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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1104, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1104

श्लोक १ ]

  • साधक-संजीवनी *

११०३

अर्जुन बोले—

महाबाहो= हे महाबाहो != औरपृथक्= अलग-अलग
हृषीकेश= हे हृषीकेश !
केशिनिषूदन= हे केशिनिषूदन !त्यागस्य= त्यागकावेदितुम्= जानना
सन्यासस्य= (मैं) संन्यासतत्त्वम्= तत्त्वइच्छामि= चाहता हूँ।

व्याख्या —‘सन्त्यासस्य महाबाहो’……‘पृथक्केशिनिषूदन’—यहाँ ‘महाबाहो’ सम्बोधन सामर्थ्यका सूचक है। अर्जुनद्वारा इस सम्बोधनका प्रयोग करनेका भाव यह है कि आप सम्पूर्ण विषयोंको कहनेमें समर्थ हैं; अतः मेरी जिज्ञासाका समाधान आप इस प्रकार करें, जिससे मैं विषयको सरलतासे समझ सकूँ।

‘हृषीकेश’ सम्बोधन अन्तर्यामीका वाचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ; अतः इस विषयमें जो-जो आवश्यक बातें हों, उनको आप (मेरे पूछे बिना भी) कह दें।

‘केशिनिषूदन’ सम्बोधन विघ्नोंको दूर करनेवालेका सूचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि जिस प्रकार आप अपने भक्तोंके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर कर देते हैं, उसी प्रकार मेरे भी सम्पूर्ण विघ्नोंको अर्थात् शंकाओं और संशयोंको दूर कर दें।

जिज्ञासा प्रायः दो प्रकारसे प्रकट की जाती है—

(१) अपने आचरणमें लानेके लिये और (२) सिद्धान्तको समझनेके लिये। जो केवल पढ़ाई करनेके लिये (सीखनेके लिये) सिद्धान्तको समझते हैं, वे केवल पुस्तकोंके विद्वान् बन सकते हैं और नयी पुस्तक भी बना सकते हैं, पर अपना कल्याण नहीं कर सकते*। अपना कल्याण तो वे ही कर सकते हैं, जो सिद्धान्तको समझकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये तत्पर हो जाते हैं।

यहाँ अर्जुनकी जिज्ञासा भी केवल सिद्धान्तको जाननेके लिये ही नहीं है, प्रत्युत सिद्धान्तको जानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये है।

(४) त्यागीके आचरण कैसे होने चाहिये?—

अकुशल कर्मसे द्वेष न करना और कुशल कर्ममें आसक्त न होना (१८।१० पूर्वार्ध)।

(५) त्यागीका भाव कैसा होना चाहिये?—

कर्तव्यमात्र करना (१८।९)।

(६) त्यागका फल क्या होता है?—

परमात्मतत्त्वमें स्थित होना (१८।१० उत्तरार्ध)।

  • असत्को असत् जाननेपर भी तबतक सत्की प्राप्ति नहीं होती, जबतक मनुष्य सत्की प्राप्तिको ही अपने जीवनका सर्वोपरि लक्ष्य नहीं बना लेता।

‘एषा तेऽभिहिता साइक्ष्ये’ (गीता २।३९) में आये ‘सांख्य’ पदको ही यहाँ ‘संन्यास’ पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी सांख्य और संन्यासको पर्यायवाची माना है; जैसे—पाँचवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें ‘सन्त्यासः’, चौथे श्लोकमें ‘साइक्ष्ययोगौ’, पाँचवें श्लोकमें ‘यत्साइक्ष्यैः’ और छठे श्लोकमें ‘सन्त्यासस्तु’ पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने सांख्यको ही संन्यास कहा है।

इसी प्रकार ‘बुद्धियोगे त्विमां शृणु’ (गीता २।३९) में आये ‘योग’ पदको ही यहाँ ‘त्याग’ पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी योग (कर्मयोग) और त्यागको पर्यायवाची माना है; जैसे—दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें ‘संगं त्यक्त्वा’ तथा इक्यावनवें श्लोकमें ‘फलं त्यक्त्वा’, तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें ‘कर्मयोगेन योगिनाम्’, चौथे अध्यायके बीसवें श्लोकमें ‘त्यक्त्वा कर्मफलसंगम्’, पाँचवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘योगौ’, पाँचवें श्लोकमें ‘तद्वोगैरपि गम्यते’, ग्यारहवें श्लोकमें ‘संगं त्यक्त्वा’ तथा बारहवें श्लोकमें ‘कर्मफलं त्यक्त्वा’, बारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें ‘त्यागात्’ पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने कर्मयोगको ही त्याग कहा है।

अच्छी तरहसे रखनेका नाम ‘संन्यास’ है—‘सम्यक् न्यासः सन्त्यासः’। तात्पर्य है कि प्रकृतिकी चीज सर्वथा प्रकृतिमें देने (छोड़ देने) और विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेनेका नाम ‘संन्यास’ है।

कर्म और फलकी आसक्तिको छोड़नेका नाम ‘त्याग’ है। छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें आया है कि जो कर्म और फलमें आसक्त नहीं होता, वह योगारूढ़ हो जाता है।