तरह जब नींद आती है तो उसमें भी स्फुरणा होती है। नींदमें जाग्रत्-अवस्थाके दब जानेके कारण संचितकी वह स्फुरणा स्वप्नरूपसे दीखने लग जाती है, उसीको स्वप्नावस्था कहते हैं। स्वप्नावस्थामें बुद्धिकी सावधानी न रहनेके कारण क्रम, व्यतिक्रम और अनुक्रम ये नहीं रहते। जैसे, शहर तो दिल्लीका दीखता है और बाजार बम्बईका तथा उस बाजारमें दूकानें कलकत्ताकी दीखती हैं, कोई जीवित आदमी दीख जाता है अथवा किसी मरे हुए आदमीसे मिलना हो जाता है, बातचीत हो
जाती है, आदि-आदि।
जाग्रत्-अवस्थामें हरेक मनुष्यके मनमें अनेक तरहकी स्फुरणाएँ होती रहती हैं। जब जाग्रत्-अवस्थामें शरीर, इन्द्रियाँ और मनपरसे बुद्धिका अधिकार हट जाता है, तब मनुष्य जैसा मनमें आता है, वैसा बोलने लगता है। इस तरह उचित-अनुचितका विचार करनेकी शक्ति काम न करनेसे वह 'सीधा-सरल पागल' कहलाता है। परन्तु जिसके शरीर, इन्द्रियाँ और मनपर बुद्धिका अधिकार रहता है, वह जो उचित समझता है, वही बोलता है और जो अनुचित समझता है, वह नहीं बोलता। बुद्धि सावधान रहनेसे वह सावचेत रहता है, इसलिये वह 'चतुर पागल' है!
इस प्रकार मनुष्य जबतक परमात्मप्राप्ति नहीं कर लेता, तबतक वह अपनेको स्फुरणाओंसे बचा नहीं सकता। परमात्मप्राप्ति होनेपर बुरी स्फुरणाएँ सर्वथा मिट जाती हैं। इसलिये जीवनमुक्त महापुरुषके मनमें अपवित्र बुरे विचार कभी आते ही नहीं। अगर उसके कहलानेवाले शरीरमें प्रारब्धवश (व्याधि आदि किसी कारणवश) कभी बेहोशी, उन्माद आदि हो जाता है तो उसमें भी वह न तो शास्त्रनिषिद्ध बोलता है और न शास्त्रनिषिद्ध कुछ करता ही है; क्योंकि अन्तःकरण शुद्ध हो जानेसे शास्त्रनिषिद्ध बोलना या करना उसके स्वभावमें नहीं रहता।
१-स्फुरणा संचितके अनुसार भी होती है और प्रारब्धके अनुसार भी। संचितके अनुसार जो स्फुरणा होती है, वह मनुष्यको कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं करती। परन्तु संचितकी स्फुरणामें भी यदि राग-द्वेष हो जायें तो वह 'संकल्प' बनकर मनुष्यको कर्म करनेके लिये बाध्य कर सकती है। प्रारब्धके अनुसार जो स्फुरणा होती है, वह (फल-भोग करानेके लिये) मनुष्यको कर्म करनेके लिये बाध्य करती है; परन्तु वह विहित कर्म करनेके लिये ही बाध्य करती है, निषिद्ध कर्म करनेके लिये नहीं। कारण कि विवेकप्रधान मनुष्यशरीर निषिद्ध कर्म करनेके लिये नहीं है। अतः अपनी विवेकशक्तिको प्रबल करके निषिद्धका त्याग करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर है और ऐसा करनेमें वह स्वतन्त्र है।
२-जाग्रत्-अवस्थामें भी जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाएँ होती हैं; जैसे—मनुष्य जाग्रत्-अवस्थामें बड़ी सावधानीसे काम करता है, तो यह जाग्रतमें जाग्रत्-अवस्था है। जाग्रत्-अवस्थामें मनुष्य जिस कामको करता है, उस कामके अलावा अचानक जो दूसरी स्फुरणा होने लगती है, वह जाग्रतमें स्वप्न-अवस्था है। जाग्रत्-अवस्थामें कभी-कभी काम करते हुए भी उस कामकी तथा पूर्वकर्मोंकी कोई भी स्फुरणा नहीं होती, बिल्कुल वृत्तिरहित अवस्था हो जाती है, वह जाग्रतमें सुषुप्ति-अवस्था है।
