श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २-३ ]
- साधक-संजीवनी *
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चौथे मतमें यज्ञ, दान और तपस्व कर्मके त्यागका निषेध है। दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्या-क्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्या-क्या विलक्षणताएँ हैं, इसका विवेचन इस प्रकार है—
१-‘काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासम्’ — संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्य-कर्मोंका त्याग बताया गया है; परन्तु इसके अलावा भी नित्य, नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्य-कर्म बाकी रह जाते हैं। अतः यह मत पूर्ण नहीं है; क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; जैसे—इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती’—ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और ‘अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे, तो भी न मारता है, न बंधता है’—ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है।
१-कर्म पाँच प्रकारके होते हैं—
(१) नित्यकर्म—शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार प्रतिदिन जो आवश्यक दैनिक कर्म किये जाते हैं, उनको ‘नित्यकर्म’ कहते हैं; जैसे—संध्या, गायत्री आदि।
(२) नैमित्तिक कर्म—देश, काल, परिस्थिति आदि किसी निमित्तको लेकर जो कर्म किये जाते हैं, उनको नैमित्तिक कर्म कहते हैं, जैसे गंगा, प्रयाग, नैमिषारण्य, पुष्कर आदि तीर्थोंमें जाकर जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे ‘देशकृत नैमित्तिक कर्म’ हैं; एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, व्यतिपात, ग्रहण, होली, दीपावली, अक्षयतृतीया आदिके समय जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे ‘कालकृत नैमित्तिक कर्म’ हैं; पुत्रके उत्थान होनेपर, पुत्र या पुत्रीका विवाह होनेपर, किसीकी मृत्यु होनेपर, संत-महात्माओंका सत्संग मिलनेपर जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे ‘परिस्थितिकृत नैमित्तिक कर्म’ हैं।
(३) काम्य कर्म—हमारा मान-सम्मान हो जाय, लोगोंमें हमारी प्रसिद्धि हो जाय, हमारा पुत्र हो जाय, हमें बहुत-सा धन मिल जाय, हमारी मनचाही हो जाय आदि इष्टकी प्राप्तिके लिये और हमारा रोग मिट जाय, आफत मिट जाय, कर्जा दूर हो जाय आदि अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो शास्त्रीय अनुष्ठान किये जाते हैं, वे सब ‘काम्य कर्म’ कहलाते हैं।
(४) प्रायश्चित्त कर्म—हमारे द्वारा बने हुए पापोंको दूर करनेके लिये जो कर्म किये जाते हैं, वे सब ‘प्रायश्चित्त कर्म’ कहलाते हैं। इसके दो भेद हैं—विशेष प्रायश्चित्त और सामान्य प्रायश्चित्त। जैसे, किसीके हाथसे चूहा, बिल्ली, कबूतर आदि मर जाय तो इन ज्ञात पापोंको दूर करनेके लिये धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु आदि धर्म-ग्रन्थोंमें बताये गये प्रायश्चित्त कर्मोंका अनुष्ठान करना ‘विशेष प्रायश्चित्त कर्म’ कहलाते हैं, और ज्ञात-अज्ञात सब पापोंको दूर करनेके लिये गंगास्नान, एकादशीव्रत, नामजप, सेवा आदि जो शुभ-कर्म किये जाते हैं, वे ‘सामान्य प्रायश्चित्त कर्म’ कहलाते हैं।
(५) आवश्यक कर्तव्य-कर्म—खेती, व्यापार, नौकरी आदि जीविकाके लिये और खाना-पीना, सोना-जागना आदि शरीरके लिये जो कर्म किये जाते हैं, वे ‘आवश्यक कर्तव्य-कर्म’ कहलाते हैं।
२-जहाँ फलके त्यागकी बात कही गयी है, वहाँ फलकी कामनाका त्याग ही समझना चाहिये; क्योंकि फलका त्याग हो ही नहीं सकता। यह नियम है कि प्रत्येक कर्म फलके रूपमें परिणत होता है। जैसे, कोई खेती करता है तो वह अनाजका त्याग कैसे करेगा? व्यापार करता है तो मुनाफेका त्याग कैसे करेगा? जैसे अनाज होना खेतीका फल है, वैसे ही अनाज न होना भी खेतीका फल है। जैसे मुनाफा होना व्यापारका फल है, वैसे ही घाटा होना भी व्यापारका फल है। परन्तु कामनाका त्याग करनेसे फलसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है (गीता—अठारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। इसीलिये भगवान्ने सिद्धि और असिद्धि दोनोंमें सम रहनेको योग अर्थात् समता कहा है (गीता—दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक); क्योंकि सिद्धि और असिद्धि दोनों कर्मका फल है। सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनेका तात्पर्य है—कर्मफलमें ममता-आसक्ति न करना अथवा कर्मफलसे अपना सम्बन्ध न जोड़ना।
२-‘त्याज्यं दोषवदित्येके’ —संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवन-निर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता—तीसरे अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इसलिये भगवान्ने नियत कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजस-तामस त्याग बताया है (अठारहवें अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)।
३-‘सर्वकर्मफलत्यागम्’ —त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है। ममता-आसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते; क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति—दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है—‘संगं त्यक्त्वा फलानि च’ (गीता १८।६)।