श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १७ ]
सम्बन्ध—पहले यजन-पूजन और भोजनके द्वारा जो श्रद्धा बतायी, उससे शास्त्रविधिका अज्ञतापूर्वक त्याग करनेवालोंकी स्वाभाविक निष्ठा—रुचिकी तो पहचान हो जाती है; परन्तु जो मनुष्य व्यापार, खेती आदि जीविकाके कार्य करते हैं अथवा शास्त्रविहित यज्ञादि शुभकर्म करते हैं, उनकी स्वाभाविक रुचिकी पहचान कैसे हो—यह बतानेके लिये यज्ञ, तप और दानके तीन-तीन भेदोंका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
अफलाकाइक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥
| यष्टव्यम्, एव = यज्ञ करना ही | करके | यज्ञः = यज्ञ |
|---|---|---|
| कर्तव्य है | अफलाकाइक्षिभिः=फलेच्छारहित | इज्यते = किया जाता है, |
| इति = —इस तरह | मनुष्योंद्वारा | सः = वह |
| मनः = मनको | यः = जो | सात्त्विकः = सात्त्विक |
| समाधाय = समाधान (सन्तुष्ट) | विधिदृष्टः = शास्त्रविधिसे नियत | है। |
व्याख्या—‘यष्टव्यमेवेति’—जब मनुष्य-शरीर मिल गया और अपना कर्तव्य करनेका अधिकार भी प्राप्त हो गया, तो अपने वर्ण-आश्रममें शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार यज्ञ करनामात्र मेरा कर्तव्य है। ‘एव इति’—ये दो अव्यय लगानेका तात्पर्य है कि इसके सिवाय दूसरा कोई भाव न रखे अर्थात् इस यज्ञसे लोकमें और परलोकमें मेरेको क्या मिलेगा? इससे मेरेको क्या लाभ होगा?—ऐसा भाव भी न रहे, केवल कर्तव्यमात्र रहे।
जब उससे कुछ मिलनेकी आशा ही नहीं रखनी है, तो फिर (फलेच्छाका त्याग करके) यज्ञ करनेकी जरूरत ही क्या है?—इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—‘मनः समाधाय’ अर्थात् ‘यज्ञ करना हमारा कर्तव्य है’ ऐसे मनको समाधान करके यज्ञ करना चाहिये।
‘अफलाकाइक्षिभिः’—मनुष्य फलकी इच्छा रखनेवाला न हो अर्थात् लोक-परलोकमें मेरेको इस यज्ञका अमुक फल मिले—ऐसा भाव रखनेवाला न हो।
‘यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते’—शास्त्रोंमें विधिके विषयमें जैसी आज्ञा दी गयी है, उसके अनुसार ही यज्ञ किया जाय। इस प्रकारसे जो यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक होता है—‘स सात्त्विकः।’
सात्त्विकताका तात्पर्य
सात्त्विकताका क्या तात्पर्य होता है? अब इसपर थोड़ा विचार करें। ‘यष्टव्यम्’*—‘यज्ञ करनामात्र कर्तव्य है’—ऐसा जब उद्देश्य रहता है, तब उस यज्ञके साथ अपना सम्बन्ध नहीं जुड़ता। परन्तु जब कर्तामें ‘वर्तमानमें मान,
आदर, सत्कार आदि मिलें, मरनेके बाद स्वर्गादि लोक मिलें तथा आगेके जन्ममें धनादि पदार्थ मिलें’—इस प्रकारकी इच्छाएँ होंगी, तब उसका उस यज्ञके साथ सम्बन्ध जुड़ जायगा। तात्पर्य है कि फलकी इच्छा रखनेसे ही यज्ञके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। केवल कर्तव्यमात्रका पालन करनेसे उससे सम्बन्ध नहीं जुड़ता, प्रत्युत उससे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और (स्वार्थ तथा अभिमान न रहनेसे) कर्ताकी अहंता शुद्ध हो जाती है।
इसमें एक बड़ी मामिक बात है कि कुछ भी कर्म करनेमें कर्ताका कर्मके साथ सम्बन्ध रहता है। कर्म कर्तासे अलग नहीं होता। कर्म कर्ताका ही चित्र होता है अर्थात् जैसा कर्ता होगा, वैसे ही कर्म होंगे। इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है—‘यो यच्छद्धः स एव सः’ अर्थात् जो जैसी श्रद्धावाला है, वैसा ही उसका स्वरूप होता है और वैसा ही (श्रद्धाके अनुसार) उससे कर्म होता है। तात्पर्य यह है कि कर्ताका कर्मके साथ सम्बन्ध होता है और कर्मके साथ सम्बन्ध होनेसे ही कर्ताका बन्धन होता है। केवल कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे कर्ताका कर्मके साथ सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् कर्ता मुक्त हो जाता है।
केवल कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करना क्या है? अपने लिये कुछ नहीं करना है, सामग्रीके साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है; मेरा देश, काल आदिसे भी कोई सम्बन्ध नहीं है; केवल मनुष्य होनेके नाते जो कर्तव्य प्राप्त हुआ है, उसको कर देना है—ऐसा भाव होनेसे कर्ता फलाकांक्षी नहीं होगा और कर्माका फल कर्ताको बाँधेगा नहीं अर्थात् यज्ञकी क्रिया
- जो करनेयोग्य है, जो अपनी सामर्थ्यके अनुरूप है, जिसे अवश्य करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि अवश्य होती है, वह ‘कर्तव्य’ होता है। वही कर्तव्य यज्ञमें ‘यष्टव्य’ और दानमें ‘दातव्य’ है।