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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1113

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

त्याग करनेका विषय है। भोगोंका तो त्याग करना चाहिये, पर कर्तव्य-कर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। कारण कि जिन भोगोंमें सुखबुद्धि और गुणबुद्धि हो रही है, उन भोगोंमें बार-बार दुःख और दोषको देखनेसे भोगोंसे वैराग्य होगा, जिससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होगी; परन्तु नियत कर्तव्य-कर्मोंमें दुःख देखकर उन कर्मोंका त्याग करनेसे सदा पराधीनता और दुःख भोगना पड़ेगा— ‘यथार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’ (गीता ३।९)। तात्पर्य यह हुआ कि भोगोंमें दुःख और दोष देखनेसे भोगासक्ति छूटेगी, जिससे कल्याण होगा और कर्तव्योंमें दुःख देखनेसे कर्तव्य छूटेगा, जिससे पतन होगा। कर्तव्य-कर्मोंका त्याग करनेमें तो राजस और तामस—ये दो भेद होते हैं, पर परिणाम—(आलस्य, प्रमाद, अतिनिद्रा आदि—) में दोनों एक हो जाते हैं अर्थात् परिणाममें दोनों ही तामस हो जाते हैं, जिसका फल अधोगति होता है— ‘अधोगच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४।१८)।

एक शंका यह भी हो सकती है कि सत्संग, भगवत्-कथा, भक्तचरित्र सुननेसे किसीको वैराग्य हो जाय तो वह प्रभुको पानेके लिये आवश्यक कर्तव्य-कर्मोंको भी छोड़ देता है और केवल भगवान्के भजनमें लग जाता है।

परिशिष्ट भाव —त्यागका फल ‘शान्ति’ है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२।१२) और रागका फल ‘दुःख’ है—‘रजसस्तु फलं दुःखम्’ (गीता १४।१६)। राजस मनुष्यको त्यागका फल ‘शान्ति’ तो नहीं मिलती, पर रागका फल ‘दुःख’ तो मिलता ही है।

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।

सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥

अर्जुन= हे अर्जुन!नियतम्= शास्त्रविहितत्यक्त्वा= त्याग करके
कार्यम्, एव= ‘केवल कर्तव्यमात्र करना है’—कर्म= कर्मक्रियते= किया जाता है,
इति= ऐसा (समझकर)सङ्गम्= आसक्तिसः, एव= वही
यत्= जो= औरसात्त्विकः= सात्त्विक
फलम्= फलेच्छकात्यागः मतः= त्याग माना गया है।

व्याख्या —‘कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियते-र्जुन’—यहाँ ‘कार्यम्’ पदके साथ ‘इति’ और ‘एव’ ये दो अव्यय लगानेसे यह अर्थ निकलता है कि केवल कर्तव्यमात्र करना है। इसको करनेमें कोई फलासक्ति नहीं, कोई स्वार्थ नहीं और कोई क्रियाजय सुखभोग भी नहीं। इस प्रकार कर्तव्यमात्र करनेसे कर्ताका उस कर्मसे सम्बन्ध-

इसलिये उसका वह कर्तव्य-कर्मोंका त्याग राजस कहा जाना चाहिये? ऐसी बात नहीं है। सांसारिक कर्मोंको छोड़कर जो भजनमें लग जाता है, उसका त्याग राजस या तामस नहीं हो सकता। कारण कि भगवान्को प्राप्त करना मनुष्य-जन्मका ध्येय है; अतः उस ध्येयकी सिद्धिके लिये कर्तव्य-कर्मोंका त्याग करना वास्तवमें कर्तव्यका त्याग करना नहीं है, प्रत्युत असली कर्तव्यको करना है। उस असली कर्तव्यको करते हुए आलस्य, प्रमाद आदि दोष नहीं आ सकते; क्योंकि उसकी रुचि भगवान्में रहती है। परन्तु राजस और तामस त्याग करनेवालोंमें आलस्य, प्रमाद आदि दोष आयेंगे ही; क्योंकि उसकी रुचि भोगोंमें रहती है।

‘स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्’ —त्यागका फल ‘शान्ति’ है। राजस मनुष्य त्याग करके भी त्यागके फल—(शान्ति—) को नहीं पाता। कारण कि उसने जो त्याग किया है, वह अपने सुख-आरामके लिये ही किया है। ऐसा त्याग तो पशु-पक्षी आदि भी करते हैं। अपने सुख-आरामके लिये शुभ-कर्मोंका त्याग करनेसे राजस मनुष्यको शान्ति तो नहीं मिलती, पर शुभ-कर्मोंके त्यागका फल दण्डरूपसे जरूर भोगना पड़ता है।

विच्छेद हो जाता है। ऐसा होनेसे वह कर्म बन्धनकारक नहीं होता अर्थात् संसारके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता। कर्म तथा उसके फलमें आसक्त होनेसे ही बन्धन होता है— ‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)।

शास्त्रविहित कर्मोंमें भी देश, काल, वर्ण, आश्रम, परिस्थितिके अनुसार जिस-जिस कर्ममें जिस-जिसकी