श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
१२०२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है—इस बातको अर्जुनने बारहवें अध्यायके आरम्भमें पूछा। उत्तरमें भगवान्ने बारहवें अध्यायमें भक्तिकी और तेरहवें-चौदहवें अध्यायोंमें निर्गुण-साधनाकी बात कही। चौदहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने गुणातीतके लक्षण, आचरण और गुणातीत होनेका उपाय पूछा तो भगवान्ने गुणातीतके लक्षण और आचरण बताकर अपनी अव्यभिचारिणी भक्तिकी गुणातीत होनेका उपाय बताया। उसी-(अव्यभिचारिणी भक्ति-) के वर्णनमें भगवान्ने पंद्रहवें अध्यायका विषय कहा। पंद्रहवें अध्यायके अन्तमें 'स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत' पदोंसे यह बात कही कि दैवी-सम्पत्तिवाले पुरुष मेरा भजन करते हैं और अर्थात्तरमें आसुरी-सम्पत्तिवाले पुरुष मेरा भजन नहीं करते। इससे पहले भी सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें और नवें अध्यायके बारहवें-तेरहवें श्लोकोंमें संकेतरूपसे दैवी और आसुरी-सम्पत्तिका वर्णन हुआ था। अतः दैवी और आसुरी-सम्पत्तिका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये सोलहवें अध्यायका आरम्भ हुआ।
सोलहवें अध्यायके उपान्त्य श्लोकको लेकर अर्जुनने सत्रहवें अध्यायके आरम्भमें निष्ठाके विषयमें प्रश्न किया। उत्तरमें भगवान्ने तीन प्रकारकी श्रद्धाका वर्णन करते हुए अध्यायका विषय पूरा कर दिया। सत्रहवें अध्यायके बाद अब अर्जुन तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कही दो निष्ठाओंके तत्त्वको अलग-अलग स्पष्ट जाननेके लिये भगवान्के सामने अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हैं।
अर्जुन उवाच
सन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
**त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥ ***
- अर्जुनकी इस जिज्ञासाके समाधानमें भगवान्ने जो-जो बातें कही हैं, उनके आधारपर अर्जुनके मनमें आयी अन्य जिज्ञासाओंका भी अनुमान लगाया जा सकता है, जो इस प्रकार हैं—
(क) सन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्—
(१) संन्यास किसे कहते हैं?—
किसी भी कर्मके साथ कर्तापनका भाव न रहना और बुद्धिका कहीं भी लिप्त न होना (१८।१७)।
(२) संन्यासी कैसा होना चाहिये?—
रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहसे युक्त तथा सिद्धि-असिद्धिमें निर्बिंकार होना चाहिये (१८।२६)।
(३) संन्यासका साधन कैसा होना चाहिये?—
सात्त्विकी बुद्धिवाला, वैराग्यवान्, एकात्मका सेवन करनेवाला, इन्द्रियोंका नियमन करनेवाला, शरीर-वाणी-मनको संयत करनेवाला आदि होना चाहिये (१८।५१-५३)।
(४) संन्यासीके आचरण कैसे होने चाहिये?—
कर्तृत्वाभिमान और राग-द्वेषसे रहित होकर कर्म करना (१८।२३)।
(५) संन्यासीका भाव कैसा होना चाहिये?—
सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक परमात्मतत्त्वको देखना (१८।२०)।
(६) संन्यासका फल क्या होता है?—
परमात्मतत्त्वमें प्रविष्ट होना (१८।५५)।
(ख) त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन—
(१) त्याग किसे कहते हैं?—
कर्म और कर्मफलकी आसक्तिका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करना (१८।६)।
(२) त्यागी कैसा होना चाहिये?—
कर्मफलका त्यागी होना चाहिये (१८।११)।
(३) त्यागका साधन कैसा होना चाहिये?—
कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग (१८।९)।
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
११०३
अर्जुन बोले—
| महाबाहो | = हे महाबाहो ! | च | = और | पृथक् | = अलग-अलग |
|---|---|---|---|---|---|
| हृषीकेश | = हे हृषीकेश ! | ||||
| केशिनिषूदन | = हे केशिनिषूदन ! | त्यागस्य | = त्यागका | वेदितुम् | = जानना |
| सन्यासस्य | = (मैं) संन्यास | तत्त्वम् | = तत्त्व | इच्छामि | = चाहता हूँ। |
व्याख्या —‘सन्त्यासस्य महाबाहो’……‘पृथक्केशिनिषूदन’—यहाँ ‘महाबाहो’ सम्बोधन सामर्थ्यका सूचक है। अर्जुनद्वारा इस सम्बोधनका प्रयोग करनेका भाव यह है कि आप सम्पूर्ण विषयोंको कहनेमें समर्थ हैं; अतः मेरी जिज्ञासाका समाधान आप इस प्रकार करें, जिससे मैं विषयको सरलतासे समझ सकूँ।
‘हृषीकेश’ सम्बोधन अन्तर्यामीका वाचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ; अतः इस विषयमें जो-जो आवश्यक बातें हों, उनको आप (मेरे पूछे बिना भी) कह दें।
‘केशिनिषूदन’ सम्बोधन विघ्नोंको दूर करनेवालेका सूचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि जिस प्रकार आप अपने भक्तोंके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर कर देते हैं, उसी प्रकार मेरे भी सम्पूर्ण विघ्नोंको अर्थात् शंकाओं और संशयोंको दूर कर दें।
जिज्ञासा प्रायः दो प्रकारसे प्रकट की जाती है—
(१) अपने आचरणमें लानेके लिये और (२) सिद्धान्तको समझनेके लिये। जो केवल पढ़ाई करनेके लिये (सीखनेके लिये) सिद्धान्तको समझते हैं, वे केवल पुस्तकोंके विद्वान् बन सकते हैं और नयी पुस्तक भी बना सकते हैं, पर अपना कल्याण नहीं कर सकते*। अपना कल्याण तो वे ही कर सकते हैं, जो सिद्धान्तको समझकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये तत्पर हो जाते हैं।
यहाँ अर्जुनकी जिज्ञासा भी केवल सिद्धान्तको जाननेके लिये ही नहीं है, प्रत्युत सिद्धान्तको जानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये है।
(४) त्यागीके आचरण कैसे होने चाहिये?—
अकुशल कर्मसे द्वेष न करना और कुशल कर्ममें आसक्त न होना (१८।१० पूर्वार्ध)।
(५) त्यागीका भाव कैसा होना चाहिये?—
कर्तव्यमात्र करना (१८।९)।
(६) त्यागका फल क्या होता है?—
परमात्मतत्त्वमें स्थित होना (१८।१० उत्तरार्ध)।
- असत्को असत् जाननेपर भी तबतक सत्की प्राप्ति नहीं होती, जबतक मनुष्य सत्की प्राप्तिको ही अपने जीवनका सर्वोपरि लक्ष्य नहीं बना लेता।
‘एषा तेऽभिहिता साइक्ष्ये’ (गीता २।३९) में आये ‘सांख्य’ पदको ही यहाँ ‘संन्यास’ पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी सांख्य और संन्यासको पर्यायवाची माना है; जैसे—पाँचवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें ‘सन्त्यासः’, चौथे श्लोकमें ‘साइक्ष्ययोगौ’, पाँचवें श्लोकमें ‘यत्साइक्ष्यैः’ और छठे श्लोकमें ‘सन्त्यासस्तु’ पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने सांख्यको ही संन्यास कहा है।
इसी प्रकार ‘बुद्धियोगे त्विमां शृणु’ (गीता २।३९) में आये ‘योग’ पदको ही यहाँ ‘त्याग’ पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी योग (कर्मयोग) और त्यागको पर्यायवाची माना है; जैसे—दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें ‘संगं त्यक्त्वा’ तथा इक्यावनवें श्लोकमें ‘फलं त्यक्त्वा’, तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें ‘कर्मयोगेन योगिनाम्’, चौथे अध्यायके बीसवें श्लोकमें ‘त्यक्त्वा कर्मफलसंगम्’, पाँचवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘योगौ’, पाँचवें श्लोकमें ‘तद्वोगैरपि गम्यते’, ग्यारहवें श्लोकमें ‘संगं त्यक्त्वा’ तथा बारहवें श्लोकमें ‘कर्मफलं त्यक्त्वा’, बारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें ‘त्यागात्’ पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने कर्मयोगको ही त्याग कहा है।
अच्छी तरहसे रखनेका नाम ‘संन्यास’ है—‘सम्यक् न्यासः सन्त्यासः’। तात्पर्य है कि प्रकृतिकी चीज सर्वथा प्रकृतिमें देने (छोड़ देने) और विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेनेका नाम ‘संन्यास’ है।
कर्म और फलकी आसक्तिको छोड़नेका नाम ‘त्याग’ है। छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें आया है कि जो कर्म और फलमें आसक्त नहीं होता, वह योगारूढ़ हो जाता है।
११०४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
परिशिष्ट भाव —कर्मयोग और ज्ञानयोगके विषयमें अर्जुनने तीसरे अध्यायके आरम्भमें भगवान्को उलाहना दिया है, पाँचवें अध्यायके आरम्भमें यह जानना चाहै है कि दोनोंमें श्रेष्ठ कौन है, और यहाँ वे दोनोंका तत्त्व जानना चाहते हैं।
सम्बन्ध —अर्जुनकी जिज्ञासाके उत्तरमें पहले भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अन्य दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बताते हैं।
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥ त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| कवयः | = (कई) विद्वान् | त्यागम् | = त्याग | त्याज्यम् | = छोड़ देना चाहिये |
|---|---|---|---|---|---|
| काम्यानाम् | = काम्य | प्राहुः | = कहते हैं। | च | = और |
| कर्मणाम् | = कर्मके | एके | = कई | अपरे | = कई विद्वान् |
| न्यासम् | = त्यागको | मनीषिणः | = विद्वान् | इति | = ऐसा |
| सन्यासम् | = संन्यास | इति | = ऐसा | (कहते हैं कि) | |
| विदुः | = समझते हैं (और) | प्राहुः | = कहते हैं | यज्ञदानतपःकर्म | = यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका |
| विचक्षणाः | = (कई) विद्वान् | कि | न, त्याज्यम् | = त्याग नहीं करना चाहिये। | |
| सर्वकर्मफलत्यागम् | = सम्पूर्ण कर्मके फलके त्यागको | कर्म | = कर्मोंको |
व्याख्या —दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं—
१-‘काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः’—कई विद्वान् कहते हैं कि काम्य-कर्मोंके त्यागका नाम ‘संन्यास’ है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनका त्याग करनेका नाम ‘संन्यास’ है।
२-‘सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः’—कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम ‘त्याग’ है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्य-कर्मोंको करते रहनेका नाम ‘त्याग’ है।
३-‘त्याज्यं दोष*वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः’—कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़
देना चाहिये।
४-‘यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे’—अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें, पर यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं—पहला और तीसरा मत ‘संन्यास’-(सांख्ययोग-)का है तथा दूसरा और चौथा मत ‘त्याग’-(कर्मयोग-)का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ा-थोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्य-कर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और
- ‘दोषवत्’ पद व्याकरणके ‘वति’ और ‘मतुप्’ दोनों प्रत्ययोंसे बनता है; परन्तु दोनोंका अर्थ दो तरहका होता है। ‘वति’ प्रत्यय करनेसे ‘दोषवत्’ पदका अर्थ होता है—कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और ‘मतुप्’ प्रत्यय करनेसे ‘दोषवत्’ पदका अर्थ होता है—दोषवाले कर्म छोड़ देने चाहिये। परन्तु यहाँ ‘वति’ प्रत्ययका ही अर्थ लेना चाहिये, ‘मतुप्’ प्रत्ययका नहीं; क्योंकि ‘मतुप्’ प्रत्ययका अर्थ भगवान्के मतके अनुसार है (गीता—अठारहवें अध्यायका अङ्गुलीसर्वां श्लोक), दार्शनिकोंके मतके अनुसार नहीं।
दूसरा अन्तर यह है कि ‘वति’ प्रत्यय अव्यय बनकर क्रियाका विशेषण होता है और ‘मतुप्’ प्रत्यय कर्ता और कर्मका विशेषण बनता है।
श्लोक २-३ ]
- साधक-संजीवनी *
११०५
