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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक ८ ]

  • साधक-संजीवनी *

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परिशिष्ट भाव —‘विहित’ की अपेक्षा ‘नियत’ कर्ममें व्यक्ति की विशेष जिम्मेवारी होती है। जैसे, किसीको पहलेपर खड़ा कर दिया अथवा जल पिलानेके लिये प्याऊपर बैठा दिया तो यह उसके लिये नियत कर्म हो गया, जिसकी उसपर विशेष जिम्मेवारी है। नियत कर्मके त्यागका ज्यादा दोष लगता है। नियतका त्याग करनेसे विप्लव होता है। अतः पैसे कम मिलें या ज्यादा, आराम कम मिले या ज्यादा, अपने नियत कर्मका कभी त्याग नहीं करना चाहिये। नियत कर्म न करनेके कारण ही आजकल समाजमें अन्व्यवस्था हो रही है। जिसकी जिस कामके लिये नियुक्त कर दी, वह उस कामको नहीं करेगा तो क्या दशा होगी? नियतका मोहपूर्वक त्याग करना तामस है, जिसका फल अधोगतिकी प्राप्ति है—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४।१८)।

दुःखमित्येव यत्कर्म कायकलेशभयात्यजेत्।

स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥

यत्= जो कुछकायकलेशभयात्= शारीरिकत्यागम्= त्याग
कर्म= कर्म है, (वह)परिश्रमके भयसेकृत्वा= करके
दुःखम्= दुःखरूप(उसका)एव= भी
एव= ही है—त्यजेत्= त्याग कर दे, (तो)त्यागफलम्
इति= ऐसा (समझकर)सः= वह
कोई)राजसम्= राजसलभेत्= पाता।

व्याख्या —‘दुःखमित्येव यत्कर्म’—यज्ञ, दान आदि शास्त्रीय नियत कर्मोंको करनेमें केवल दुःख ही भोगना पड़ता है और उनमें है ही क्या? क्योंकि उन कर्मोंको करनेके लिये अनेक नियमोंमें बँधना पड़ता है और खर्चा भी करना पड़ता है—इस प्रकार राजस पुरुषको उन कर्मोंमें केवल दुःख-ही-दुःख दीखता है। दुःख दीखनेका कारण यह है कि उनका परलोकपर, शास्त्रीय, शास्त्रविहित कर्मोंपर और उन कर्मोंके परिणामपर श्रद्धा-विश्वास नहीं होता।

‘कायकलेशभयात्यजेत्’ —राजस मनुष्यको शास्त्र-मर्यादा और लोक-मर्यादाके अनुसार चलनेसे शरीरमें कलेश अर्थात् परिश्रमका अनुभव होता है*। राजस मनुष्यको अपने वर्ण, आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेमें और माता-पिता, गुरु, मालिक आदिकी आज्ञाका पालन करनेमें पराधीनता और दुःखका अनुभव होता है तथा उनकी आज्ञा भंग करके जैसी मरजी आये, वैसा करनेमें स्वाधीनता और सुखका अनुभव होता है। राजस मनुष्योंके विचार यह होते हैं कि ‘गृहस्थमें आराम नहीं मिलता, स्त्री-पुत्र आदि हमारे अनुकूल नहीं हैं अथवा सब कुटुम्बी मर गये हैं, घरमें काम करनेके लिये कोई रहा नहीं, खुदको तकलीफ उठानी

पड़ती है, इसलिये साधु बन जायँ तो आरामसे रहेंगे, रोटी, कपड़ा आदि सब चीजें मुफ्तमें मिल जायँगी, परिश्रम नहीं करना पड़ेगा; कोई ऐसी सरकारी नौकरी मिल जाय, जिससे काम कम करना पड़े और रुपये आरामसे मिलते रहें, हम काम न करें तो भी उस नौकरीसे हमें कोई छुड़ा न सके, हम नौकरी छोड़ देंगे तो हमें पेंशन मिलती रहेगी’, इत्यादि। ऐसे विचारोंके कारण उन्हें घरका काम-धन्ध करना अच्छा नहीं लगता और वे उसका त्याग कर देते हैं।

यहाँ शंका होती है कि ज्ञानप्राप्तिके साधनोंमें दुःख और दोषको बार-बार देखनेकी बात कही है (गीता—तेरहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक) और यहाँ कर्मोंमें दुःख देखकर उनका त्याग करनेको राजस त्याग कहा है अर्थात् कर्मोंके त्यागका निषेध किया है—इन दोनों बातोंमें परस्पर विरोध प्रतीत होता है। इसका समाधान है कि वास्तवमें इन दोनोंमें विरोध नहीं है, प्रत्युत इन दोनोंका विषय अलग-अलग है। वहाँ (गीता—तेरहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें) भोगोंमें दुःख और दोषको देखनेकी बात है और यहाँ नियत कर्तव्य-कर्मोंमें दुःखको देखनेकी बात है। इसलिये वहाँ भोगोंका त्याग करनेका विषय है और यहाँ कर्तव्य-कर्मोंका

  • कलेशका अनुभव होनेमें शरीरकी ममता और आसक्ति ही कारण है।