श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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नियुक्ति की जाती है, वे सब नियत कर्म कहलाते हैं; जैसे—साधुको ऐसा करना चाहिये, गृहस्थको ऐसा करना चाहिये, ब्राह्मणको अमुक काम करना चाहिये, क्षत्रियको अमुक काम करना चाहिये इत्यादि। उन कर्मोंको प्रमाद, आलस्य, उपेक्षा, उदासीनता आदि दोषोंसे रहित होकर तत्परता और उत्साहपूर्वक करना चाहिये। इसीलिये भगवान्ने कर्मयोगके प्रसंगमें जगह-जगह ‘समाचर’ शब्द दिया है (गीता—तीसरे अध्यायका नवों और उन्नीसवों श्लोक)।
‘संगं त्यक्त्वा फलं चैव’—संगके त्यागका तात्पर्य है कि कर्म, कर्म करनेके औजार (साधन) आदिमें आसक्ति, प्रियता, ममता आदि न हो और फलके त्यागका तात्पर्य है कि कर्मके परिणामके साथ सम्बन्ध न हो अर्थात् फलकी इच्छा न हो। इन दोनोंका तात्पर्य है कि कर्म और फलमें आसक्ति तथा इच्छाका त्याग हो।
‘स त्यागः सात्त्विको मतः’१—कर्म और फलमें आसक्ति तथा कामनाका त्याग करके कर्तव्यमात्र समझकर
परिशिष्ट भाव—तमोगुणमें मूढ़ता (बेसमझी) है और रजोगुणमें स्वार्थबुद्धि है, पर सत्त्वगुणमें न मूढ़ता है, न स्वार्थबुद्धि है, प्रत्युत सम्बन्ध-विच्छेद है। सात्त्विक मनुष्य कर्तव्यमात्र समझकर सब नियत कर्म करता है। एक मार्मिक बात है कि कर्तव्यमात्र समझकर जो भी कर्म किया जाता है, उससे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। लौकिक साधन (कर्मयोग और ज्ञानयोग) में शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद मुख्य है। इसलिये साधकको प्रत्येक कर्म कर्तव्यमात्र समझकर करना चाहिये। स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करनेसे तो बन्धन होता है, पर सम्बन्ध न जोड़कर कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे मुक्ति होती है।१
१-गीताभरमें जहाँ कहीं (सातवें अध्यायके बारहवें, चौदहवें अध्यायके पाँचवेंसे अठारहवें, और बाईसवें, सत्रहवें अध्यायके पहले, दूसरे, आठवेंसे दसवें, ग्यारहवेंसे तेरहवें, सत्रहवेंसे बाईसवें और अठारहवें अध्यायके बीसवेंसे अड़ईसवें, तीसवेंसे पैंतीसवें तथा सैंतीसवेंसे उन्नालीसवें श्लोकोंमें) गुणोंका वर्णन हुआ है, वहाँ सत्त्व, रज और तम—यही क्रम रखा गया है। केवल यहीं (१८।७—१९में) व्यतिक्रम हुआ है अर्थात् तम, रज और सत्त्व—ऐसा क्रम रखा गया है। इसका कारण है—(१) यदि छठे श्लोकके बाद ही (सातवें श्लोकमें) सात्त्विक त्यागका वर्णन करते तो भगवान्ने निश्चित मतमें और सात्त्विक त्यागमें पुनरुक्तिका दोष आ जाता। (२) किसी वस्तुकी उत्तमता तभी सिद्ध होती है, जब उसके पहले अनुत्तम वस्तुका वर्णन किया जाय। इसलिये भगवान् सात्त्विक त्यागकी उत्तमता सिद्ध करनेके लिये पहले अनुत्तम तामस और राजस त्यागका वर्णन करते हैं। (३) आगे दसवेंसे बारहवें श्लोकतक ‘सात्त्विक त्यागी’ का वर्णन हुआ है। यदि सात्त्विक त्यागका वर्णन सात्त्विक त्यागीके पास (नवें श्लोकमें) न देते तो तामस त्यागके पास होनेसे सात्त्विक त्यागीका सम्बन्ध न जुड़ता।
२-अलौकिक साधन (भक्तियोग) में भगवान्ने सम्बन्ध जोड़ना मुख्य है। इसलिये भक्तको जप, ध्यान, कीर्तन आदि कर्तव्य समझकर नहीं करने चाहिये, प्रत्युत अपने प्रियतमका काम (सेवा-पूजन) समझकर उनकी प्रसन्नताके लिये प्रेमपूर्वक करने चाहिये। भगवान्की होके वस्तु (नाम, रूप आदि) प्रिय लगनी चाहिये। भगवान्का काम करनेमें आनन्द आना चाहिये। जैसे, दवा कर्तव्य समझकर ली जाती है, पर भोजन कर्तव्य समझकर नहीं किया जाता, प्रत्युत अपनी भूख मिटानेके लिये किया जाता है। इसलिये भक्तको जप, ध्यान आदि कर्तव्यमात्र समझकर त्यागके उद्देश्यसे नहीं करने चाहिये, प्रत्युत भगवान्के साथ सम्बन्ध जाग्रत करनेके लिये करने चाहिये। अगर वह जप, ध्यान आदि भी कर्तव्य समझकर करेगा तो भगवत्सम्बन्ध जाग्रत नहीं होगा, प्रेमका उदय नहीं होगा।