कर्म करनेका वेग ज्यादा रहनेसे जाग्रत्-अवस्थामें जाग्रत् और स्वप्न-अवस्था तो ज्यादा होती है, पर सुषुप्ति-अवस्था बहुत थोड़ी होती है। अगर कोई साधक जाग्रत्की स्वाभाविक सुषुप्तिको स्थायी बना ले तो उसका साधन बहुत तेज हो जायगा; क्योंकि जाग्रत्-सुषुप्तिमें साधकका परमात्माके साथ निरावरणरूपसे स्वतः सम्बन्ध होता है। ऐसे तो सुषुप्ति-अवस्थामें भी संसारका सम्बन्ध टूट जाता है; परन्तु बुद्धि-वृत्ति अज्ञानमें लीन हो जानेसे स्वरूपका स्पष्ट अनुभव नहीं होता। जाग्रत्-सुषुप्तिमें बुद्धि जाग्रत् रहनेसे स्वरूपका स्पष्ट अनुभव होता है।
यह जाग्रत्-सुषुप्ति समाधिसे भी विलक्षण है; क्योंकि यह स्वतः होती है और समाधिमें अभ्यासके द्वारा वृत्तियोंको एकाग्र तथा निरुद्ध करना पड़ता है। इसलिये समाधिमें पुरुषार्थ साथमें रहनेके कारण शरीरमें स्थिति होती है; परन्तु जाग्रत्-सुषुप्तिमें अभ्यास और अहंकारके बिना वृत्तियाँ स्वतः निरुद्ध होनेके कारण स्वरूपमें स्थिति होती है अर्थात् स्वरूपका अनुभव होता है।
११२४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
प्रारब्ध कर्म
प्रारब्ध कर्म
graph TD
PK[प्रारब्ध कर्म] --> AK[अनुकूल परिस्थिति]
PK --> MS[मिश्रित (अनुकूल-प्रतिकूल) परिस्थिति]
PK --> PKL[प्रतिकूल परिस्थिति]
AK --> SPP1[स्वेच्छापूर्वक क्रिया (प्रवृत्ति)]
AK --> ANPP1[अनच्छापूर्वक क्रिया]
AK --> PEP1[परेच्छापूर्वक क्रिया]
MS --> SPP2[स्वेच्छापूर्वक क्रिया]
MS --> ANPP2[अनच्छापूर्वक क्रिया]
MS --> PEP2[परेच्छापूर्वक क्रिया]
PKL --> SPP3[स्वेच्छापूर्वक क्रिया]
PKL --> ANPP3[अनच्छापूर्वक क्रिया]
PKL --> PEP3[परेच्छापूर्वक क्रिया]
संचितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये सम्युख होते हैं, उन कर्मोंको प्रारब्ध कर्म कहते हैं*। प्रारब्ध कर्मोंका फल तो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें सामने आता है; परन्तु उन प्रारब्ध कर्मोंको भोगनेके लिये प्राणियोंकी प्रवृत्ति तीन प्रकारसे होती है—(१) स्वेच्छापूर्वक, (२) अनिच्छा-(दैवैच्छा-) पूर्वक और (३) परेच्छापूर्वक। उदाहरणार्थ—
(१) किसी व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें मुनाफा हो गया। ऐसे ही किसी दूसरे व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें घाटा लग गया। इन दोनोंमें मुनाफा होना और घाटा लगना तो उनके शुभ-अशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं; परन्तु माल खरीदनेमें उनकी प्रवृत्ति स्वेच्छापूर्वक हुई है।
(२) कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो आगे आनेवाली नदीमें बाढ़के प्रवाहके कारण एक धनका टोकरा बहकर आया और उस सज्जनने उसे निकाल लिया। ऐसे ही कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो उसपर वृक्षकी एक टहनी गिर पड़ी और उसको चोट लग गयी। इन दोनोंमें धनका मिलना और चोट लगना तो उनके शुभ-अशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं; परन्तु धनका