चौथे मतमें यज्ञ, दान और तपस्व कर्मके त्यागका निषेध है। दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्या-क्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्या-क्या विलक्षणताएँ हैं, इसका विवेचन इस प्रकार है—
१-‘काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासम्’ — संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्य-कर्मोंका त्याग बताया गया है; परन्तु इसके अलावा भी नित्य, नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्य-कर्म बाकी रह जाते हैं। अतः यह मत पूर्ण नहीं है; क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; जैसे—इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती’—ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और ‘अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे, तो भी न मारता है, न बंधता है’—ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है।
१-कर्म पाँच प्रकारके होते हैं—
(१) नित्यकर्म—शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार प्रतिदिन जो आवश्यक दैनिक कर्म किये जाते हैं, उनको ‘नित्यकर्म’ कहते हैं; जैसे—संध्या, गायत्री आदि।
(२) नैमित्तिक कर्म—देश, काल, परिस्थिति आदि किसी निमित्तको लेकर जो कर्म किये जाते हैं, उनको नैमित्तिक कर्म कहते हैं, जैसे गंगा, प्रयाग, नैमिषारण्य, पुष्कर आदि तीर्थोंमें जाकर जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे ‘देशकृत नैमित्तिक कर्म’ हैं; एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, व्यतिपात, ग्रहण, होली, दीपावली, अक्षयतृतीया आदिके समय जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे ‘कालकृत नैमित्तिक कर्म’ हैं; पुत्रके उत्थान होनेपर, पुत्र या पुत्रीका विवाह होनेपर, किसीकी मृत्यु होनेपर, संत-महात्माओंका सत्संग मिलनेपर जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे ‘परिस्थितिकृत नैमित्तिक कर्म’ हैं।
(३) काम्य कर्म—हमारा मान-सम्मान हो जाय, लोगोंमें हमारी प्रसिद्धि हो जाय, हमारा पुत्र हो जाय, हमें बहुत-सा धन मिल जाय, हमारी मनचाही हो जाय आदि इष्टकी प्राप्तिके लिये और हमारा रोग मिट जाय, आफत मिट जाय, कर्जा दूर हो जाय आदि अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो शास्त्रीय अनुष्ठान किये जाते हैं, वे सब ‘काम्य कर्म’ कहलाते हैं।
(४) प्रायश्चित्त कर्म—हमारे द्वारा बने हुए पापोंको दूर करनेके लिये जो कर्म किये जाते हैं, वे सब ‘प्रायश्चित्त कर्म’ कहलाते हैं। इसके दो भेद हैं—विशेष प्रायश्चित्त और सामान्य प्रायश्चित्त। जैसे, किसीके हाथसे चूहा, बिल्ली, कबूतर आदि मर जाय तो इन ज्ञात पापोंको दूर करनेके लिये धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु आदि धर्म-ग्रन्थोंमें बताये गये प्रायश्चित्त कर्मोंका अनुष्ठान करना ‘विशेष प्रायश्चित्त कर्म’ कहलाते हैं, और ज्ञात-अज्ञात सब पापोंको दूर करनेके लिये गंगास्नान, एकादशीव्रत, नामजप, सेवा आदि जो शुभ-कर्म किये जाते हैं, वे ‘सामान्य प्रायश्चित्त कर्म’ कहलाते हैं।
(५) आवश्यक कर्तव्य-कर्म—खेती, व्यापार, नौकरी आदि जीविकाके लिये और खाना-पीना, सोना-जागना आदि शरीरके लिये जो कर्म किये जाते हैं, वे ‘आवश्यक कर्तव्य-कर्म’ कहलाते हैं।
२-जहाँ फलके त्यागकी बात कही गयी है, वहाँ फलकी कामनाका त्याग ही समझना चाहिये; क्योंकि फलका त्याग हो ही नहीं सकता। यह नियम है कि प्रत्येक कर्म फलके रूपमें परिणत होता है। जैसे, कोई खेती करता है तो वह अनाजका त्याग कैसे करेगा? व्यापार करता है तो मुनाफेका त्याग कैसे करेगा? जैसे अनाज होना खेतीका फल है, वैसे ही अनाज न होना भी खेतीका फल है। जैसे मुनाफा होना व्यापारका फल है, वैसे ही घाटा होना भी व्यापारका फल है। परन्तु कामनाका त्याग करनेसे फलसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है (गीता—अठारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। इसीलिये भगवान्ने सिद्धि और असिद्धि दोनोंमें सम रहनेको योग अर्थात् समता कहा है (गीता—दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक); क्योंकि सिद्धि और असिद्धि दोनों कर्मका फल है। सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनेका तात्पर्य है—कर्मफलमें ममता-आसक्ति न करना अथवा कर्मफलसे अपना सम्बन्ध न जोड़ना।
२-‘त्याज्यं दोषवदित्येके’ —संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवन-निर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता—तीसरे अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इसलिये भगवान्ने नियत कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजस-तामस त्याग बताया है (अठारहवें अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)।
३-‘सर्वकर्मफलत्यागम्’ —त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है। ममता-आसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते; क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति—दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है—‘संगं त्यक्त्वा फलानि च’ (गीता १८।६)।
११०६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
४-'यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम्'—त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ, दान और तप रूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं, उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया
सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥
| भरतसत्तम | = हे भरतवंशियोंमें | मे | = मेरा | त्यागः | = त्याग |
|---|---|---|---|---|---|
| श्रेष्ठ अर्जुन! (तू) | निश्चयम् | = निश्चय | त्रिविधः | = तीन | |
| तत्र | = संन्यास और त्याग | शृणु | = सुन; | प्रकारका | |
| —इन दोनोंमेंसे पहले | हि | = क्योंकि | सम्प्रकीर्तितः | = कहा | |
| त्यागे | = त्यागके विषयमें | पुरुषव्याघ्र | = हे पुरुषश्रेष्ठ! | गया है। |
व्याख्या—[ इस श्लोकके पूर्वार्धकी व्याख्याके रूपमें भगवान्ने पाँचवें और छठे श्लोकमें अपना मत बताया है और उत्तरार्धकी व्याख्याके रूपमें सातवेंसे नवें श्लोकतक तीन प्रकारके त्यागका वर्णन किया है।
जिस प्रकार शरीर और शरीरीका विवेक सभी योगियोंके लिये परम आवश्यक होनेके कारण भगवान्ने उसका वर्णन गीतामें सबसे पहले (दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) किया है, उसी प्रकार फलकी कामना और कर्मकी आसक्तिका त्याग सभी योगियोंके लिये अत्यन्त आवश्यक होनेके कारण यहाँ भगवान् 'त्याग' का वर्णन सबसे पहले आरम्भ करते हैं।]
'निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम'— हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं संन्यास और
है—यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इनको न करते हों, तो जरूर करना चाहिये; और इनके अतिरिक्त तीर्थ, व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (अठारहवें अध्यायका पाँचवाँ-छठा श्लोक)।
त्याग—दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें अपना मत कहता हूँ, उसको तुम सुनो।
'त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः'— हे पुरुषव्याघ्र! त्याग तीन तरहका कहा गया है—सात्त्विक, राजस और तामस। वास्तवमें भगवान्के मतमें सात्त्विक त्याग ही 'त्याग' है; परन्तु उसके साथ राजस और तामस त्यागका भी वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि उनके बिना भगवान्के अभीष्ट सात्त्विक त्यागकी श्रेष्ठता स्पष्ट नहीं होती; क्योंकि परीक्षा या तुलना करके किसी भी वस्तुकी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये दूसरी वस्तुएँ सामने रखनी ही पड़ती हैं।
तीन प्रकारका त्याग बतानेका तात्पर्य यह भी है कि साधक सात्त्विक त्यागको ग्रहण करे और राजस तथा तामस त्यागका त्याग करे।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
| यज्ञदान- | तत् | = उनको तो | च | = और |
|---|---|---|---|---|
| तपःकर्म | कार्यम्, एव | = करना ही | तपः | = तप—ये तीनों |
| तप रूप कर्मोंका | चाहिये; | एव | = ही (कर्म) | |
| न, त्याज्यम् | (क्योंकि) | मनीषिणाम् | = मनीषियोंको | |
| करना | यज्ञः | = यज्ञ, | पावनानि | = पवित्र |
| चाहिये, (प्रत्युत) | दानम् | = दान | करनेवाले हैं। |
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
११०७
व्याख्या —‘यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्’—यहाँ भगवान्ने दूसरोंके मत (तीसरा श्लोक)-को ठीक बताया है। भगवान् कठोर शब्दोंसे किसीके मतका खण्डन नहीं करते। आदर देनेके लिये भगवान् दूसरेके मतका वास्तविक अंश ले लेते हैं और उसमें अपना मत भी शामिल कर देते हैं। यहाँ भगवान्ने दूसरेके मतके अनुसार कहा कि यज्ञ, दान और तप रूपकर्म छोड़ने नहीं चाहिये। इसके साथ भगवान्ने अपना मत बताया कि इतना ही नहीं, प्रत्युत उनको न करते हो तो जरूर करना चाहिये—‘कार्यमेव तत्।’ कारण कि यज्ञ, दान और तप—तीनों कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।
‘यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्’ —यहाँ ‘चैव’ पदका तात्पर्य है कि नित्य, नैमित्तिक, जीविका-सम्बन्धी, शरीर-सम्बन्धी आदि जितने भी कर्तव्य-कर्म हैं, उनको भी जरूर करना चाहिये; क्योंकि वे भी मनीषियोंको
परिशिष्ट भाव —मनीषीका अर्थ है—विचारशील। जो कर्म अपनी कोई कामना न रखकर दूसरोंके हितके लिये किये जाते हैं, वे कर्म पवित्र करनेवाले हो जाते हैं अर्थात् दुर्गुण-दुराचार, पाप आदि मलको दूर करके महान् आनन्द देनेवाले हो जाते हैं। परन्तु वे ही कर्म अगर अपनी कामना रखकर और दूसरोंका अहित करनेके लिये किये जायें तो वे अपवित्र करनेवाले अर्थात् लोक-परलोक दोनोंमें महान् दुःख देनेवाले हो जाते हैं।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥
| पार्थ | = हे पार्थ ! | (कर्माको) | कर्तव्यानि | = करना चाहिये— |
|---|---|---|---|---|
| एतानि | = इन (यज्ञ, दान और तप रूपक) | सङ्गम् | = आसक्ति | इति |
| कर्माणि | = कर्मोंको | च | = और | मे |
| तु | = तथा | फलानि | = फलोंकी इच्छाका | निश्चितम् |
| अपि | = (दूसरे) भी | त्यक्त्वा | = त्याग करके | उत्तमम् |
| मतम् | = मत है। |
व्याख्या —‘एतान्यपि तु कर्माणि ..... निश्चितं मतमुत्तमम्’—यहाँ ‘एतानि’ पदसे पूर्वश्लोकमें कहे यज्ञ, दान और तप रूपकर्मोंकी तथा ‘अपि’ पदसे शास्त्रवहित पठन-पाठन, खेती-व्यापार आदि जीविका-सम्बन्धी कर्म; शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जागना आदि शारीरिक कर्म और परिस्थितिके अनुसार सामने आये अवश्य कर्तव्य-कर्म—इन सभी कर्मोंको लेना चाहिये। इन समस्त कर्मोंको आसक्ति और
पवित्र करनेवाले हैं।
जो मनुष्य समत्वबुद्धिसे युक्त होकर कर्मजन्य फलका त्याग कर देते हैं, वे मनीषी हैं—‘कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः’ (गीता २।५१)। ऐसे मनीषियोंको वे यज्ञादि कर्म पवित्र करते हैं। परन्तु जो वास्तवमें मनीषी नहीं हैं, जिनकी इन्द्रियां वशमें नहीं हैं अर्थात् अपने सुखभोगके लिये ही जो यज्ञ, दानादि कर्म करते हैं, उनको वे कर्म पवित्र नहीं करते, प्रत्युत वे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं।
