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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1078

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०७७

और यज्ञके फलके साथ कर्ताका सम्बन्ध नहीं होगा। गीता कहती है—'कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि' (५।११) अर्थात् करण (शरीर, इन्द्रियाँ आदि) उपकरण (यज्ञ करनेमें उपयोगी सामग्री) और अधिकरण (स्थान) आदि किसीके भी साथ हमारा सम्बन्ध न हो।

यज्ञकी क्रियाका आरम्भ होता और समाप्ति होती है। ऐसे ही उसके फलका भी आरम्भ होता और समाप्ति होती है। क्रिया और फल दोनों उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाले हैं और स्वयं (आत्मा) नित्य-निरन्तर रहनेवाला है; परन्तु यह (स्वयं) क्रिया और फलके साथ अपना

सम्बन्ध मान लेता है। इस माने हुए सम्बन्धको यह जबतक नहीं छोड़ता, तबतक यह जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ा रहता है—'फले सक्तो निबध्यते' (गीता ५।१२)।

एक विलक्षण बात है कि गीतामें जो सत्त्वगुण कहा है, वह संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्माकी तरफ ले जानेवाला होनेसे 'सत्' अर्थात् निर्गुण हो जाता है*। दैवी-सम्पत्तिमें भी जितने गुण हैं, वे सब सात्त्विक ही हैं। परन्तु दैवी-सम्पत्तिवाला तभी परमात्माको प्राप्त होगा, जब वह सत्त्वगुणसे ऊँचा उठ जायगा अर्थात् जब गुणोंके संगसे सर्वथा रहित हो जायगा।

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥ १२॥

तु = परन्तु भरतश्रेष्ठ = हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! यत् = जो फलम् = फलकी अभिसन्धाय = इच्छाको लेकर एव = ही इज्यते = किया जाता है च = अथवा दम्भार्थम् = दम्भ (दिखावटीपन)-के लिये अपि = भी (किया जाता है), तम् = उस यज्ञम् = यज्ञको (तुम) राजसम् = राजस विद्धि = समझो।

व्याख्या—'अभिसन्धाय तु फलम्'—फल अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिकी कामना रखकर जो यज्ञ किया जाता है, वह राजस हो जाता है। 'इस लोकमें हमें धन-वैभव मिले; स्त्री-पुत्र, परिवार अच्छा मिले; नौकर-चाकर, गाय-भैंस आदि भी हमारे अनुकूल मिलें; हमारा शरीर नीरोग रहे; हमारा आदर-सत्कार, मान-बड़ाई, प्रसिद्धि हो जाय तथा मरनेके बाद भी हमें स्वर्गादि लोकोंके दिव्य भोग मिलें' आदि इष्टकी प्राप्तिकी कामनाएँ हैं।

  • श्रीमद्भागवतमें एकादश स्कन्धके पचीसवें अध्यायमें जहाँ तामस, राजस और सात्त्विक—इन तीन गुणोंका वर्णन हुआ है, वहाँ उनके साथ एक 'निर्गुण' और कहा है। परन्तु गीतामें तीन ही गुण कहे गये हैं। जब दोनोंके वक्ता भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, तो फिर ऐसा भेद क्यों? गीताका जो सात्त्विक भाव है, उसमें भगवान्ने 'यष्टव्यम्' (१७।११), 'दातव्यम्' (१७।२०), 'कार्यमित्येव' (१८।९) आदि पद कहे हैं। इन्हें कहनेका तात्पर्य यह है कि जिस कर्ताका 'यज्ञ करनामात्र, दान देनामात्र और कर्तव्य करनामात्र' उद्देश्य रहता है, उसका कर्म और कर्मफलके साथ प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् सात्त्विक यज्ञ, दान आदि भी 'निर्गुण' हो जाते हैं। सत्रहवें अध्यायके अन्तमें परमात्माके तीन नामों 'ॐ, तत्, सत्' के वर्णनमें 'सत्' शब्दकी व्याख्या करते हुए भगवान्ने बताया कि उस परमात्माके निमित्त जितने कर्म किये जाते हैं, वे सभी 'सत्' (निर्गुण) हो जाते हैं—'कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते' (१७।२७)। तात्पर्य यह है कि कर्मयोगीका कर्म और कर्मफलके साथ सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे और भक्तियोगीके कर्मोंका भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़नेसे उनके सभी कर्म 'निर्गुण' हो जाते हैं। इस प्रकार दोनों ही बातें एक हीमें आ जानेसे गीतामें निर्गुणका अलग वर्णन नहीं आया है। गीतामें जहाँ सत्त्वगुणको अनामय बताया है, वहाँ सत्त्वगुणसे बन्धन होनेकी बात भी कही है (१४।६) और कहा है कि सत्त्वगुणमें स्थित पुरुष ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं (१४।१८)। इसका तात्पर्य यह है कि बन्धन सत्त्वगुणसे नहीं होता, प्रत्युत उसका संग करनेसे ही बन्धन होता है—'सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ' (१४।६) और 'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (१३।२१)। ऐसे ही सत्त्वगुणमें अपनी स्थिति मानना 'सत्त्वस्थाः' (१४।१८) भी बन्धनकारक है।