टोकरा मिलना और वृक्षकी टहनी गिरना—यह प्रवृत्ति अनिच्छा-(दैवैच्छा-) पूर्वक हुई है।
(३) किसी धनी व्यक्तिने किसी बच्चेको गोद ले लिया अर्थात् उसको पुत्र-रूपमें स्वीकार कर लिया, जिससे उसका सब धन उस बच्चेको मिल गया। ऐसे ही चोरोंने किसीका सब धन लूट लिया। इन दोनोंमें बच्चेको धन मिलना और चोरीमें धनका चला जाना तो उनके शुभ-अशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं; परन्तु गोदमें जाना और चोरी होना—यह प्रवृत्ति परेच्छापूर्वक हुई है।
यहाँ एक बात और समझ लेनी चाहिये कि कर्मोंका फल 'कर्म' नहीं होता, प्रत्युत 'परिस्थिति' होती है अर्थात् प्रारब्ध कर्मोंका फल परिस्थितिरूपसे सामने आता है। अगर नये (क्रियमाण) कर्मको प्रारब्धका फल मान लिया जाय तो फिर 'ऐसा करो, ऐसा मत करो'—यह शास्त्रोंका, गुरुजनोंका विधि-निषेध निरर्थक हो जायगा। दूसरी बात, पहले जैसे कर्म किये थे, उन्हींके अनुसार जन्म होगा और उन्हींके अनुसार कर्म होंगे तो वे कर्म फिर आगे नये कर्म पैदा कर देंगे, जिससे यह कर्म-परम्परा चलती ही रहेगी अर्थात् इसका कभी अन्त ही नहीं आयेगा।
- 'प्रकषेण आरब्धः प्रारब्धः' अर्थात् अच्छी तरहसे फल देनेके लिये जिसका आरम्भ हो चुका है, वह 'प्रारब्ध' है।
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
११२५
प्रारब्ध कर्मसे मिलनेवाले फलके दो भेद हैं—प्राप्त फल और अप्राप्त फल। अभी प्राणियोंके सामने जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आ रही है, वह 'प्राप्त' फल है और इसी जन्ममें जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भविष्यमें आनेवाली है वह 'अप्राप्त' फल है।
क्रियमाण कर्मोंका जो फल-अंश संचितमें जमा रहता है, वही प्रारब्ध बनकर अनुकूल, प्रतिकूल और मिश्रित परिस्थितिके रूपमें मनुष्यके सामने आता है। अतः जबतक संचित कर्म रहते हैं, तबतक प्रारब्ध बनता ही रहता है और प्रारब्ध परिस्थितिके रूपमें परिणत होता ही रहता है। यह परिस्थिति मनुष्यको सुखी-दुःखी होनेके लिये बाध्य नहीं करती। सुखी-दुःखी होनेमें तो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जोड़ना ही मुख्य कारण है। परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जोड़ने अथवा न जोड़नेमें यह मनुष्य सर्वथा स्वाधीन है, पराधीन नहीं है। जो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, वह अविवेकी पुरुष तो सुखी-दुःखी होता ही रहता है। परन्तु जो परिस्थितिके साथ सम्बन्ध नहीं मानता, वह विवेकी पुरुष कभी सुखी-दुःखी नहीं होता; अतः उसकी स्थिति स्वतः साम्यावस्थामें होती है, जो कि उसका स्वरूप है।
कर्मोंमें मनुष्यके प्रारब्धकी प्रधानता है या पुरुषार्थकी? अथवा प्रारब्ध बलवान् है या पुरुषार्थ?—इस विषयमें बहुत-सी शंकाएँ हुआ करती हैं। उनके समाधानके लिये पहले यह समझ लेना जरूरी है कि प्रारब्ध और पुरुषार्थ क्या है?