इस श्लोकके पूर्वार्धमें ‘यज्ञदानतपःकर्म’—ऐसा समासयुक्त पद दिया है और उत्तरार्धमें ‘यज्ञो दानं तपः’—ऐसे अलग-अलग पद दिये हैं, इसका तात्पर्य है कि भगवान्ने समासयुक्त पदसे यह बताया है कि यज्ञ, दान और तपका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इनको जरूर करना चाहिये और अलग-अलग पदोंसे यह बताया है कि इनमेंसे एक-एक कर्म भी मनीषीको पवित्र करनेवाला है।
जो कर्म अपनी कोई कामना न रखकर दूसरोंके हितके लिये किये जाते हैं, वे कर्म पवित्र करनेवाले हो जाते हैं अर्थात् दुर्गुण-दुराचार, पाप आदि मलको दूर करके महान् आनन्द देनेवाले हो जाते हैं। परन्तु वे ही कर्म अगर अपनी कामना रखकर और दूसरोंका अहित करनेके लिये किये जायें तो वे अपवित्र करनेवाले अर्थात् लोक-परलोक दोनोंमें महान् दुःख देनेवाले हो जाते हैं।
फलेच्छाका त्याग करके जरूर करना चाहिये। अपनी कामना, ममता और आसक्तिका त्याग करके कर्मोंको केवल प्राणिमात्रके हितके लिये करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारके लिये और योग अपने लिये हो जाता है। परन्तु कर्मोंको अपने लिये करनेसे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं—अपने व्यक्तत्वको नष्ट नहीं होने देते।
गीतामें कहीं संग-(आसक्ति-) के त्यागकी बात आती है और कहीं कर्मोंके फलके त्यागकी बात आती है। इस
११०८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
श्लोकमें संग और फल—दोनोंके त्यागकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि गीतामें जहाँ संगके त्यागकी बात कही है, वहाँ उसके साथ फलके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये और जहाँ फलके त्यागकी बात कही है, वहाँ उसके साथ संगके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये। यहाँ अर्जुनने त्यागके तत्त्वकी बात पूछी है; अतः भगवान्ने त्यागका यह तत्त्व बताया है कि संग (आसक्ति) और फल—दोनोंका ही त्याग करना चाहिये, जिससे साधकको यह जानकारी स्पष्ट हो जाय कि आसक्ति न तो कर्ममें रहनी चाहिये और न फलमें ही रहनी चाहिये। आसक्ति न रहनेसे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि कर्म करनेके औजारों—(करणों—)में तथा प्राप्त वस्तुओंमें ममता नहीं रहती (गीता—पाँचवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।
संग (आसक्ति या सम्बन्ध) सूक्ष्म होता है और फलेच्छा स्थूल होती है। संग या आसक्तिकी सूक्ष्मता वहाँतक है, जहाँ चेतन-स्वरूपने नाशवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ा है। वहाँसे आसक्ति पैदा होती है, जिससे जन्म-मरण आदि सब अनर्थ होते—‘करणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजम्भसु’ (गीता १३।२१)। आसक्तिका त्याग करनेसे नाशवान्के साथ जोड़े हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और स्वतः—स्वाभाविक रहनेवाली असंगताका अनुभव हो जाता है।
इस विषयमें एक और बात समझनेकी है कि कई दार्शनिक इस नाशवान् संसारको असत् मानते हैं; क्योंकि यह पहले भी नहीं था और पीछे भी नहीं रहेगा, इसलिये वर्तमानमें भी यह नहीं है; जैसे—स्वप्न। कई दार्शनिकोंका यह मत है कि संसार परिवर्तनशील है, हरदम बदलता रहता है, कभी एक रूप नहीं रहता; जैसे—अपना शरीर। कई यह मानते हैं कि परिवर्तनशील होनेपर भी संसारका कभी अभाव नहीं होता, प्रत्युत तत्त्वसे सदा रहता है; जैसे—जल (जल ही बर्फ, बादल, भाप और परमाणुरूपसे हो जाता है, पर स्वरूपसे वह मिटता नहीं)। इस तरह अनेक मतभेद हैं; किन्तु नाशवान् जड़का अपने अविनाशी चेतन-स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इसमें किसी भी दार्शनिकका मतभेद नहीं है। ‘संगं त्यक्त्वा’ पदोंसे भगवान्ने उसी सम्बन्धका त्याग कहा है।
प्रकृति सत् है या असत् है अथवा सत्-असत्से विलक्षण है? अनादि-सान्त है या अनादि-अनन्त है? इस झगड़ेमें पड़कर साधकको अपना अमूल्य समय खर्च नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इस प्रकृतिसे तथा प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहिये, जो कि स्वतः हो ही रहा है। स्वतः होनेवाले सम्बन्ध-विच्छेदका केवल अनुभव करना है कि शरीर तो प्रतिक्षण बदलता ही रहता है और स्वयं निर्विकाररूपसे सदा ज्यों-का-त्यों रहता है।
अब प्रश्न यह होता है कि फल क्या है? प्रारब्ध-कर्मके अनुसार अभी हमें जो परिस्थिति, वस्तु, देश, काल आदि प्राप्त हैं, वह सब कर्मोंका ‘प्राप्त फल’ है और भविष्यमें जो परिस्थिति, वस्तु आदि प्राप्त होनेवाली है, वह सब कर्मोंका ‘अप्राप्त फल’ है। प्राप्त तथा अप्राप्त फलमें आसक्ति रहनेके कारण ही प्राप्तमें ममता और अप्राप्तकी कामना होती है। इसलिये भगवान्ने ‘त्यक्त्वा फलानि च’ कहकर फलोंका त्याग करनेकी बात कही है।
कर्मफलका त्याग क्यों करना चाहिये? क्योंकि कर्मफल हमारे साथ रहनेवाला है ही नहीं। कारण यह है कि जिन कर्मोंसे फल बनता है, उन कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है; अतः उनका फल भी प्राप्त और नष्ट होनेवाला ही है। इसलिये कर्मफलका त्याग करना है। फलके त्यागमें वस्तुतः फलकी आसक्तिका, कामनाका ही त्याग करना है। वास्तवमें आसक्ति हमारे स्वरूपमें है नहीं, केवल मानी हुई है।
दूसरी बात, जो अपना स्वरूप होता है, उसका त्याग नहीं होता; जैसे—प्रज्वलित अग्नि उष्णता और प्रकाशका त्याग नहीं कर सकती। जो चीज अपनी नहीं होती, उसका भी त्याग नहीं होता; जैसे—संसारमें अनेक वस्तुएँ पड़ी हैं; परन्तु उनका हम त्याग करें—ऐसा कहना भी नहीं बनता; क्योंकि वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं। इसलिये त्याग उसीका होता है, जो वास्तवमें अपना नहीं है, पर जिसको अपना मान लिया है। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदि हमारे नहीं हैं, फिर भी उनको हम अपना मानते हैं, तो इस अपनेपनकी मान्यताका ही त्याग करना है।
मनुष्यके सामने कर्तव्यरूपसे जो कर्म आ जाय, उसको
- यहाँ ‘फलानि’ शब्दमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि सकामभावसे कर्म करनेवालोंमें बहुत-से फलोंकी इच्छा होती है—‘बहुगुणशा हानन्ताश्च बुद्ध्योऽव्यवसायिनाम्’ (गीता २।४९)। वे इस लोकमें सुख-आराम, मान-सम्मान, यश-प्रतिष्ठा आदि चाहते हैं और परलोकमें स्वर्ग आदिकी प्राप्ति चाहते हैं। भगवान्के मतमें इन सभी फलोंकी इच्छाओंका त्याग है।
श्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
११०९
फल और आसक्ति का त्याग करके सावधानीके साथ तत्परतापूर्वक करना चाहिये—‘कर्तव्यानि’। कर्मयोगमें विधि-निषेधको लेकर ‘अमुक काम करना है और अमुक काम नहीं करना है’—ऐसा विचार तो करना ही है; परन्तु ‘अमुक काम बड़ा है और अमुक काम छोटा है’—ऐसा विचार नहीं करना है। कारण कि जहाँ कर्म और उसके फलसे अपना कोई सम्बन्ध ही नहीं है, वहाँ यह कर्म बड़ा है, यह कर्म छोटा है; इस कर्मका फल बड़ा है, इस कर्मका फल छोटा है—ऐसा विचार हो ही नहीं सकता। कर्मका बड़ा या छोटा होना फलकी इच्छाके कारण ही दीखता है, जब कि कर्मयोगमें फलेच्छाका त्याग होता है।
कर्म करना राग-प्रीतिके लिये भी होता है और राग-निवृत्तिके लिये भी। कर्मयोगी राग-निवृत्तिके लिये अर्थात् करनेका राग मिटानेके लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करता है—‘आरुरुक्षोमुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते’ (गीता ६।३), ‘न कर्मणामनारम्भानैकम्व्यं पुरुषोऽश्रुते’ (गीता ३।४)। अपने लिये कर्म करनेसे करनेका राग बढ़ता है। इसलिये कर्मयोगी कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता, प्रत्युत केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है। उसके स्थूलशरीरमें होनेवाली ‘क्रिया’, सूक्ष्मशरीरमें होनेवाला ‘परहित-चित्तन’ तथा कारणशरीरमें होनेवाली ‘स्थिरता’—तीनों ही दूसरोंके हितके लिये होती हैं, अपने लिये नहीं। इसलिये उसका करनेका राग सुगमतासे मिट जाता है।
परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें कर्मासक्ति और फलासक्ति—दोनोंके त्यागकी बात आयी है। कर्मासक्ति और फलासक्ति ही खास बन्धन है, जिससे छूटनेपर ही मनुष्य योगारूढ़ होता है—‘यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जे……’ (गीता ६।४)।
शुभ कर्म भी निष्कामभाव होनेसे ही कल्याण करनेवाले होते हैं। अगर निष्कामभाव न हो तो शुभ कर्म भी बन्धनकारक होते हैं—‘आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता ८।१६)।
सम्बन्ध—इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने तीन प्रकारके त्यागकी बात कही थी। अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसी त्रिविध त्यागका वर्णन करते हैं।
परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें संसारका राग ही बाधक है। अतः राग मिटनेपर कर्मयोगीको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति अपने-आप हो जाती है (गीता—चौथे अध्यायका अङ्गीसर्वां श्लोक)।
‘कर्तव्य’ शब्दका अर्थ होता है—जिसको हम कर सकते हैं तथा जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि जरूर होती है। उद्देश्य वही कहलाता है, जो नित्यसिद्ध और अनुत्पन्न है अर्थात् जो अनादि है और जिसका कभी विनाश नहीं होता। उस उद्देश्यकी सिद्धि मनुष्यजन्ममें ही होती है और उसकी सिद्धिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है, न कि कर्मजन्म परिस्थितिरूप सुख-दुःख भोगनेके लिये। कर्मजन्म परिस्थिति वह होती है, जो उत्पन्न और नष्ट होती हो। वह परिस्थिति तो मनुष्यके अलावा पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता, नारकीय-स्वर्गीय आदि योनियोंके प्राणियोंको भी मिलती है, जहाँ कर्तव्यका कोई प्रश्न ही नहीं है और जहाँ उद्देश्यकी प्रतिका अधिकार भी नहीं है।
भगवान्के द्वारा अपने मतको ‘निश्चितम्’ कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं है, यह मत अटल है अर्थात् यह किंचिन्मात्र भी इधर-उधर नहीं हो सकता; और ‘उत्तमम्’ कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें शास्त्रीय दृष्टिसे कोई कमी नहीं है, प्रत्युत यह पूर्णताको प्राप्त करानेवाला है।
नियतस्य तु सन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥
| नियतस्य | = नियत | न, उपपद्यते | = उचित नहीं है। | परित्यागः | = त्याग करना |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्मणः | = कर्मका | तस्य | = उसका | तामसः | = तामस |
| तु | = तो | मोहात् | = मोहपूर्वक | परिकीर्तितः | = कहा गया है। |
| सन्यासः | = त्याग करना |
१११०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
व्याख्या —[ तीन तरहके त्यागका वर्णन भगवान् इसलिये करते हैं कि अर्जुन कर्माका स्वरूपसे त्याग करना चाहते थे—‘श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके’ (गीता २।५); अतः त्रिविध त्याग बताकर अर्जुनको चेत कराना था, और आगेके लिये मनुष्यमात्रको यह बताना था कि नियत कर्माका स्वरूपसे त्याग करना भगवान्को मान्य (अभीष्ट) नहीं है। भगवान् तो सात्त्विक त्यागको ही वास्तवमें त्याग मानते हैं। सात्त्विक त्यागसे संसारके सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है।
दूसरी बात, सत्रहवें अध्यायमें भी भगवान् गुणोंके अनुसार श्रद्धा, आहार आदिके तीन-तीन भेद कहकर आये हैं, इसलिये यहाँ भी अर्जुनद्वारा त्यागका तत्त्व पृष्ठनेपर भगवान्ने त्यागके तीन भेद कहे हैं।]
