श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
परिशिष्ट भाव —कर्मयोग और ज्ञानयोगके विषयमें अर्जुनने तीसरे अध्यायके आरम्भमें भगवान्को उलाहना दिया है, पाँचवें अध्यायके आरम्भमें यह जानना चाहै है कि दोनोंमें श्रेष्ठ कौन है, और यहाँ वे दोनोंका तत्त्व जानना चाहते हैं।
सम्बन्ध —अर्जुनकी जिज्ञासाके उत्तरमें पहले भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अन्य दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बताते हैं।
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥ त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| कवयः | = (कई) विद्वान् | त्यागम् | = त्याग | त्याज्यम् | = छोड़ देना चाहिये |
|---|---|---|---|---|---|
| काम्यानाम् | = काम्य | प्राहुः | = कहते हैं। | च | = और |
| कर्मणाम् | = कर्मके | एके | = कई | अपरे | = कई विद्वान् |
| न्यासम् | = त्यागको | मनीषिणः | = विद्वान् | इति | = ऐसा |
| सन्यासम् | = संन्यास | इति | = ऐसा | (कहते हैं कि) | |
| विदुः | = समझते हैं (और) | प्राहुः | = कहते हैं | यज्ञदानतपःकर्म | = यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका |
| विचक्षणाः | = (कई) विद्वान् | कि | न, त्याज्यम् | = त्याग नहीं करना चाहिये। | |
| सर्वकर्मफलत्यागम् | = सम्पूर्ण कर्मके फलके त्यागको | कर्म | = कर्मोंको |
व्याख्या —दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं—
१-‘काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः’—कई विद्वान् कहते हैं कि काम्य-कर्मोंके त्यागका नाम ‘संन्यास’ है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनका त्याग करनेका नाम ‘संन्यास’ है।
२-‘सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः’—कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम ‘त्याग’ है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्य-कर्मोंको करते रहनेका नाम ‘त्याग’ है।
३-‘त्याज्यं दोष*वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः’—कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़
देना चाहिये।
४-‘यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे’—अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें, पर यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं—पहला और तीसरा मत ‘संन्यास’-(सांख्ययोग-)का है तथा दूसरा और चौथा मत ‘त्याग’-(कर्मयोग-)का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ा-थोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्य-कर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और
- ‘दोषवत्’ पद व्याकरणके ‘वति’ और ‘मतुप्’ दोनों प्रत्ययोंसे बनता है; परन्तु दोनोंका अर्थ दो तरहका होता है। ‘वति’ प्रत्यय करनेसे ‘दोषवत्’ पदका अर्थ होता है—कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और ‘मतुप्’ प्रत्यय करनेसे ‘दोषवत्’ पदका अर्थ होता है—दोषवाले कर्म छोड़ देने चाहिये। परन्तु यहाँ ‘वति’ प्रत्ययका ही अर्थ लेना चाहिये, ‘मतुप्’ प्रत्ययका नहीं; क्योंकि ‘मतुप्’ प्रत्ययका अर्थ भगवान्के मतके अनुसार है (गीता—अठारहवें अध्यायका अङ्गुलीसर्वां श्लोक), दार्शनिकोंके मतके अनुसार नहीं।
दूसरा अन्तर यह है कि ‘वति’ प्रत्यय अव्यय बनकर क्रियाका विशेषण होता है और ‘मतुप्’ प्रत्यय कर्ता और कर्मका विशेषण बनता है।