श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1102, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें ‘एषा तेऽभहिता साङ्ख्ये बुद्धियोगे त्विमां शृणु’ पदोंसे जिस सांख्ययोग और कर्मयोगकी बात कही है, उसीको तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठाके नामसे कहा है। उन दोनों निष्ठाओंके तत्त्वको अलग-अलग रूपसे ठीक जाननेकी इच्छा अर्जुनके मनमें थी। परन्तु जिस प्रकार भगवान्को सातवेंसे पंद्रहवें अध्यायतक दैवी-सम्पत्ति और आसुरी-सम्पत्तिको कहनेका अवसर प्राप्त नहीं हुआ, उसी प्रकार अर्जुनको भी तीसरेसे सत्रहवें अध्यायतक उन दोनों निष्ठाओंके विषयमें अपनी जिज्ञासा प्रकट करनेका अवसर प्राप्त नहीं हुआ।
तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें दो निष्ठाओंको कहकर भगवान्ने चौथे अध्यायके पहले श्लोकमें बताया कि मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। इसपर अर्जुनने प्रश्न किया कि आपका जन्म तो अभीका है, फिर आपने सृष्टिके आदिमें सूर्यको कैसे उपदेश दिया? उत्तरमें भगवान्ने अपने अवतार और कर्मयोगके तत्त्वका वर्णन किया। चौथे अध्यायके ही चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको ज्ञान प्राप्त करनेकी आज्ञा दी—‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेव्या’ और बयालीसवें श्लोकमें योगमें स्थित होनेकी आज्ञा दी—‘छिन्त्वैन संशयं योगमातिष्ठोतिष्ठ भारत’ इन दो अलग-अलग आज्ञाओंके कारण अर्जुनने पाँचवें अध्यायके आरम्भमें दोनोंमें अपने लिये एक निश्चित कल्याणकारक साधन पूछा। उसके उत्तरमें भगवान्ने पाँचवें अध्यायका विषय पूरा कहकर अपनी ओरसे ही छठे अध्यायका विषय आरम्भ किया।
छठे अध्यायके तैंतीसवें-चौंतीसवें श्लोकोंमें अर्जुनने मनकी चंचलताके विषयमें प्रश्न किया। उसका भगवान्ने बहुत संक्षेपसे उत्तर दिया। फिर अर्जुनने सैंतीसवेंसे उन्तालीसवें श्लोकतक योगभ्रष्ट पुरुषकी गतिके विषयमें प्रश्न किया। उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने छठे अध्यायका विषय समाप्त किया। छठे अध्यायके अन्तिम श्लोकमें भगवान्ने अपने भक्तको सम्पूर्ण योगियोंमें परम श्रेष्ठ बताया। उसीको लेकर भगवान्ने सातवें अध्यायका विषय आरम्भ किया और उसमें भक्तिका विशेष वर्णन किया।
सातवें अध्यायके अन्तमें आये हुए ब्रह्म, अध्यात्म आदिको लेकर अर्जुनने आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न किये। उनमेंसे छः प्रश्नोंका उत्तर संक्षेपसे देकर अन्तकालीन गति-विषयक सातवें प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने विस्तारपूर्वक आठवें अध्यायका विषय कहा। फिर सातवें अध्यायमें जो विषय छूट गया था, उसी विषयका वर्णन नवें अध्यायमें तथा दसवें अध्यायमें ग्यारहवें श्लोकतक किया। दसवें अध्यायके नवें, दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें भक्त और उनपर कृपाकी बात सुनकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए और प्रभावित भी हुए। अतः अर्जुनने बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक भगवान्की स्तुति की और अपनी विभूतियोंको विस्तारसे कहनेके लिये प्रार्थना की। अपनी मुख्य-मुख्य विभूतियोंको कहते हुए भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तमें कहा कि ‘हे अर्जुन! तेरको बहुत जाननेकी क्या जरूरत है? मैं सम्पूर्ण संसारको अपने एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ। इसी बातको लेकर ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने भगवान्से अपना विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना की। अपना विश्वरूप दिखकर भगवान्ने ग्यारहवें अध्यायके अन्तमें कहा कि अनन्य भक्तिसे मेरा दर्शन, ज्ञान और मेरेमें प्रवेश—ये तीनों हो जाते हैं।
ग्यारहवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने भक्तकी महिमा कही और उससे पहले (चौथे अध्यायके चौंतीसवेंसे सैंतीसवें श्लोकतक, पाँचवें अध्यायके तेरहवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक, छठे अध्यायके चौबीसवेंसे अट्ठाईसवें श्लोकतक और आठवें अध्यायके ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक) निर्गुण-तत्त्वकी उपासनाकी महिमा कही। उन