‘नियतस्य तु सन्यासः कर्मणो नोपपद्यते’ —पूर्व-श्लोकमें भगवान्ने त्यागके विषयमें अपना जो निश्चित उत्तम मत बताया है, उससे यह तामस त्याग बिलकुल ही विपरीत है और सर्वथा निकृष्ट है, यह बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पद आया है।
नियत कर्माका त्याग करना कभी भी उचित नहीं है; क्योंकि वे तो अवश्यकर्तव्य हैं। बलिवैश्वदेव आदि यज्ञ करना, कोई अतिथि आ जाय तो गृहस्थ-धर्मके अनुसार उसको अन्न, जल आदि देना, विशेष पर्वमें या श्राद्ध-तर्पणके दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराना और दक्षिणा देना, अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार प्रातः और सायंकालमें सन्ध्या करना आदि कर्मोंको न मानना और न करना ही नियत कर्माका त्याग है।
‘मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः’ —ऐसे नियत कर्मोंको मूढ़तासे अर्थात् बिना विवेक-विचारके छोड़ देना तामस त्याग कहा जाता है। सत्संग, सभा, समिति आदिमें जाना आवश्यक था, पर आलस्यमें पड़े रहे, आराम करने लग गये अथवा सो गये; घरमें माता-पिता बीमार हैं, उनके लिये वैद्यको बुलाने या औषधि लानेके लिये जा रहे थे, रास्तेमें कहींपर लोग ताश-चौपड़ आदि खेल रहे थे, उनको देखकर खुद भी खेलमें लग गये और वैद्यको बुलाना या औषधि लाना भूल गये; कोर्टमें मुकदमा चल रहा है, उसमें हाजिर होनेके समय हँसी-दिल्लगी, खेल-तमाशा आदिमें लग गये और समय बीत गया; शरीरके लिये शौच-स्नान आदि जो आवश्यक कर्तव्य हैं, उनको आलस्य और प्रमादके कारण छोड़ दिया—यह सब तामस त्यागके उदाहरण हैं।
विहित कर्म और नियत कर्ममें क्या अन्तर है? शास्त्रोंने जिन कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी है, वे सभी ‘विहित कर्म’ कहलाते हैं। उन सम्पूर्ण विहित कर्मोंका पालन एक व्यक्ति कर ही नहीं सकता; क्योंकि शास्त्रोंमें सम्पूर्ण वारों तथा तिथियोंके व्रतका विधान आता है। यदि एक ही मनुष्य सब वारोंमें या सब तिथियोंमें व्रत करेगा तो फिर वह भोजन कब करेगा? इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके लिये सभी विहित कर्म लागू नहीं होते। परन्तु उन विहित कर्मोंमें भी वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुसार जिसके लिये जो कर्तव्य आवश्यक होता है, उसके लिये वह ‘नियत कर्म’ कहलाता है। जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—चारों वर्णोंमें जिस-जिस वर्णके लिये जीविका और शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी जितने भी नियम हैं, उस-उस वर्णके लिये वे सभी ‘नियत कर्म’ हैं।
नियत कर्माका मोहपूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग ‘तामस’ हो जाता है तथा सुख और आरामके लिये त्याग करनेसे वह त्याग ‘राजस’ हो जाता है। सुखेच्छा, फलेच्छा तथा आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग ‘सात्त्विक’ हो जाता है। तात्पर्य यह है कि मोहमें उलझ जाना तामस पुरुषका स्वभाव है, सुख-आराममें उलझ जाना राजस पुरुषका स्वभाव है और इन दोनोंसे रहित होकर सावधानीपूर्वक निष्कामभावसे कर्तव्य-कर्म करना सात्त्विक पुरुषका स्वभाव है। इस सात्त्विक स्वभाव अथवा सात्त्विक त्यागसे ही कर्म और कर्मफलसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है, राजस और तामस त्यागसे नहीं; क्योंकि राजस और तामस त्याग वास्तवमें त्याग है ही नहीं।
लोग सामान्य रीतिसे स्वरूपसे कर्मोंको छोड़ देनेको ही त्याग मानते हैं; क्योंकि उन्हें प्रत्यक्षमें वही त्याग दीखता है। कौन व्यक्ति कौन-सा काम किस भावसे कर रहा है, इसका उन्हें पता नहीं लगता। परन्तु भगवान् भीतरकी कामना-ममता-आसक्तिके त्यागको ही त्याग मानते हैं; क्योंकि ये ही जन्म-मरणके कारण हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।
यदि बाहरके त्यागको ही असली त्याग माना जाय तो सभी मरनेवालोंका कल्याण हो जाना चाहिये; क्योंकि उनकी तो सम्पूर्ण वस्तुएँ छूट जाती हैं; और तो क्या, अपना कहलानेवाला शरीर भी छूट जाता है और उनको वे वस्तुएँ प्रायः यादतक नहीं रहतीं! अतः भीतरका त्याग ही असली त्याग है। भीतरका त्याग होनेसे बाहरसे वस्तुएँ अपने पास रहे या न रहे, मनुष्य उनसे बँधता नहीं।
श्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
११११
परिशिष्ट भाव —‘विहित’ की अपेक्षा ‘नियत’ कर्ममें व्यक्ति की विशेष जिम्मेवारी होती है। जैसे, किसीको पहलेपर खड़ा कर दिया अथवा जल पिलानेके लिये प्याऊपर बैठा दिया तो यह उसके लिये नियत कर्म हो गया, जिसकी उसपर विशेष जिम्मेवारी है। नियत कर्मके त्यागका ज्यादा दोष लगता है। नियतका त्याग करनेसे विप्लव होता है। अतः पैसे कम मिलें या ज्यादा, आराम कम मिले या ज्यादा, अपने नियत कर्मका कभी त्याग नहीं करना चाहिये। नियत कर्म न करनेके कारण ही आजकल समाजमें अन्व्यवस्था हो रही है। जिसकी जिस कामके लिये नियुक्त कर दी, वह उस कामको नहीं करेगा तो क्या दशा होगी? नियतका मोहपूर्वक त्याग करना तामस है, जिसका फल अधोगतिकी प्राप्ति है—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४।१८)।
दुःखमित्येव यत्कर्म कायकलेशभयात्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥
| यत् | = जो कुछ | कायकलेशभयात्= शारीरिक | त्यागम् | = त्याग |
|---|---|---|---|---|
| कर्म | = कर्म है, (वह) | परिश्रमके भयसे | कृत्वा | = करके |
| दुःखम् | = दुःखरूप | (उसका) | एव | = भी |
| एव | = ही है— | त्यजेत् | = त्याग कर दे, (तो) | त्यागफलम् |
| इति | = ऐसा (समझकर) | सः | = वह | न |
| कोई) | राजसम् | = राजस | लभेत् | = पाता। |
व्याख्या —‘दुःखमित्येव यत्कर्म’—यज्ञ, दान आदि शास्त्रीय नियत कर्मोंको करनेमें केवल दुःख ही भोगना पड़ता है और उनमें है ही क्या? क्योंकि उन कर्मोंको करनेके लिये अनेक नियमोंमें बँधना पड़ता है और खर्चा भी करना पड़ता है—इस प्रकार राजस पुरुषको उन कर्मोंमें केवल दुःख-ही-दुःख दीखता है। दुःख दीखनेका कारण यह है कि उनका परलोकपर, शास्त्रीय, शास्त्रविहित कर्मोंपर और उन कर्मोंके परिणामपर श्रद्धा-विश्वास नहीं होता।
‘कायकलेशभयात्यजेत्’ —राजस मनुष्यको शास्त्र-मर्यादा और लोक-मर्यादाके अनुसार चलनेसे शरीरमें कलेश अर्थात् परिश्रमका अनुभव होता है*। राजस मनुष्यको अपने वर्ण, आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेमें और माता-पिता, गुरु, मालिक आदिकी आज्ञाका पालन करनेमें पराधीनता और दुःखका अनुभव होता है तथा उनकी आज्ञा भंग करके जैसी मरजी आये, वैसा करनेमें स्वाधीनता और सुखका अनुभव होता है। राजस मनुष्योंके विचार यह होते हैं कि ‘गृहस्थमें आराम नहीं मिलता, स्त्री-पुत्र आदि हमारे अनुकूल नहीं हैं अथवा सब कुटुम्बी मर गये हैं, घरमें काम करनेके लिये कोई रहा नहीं, खुदको तकलीफ उठानी
पड़ती है, इसलिये साधु बन जायँ तो आरामसे रहेंगे, रोटी, कपड़ा आदि सब चीजें मुफ्तमें मिल जायँगी, परिश्रम नहीं करना पड़ेगा; कोई ऐसी सरकारी नौकरी मिल जाय, जिससे काम कम करना पड़े और रुपये आरामसे मिलते रहें, हम काम न करें तो भी उस नौकरीसे हमें कोई छुड़ा न सके, हम नौकरी छोड़ देंगे तो हमें पेंशन मिलती रहेगी’, इत्यादि। ऐसे विचारोंके कारण उन्हें घरका काम-धन्ध करना अच्छा नहीं लगता और वे उसका त्याग कर देते हैं।
यहाँ शंका होती है कि ज्ञानप्राप्तिके साधनोंमें दुःख और दोषको बार-बार देखनेकी बात कही है (गीता—तेरहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक) और यहाँ कर्मोंमें दुःख देखकर उनका त्याग करनेको राजस त्याग कहा है अर्थात् कर्मोंके त्यागका निषेध किया है—इन दोनों बातोंमें परस्पर विरोध प्रतीत होता है। इसका समाधान है कि वास्तवमें इन दोनोंमें विरोध नहीं है, प्रत्युत इन दोनोंका विषय अलग-अलग है। वहाँ (गीता—तेरहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें) भोगोंमें दुःख और दोषको देखनेकी बात है और यहाँ नियत कर्तव्य-कर्मोंमें दुःखको देखनेकी बात है। इसलिये वहाँ भोगोंका त्याग करनेका विषय है और यहाँ कर्तव्य-कर्मोंका
- कलेशका अनुभव होनेमें शरीरकी ममता और आसक्ति ही कारण है।
१११२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
त्याग करनेका विषय है। भोगोंका तो त्याग करना चाहिये, पर कर्तव्य-कर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। कारण कि जिन भोगोंमें सुखबुद्धि और गुणबुद्धि हो रही है, उन भोगोंमें बार-बार दुःख और दोषको देखनेसे भोगोंसे वैराग्य होगा, जिससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होगी; परन्तु नियत कर्तव्य-कर्मोंमें दुःख देखकर उन कर्मोंका त्याग करनेसे सदा पराधीनता और दुःख भोगना पड़ेगा— ‘यथार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’ (गीता ३।९)। तात्पर्य यह हुआ कि भोगोंमें दुःख और दोष देखनेसे भोगासक्ति छूटेगी, जिससे कल्याण होगा और कर्तव्योंमें दुःख देखनेसे कर्तव्य छूटेगा, जिससे पतन होगा। कर्तव्य-कर्मोंका त्याग करनेमें तो राजस और तामस—ये दो भेद होते हैं, पर परिणाम—(आलस्य, प्रमाद, अतिनिद्रा आदि—) में दोनों एक हो जाते हैं अर्थात् परिणाममें दोनों ही तामस हो जाते हैं, जिसका फल अधोगति होता है— ‘अधोगच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४।१८)।
एक शंका यह भी हो सकती है कि सत्संग, भगवत्-कथा, भक्तचरित्र सुननेसे किसीको वैराग्य हो जाय तो वह प्रभुको पानेके लिये आवश्यक कर्तव्य-कर्मोंको भी छोड़ देता है और केवल भगवान्के भजनमें लग जाता है।
परिशिष्ट भाव —त्यागका फल ‘शान्ति’ है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२।१२) और रागका फल ‘दुःख’ है—‘रजसस्तु फलं दुःखम्’ (गीता १४।१६)। राजस मनुष्यको त्यागका फल ‘शान्ति’ तो नहीं मिलती, पर रागका फल ‘दुःख’ तो मिलता ही है।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥
| अर्जुन | = हे अर्जुन! | नियतम् | = शास्त्रविहित | त्यक्त्वा | = त्याग करके |
|---|---|---|---|---|---|
| कार्यम्, एव | = ‘केवल कर्तव्यमात्र करना है’— | कर्म | = कर्म | क्रियते | = किया जाता है, |
| इति | = ऐसा (समझकर) | सङ्गम् | = आसक्ति | सः, एव | = वही |
| यत् | = जो | च | = और | सात्त्विकः | = सात्त्विक |
| फलम् | = फलेच्छका | त्यागः मतः | = त्याग माना गया है। |
व्याख्या —‘कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियते-र्जुन’—यहाँ ‘कार्यम्’ पदके साथ ‘इति’ और ‘एव’ ये दो अव्यय लगानेसे यह अर्थ निकलता है कि केवल कर्तव्यमात्र करना है। इसको करनेमें कोई फलासक्ति नहीं, कोई स्वार्थ नहीं और कोई क्रियाजय सुखभोग भी नहीं। इस प्रकार कर्तव्यमात्र करनेसे कर्ताका उस कर्मसे सम्बन्ध-
इसलिये उसका वह कर्तव्य-कर्मोंका त्याग राजस कहा जाना चाहिये? ऐसी बात नहीं है। सांसारिक कर्मोंको छोड़कर जो भजनमें लग जाता है, उसका त्याग राजस या तामस नहीं हो सकता। कारण कि भगवान्को प्राप्त करना मनुष्य-जन्मका ध्येय है; अतः उस ध्येयकी सिद्धिके लिये कर्तव्य-कर्मोंका त्याग करना वास्तवमें कर्तव्यका त्याग करना नहीं है, प्रत्युत असली कर्तव्यको करना है। उस असली कर्तव्यको करते हुए आलस्य, प्रमाद आदि दोष नहीं आ सकते; क्योंकि उसकी रुचि भगवान्में रहती है। परन्तु राजस और तामस त्याग करनेवालोंमें आलस्य, प्रमाद आदि दोष आयेंगे ही; क्योंकि उसकी रुचि भोगोंमें रहती है।