मनुष्यमें चार तरहकी चाहना हुआ करती है—एक धनकी, दूसरी धर्मकी, तीसरी भोगकी और चौथी मुक्तिकी। प्रचलित भाषामें इन्हीं चारोंको अर्थ, धर्म, काम और मोक्षके नामसे कहा जाता है—
(१) अर्थ—धनको 'अर्थ' कहते हैं। वह धन दो तरहका होता है—स्थाय और जंगम। सोना, चाँदी, रुपये, जमीन, जायदाद, मकान आदि स्थावर हैं और गाय, भैंस, घोड़ा, ऊँट, भेड़, बकरी आदि जंगम हैं।
(२) धर्म—सकाम अथवा निष्कामभावसे जो यज्ञ,
तप, दान, व्रत, तीर्थ आदि किये जाते हैं, उसको 'धर्म' कहते हैं।
(३) काम—सांसारिक सुख-भोगको 'काम' कहते हैं। वह सुखभोग आठ तरहका होता है—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मान, बड़ाई और आराम।
(क) शब्द—शब्द दो तरहका होता है—वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक। व्याकरण, कोश, साहित्य, उपन्यास, गल्प, कहानी आदि 'वर्णात्मक' शब्द हैं। खाल, तार और फूँकके तीन बाजे और तालका आधा बाजा—ये साढ़े तीन प्रकारके बाजे 'ध्वन्यात्मक' शब्दको प्रकट करनेवाले हैं। इन वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्दोंको सुननेसे जो सुख मिलता है, वह शब्दका सुख है।
(ख) स्पर्श—स्त्री, पुत्र, मित्र आदिके साथ मिलनेसे तथा ठण्डा, गरम, कोमल आदिके अर्थात् उनका त्वचाके साथ संयोग होनेसे जो सुख होता है, वह स्पर्शका सुख है।
(ग) रूप—नेत्रोंसे खेल, तमाशा, सिनेमा, बाजीगरी, वन, पहाड़, सरोवर, मकान आदिकी सुन्दरताको देखकर जो सुख होता है, वह रूपका सुख है।
(घ) रस—मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (कड़वा), तिक्त (तीखा) और कषाय (कसैला)—इन छः रसोंको चखनेसे जो सुख होता है, वह रसका सुख है।
(ङ) गन्ध—नाकसे अतर, तेल, फुलेल, लवेण्डर, पुष्प आदि सुगन्धवाले और लहसुन, प्याज आदि दुर्गन्धवाले पदार्थोंको सूँघनेसे जो सुख होता है, वह गन्धका सुख है।
(च) मान—शरीरका आदर-सत्कार होनेसे जो सुख होता है, वह मानका सुख है।
(छ) बड़ाई—नामकी प्रशंसा, वाह-वाह होनेसे जो सुख होता है, वह बड़ाईका सुख है।
(ज) आराम—शरीरसे परिश्रम न करनेसे अर्थात् निकम्मे पड़े रहनेसे जो सुख होता है, वह आरामका सुख है।
(ऽ) मोक्ष—आत्मसाक्षात्कार, तत्त्वज्ञान, कल्याण, उद्धार, मुक्ति, भगवदर्शन, भगवत्प्रेम आदिका नाम 'मोक्ष' है।
१-वर्णात्मक शब्दमें भी दस रस होते हैं—शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शान्त और वात्सल्य। ये दस ही रस चित्त द्रवित होनेसे होते हैं। इन दसों रसोंका उपयोग भगवान्के लिये किया जाय तो ये सभी रस कल्याण करनेवाले हो जाते हैं और इनसे सुख भोगा जाय तो ये सभी रस पतन करनेवाले हो जाते हैं।
२-ढोल, ढोलकी, तबला, पखावज, मृदंग आदि 'खाल' के; सितार, सारंगी, मोरचंग आदि 'तार' के; मशक, पेटी (हार्मोनियम), बांसुरी, पूँगी आदि 'फूँक' के और झाँझ, मंजीरा, करताल आदि 'ताल' के बाजे हैं।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
इन चारों (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष)-में देखा जाय तो अर्थ और धर्म—दोनों ही परस्पर एक-दूसरेकी वृद्धि करनेवाले हैं अर्थात् अर्थसे धर्मकी और धर्मसे अर्थकी वृद्धि होती है। परन्तु धर्मका पालन कामनापूर्तिके लिये किया जाय तो वह धर्म भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है और अर्थको कामनापूर्तिमें लगाया जाय तो वह अर्थ भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है। तात्पर्य है कि कामना धर्म और अर्थ—दोनोंको खा जाती है। इसीलिये गीतामें भगवान्ने कामनाको 'महाशन' (बहुत खानेवाला) बताते हुए उसके त्यागकी बात विशेषतासे कही है (तीसरे अध्यायके सैतीसवेंसे तैंतालीसवें श्लोकतक)।
