श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
यहाँ शंका हो सकती है कि प्रस्तुत श्लोकमें तो कर्म करनेकी बात आयी है, त्यागकी बात आयी ही नहीं, फिर यह 'सात्त्विक त्याग' कैसे हुआ? इसका समाधान है कि सात्त्विक कर्तामें न मोह है, न स्वार्थ है, न आसक्ति है, न फलेच्छा है, केवल कर्तव्यमात्र है, इसलिये कर्मके साथ कर्ताका कुछ भी सम्बन्ध न होनेसे यह 'त्याग' हुआ। कर्तव्यमात्र जड़-विभागमें ही रहा, चेतनके साथ सम्बन्ध नहीं हुआ। जब चेतन (शरीरी) शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब शरीरसे होनेवाले कर्मोंके साथ उसका सम्बन्ध जुड़ जाता है। अगर वह शरीरके साथ सम्बन्ध न जोड़े, केवल कर्तव्यमात्र करे तो उसका कर्मोंके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ेगा। शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेके कारण इसका नाम 'त्याग' हुआ। इसमें कर्म और फल दोनोंके साथ सम्बन्ध-विच्छेद है।
सम्बन्ध—छठे श्लोकमें 'एतानि' और 'अपि तु' पदोंसे कहे गये यज्ञ, दान, तप आदि शास्त्रविहित कर्मोंके करनेमें और शास्त्रनिषिद्ध तथा काम्य कर्मोंका त्याग करनेमें क्या भाव होना चाहिये? यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
| अकुशलम् | = (जो) अकुशल | न, अनुषज्जते | = आसक्त नहीं | छिन्नसंशयः | = सन्देहरहित |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्म | = कर्मसे | होता, | (और) | ||
| न, द्वेष्टि | = द्वेष नहीं करता | त्यागी | = (वह) | सत्त्व- | |
| (और) | त्यागी, | समाविष्टः | = अपने स्वरूपमें | ||
| कुशले | = कुशल कर्ममें | मेधावी | = बुद्धिमान्, | स्थित है। |
व्याख्या—'न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म' —जो शास्त्रविहित शुभ-कर्म फलकी कामनासे किये जाते हैं और परिणाममें जिनसे पुनर्जन्म होता है (गीता—दूसरे अध्यायके बयालीसवेंसे चौवालीसवें तक और नवें अध्यायका बीसवाँ-इककीसवाँ श्लोक) तथा जो शास्त्रनिषिद्ध पाप-कर्म हैं और परिणाममें जिनसे नीच योनियों तथा नरकोंमें जाना पड़ता है (गीता—सोलहवें अध्यायके सातवेंसे बीसवें श्लोकतक), वे सब-के-सब कर्म 'अकुशल' कहलाते हैं। साधक ऐसे अकुशल कर्मोंका त्याग तो करता है, पर द्वेषपूर्वक नहीं। कारण कि द्वेषपूर्वक त्याग करनेसे कर्मोंसे तो सम्बन्ध छूट जाता है, पर द्वेषके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है, जो शास्त्रविहित काम्य-कर्मोंसे तथा शास्त्र-निषिद्ध पाप-कर्मोंसे भी भयंकर है।
'कुशले नानुषज्जते' —शास्त्रविहित कर्मोंमें भी जो वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिके अनुसार नियत हैं और जो आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके किये जाते हैं
तथा परिणाममें जिनसे मुक्ति होती है, ऐसे सभी कर्म 'कुशल' कहलाते हैं। साधक ऐसे कुशल कर्मोंको करते हुए भी उनमें आसक्त नहीं होता।
'त्यागी' —कुशल कर्मोंके करनेमें जिसका राग नहीं होता और अकुशल कर्मोंके त्यागमें जिसका द्वेष नहीं होता, वही असली त्यागी है*। परन्तु वह त्याग पूर्णतया तब सिद्ध होता है, जब कर्मोंको करने अथवा न करनेसे अपनेमें कोई फरक न पड़े अर्थात् निरन्तर निलिप्तता बनी रहे (गीता—तीसरे अध्यायका अठारहवाँ और चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। ऐसा होनेपर साधक योगारूढ़ हो जाता है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)।
'मेधावी' —जिसके सम्पूर्ण कार्य सांगोपांग होते हैं और संकल्प तथा कामनासे रहित होते हैं तथा ज्ञानरूप अग्निसे जिसने सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म कर दिया है, उसे पण्डित भी पण्डित (मेधावी अथवा बुद्धिमान्) कहते हैं (गीता—चौथे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।
- दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधानं निवर्तते। गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथाभक्तः ॥ (श्रीमद्भा० ११।७।११)
'जो पुरुष अनुकूलता-प्रतिकूलतारूप द्वन्द्वोंसे ऊँचा उठ जाता है, वह शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंका त्याग करता है, पर द्वेषबुद्धिसे नहीं और शास्त्रविहित कर्मोंको करता है, पर गुणबुद्धिसे अर्थात् रागपूर्वक नहीं। जैसे घुटनोंके बलपर चलनेवाले बच्चोंकी निर्बुद्धि और प्रवृत्ति राग-द्वेषपूर्वक नहीं होती, वैसे ही उभयातीतो पुरुषकी निर्बुद्धि और प्रवृत्ति भी राग-द्वेषपूर्वक नहीं होती (बच्चोंमें तो अज्ञता रहती है, पर राग-द्वेषसे रहित पुरुषमें विज्ञता रहती है)।'