‘स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्’ —त्यागका फल ‘शान्ति’ है। राजस मनुष्य त्याग करके भी त्यागके फल—(शान्ति—) को नहीं पाता। कारण कि उसने जो त्याग किया है, वह अपने सुख-आरामके लिये ही किया है। ऐसा त्याग तो पशु-पक्षी आदि भी करते हैं। अपने सुख-आरामके लिये शुभ-कर्मोंका त्याग करनेसे राजस मनुष्यको शान्ति तो नहीं मिलती, पर शुभ-कर्मोंके त्यागका फल दण्डरूपसे जरूर भोगना पड़ता है।
विच्छेद हो जाता है। ऐसा होनेसे वह कर्म बन्धनकारक नहीं होता अर्थात् संसारके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता। कर्म तथा उसके फलमें आसक्त होनेसे ही बन्धन होता है— ‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)।
शास्त्रविहित कर्मोंमें भी देश, काल, वर्ण, आश्रम, परिस्थितिके अनुसार जिस-जिस कर्ममें जिस-जिसकी
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
१११३
नियुक्ति की जाती है, वे सब नियत कर्म कहलाते हैं; जैसे—साधुको ऐसा करना चाहिये, गृहस्थको ऐसा करना चाहिये, ब्राह्मणको अमुक काम करना चाहिये, क्षत्रियको अमुक काम करना चाहिये इत्यादि। उन कर्मोंको प्रमाद, आलस्य, उपेक्षा, उदासीनता आदि दोषोंसे रहित होकर तत्परता और उत्साहपूर्वक करना चाहिये। इसीलिये भगवान्ने कर्मयोगके प्रसंगमें जगह-जगह ‘समाचर’ शब्द दिया है (गीता—तीसरे अध्यायका नवों और उन्नीसवों श्लोक)।
‘संगं त्यक्त्वा फलं चैव’—संगके त्यागका तात्पर्य है कि कर्म, कर्म करनेके औजार (साधन) आदिमें आसक्ति, प्रियता, ममता आदि न हो और फलके त्यागका तात्पर्य है कि कर्मके परिणामके साथ सम्बन्ध न हो अर्थात् फलकी इच्छा न हो। इन दोनोंका तात्पर्य है कि कर्म और फलमें आसक्ति तथा इच्छाका त्याग हो।
‘स त्यागः सात्त्विको मतः’१—कर्म और फलमें आसक्ति तथा कामनाका त्याग करके कर्तव्यमात्र समझकर
परिशिष्ट भाव—तमोगुणमें मूढ़ता (बेसमझी) है और रजोगुणमें स्वार्थबुद्धि है, पर सत्त्वगुणमें न मूढ़ता है, न स्वार्थबुद्धि है, प्रत्युत सम्बन्ध-विच्छेद है। सात्त्विक मनुष्य कर्तव्यमात्र समझकर सब नियत कर्म करता है। एक मार्मिक बात है कि कर्तव्यमात्र समझकर जो भी कर्म किया जाता है, उससे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। लौकिक साधन (कर्मयोग और ज्ञानयोग) में शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद मुख्य है। इसलिये साधकको प्रत्येक कर्म कर्तव्यमात्र समझकर करना चाहिये। स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करनेसे तो बन्धन होता है, पर सम्बन्ध न जोड़कर कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे मुक्ति होती है।१
१-गीताभरमें जहाँ कहीं (सातवें अध्यायके बारहवें, चौदहवें अध्यायके पाँचवेंसे अठारहवें, और बाईसवें, सत्रहवें अध्यायके पहले, दूसरे, आठवेंसे दसवें, ग्यारहवेंसे तेरहवें, सत्रहवेंसे बाईसवें और अठारहवें अध्यायके बीसवेंसे अड़ईसवें, तीसवेंसे पैंतीसवें तथा सैंतीसवेंसे उन्नालीसवें श्लोकोंमें) गुणोंका वर्णन हुआ है, वहाँ सत्त्व, रज और तम—यही क्रम रखा गया है। केवल यहीं (१८।७—१९में) व्यतिक्रम हुआ है अर्थात् तम, रज और सत्त्व—ऐसा क्रम रखा गया है। इसका कारण है—(१) यदि छठे श्लोकके बाद ही (सातवें श्लोकमें) सात्त्विक त्यागका वर्णन करते तो भगवान्ने निश्चित मतमें और सात्त्विक त्यागमें पुनरुक्तिका दोष आ जाता। (२) किसी वस्तुकी उत्तमता तभी सिद्ध होती है, जब उसके पहले अनुत्तम वस्तुका वर्णन किया जाय। इसलिये भगवान् सात्त्विक त्यागकी उत्तमता सिद्ध करनेके लिये पहले अनुत्तम तामस और राजस त्यागका वर्णन करते हैं। (३) आगे दसवेंसे बारहवें श्लोकतक ‘सात्त्विक त्यागी’ का वर्णन हुआ है। यदि सात्त्विक त्यागका वर्णन सात्त्विक त्यागीके पास (नवें श्लोकमें) न देते तो तामस त्यागके पास होनेसे सात्त्विक त्यागीका सम्बन्ध न जुड़ता।
२-अलौकिक साधन (भक्तियोग) में भगवान्ने सम्बन्ध जोड़ना मुख्य है। इसलिये भक्तको जप, ध्यान, कीर्तन आदि कर्तव्य समझकर नहीं करने चाहिये, प्रत्युत अपने प्रियतमका काम (सेवा-पूजन) समझकर उनकी प्रसन्नताके लिये प्रेमपूर्वक करने चाहिये। भगवान्की होके वस्तु (नाम, रूप आदि) प्रिय लगनी चाहिये। भगवान्का काम करनेमें आनन्द आना चाहिये। जैसे, दवा कर्तव्य समझकर ली जाती है, पर भोजन कर्तव्य समझकर नहीं किया जाता, प्रत्युत अपनी भूख मिटानेके लिये किया जाता है। इसलिये भक्तको जप, ध्यान आदि कर्तव्यमात्र समझकर त्यागके उद्देश्यसे नहीं करने चाहिये, प्रत्युत भगवान्के साथ सम्बन्ध जाग्रत करनेके लिये करने चाहिये। अगर वह जप, ध्यान आदि भी कर्तव्य समझकर करेगा तो भगवत्सम्बन्ध जाग्रत नहीं होगा, प्रेमका उदय नहीं होगा।
११४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
यहाँ शंका हो सकती है कि प्रस्तुत श्लोकमें तो कर्म करनेकी बात आयी है, त्यागकी बात आयी ही नहीं, फिर यह 'सात्त्विक त्याग' कैसे हुआ? इसका समाधान है कि सात्त्विक कर्तामें न मोह है, न स्वार्थ है, न आसक्ति है, न फलेच्छा है, केवल कर्तव्यमात्र है, इसलिये कर्मके साथ कर्ताका कुछ भी सम्बन्ध न होनेसे यह 'त्याग' हुआ। कर्तव्यमात्र जड़-विभागमें ही रहा, चेतनके साथ सम्बन्ध नहीं हुआ। जब चेतन (शरीरी) शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब शरीरसे होनेवाले कर्मोंके साथ उसका सम्बन्ध जुड़ जाता है। अगर वह शरीरके साथ सम्बन्ध न जोड़े, केवल कर्तव्यमात्र करे तो उसका कर्मोंके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ेगा। शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेके कारण इसका नाम 'त्याग' हुआ। इसमें कर्म और फल दोनोंके साथ सम्बन्ध-विच्छेद है।
सम्बन्ध—छठे श्लोकमें 'एतानि' और 'अपि तु' पदोंसे कहे गये यज्ञ, दान, तप आदि शास्त्रविहित कर्मोंके करनेमें और शास्त्रनिषिद्ध तथा काम्य कर्मोंका त्याग करनेमें क्या भाव होना चाहिये? यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
| अकुशलम् | = (जो) अकुशल | न, अनुषज्जते | = आसक्त नहीं | छिन्नसंशयः | = सन्देहरहित |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्म | = कर्मसे | होता, | (और) | ||
| न, द्वेष्टि | = द्वेष नहीं करता | त्यागी | = (वह) | सत्त्व- | |
| (और) | त्यागी, | समाविष्टः | = अपने स्वरूपमें | ||
| कुशले | = कुशल कर्ममें | मेधावी | = बुद्धिमान्, | स्थित है। |
व्याख्या—'न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म' —जो शास्त्रविहित शुभ-कर्म फलकी कामनासे किये जाते हैं और परिणाममें जिनसे पुनर्जन्म होता है (गीता—दूसरे अध्यायके बयालीसवेंसे चौवालीसवें तक और नवें अध्यायका बीसवाँ-इककीसवाँ श्लोक) तथा जो शास्त्रनिषिद्ध पाप-कर्म हैं और परिणाममें जिनसे नीच योनियों तथा नरकोंमें जाना पड़ता है (गीता—सोलहवें अध्यायके सातवेंसे बीसवें श्लोकतक), वे सब-के-सब कर्म 'अकुशल' कहलाते हैं। साधक ऐसे अकुशल कर्मोंका त्याग तो करता है, पर द्वेषपूर्वक नहीं। कारण कि द्वेषपूर्वक त्याग करनेसे कर्मोंसे तो सम्बन्ध छूट जाता है, पर द्वेषके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है, जो शास्त्रविहित काम्य-कर्मोंसे तथा शास्त्र-निषिद्ध पाप-कर्मोंसे भी भयंकर है।
'कुशले नानुषज्जते' —शास्त्रविहित कर्मोंमें भी जो वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिके अनुसार नियत हैं और जो आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके किये जाते हैं
तथा परिणाममें जिनसे मुक्ति होती है, ऐसे सभी कर्म 'कुशल' कहलाते हैं। साधक ऐसे कुशल कर्मोंको करते हुए भी उनमें आसक्त नहीं होता।
'त्यागी' —कुशल कर्मोंके करनेमें जिसका राग नहीं होता और अकुशल कर्मोंके त्यागमें जिसका द्वेष नहीं होता, वही असली त्यागी है*। परन्तु वह त्याग पूर्णतया तब सिद्ध होता है, जब कर्मोंको करने अथवा न करनेसे अपनेमें कोई फरक न पड़े अर्थात् निरन्तर निलिप्तता बनी रहे (गीता—तीसरे अध्यायका अठारहवाँ और चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। ऐसा होनेपर साधक योगारूढ़ हो जाता है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)।
'मेधावी' —जिसके सम्पूर्ण कार्य सांगोपांग होते हैं और संकल्प तथा कामनासे रहित होते हैं तथा ज्ञानरूप अग्निसे जिसने सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म कर दिया है, उसे पण्डित भी पण्डित (मेधावी अथवा बुद्धिमान्) कहते हैं (गीता—चौथे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।
- दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधानं निवर्तते। गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथाभक्तः ॥ (श्रीमद्भा० ११।७।११)
'जो पुरुष अनुकूलता-प्रतिकूलतारूप द्वन्द्वोंसे ऊँचा उठ जाता है, वह शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंका त्याग करता है, पर द्वेषबुद्धिसे नहीं और शास्त्रविहित कर्मोंको करता है, पर गुणबुद्धिसे अर्थात् रागपूर्वक नहीं। जैसे घुटनोंके बलपर चलनेवाले बच्चोंकी निर्बुद्धि और प्रवृत्ति राग-द्वेषपूर्वक नहीं होती, वैसे ही उभयातीतो पुरुषकी निर्बुद्धि और प्रवृत्ति भी राग-द्वेषपूर्वक नहीं होती (बच्चोंमें तो अज्ञता रहती है, पर राग-द्वेषसे रहित पुरुषमें विज्ञता रहती है)।'
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
१११५
कारण कि कर्मोंको करते हुए भी कर्मोंसे लिपायमान न होना बड़ी बुद्धिमत्ता है।
इसी मेधावीको चौथे अध्यायके अठारहवें श्लोकमें 'स बुद्धिमान्मनुष्येषु' पदोंसे सम्पूर्ण मनुष्योंमें बुद्धिमान् बताया गया है।
'छिन्नसंशयः'—उस त्यागी पुरुषमें कोई सन्देह नहीं रहता। तत्त्वमें अभिन्नभावसे स्थित रहनेके कारण उसमें किसी तरहका संदेह रहनेकी सम्भावना
परिशिष्ट भाव—इस श्लोकका तात्पर्य राग-द्वेषका त्याग करनेमें है। मनुष्यका स्वभाव है कि वह रागपूर्वक ग्रहण और द्वेषपूर्वक त्याग करता है। राग और द्वेष—दोनोंसे ही संसारसे सम्बन्ध जुड़ता है। भगवान् कहते हैं कि वास्तवमें वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो शुभ कर्मका ग्रहण तो करता है, पर रागपूर्वक नहीं और अशुभ कर्मका त्याग तो करता है, पर द्वेषपूर्वक नहीं।
सम्बन्ध—कर्मोंको करनेमें राग न हो और छोड़नेमें द्वेष न हो—इतनी झंझट क्यों की जाय? कर्मोंका सर्वथा ही त्याग क्यों न कर दिया जाय?—इस शंकाको दूर करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
न हि देहभूता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
| हि | = कारण कि | न, शक्यम् | = सम्भव | त्यागी है, |
|---|---|---|---|---|
| देहभूता | = देहधारी | नहीं है। | सः | |
| मनुष्यके द्वारा | तु | = इसलिये | त्यागी | = त्यागी है— |
| अशेषतः | = सम्पूर्ण | यः | = जो | इति |
| कर्माणि | = कर्मोंका | कर्मफल- | अभिधीयते | |
| त्यक्तुम् | = त्याग करना | त्यागी | = कर्मफलका |
व्याख्या—'न हि देहभूता* शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः'—देहधारी अर्थात् देहके साथ तादात्म्य रखनेवाले मनुष्योंके द्वारा कर्मोंका सर्वथा त्याग होना सम्भव नहीं है; क्योंकि शरीर प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति स्वतः क्रियाशील है। अतः शरीरके साथ तादात्म्य (एकता) रखनेवाला क्रियासे रहित कैसे हो सकता है? हाँ, यह हो सकता है कि मनुष्य यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि कर्मोंको छोड़ दे; परन्तु वह खाना-पीना, चलना-फिरना, आना-जाना, उठना-बैठना, सोना-जागना आदि आवश्यक शारीरिक क्रियाओंको कैसे छोड़ सकता है?