यदि धर्मका अनुष्ठान कामनाका त्याग करके किया जाय तो वह अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है। ऐसे ही धनको कामनाका त्याग करके दूसरोंके उपकारमें, हितमें, सुखमें खर्च किया जाय तो वह भी अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है।
अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—इन चारोंमें 'अर्थ' (धन) और 'काम' (भोग)-की प्राप्तिमें प्रारब्धकी मुख्यता और पुरुषार्थकी गौणता है तथा 'धर्म' और 'मोक्ष' में पुरुषार्थकी मुख्यता और प्रारब्धकी गौणता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ—दोनोंका क्षेत्र अलग-अलग है और दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रमें प्रधान हैं। इसलिये कहा है— संतोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्तव्यः स्वाध्याये जपदानयोः॥
अर्थात् अपनी स्त्री, पुत्र, परिवार, भोजन और धनमें तो सन्तोष करना चाहिये और स्वाध्याय, पाठ-पूजा, नाम-जप, कीर्तन और दान करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि प्रारब्धके फल—धन और भोगमें तो सन्तोष करना चाहिये; क्योंकि वे प्रारब्धके अनुसार जितने मिलनेवाले हैं, उतने ही मिलेंगे, उससे अधिक नहीं। परन्तु धर्मका अनुष्ठान और अपना कल्याण करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये; क्योंकि यह नया पुरुषार्थ है और इसी पुरुषार्थके लिये मनुष्यशरीर मिला है।
१-लालने ताड़ने मातृर्णकारुण्यं यथाभक्ते। तद्वदेव महेशस्य नियन्तृर्णुणदोषयोः॥
'जिस प्रकार बच्चेका पालन करने और ताड़ना करने—दोनोंमें माताकी कहीं अकृपा नहीं होती, उसी प्रकार जीवोंके गुण-दोषोंका नियन्त्रण करनेवाले परमेश्वरकी कहीं किसीपर अकृपा नहीं होती है।'
२-यद्वापि तद्वत्त्वयेव यदभाव्यं न तद्ववेत्। इति निश्चितबुद्धीनां न चिन्ता बाधते क्वचित्॥ ( नारदपुराण, पूर्व, ३७।४७ )
'जो होनेवाला है, वह होकर ही रहता है और जो नहीं होनेवाला है, वह कभी नहीं होता—ऐसा निश्चय जिनकी बुद्धिमें होता है, उन्हें चिन्ता कभी नहीं सताती।'
कर्मके दो भेद हैं—शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप)। शुभकर्मका फल अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होना है और अशुभकर्मका फल प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होना है। कर्म बाहरसे किये जाते हैं, इसलिये उन कर्मोंका फल भी बाहरकी परिस्थितिके रूपमें ही प्राप्त होता है। परन्तु उन परिस्थितियोंसे जो सुख-दुःख होते हैं, वे भीतर होते हैं। इसलिये उन परिस्थितियोंमें सुखी तथा दुःखी होना शुभाशुभकर्मोंका अर्थात् प्रारब्धका फल नहीं है, प्रत्युत अपनी मूर्खताका फल है। अगर वह मूर्खता चली जाय, भगवान्पर१ अथवा प्रारब्धपर२ विश्वास हो जाय तो प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी चित्तमें प्रसन्नता होगी, हर्ष होगा। कारण कि प्रतिकूल परिस्थितिमें पाप कटते हैं, आगे पाप न करनेमें सावधानी आती है और पापोंके नष्ट होनेसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है।
साधकको अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करना चाहिये, दुरुपयोग नहीं। अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो अनुकूल सामग्रीको दूसरोंके हितके लिये सेवाबुद्धिसे खर्च करना अनुकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उसका सुख-बुद्धिसे भोग करना दुरुपयोग है। ऐसे ही प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग करना और 'मेरे पूर्वकृत पापोंका नाश करनेके लिये, भविष्यमें पाप न करनेकी सावधानी रखनेके लिये और मेरी उन्नति करनेके लिये ही प्रभु-कृपासे ऐसी परिस्थिति आयी है'३—ऐसा समझकर परम प्रसन्न रहना प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उससे दुःखी होना दुरुपयोग है।
