श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1062, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः
अवतरणिका—
सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भगवान्ने शास्त्रविधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करनेवाले पुरुषोंको सिद्धि, सुख और परमगति न मिलनेकी बात कही। यह सुननेपर अर्जुनके मनमें आया कि शास्त्रविधिको ठीक-ठीक जाननेवाले लोग तो बहुत कम हैं। अधिक संख्यामें ऐसे ही लोग हैं, जो शास्त्रविधिको तो जानते नहीं, पर अपनी कुल-परम्परा, वर्ण, आश्रम, संस्कार आदिके अनुसार देवता आदिका श्रद्धापूर्वक यजन (पूजन) करते हैं। शास्त्रविधिका त्याग होनेसे ऐसे पुरुषोंकी नीची (आसुरी) स्थिति होनी चाहिये और श्रद्धा होनेसे ऊँची (दैवी) स्थिति होनी चाहिये। इसलिये वास्तवमें उनकी क्या स्थिति है—यह जाननेके लिये अर्जुन पहले श्लोकमें प्रश्न करते हैं१।
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥
अर्जुन बोले—
| कृष्ण | = हे कृष्ण ! | यजन्ते | = (देवता आदिका) | का | = कौन-सी है ? |
|---|---|---|---|---|---|
| ये | = जो मनुष्य | पूजन करते हैं, | सत्त्वम् | = सात्त्विकी है | |
| शास्त्रविधिम् | = शास्त्रविधिका | तेषाम् | = उनकी | आहो | = अथवा |
| उत्सृज्य | = त्याग करके | निष्ठा | = निष्ठा | रजः, तमः | = राजसी- |
| श्रद्धया, अन्विताः | = श्रद्धापूर्वक | तु | = फिर | तामसी |
व्याख्या—[ यह सत्रहवाँ अध्याय सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकपर चला है। उसीको लेकर अर्जुन वहाँ आये 'यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य' (जो शास्त्रविधिका त्याग करके) की जगह यहाँ 'ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य' ही कहकर 'कामकारतः' (मनमाने ढंगसे) की जगह 'श्रद्धयान्विताः' (श्रद्धासे) कहते हैं; 'वर्तते' (बर्ताव करता है) की जगह 'यजन्ते' (यजन करता है) कहते हैं; और 'न स सिद्धिंमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्' (वह सिद्धि, सुख और परमगतिको प्राप्त नहीं होता) की जगह 'तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः' (उनकी निष्ठा कौन-सी है? सात्त्विकी—दैवी-सम्पत्तिवाली अथवा राजसी-
तामसी—आसुरी-सम्पत्तिवाली?) कहकर भगवान्से प्रश्न करते हैं। ]
'ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य' सत्त्वमाहो रजस्तमः'—
श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवाद सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये है। उन दोनोंके सामने कलियुगकी जनता थी; क्योंकि द्वारपयुग समाप्त हो रहा था। आगे आनेवाले कलियुगी जीवोंकी तरफ दृष्टि रहनेसे अर्जुन पूछते हैं कि महाराज! जिन मनुष्योंका भाव बड़ा अच्छा है, श्रद्धा-भक्ति भी है, पर शास्त्रविधिको जानते नहीं। यदि वे जान जायँ, तो पालन करने लग जायँ, पर उनको पता नहीं। अतः उनकी क्या स्थिति होती है?
१-इस (सत्रहवें) अध्यायको नवें अध्यायके सत्ताईसवें श्लोक (यत्करोषि यदृशनासि.....तत्कुरुष्व मदर्पणम्) की व्याख्या मानना विचारसे युक्तिसंगत नहीं बैठता। कारण कि नवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक 'भगवदर्पण-विषयक' प्रकरणमें आया है, जो छब्बीसवें श्लोकसे आरम्भ हुआ है और अठ्ठाईसवें श्लोकमें (भगवदर्पणका फल बतलाकर) समाप्त हुआ है। परन्तु यहाँ मनुष्योंकी श्रद्धाको पहचाननेका प्रसंग है; क्योंकि इस (सत्रहवें) अध्यायके आरम्भमें अर्जुनका प्रश्न मनुष्योंकी निष्ठा, श्रद्धाको लेकर ही है। अतः भगवान् उसका उत्तर भी श्रद्धाको लेकर ही देते हैं।
२-शास्त्रविधिका त्याग तीन कारणोंसे होता है—(१) अज्ञतासे, (२) उपेक्षासे और (३) विरोधसे।