दूसरी बात, भीतरसे कर्मोंका सम्बन्ध छोड़ना ही
ही नहीं रहती। सन्देह तो वहीं रहता है, जहाँ अधूरा ज्ञान होता है अर्थात् कुछ जानते हैं और कुछ नहीं जानते।
'सत्त्वसमाविष्टः'—आसक्ति आदिका त्याग होनेसे उसकी अपने स्वरूपमें, चिन्मयतामें स्वतः स्थिति हो जाती है। इसलिये उसे 'सत्त्वसमाविष्टः' कहा गया है। इसीको पाँचवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें 'तस्मादब्रह्मणि ते स्थिताः' पदोंसे परमात्मामें स्थित बताया गया है।
वास्तवमें छोड़ना है। बाहरसे सम्बन्ध नहीं छोड़ा जा सकता। यदि बाहरसे सम्बन्ध छोड़ भी दिया जाय तो वह कबतक छूटा रहेगा? जैसे कोई समाधि लगा ले तो उस समय बाहरकी क्रियाओंका सम्बन्ध छूट जाता है। परन्तु समाधि भी एक क्रिया है, एक कर्म है; क्योंकि इसमें प्रकृतिजन्म कारण-शरीरका सम्बन्ध रहता है। इसलिये समाधिसे भी व्युत्थान होता है।
कोई भी देहधारी मनुष्य कर्मोंका स्वरूपसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं कर सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मता (योगनिष्ठा) प्राप्त नहीं होती और कर्मोंका त्याग करनेमात्रसे सिद्धि
- यहाँ 'देहभूता' पदको देहाभिमानी अर्थात् देहके साथ तादात्म्य माननेवाले सामान्य पुरुषोंका ही वाचक समझना चाहिये। गुणातीत महापुरुषकी देहसे भी क्रियाएँ होती रहती हैं; परन्तु देहके साथ तादात्म्य न रहनेसे उसका उन क्रियाओंसे कोई सम्बन्ध नहीं होता अर्थात् वह उन क्रियाओंका कर्ता नहीं बनता।
११९६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
(सांख्यनिष्ठा) भी प्राप्त नहीं होती (गीता—तीसरे अध्यायका चौथा श्लोक)।
मार्मिक बात
पुरुष (चेतन) सदा निर्विचार और एकरस रहनेवाला है; परन्तु प्रकृति विकारी और सदा परिवर्तनशील है। जिसमें अच्छी रीतिसे क्रियाशीलता हो, उसको 'प्रकृति' कहते हैं—'प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युद्) इति प्रकृतिः।'
उस प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ जबतक पुरुष अपना सम्बन्ध (तादात्म्य) मानता रहेगा, तबतक वह कर्मोंका सर्वथा त्याग कर ही नहीं सकता। कारण कि शरीरमें अहंता-ममता होनेके कारण मनुष्य शरीरसे होनेवाली प्रत्येक क्रियाको अपनी क्रिया मानता है, इसलिये वह कभी किसी अवस्थामें भी क्रियारहित नहीं हो सकता।
दूसरी बात, केवल पुरुषने ही प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ा है। प्रकृतिने पुरुषके साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा है। जहाँ विवेक रहता है, वहाँ पुरुषने विवेककी उपेक्षा करके प्रकृतिसे सम्बन्धकी सद्भावना कर ली अर्थात् सम्बन्धको सत्य मान लिया। सम्बन्धको सत्य माननेसे ही बन्धन हुआ है। वह सम्बन्ध दो तरहका होता है—अपनेको शरीर मानना और शरीरको अपना मानना। अपनेको शरीर माननेसे 'अहंता' और शरीरको अपना माननेसे 'ममता' होती है। इस अहंता-ममतारूप सम्बन्धका घनिष्ठ होना ही देहधारीका स्वरूप है। ऐसा देहधारी मनुष्य कर्मोंको सर्वथा नहीं छोड़ सकता।
'यस्तु* कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते'—जो किसी भी कर्म और फलके साथ अपना सम्बन्ध नहीं रखता, वही त्यागी है। जबतक मनुष्य कुशल-अकुशलके साथ, अच्छे-मन्देके साथ अपना सम्बन्ध रखता है, तबतक वह त्यागी नहीं है।
यह पुरुष जिस प्राकृत क्रिया और पदार्थको अपना मानता है, उसमें उसकी प्रियता हो जाती है। उसी प्रियताका नाम है—आसक्ति। यह आसक्ति ही वर्तमानके कर्मोंको लेकर 'कर्मसक्ति' और भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छाको लेकर 'फलासक्ति' कहलाती है। जब मनुष्य फल-त्यागका उद्देश्य बना लेता है, तब उसके सब कर्म
संसारके हितके लिये होने लगते हैं, अपने लिये नहीं। कारण कि उसको यह बात अच्छी तरहसे समझमें आ जाती है कि कर्म करनेकी सब-की-सब सामग्री संसारसे मिली है और संसारकी ही है, अपनी नहीं। इन कर्मोंका भी आदि और अन्त होता है तथा उनका फल भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है; परन्तु स्वयं सदा निर्विचार रहता है; न उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है और न कभी विकृत ही होता है। ऐसा विवेक होनेपर फलेच्छाका त्याग सुगमतासे हो जाता है। फलका त्याग करनेमें उस विवेकी मनुष्यमें कभी अभिमान भी नहीं आता; क्योंकि कर्म और उसका फल—दोनों ही अपनेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रहे हैं; अतः उनके साथ हमारा सम्बन्ध वास्तवमें है ही कहाँ? इसीलिये भगवान् कहते हैं कि जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी कहा जाता है।
निर्विचारका विकारी कर्मफलके साथ सम्बन्ध कभी था नहीं, है नहीं, हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं है। केवल अविवेकके कारण सम्बन्ध माना हुआ था। उस अविवेकके मिटनेसे मनुष्यकी अभिधा अर्थात् उसका नाम 'त्यागी' हो जाता है—'स त्यागीत्यभिधीयते।'
माने हुए सम्बन्धके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक बात कही जाती है। एक व्यक्ति घर-परिवारको छोड़कर सच्चे हृदयसे साधु-संन्यासी हो जाता है तो उसके बाद घरवालोंकी कितनी ही उन्नति अथवा अवनति हो जाय अथवा सब-के-सब मर जायें, उनका नामोनिशान भी न रहे, तो भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता। इसमें विचार करें कि उस व्यक्तिका परिवारके साथ जो सम्बन्ध था, वह दोनों तरफसे माना हुआ था अर्थात् वह परिवारको अपना मानता था और परिवार उसको अपना मानता था। परन्तु पुरुष और प्रकृतिका सम्बन्ध केवल पुरुषकी तरफसे माना हुआ है, प्रकृतिकी तरफसे माना हुआ नहीं! जब दोनों तरफसे माना हुआ (व्यक्ति और परिवारका) सम्बन्ध भी एक तरफसे छोड़नेपर छूट जाता है, तब केवल एक तरफसे माना हुआ (पुरुष और प्रकृतिका) सम्बन्ध छोड़नेपर छूट जाय, इसमें कहना ही क्या है!
- यहाँ 'तु' अव्ययका प्रयोग करनेका तात्पर्य है कि जो सामान्य संसारी पुरुष हैं, उनकी अपेक्षा कर्मफलका त्याग करनेवाला पुरुष श्रेष्ठ है, विलक्षण है। कारण कि उसका उद्देश्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करनेका अर्थात् अपना कल्याण करनेका होता है।
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
१११७
परिशिष्ट भाव—यह श्लोक कर्मयोगकी दृष्टिसे कहा गया है। कर्मयोगमें कर्मफलकी इच्छाका त्याग होता है और ज्ञानयोगमें कर्तृत्वाभिमानका त्याग होता है।
‘कर्मफलत्याग’ का तात्पर्य है—कर्मफलकी इच्छाका त्याग। कारण कि कर्मफलका त्याग हो ही नहीं सकता, जैसे—शरीर भी कर्मफल है, फिर उसका त्याग कैसे होगा ? भोजन करनेपर तृप्तिका त्याग कैसे होगा ! खेती करनेपर अन्नका त्याग कैसे होगा ? अतः साधकको कर्मफलकी इच्छाका त्याग करना है। फलेच्छाका त्याग करनेसे साधक सुखी-दुःखी नहीं होगा। इसलिये गीतामें फलेच्छाके त्यागको ही फलका त्याग कहा गया है।
बाहरका त्याग वास्तवमें त्याग नहीं है, प्रत्युत भीतरका त्याग ही त्याग है। अगर कोई बाहरसे त्याग करके एकान्तमें चला जाय तो भी संसारका बीज शरीर तो उसके साथ है ही। मरनेवालेका अपने शरीरसहित सब वस्तुओंका त्याग हो जाता है, पर उससे मुक्ति नहीं होती। अतः हमारी कामना-ममता-आसक्ति ही बाँधनेवाले हैं, संसार नहीं। इसलिये अपने लिये कुछ न करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है—‘यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’ (गीता ४।२३)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि कर्मफलका त्याग करनेवाला ही वास्तवमें त्यागी है। अगर मनुष्य कर्मफलका त्याग न करे तो क्या होता है—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्॥ १२॥
अत्यागिनाम् = कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको
कर्मणः = कर्मोंका
इष्टम् = इष्ट,
अनिष्टम् = अनिष्ट
च = और
मिश्रम् = मिश्रित—
त्रिविधम् = (ऐसे) तीन प्रकारका
फलम् = फल
प्रेत्य = मरनेके बाद (भी)
भवति = होता है;
तु = परन्तु
सन्न्यासिनाम् = कर्मफलका त्याग करनेवालोंको
क्वचित् = कहीं भी
न = नहीं होता।
व्याख्या—‘अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्’—कर्मका फल तीन तरहका होता है—इष्ट, अनिष्ट और मिश्र। जिस परिस्थितिको मनुष्य चाहता है, वह ‘इष्ट’ कर्मफल है, जिस परिस्थितिको मनुष्य नहीं चाहता, वह ‘अनिष्ट’ कर्मफल है और जिसमें कुछ भाग इष्टका तथा कुछ भाग अनिष्टका है, वह ‘मिश्र’ कर्मफल है। वास्तवमें देखा जाय तो संसारमें प्रायः मिश्रित ही फल होता है; जैसे—धन होनेसे अनुकूल (इष्ट) और प्रतिकूल (अनिष्ट)—दोनों ही स्थितियाँ आती हैं; धनसे निर्वाह होता है—यह अनुकूलता है और टैक्स लगता है, धन नष्ट हो जाता है, छिन जाता है—यह प्रतिकूलता है। तात्पर्य है कि इष्टमें भी आंशिक अनिष्ट और अनिष्टमें भी आंशिक इष्ट रहता ही है। कारण कि सम्पूर्ण संसार त्रिगुणात्मक है (गीता—अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक); यहाँ जन्म भी दुःखालय (आठवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक) और सुखरहित (नवें अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक) है। अतः चाहे इष्ट (अनुकूल) परिस्थिति हो, चाहे अनिष्ट (प्रतिकूल) परिस्थिति हो, वह सर्वथा अनुकूल या प्रतिकूल होती ही नहीं। यहाँ इष्ट और अनिष्ट कहनेका मतलब यह है कि इष्टमें अनुकूलताकी और अनिष्टमें प्रतिकूलताकी प्रधानता होती है। वास्तवमें कर्मोंका फल मिश्रित ही होता है; क्योंकि कोई भी कर्म सर्वथा निर्दोष नहीं होता (अठारहवें अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक)।
