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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1103

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है—इस बातको अर्जुनने बारहवें अध्यायके आरम्भमें पूछा। उत्तरमें भगवान्ने बारहवें अध्यायमें भक्तिकी और तेरहवें-चौदहवें अध्यायोंमें निर्गुण-साधनाकी बात कही। चौदहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने गुणातीतके लक्षण, आचरण और गुणातीत होनेका उपाय पूछा तो भगवान्ने गुणातीतके लक्षण और आचरण बताकर अपनी अव्यभिचारिणी भक्तिकी गुणातीत होनेका उपाय बताया। उसी-(अव्यभिचारिणी भक्ति-) के वर्णनमें भगवान्ने पंद्रहवें अध्यायका विषय कहा। पंद्रहवें अध्यायके अन्तमें 'स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत' पदोंसे यह बात कही कि दैवी-सम्पत्तिवाले पुरुष मेरा भजन करते हैं और अर्थात्तरमें आसुरी-सम्पत्तिवाले पुरुष मेरा भजन नहीं करते। इससे पहले भी सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें और नवें अध्यायके बारहवें-तेरहवें श्लोकोंमें संकेतरूपसे दैवी और आसुरी-सम्पत्तिका वर्णन हुआ था। अतः दैवी और आसुरी-सम्पत्तिका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये सोलहवें अध्यायका आरम्भ हुआ।

सोलहवें अध्यायके उपान्त्य श्लोकको लेकर अर्जुनने सत्रहवें अध्यायके आरम्भमें निष्ठाके विषयमें प्रश्न किया। उत्तरमें भगवान्ने तीन प्रकारकी श्रद्धाका वर्णन करते हुए अध्यायका विषय पूरा कर दिया। सत्रहवें अध्यायके बाद अब अर्जुन तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कही दो निष्ठाओंके तत्त्वको अलग-अलग स्पष्ट जाननेके लिये भगवान्के सामने अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हैं।

अर्जुन उवाच

सन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।

**त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥ ***

  • अर्जुनकी इस जिज्ञासाके समाधानमें भगवान्ने जो-जो बातें कही हैं, उनके आधारपर अर्जुनके मनमें आयी अन्य जिज्ञासाओंका भी अनुमान लगाया जा सकता है, जो इस प्रकार हैं—

(क) सन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्—

(१) संन्यास किसे कहते हैं?—

किसी भी कर्मके साथ कर्तापनका भाव न रहना और बुद्धिका कहीं भी लिप्त न होना (१८।१७)।

(२) संन्यासी कैसा होना चाहिये?—

रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहसे युक्त तथा सिद्धि-असिद्धिमें निर्बिंकार होना चाहिये (१८।२६)।

(३) संन्यासका साधन कैसा होना चाहिये?—

सात्त्विकी बुद्धिवाला, वैराग्यवान्, एकात्मका सेवन करनेवाला, इन्द्रियोंका नियमन करनेवाला, शरीर-वाणी-मनको संयत करनेवाला आदि होना चाहिये (१८।५१-५३)।

(४) संन्यासीके आचरण कैसे होने चाहिये?—

कर्तृत्वाभिमान और राग-द्वेषसे रहित होकर कर्म करना (१८।२३)।

(५) संन्यासीका भाव कैसा होना चाहिये?—

सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक परमात्मतत्त्वको देखना (१८।२०)।

(६) संन्यासका फल क्या होता है?—

परमात्मतत्त्वमें प्रविष्ट होना (१८।५५)।

(ख) त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन—

(१) त्याग किसे कहते हैं?—

कर्म और कर्मफलकी आसक्तिका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करना (१८।६)।

(२) त्यागी कैसा होना चाहिये?—

कर्मफलका त्यागी होना चाहिये (१८।११)।

(३) त्यागका साधन कैसा होना चाहिये?—

कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग (१८।९)।