मनुष्यशरीर सुख-दुःख भोगनेके लिये नहीं है। सुख भोगनेके स्थान स्वर्गादिक हैं और दुःख भोगनेके स्थान नरक तथा चौरासी लाख योनियाँ हैं। इसलिये वे भोगयोनियाँ हैं और मनुष्य कर्मयोन है। परन्तु यह कर्मयोन उनके लिये है जो मनुष्यशरीरमें सावधान नहीं होते, केवल जन्म-मरणके सामान्य प्रवाहमें ही पड़े हुए हैं। वास्तवमें मनुष्यशरीर सुख-दुःखसे ऊँचा उठनेके लिये अर्थात्
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
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मुक्तिको प्राप्तिके लिये ही मिला है। इसलिये इसको कर्मयोगि न कहकर 'साधनयोगि' ही कहना चाहिये।
प्रारब्ध-कर्मके फलस्वरूप जो अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति आती है, उन दोनोंमें अनुकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें तो मनुष्य स्वतन्त्र है, पर प्रतिकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें मनुष्य परतन्त्र है अर्थात् उसका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जा सकता। कारण यह है कि अनुकूल परिस्थिति दूसरोंका हित करने, उन्हें सुख देनेके फलस्वरूप बनी है और प्रतिकूल परिस्थिति दूसरोंको दुःख देनेके फलस्वरूप बनी है। इसको एक दृष्टान्तसे इस प्रकार समझ सकते हैं—
श्यामलालने रामलालको सौ रुपये उधार दिये। रामलालने वायदा किया कि अमुक महीने मैं ब्याजसहित रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत गया, पर रामलालने रुपये नहीं लौटाये तो श्यामलाल रामलालके घर पहुँचा और बोला—'तुमने वायदेके अनुसार रुपये नहीं दिये! अब दो।' रामलालने कहा—'अभी मेरे पास रुपये नहीं हैं, परसों दे दूँगा।' श्यामलाल तीसरे दिन पहुँचा और बोला—'लाओ मेरे रुपये!' रामलालने कहा—'अभी मैं आपके पैसे नहीं जुटा सका, परसों आपके रुपये जरूर दूँगा।' तीसरे दिन फिर श्यामलाल पहुँचा और बोला—'रुपये दो।' तो रामलालने कहा—'कल जरूर दूँगा।' दूसरे दिन श्यामलाल फिर पहुँचा और बोला—'लाओ मेरे रुपये।' रामलालने कहा—'रुपये जुटे नहीं, मेरे पास रुपये हैं नहीं, तो मैं कहाँसे दूँ? परसों आना।' रामलालकी बातें सुनकर श्यामलालको गुस्सा आ गया और 'परसों-परसों करता है, रुपये देता नहीं'—ऐसा कहकर उसने रामलालको पाँच जूते मार दिये। रामलालने कोर्टमें नालिश (शिकायत) कर दी। श्यामलालको बुलाया गया और पूछा गया—'तुमने इसके घरपर जाकर जूता मारा है?' तो श्यामलालने कहा—'हाँ साहब, मैंने जूता मारा है।' मैजिस्ट्रेटने पूछा—'क्यों मारा?'
श्यामलालने कहा—'इसको मैंने रुपये दिये थे और
इसने वायदा किया था कि मैं इस महीने रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत जानेपर मैंने इसके घरपर जाकर रुपये माँगे तो कल-परसों, कल-परसों कहकर इसने मुझे बहुत तंग किया। इसपर मैंने गुस्सेमें आकर इसे पाँच जूते मार दिये। तो सरकार! पाँच जूतोंके पाँच रुपये काटकर शेष रुपये मुझे दिला दीजिये।'
मैजिस्ट्रेटने हँसकर कहा—'यह फौजदारी कोर्ट है। यहाँ रुपये दिलानेका कायदा (नियम) नहीं है। यहाँ दण्ड देनेका कायदा है। इसलिये आपको जूता मारनेके बदलेमें कैद या जुर्माना भोगना ही पड़ेगा। आपको रुपये लेने हों तो दीवानी कोर्टमें जाकर नालिश करो, वहाँ रुपये दिलानेका कायदा है; क्योंकि वह विभाग अलग है।'