‘भवत्यत्यागिनां प्रेत्य’—उपर्युक्त सभी फल अत्यागियोंको अर्थात् फलकी इच्छा रखकर कर्म करनेवालोंको ही मिलते हैं, सन्न्यासियोंको नहीं। कारण कि जितने भी कर्म होते हैं, वे सब प्रकृतिके द्वारा अर्थात् प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिके द्वारा ही होते हैं तथा फलरूप परिस्थिति भी प्रकृतिके द्वारा ही बनती है। इसलिये कर्मोंका और उनके फलोंका सम्बन्ध केवल प्रकृतिके साथ है, ‘स्वयं’-(चेतनस्वरूप-) के साथ नहीं। परन्तु जब ‘स्वयं’ उनसे सम्बन्ध तोड़ लेता है, तो फिर वह भोगी नहीं बनता, प्रत्युत त्यागी हो जाता है।
अत्यागीका मतलब है—पीछेके दो (दसवें-ग्यारहवें)
१११८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
श्लोकोंमें जिन त्यागियोंकी बात आयी है, उनके समान जो त्यागी नहीं है अर्थात् जिन्होंने कर्मफलका त्याग नहीं किया है, ऐसे अत्यागी मनुष्योंके सामने इष्ट, अनिष्ट और मिश्र—तीनों कर्मफल अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें आते रहते हैं, जिनसे वे सुखी-दुःखी होते रहते हैं। उनसे सुखी-दुःखी होना ही वास्तवमें बन्धन है।
वास्तवमें अनुकूलतासे सुखी होना ही प्रतिकूलतामें दुःखी होनेका कारण है; क्योंकि परिस्थितिजन्य सुख भोगनेवाला कभी दुःखसे बच ही नहीं सकता। जबतक वह सुख भोगता रहेगा, तबतक वह प्रतिकूल परिस्थितियोंमें दुःखी होता ही रहेगा। चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग आदि उसको कभी छोड़ नहीं सकते और वह भी इनसे कभी छूट नहीं सकता।
‘प्रेत्य भवति ’ कहनेका तात्पर्य है कि जो कर्म-फलके त्यागी नहीं हैं, उनको इष्ट, अनिष्ट और मिश्र—ये तीनों कर्मफल मरनेके बाद जरूर मिलते हैं। परन्तु इसके साथ ‘न तु सन्यासिनां क्वचित् ’ पदोंमें कहा गया है कि जो कर्मफलके त्यागी हैं, उनको कहीं भी अर्थात् यहाँ और मरनेके बाद भी कर्मफल नहीं मिलता। इससे सिद्ध होता है कि अत्यागियोंको मरनेके बाद तो कर्मफल मिलता ही है, पर यहाँ जीते-जी भी कर्मफल मिल सकता है।
‘न तु सन्यासिनां क्वचित् ’—संन्यासियों—(त्यागियों—) को कहीं भी अर्थात् इस लोकमें या परलोकमें, इस जन्ममें या मरनेके बाद भी कर्मफल भोगना नहीं पड़ता। हाँ, पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार इस जन्ममें उनके सामने अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति तो आती है, पर वे अपने विवेकके बलसे उन परिस्थितियोंके भोगी नहीं बनते, उनसे सुखी-दुःखी नहीं होते अर्थात् सर्वथा निलिप्त रहते हैं।
संन्यासियों अर्थात् त्यागियोंको फल क्यों नहीं भोगना पड़ता? कारण कि वे अपने लिये कुछ भी नहीं करते। उनको अच्छी तरहसे यह विवेक हो जाता है कि अपना जो सत्स्वरूप है, उसके लिये किसी भी क्रिया और वस्तुकी आवश्यकता है ही नहीं। अपने लिये पानेकी इच्छासे साधक कुछ भी करता है तो वह अपने व्यक्तित्वको ही स्थिर रखता है; क्योंकि वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग मानता है। जब वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग नहीं मानता अर्थात् सबके हितमें ही अपना हित मानता है, तब वह स्वतः ‘सर्वभूतहिते रताः ’ हो जाता है। फिर उसके स्थूलशरीरसे होनेवाली
क्रियाएँ, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला परहित-चिन्तन और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरता—तीनों ही संसारके मात्र प्राणियोंके हितके लिये होती हैं। कारण कि शरीर आदि सब-की-सब सामग्री संसारसे अभिन्न है। उस सामग्रीसे अपना हित चाहता है—यही गलती होती है, जो कि अपनी परिच्छिन्नतामें हेतु है।
यहाँ ‘सन्यासिनाम् ’ पदमें त्यागी (कर्मयोगी) और संन्यासी (सांख्ययोगी)—दोनोंकी एकता की गयी है; जैसे—कर्मयोगी कर्मोंसे असंग रहता है तो सांख्ययोगी भी कर्मोंसे सर्वथा निलिप्त रहता है। कर्मयोगी (निष्कामभावसे) कर्म करते हुए भी फलके साथ सम्बन्ध नहीं रखता तो सांख्ययोगी कर्ममात्रके साथ किंचित् भी सम्बन्ध नहीं रखता। कर्मयोगी फलसे सम्बन्ध-विच्छेद करता है अर्थात् ममताका त्याग करता है तो सांख्ययोगी कर्तृत्वाभिमान अर्थात् अहंताका त्याग करता है। ममताका त्याग होनेपर अहंताका भी स्वतः त्याग हो जाता है और अहंताका त्याग होनेपर ममताका भी स्वतः त्याग हो जाता है। इसलिये भगवान्ने कर्मयोगमें ममताके त्यागके बाद अहंताका त्याग बताया है—‘निर्मयो निर्हंकारः ’ (२।७१) और सांख्ययोगमें अहंताके त्यागके बाद ममताका त्याग बताया है—‘अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः ’ (१८।५३)। इन दोनोंकी इस त्याग करनेकी प्रक्रियामें तो फरक है; परन्तु परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिका कार्य—इनमेंसे किसीके भी साथ इन दोनोंका सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् तत्त्वमें कर्मयोगी और सांख्ययोगी—दोनों एक हो जाते हैं।
पहले अर्जुनने यह पूछा था कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ; अतः भगवान्ने यहाँ ‘सन्यासिनाम् ’ पदसे दोनोंका यह तत्त्व बताया कि कर्मयोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है, अपने लिये कुछ नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ नहीं करना है। ऐसे ही सांख्ययोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है और अपने लिये कुछ नहीं चाहिये। सांख्ययोगी प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध नहीं मानता, इसलिये उसके लिये ‘अपने लिये कुछ नहीं करना है’—यह कहना ही नहीं बनता।
यहाँ ‘त्यागिनाम् ’ पद न देकर ‘सन्यासिनाम् ’ पद देनेका यह तात्पर्य है कि जो निलिप्तता सांख्ययोगसे होती है, वही निलिप्तता त्यागसे अर्थात् कर्मयोगसे भी होती है (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। दूसरी बात,
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
११११
यहाँतक भगवान्ने कर्मयोगसे निर्लिप्तता बतायी, अब ‘सन््यासिनाम् ’ पद कहकर आगे सांख्ययोगसे निर्लिप्तता बतानेका बीज भी डाल देते हैं।
कर्म-सम्बन्धी विशेष बात
पुरुष और प्रकृति—ये दो हैं। इनमेंसे पुरुषमें कभी परिवर्तन नहीं होता और प्रकृति कभी परिवर्तनरहित नहीं होती। जब यह पुरुष प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब प्रकृतिकी क्रिया पुरुषका ‘कर्म’ बन जाती है; क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे तादात्म्य हो जाता है। तादात्म्य होनेसे जो प्राकृत वस्तुएँ प्राप्त हैं, उनमें ममता होती है और उस ममताके कारण अप्राप्त वस्तुओंकी कामना होती है। इस प्रकार जबतक कामना, ममता और तादात्म्य रहता है, तबतक जो कुछ परिवर्तनरूप क्रिया होती है, उसका नाम ‘कर्म’ है।
तादात्म्यके टूटनेपर वही कर्म पुरुषके लिये ‘अकर्म’ हो जाता है अर्थात् वह कर्म क्रियामात्र रह जाता है, उसमें फलजनकता नहीं रहती—यह ‘कर्ममें अकर्म’ है। अकर्म-अवस्थामें अर्थात् स्वरूपका अनुभव होनेपर उस महापुरुषके शरीरसे जो क्रिया होती रहती है, वह ‘अकर्ममें कर्म’ है (गीता—चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि अपने निर्लिप्त स्वरूपका अनुभव न होनेपर भी वास्तवमें सब क्रियाएँ प्रकृति और उसके कार्य शरीरमें होती हैं; परन्तु प्रकृति या शरीरसे अपनी पृथक्ताका अनुभव न होनेसे वे क्रियाएँ ‘कर्म’ बन जाती हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सताईसवाँ और तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)।
कर्म तीन तरहके होते हैं—क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध। अभी वर्तमानमें जो कर्म किये जाते हैं, वे ‘क्रियमाण ’ कर्म कहलाते हैं*। वर्तमानसे पहले इस जन्ममें किये हुए अथवा पहलेके अनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म संगृहीत हैं, वे ‘संचित ’ कर्म कहलाते हैं। संचितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये प्रस्तुत (उन्मुख) हो गये हैं अर्थात् जन्म, आयु और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें परिणत होनेके लिये सामने आ गये हैं, वे ‘प्रारब्ध ’ कर्म कहलाते हैं।
- जो भी नये कर्म और उनके संस्कार बनते हैं, वे सब केवल मनुष्यजन्ममें ही बनते हैं (गीता—चौथे अध्यायका बारहवाँ और पन्द्रहवें अध्यायका दूसरा श्लोक), पशु-पक्षी आदि योनियोंमें नहीं; क्योंकि वे योनियाँ केवल कर्मफल-भोगके लिये ही मिलती हैं।
क्रियमाण कर्म
क्रियमाण कर्म
graph TD
A[क्रियमाण कर्म] --> B[फल-अंश]
A --> C[संस्कार-अंश]
B --> D[दृष्ट]
B --> E[अदृष्ट]
D --> F[तात्कालिक]
D --> G[कालान्तरिक]
E --> H[लौकिक]
E --> I[पारलौकिक]
C --> J[शुद्ध]
C --> K[अशुद्ध]
क्रियमाण कर्म दो तरहके होते हैं—शुभ और अशुभ। जो कर्म शास्त्रानुसार विधि-विधानसे किये जाते हैं, वे शुभकर्म कहलाते हैं और काम, क्रोध, लोभ, आसक्ति आदिको लेकर जो शास्त्र-निषिद्ध कर्म किये जाते हैं, वे अशुभकर्म कहलाते हैं।
शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक क्रियमाण कर्मका एक तो फल-अंश बनता है और एक संस्कार-अंश। ये दोनों भिन्न-भिन्न हैं।
क्रियमाण कर्मके फल-अंशके दो भेद हैं—दृष्ट और अदृष्ट। इनमेंसे दृष्टके भी दो भेद होते हैं—तात्कालिक और कालान्तरिक। जैसे, भोजन करते हुए जो रस आता है, सुख होता है, प्रसन्नता होती है और तृप्ति होती है—यह दृष्टका ‘तात्कालिक’ फल है और भोजनके परिणाममें आयु, बल, आरोग्य आदिका बढ़ना—यह दृष्टका ‘कालान्तरिक’ फल है। ऐसे ही जिसका अधिक मिर्च खानेका स्वभाव है, वह जब अधिक मिर्चवाले पदार्थ खाता है, तब उसको प्रसन्नता होती है, सुख होता है और मिर्चकी तीक्ष्णताके कारण मुँहमें, जीभमें जलन होती है, आँखोंसे और नाकसे पानी निकलता है, सिरसे पसीना निकलता है—यह दृष्टका ‘तात्कालिक’ फल है और कुपथ्यके कारण परिणाममें पेटमें जलन और रोग, दुःख आदिका होना—यह दृष्टका ‘कालान्तरिक’ फल है।