इस तरह अशुभकर्मोंका फल जो प्रतिकूल परिस्थिति है, वह 'फौजदारी' है, इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग नहीं कर सकते और शुभकर्मोंका फल जो अनुकूल परिस्थिति है, वह 'दीवानी' है, इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग किया जा सकता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके शुभ-अशुभ-कर्मोंका विभाग अलग-अलग है। इसलिये शुभकर्म (पुण्यों) और अशुभकर्मों- (पापों-)का अलग-अलग संग्रह होता है। स्वाभाविकरूपसे ये दोनों एक-दूसरेसे कटते नहीं अर्थात् पापोंसे पुण्य नहीं कटते और पुण्योंसे पाप नहीं कटते। हाँ, अगर मनुष्य पाप काटनेके उद्देश्यसे (प्रायश्चित्करूपसे) शुभकर्म करता है, तो उसके पाप कट सकते हैं।
संसारमें एक आदमी पुण्यात्मा है, सदाचारी है और दुःख पा रहा है तथा एक आदमी पापात्मा है, दुराचारी है और सुख भोग रहा है—इस बातको लेकर अच्छे-अच्छे पुरुषोंके भीतर भी यह शंका हो जाया करती है कि इसमें ईश्वरका न्याय कहाँ है*। इसका समाधान यह है कि अभी पुण्यात्मा जो दुःख पा रहा है, यह पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पापका फल है, अभी किये हुए पुण्यका नहीं। ऐसे ही अभी पापात्मा जो सुख भोग रहा है, यह भी पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पुण्यका फल है, अभी किये हुए पापका नहीं।
- महाभारत, वनपर्वमें एक कथा आती है। एक दिन द्रौपदीने युधिष्ठिरजी महाराजसे कहा कि आप धर्मको छोड़कर एक कदम भी आगे नहीं रखते, पर आप वनवासमें दुःख पा रहे हैं और दुर्वाधन धर्मकी किंचिन्मात्र भी परवाह न करके केवल स्वार्थ-परायण हो रहा है, पर वह राज्य कर रहा है, आरामसे रह रहा है और सुख भोग रहा है? ऐसी शंका करनेपर युधिष्ठिरजी महाराजने कहा कि जो सुख पानेकी इच्छासे धर्मका पालन करते हैं, वे धर्मके तत्त्वको जानते ही नहीं! वे तो पशुओंकी तरह सुख-भोगके लिये लोलुप और दुःखसे भयभीत रहते हैं, फिर बेचारे धर्मके तत्त्वको कैसे जानें! इसलिये मनुष्यकी मनुष्यता इसीमें है कि वे अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिकी परवाह न करके शास्त्रके आज्ञानुसार केवल अपने धर्म- (कर्तव्य- ) का पालन करते रहें।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
इसमें एक तात्त्विक बात और है। कर्मोंके फलरूपमें जो अनुकूल परिस्थिति आती है, उससे सुख ही होता है और प्रतिकूल परिस्थिति आती है, उससे दुःख ही होता है—ऐसी बात है नहीं। जैसे, अनुकूल परिस्थिति आनेपर मनमें अभिमान होता है, छोटोंसे घृणा होती है, अपनेसे अधिक सम्पत्तिवालोंको देखकर उनसे ईर्ष्या होती है, असहिष्णुता होती है, अन्तःकरणमें जलन होती है और मनमें ऐसे दुर्भाव आते हैं कि उनकी सम्पत्ति कैसे नष्ट हो तथा वरुपर उनको नीचा दिखानेकी चेष्टा भी होती है। इस तरह सुख-सामग्री और धन-सम्पत्ति पासमें रहनेपर भी वह सुखी नहीं हो सकता। परन्तु बाहरी सामग्रीको देखकर अन्य लोगोंको यह भ्रम होता है कि वह बड़ा सुखी है। ऐसे ही किसी विरक्त और त्यागी मनुष्यको देखकर भोग-सामग्रीवाले मनुष्यको उसपर दया आती है कि बेचारेके पास धन-सम्पत्ति आदि सामग्री नहीं है, बेचारा बड़ा दुःखी है! परन्तु वास्तवमें विरक्तके मनमें बड़ी शान्ति और बड़ी प्रसन्नता रहती है। वह शान्ति और प्रसन्नता धनके कारण किसी धनीमें नहीं रह सकती। इसलिये धनका होनामात्र सुख नहीं है और धनका अभावमात्र दुःख नहीं है। सुख नाम हृदयकी शान्ति और प्रसन्नताका है और दुःख नाम हृदयकी जलन और सन्तापका है।
पुण्य और पापका फल भोगनेमें एक नियम नहीं है। पुण्य तो निष्कामभावसे भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त हो सकता है; परन्तु पाप भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त नहीं होता। पापका फल तो भोगना ही पड़ता है; क्योंकि भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध किये हुए कर्म भगवान्के अर्पण कैसे हो सकते हैं? और अर्पण करनेवाला भी भगवान्के विरुद्ध कर्मोंको भगवान्के अर्पण कैसे कर सकता है? प्रत्युत भगवान्की आज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्के अर्पण होते हैं। इस विषयमें एक कहानी आती है।
एक राजा अपनी प्रजासहित हरिद्वार गया। उसके साथमें सब तरहके लोग थे। उनमें एक चमार भी था। उस चमारने सोचा कि ये बनिया लोग बड़े चतुर होते हैं। ये अपनी बुद्धिमानीसे धनी बन गये हैं। अगर हम भी उनकी बुद्धिमानीके अनुसार चलें तो हम भी धनी बन जायें! ऐसा विचार करके वह एक चतुर बनियेकी क्रियाओंपर निगरानी रखकर चलने लगा। जब हरिद्वारके ब्रह्मकुण्डमें पण्डा दान-पुण्यका संकल्प कराने लगा, तब उस बनियेने कहा—'मैंने अमुक ब्राह्मणको सौ रुपये उधार
दिये थे, आज मैं उनको दानरूपमें श्रीकृष्णार्पण करता हूँ!' पण्डेने संकल्प भरवा दिया। चमारने देखा कि इसने एक कौड़ी भी नहीं दी और लोगोंमें प्रसिद्ध हो गया कि इसने सौ रुपयोंका दान कर दिया, कितना बुद्धिमान् है! मैं भी इससे कम नहीं रहूँगा। जब पण्डेने चमारसे संकल्प भरवाना शुरू किया, तब चमारने कहा—'अमुक बनियेने मुझे सौ रुपये उधार दिये थे तो उन सौ रुपयोंको मैं श्रीकृष्णार्पण करता हूँ।' उसकी ग्रामीण बोलीको पण्डा पूरी तरह समझा नहीं और संकल्प भरवा दिया। इससे चमार बड़ा खुश हो गया कि मैंने भी बनियेके समान सौ रुपयोंका दान-पुण्य कर दिया!
सब घर पहुँचे। समयपर खेती हुई। ब्राह्मण और चमारके खेतोंमें खूब अनाज पैदा हुआ। ब्राह्मण देवताने बनियेसे कहा—'सेठ! आप चाहें तो सौ रुपयोंका अनाज ले लो, इससे आपको नफा भी हो सकता है। मुझे तो आपका कर्जा चुकाना है।' बनियेने कहा—'ब्राह्मण देवता! जब मैं हरिद्वार गया था, तब मैंने आपको उधार दिये हुए सौ रुपये दान कर दिये।' ब्राह्मण बोला—'सेठ! मैंने आपसे सौ रुपये उधार लिये हैं, दान नहीं लिये। इसलिये इन रुपयोंको मैं रखना नहीं चाहता, ब्याजसहित पूरा चुकाना चाहता हूँ।' सेठने कहा—'आप देना ही चाहते हैं तो अपनी बहन अथवा कन्याको दे सकते हैं। मैंने सौ रुपये भगवान्के अर्पण कर दिये हैं, इसलिये मैं तो लूँगा नहीं।' अब ब्राह्मण और क्या करता? वह अपने घर लौट गया।
अब जिस बनियेसे चमारने सौ रुपये लिये थे, वह बनिया चमारके खेतमें पहुँचा और बोला—'लाओ मेरे रुपये। तुम्हारा अनाज हुआ है, सौ रुपयोंका अनाज ही दे दो।' चमारने सुन रखा था कि ब्राह्मणके देनेपर भी बनियेने उससे रुपये नहीं लिये। अतः उसने सोचा कि मैंने भी संकल्प कर रखा है तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे? ऐसा सोचकर चमार बनियेसे बोला—'मैंने तो अमुक सेठकी तरह गंगाजीमें खड़े होकर सब रुपये श्रीकृष्णार्पण कर दिये, तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे?' बनिया बोला—'तरे अर्पण कर देनेसे कर्जा नहीं छूट सकता; क्योंकि तूने मेरेसे कर्जा लिया है तो तेरे छोड़नेसे कैसे छूट जायगा? मैं तो अपने सौ रुपये ब्याजसहित पूरे लूँगा; लाओ मेरे रुपये।' ऐसा कहकर उसने चमारसे अपने रुपयोंका अनाज ले लिया।
इस कहानीसे यह सिद्ध होता है कि हमारेपर दूसरोंका जो कर्जा है, वह हमारे छोड़नेसे नहीं छूट सकता। ऐसे ही हम