इसी प्रकार अदृष्टके भी दो भेद होते हैं—लौकिक और पारलौकिक। जीते-जी ही फल मिल जाय—इस भावसे यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, मन्त्र-जप आदि शुभकर्मोंको
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
विधि-विधानसे किया जाय और उसका कोई प्रबल प्रतिबन्ध न हो तो यहाँ ही पुत्र, धन, यश, प्रतिष्ठा आदि अनुकूलकी प्राप्ति होना और रोग, निर्धनता आदि प्रतिकूलकी निवृत्ति होना—यह अदृष्टका 'लौकिक' फल है' और मरनेके बाद स्वर्ग आदिकी प्राप्ति हो जाय—इस भावसे यथार्थ विधि-विधान और श्रद्धा-विश्वासपूर्वक जो यज्ञ, दान, तप आदि शुभकर्म किये जायँ तो मरनेके बाद स्वर्ग आदि लोकोकी प्राप्ति होना—यह अदृष्टका 'पारलौकिक' फल है। ऐसे ही डाका डालने, चोरी करने, मनुष्यकी हत्या करने आदि अशुभकर्मोंका फल यहाँ ही कैद, जुर्माना, फाँसी आदि होना—यह अदृष्टका 'लौकिक' फल है और पापोंके कारण मरनेके बाद नरकोंमें जाना और पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि बनना—यह अदृष्टका 'पारलौकिक' फल है। पाप-पुण्यके इस लौकिक और पारलौकिक फलके विषयमें एक बात और समझनेकी है कि जिन पापकर्मोंका फल यहाँ कैद, जुर्माना, अपमान, निन्दा आदिके रूपमें
भोग लिया है, उन पापोंका फल मरनेके बाद भोगना नहीं पड़ेगा। परन्तु व्यक्तिके पाप कितनी मात्राके थे और उनका भोग कितनी मात्रामें हुआ अर्थात् उन पापकर्मोंका फल उसने पूरा भोगा या अधूरा भोगा—इसका पूरा पता मनुष्यको नहीं लगता; क्योंकि मनुष्यके पास इसका कोई माप-तौल नहीं है। परन्तु भगवान्को इसका पूरा पता है; अतः उनके कानूनके अनुसार उन पापोंका फल यहाँ जितने अंशमें कम भोगा गया है, उतना इस जन्ममें या मरनेके बाद भोगना ही पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये कि मेरा पाप तो कम था, पर दण्ड अधिक भोगना पड़ा अथवा मैंने पाप तो किया नहीं, पर दण्ड मुझे मिल गया! कारण कि यह सर्वज्ञ, सर्वसुहृद, सर्वसमर्थ भगवान्का विधान है कि पापसे अधिक दण्ड कोई नहीं भोगता और जो दण्ड मिलता है, वह किसी-न-किसी पापका ही फल होता है।
इसी तरह धन-सम्पत्ति, मान, आदर, प्रशंसा, नीरोगता
१-यहाँ दृष्टका 'कालान्तरिक' फल और अदृष्टका 'लौकिक' फल—दोनों फल एक समान ही दीखते हैं, फिर भी दोनोंमें अन्तर है। जो 'कालान्तरिक' फल है, वह सीधे मिलता है, प्रारब्ध बनकर नहीं; परन्तु जो 'लौकिक' फल है, वह प्रारब्ध बनकर ही मिलता है।
२-एक सुनी हुई घटना है। किसी गाँवमें एक सज्जन रहते थे। उनके घरके सामने एक सुनारका घर था। सुनारके पास सोना आता रहता था और वह गढ़कर देता रहता था। ऐसे वह पैसे कमाता था। एक दिन उसके पास अधिक सोना जमा हो गया। रात्रिमें पहरा लगानेवाले सिपाहीको इस बातका पता लग गया। उस पहरेदारने रात्रिमें उस सुनारको मार दिया और जिस बक्समें सोना था, उसे उठाकर चल दिया। इसी बीच सामने रहनेवाले सज्जन लघुशंकाके लिये उठकर बाहर आये। उन्होंने पहरेदारको पकड़ लिया कि तू इस बक्सको कैसे ले जा रहा है? तो पहरेदारने कहा—'तू चुप रह, हल्ला मत कर। इसमेंसे कुछ तू ले ले और कुछ मैं ले लूँ।' सज्जन बोले—'मैं कैसे ले लूँ? मैं चोर थोड़े ही हूँ।' पहरेदारने कहा—'देख, तू समझ जा, मेरी बात मान ले, नहीं तो दुःख पायेगा।' पर वे सज्जन माने नहीं। तब पहरेदारने बक्सा नीचे रख दिया और उस सज्जनको पकड़कर जोरसे सीटी बजा दी। सीटी सुनते ही और जगह पहरा लगानेवाले सिपाही दौड़कर वहाँ आ गये। उसने सबसे कहा कि 'यह इस घरसे बक्सा लेकर आया है और मैंने इसको पकड़ लिया है।' तब सिपाहियोंने घरमें घुसकर देखा कि सुनार मरा पड़ा है। उन्होंने उस सज्जनको पकड़ लिया और राजकीय आदमियोंके हवाले कर दिया। जजके सामने बहस हुई तो उस सज्जनने कहा कि 'मैंने नहीं मारा है, उस पहरेदार सिपाहीने मारा है।' सब सिपाही आपसमें मिले हुए थे, उन्होंने कहा कि 'नहीं इसीने मारा है, हमने खुद रात्रिमें इसे पकड़ा है।' इत्यादि।
मुकदमा चला। चलते-चलते अन्तमें उस सज्जनके लिये फाँसीका हुक्म हुआ। फाँसीका हुक्म होते ही उस सज्जनके मुखसे निकला—'देखो, सरासर अन्याय हो रहा है! भगवान्के दरबारमें कोई न्याय नहीं! मैंने मारा नहीं, मुझे दण्ड हो और जिसने मारा है, वह बेदाग छूट जाय, जुर्माना भी नहीं; यह अन्याय है।' जजपर उसके वचनोंका असर पड़ा कि वास्तवमें यह सच्चा बोल रहा है, इसकी किसी तरहसे जाँच होनी चाहिये। ऐसा विचार करके उस जजने एक षड्यन्त्र रचा।
सुबह होते ही एक आदमी रोता-चिल्लाता हुआ आया और बोला—'हमारे भाईकी हत्या हो गयी, सरकार! इसकी जाँच होनी चाहिये।' तब जजने उसी सिपाहीको और कैदी सज्जनको मरे व्यक्तिकी लाश उठाकर लानेके लिये भेजा। दोनों उस आदमीके साथ वहाँ गये, जहाँ लाश पड़ी थी। खाटपर लाशके ऊपर कपड़ा बिछा था। खून बिखरा पड़ा था। दोनोंने उस खाटको उठाया और उठाकर ले चले। साथका दूसरा आदमी खबर देनेके बहाने दौड़कर आगे चला गया। तब चलते-चलते सिपाहीने कैदीसे कहा—'देख, उस दिन तू मेरी बात मान लेता तो सोना मिल जाता और फाँसी भी नहीं होती, अब देख लिया सच्चाईका फल?' कैदीने कहा—'मैंने तो अपना काम सच्चाईका ही किया था, फाँसी हो गयी तो हो गयी! हत्या की तूने और दण्ड भोगना पड़ा मेरेको! भगवान्के यहाँ न्याय नहीं!'
खाटपर झूठमूठ मरे हुएके समान पड़ा हुआ आदमी उन दोनोंकी बातें सुन रहा था। जब जजके सामने खाट रखी गयी
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
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आदि अनुकूल परिस्थितिके रूपमें पुण्य-कर्मोंका जितना फल यहाँ भोग लिया है, उतना अंश तो यहाँ नष्ट हो ही गया और जितना बाकी रह गया है, वह परलोकमें फिर भोगा जा सकता है। यदि पुण्यकर्मोंका पूरा फल यहाँ भोग लिया गया है तो पुण्य यहींपर समाप्त हो जायेंगे।
क्रियमाण-कर्मके संस्कार-अंशके भी दो भेद हैं—शुद्ध एवं पवित्र संस्कार और अशुद्ध एवं अपवित्र संस्कार। शास्त्रविहित कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं, वे शुद्ध एवं पवित्र होते हैं और शास्त्र, नीति, लोकमर्यादाके विरुद्ध कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं, वे अशुद्ध एवं अपवित्र होते हैं।
इन दोनों शुद्ध और अशुद्ध संस्कारोंको लेकर स्वभाव (प्रकृति, आदत) बनता है। उन संस्कारोंमेंसे अशुद्ध अंशका सर्वथा नाश करनेपर स्वभाव शुद्ध, निर्मल, पवित्र हो जाता है; परन्तु जिन पूर्वकृत कर्मोंसे स्वभाव बना है, उन कर्मोंकी भिन्नताके कारण जीवन्मुक्त पुरुषोंके स्वभावोंमें भी भिन्नता रहती है। इन विभिन्न स्वभावोंके कारण ही उनके द्वारा विभिन्न कर्म होते हैं, पर वे कर्म दोषी नहीं होते, प्रत्युत सर्वथा शुद्ध होते हैं और उन कर्मोंसे दुनियाका कल्याण होता है।
तो खूनभरे पकड़ोंको हटाकर वह उठ खड़ा हुआ और उसने सारी बात जजको बता दी कि रास्तेमें सिपाही यह बोला और कैदी यह बोला। यह सुनकर जजको बड़ा आश्चर्य हुआ। सिपाही भी हल्का-बल्का रह गया। सिपाहीको पकड़कर कैद कर लिया गया। परन्तु जजके मनमें सन्तोष नहीं हुआ। उसने कैदीको एकान्तमें बुलाकर कहा कि 'इस मामलेमें तो मैं तुम्हें निर्दोष मानता हूँ, पर सच-सच बताओ कि इस जन्ममें तुमने कोई हत्या की है क्या?' वह बोला—बहुत पहलेकी घटना है। एक दुष्ट था, जो छिपकर मेरे घर मेरी स्त्रीके पास आया करता था। मैंने अपनी स्त्रीको तथा उसको अलग-अलग खूब समझाया। पर वह माना नहीं। एक रात वह घरपर था और अचानक मैं आ गया। मेरेको गुस्सा आया हुआ था। मैंने तलवारसे उसका गला काट दिया और घरके पीछे जो नदी है, उसमें फेंक दिया। इस घटनाका किसीको पता नहीं लगा। यह सुनकर जज बोला—तुम्हारेको इस समय फाँसी होगी ही; मैंने भी सोचा कि मैंने किसीसे घूस (रिश्त) नहीं खाया, कभी बेईमानी नहीं की, फिर मेरे हाथसे इसके लिये फाँसीका हुक्म लिखा कैसे गया? अब सन्तोष हुआ। उसी पापका फल तुम्हें यह भोगना पड़ेगा। सिपाहीको अलग फाँसी होगी।'
[ उस सज्जनेने चोर सिपाहीको पकड़कर अपने कर्तव्यका पालन किया था। फिर उसको जो दण्ड मिला है, वह उसके कर्तव्य-पालनका फल नहीं है, प्रत्युत उसने बहुत पहले जो हत्या की थी, उस हत्याका फल है। कारण कि मनुष्यको अपनी रक्षा करनेका अधिकार है, मारनेका अधिकार नहीं। मारनेका अधिकार रक्षक क्षत्रियका, राजाका है। अतः कर्तव्यका पालन करनेके कारण उस पाप-(हत्या-) का फल उसको यहाँ मिल गया और परलोकके भयंकर दण्डसे उसका छुटकारा हो गया। कारण कि इस लोकमें जो दण्ड भोग लिया जाता है, उसका थोड़ेंमें ही छुटकारा हो जाता है, थोड़ेंमें ही शुद्ध हो जाती है, नहीं तो परलोकमें बड़ा भयंकर (व्याजसहित) दण्ड भोगना पड़ता है।]
इस कहानीसे यह पता लगता है कि मनुष्यके कब किये हुए पापका फल कब मिलेगा—इसका कुछ पता नहीं। भगवान्का विधान विचित्र है। जबतक पुराने पुण्य प्रबल रहते हैं, तबतक उग्र पापका फल भी तत्काल नहीं मिलता। जब पुराने पुण्य खत्म होते हैं, तब उस पापकी बारी आती है। पापका फल (दण्ड) तो भोगना ही पड़ता है, चाहे इस जन्ममें भोगना पड़े या जन्मान्तरमें।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। नाभूक्तं क्षीयते कर्म जन्मकोटिशतैरपि॥
- व्याघ्रस्तुष्यति कानने सुगहनां सिंहो गुहां सेवते हंसो वाज्छति पञ्चिनीं कुसुमितां गृध्रः श्मशाने स्थले।
साधुः सत्कृतिसाधुमेव भजते नीचोऽपि नीचं जनं या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते॥
'व्याघ्र घने वनमें संतुष्ट रहता है, सिंह गहन गुफाका सेवन करता है, हंस खिली हुई कमलिनियों चाहता है, ग्रीध्र श्मशान-भूमिमें रहना पसंद करता है, सज्जन पुरुष अच्छे आचरणोंवाले सज्जन पुरुषोंमें और नीच पुरुष नीच लोगोंमें ही रहना चाहते हैं। सच है, स्वभावसे पैदा हुई जिसकी जैसी प्रकृति है, उस प्रकृतिको कोई नहीं छोड़ता।