श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
रचना चाहिये। शास्त्रकी आज्ञा समझकर ही तुझे कर्तव्य-कर्म करना चाहिये। इसका तात्पर्य यह है कि युद्धरूप क्रिया बाँधनेवाली नहीं है, प्रत्युत स्वार्थ और अभिमान रखकर की हुई शास्त्रीय क्रिया (यज्ञ, दान आदि) ही बाँधनेवाली होती है; और मनमाने ढंगसे (शास्त्र-विपरीत)-की हुई क्रिया तो पतन करनेवाली होती है।
स्वतः प्राप्त युद्धरूप क्रिया क्रूर और हिंसारूप दीखती हुई भी पापजनक नहीं होती (गीता—अठारहवें अध्यायका सैंतालीसवें श्लोक)। तात्पर्य है कि
परिशिष्ट भाव —सातवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि आसुर स्वभाववाले मनुष्य कर्तव्य-अकर्तव्यको नहीं जानते। यहाँ भगवान् बताते हैं कि वह आसुर स्वभाव शास्त्रके अनुसार आचरण करनेसे ही मिटेगा।
यहाँ शंका हो सकती है कि जो शास्त्र पढ़े हुए नहीं हैं, उनको कर्तव्यका ज्ञान कैसे होगा? इसका समाधान है कि अगर उनका अपने कल्याणका उद्देश्य होगा तो अपने कर्तव्यका ज्ञान स्वतः होगा; क्योंकि आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य नहीं होगा तो शास्त्र पढ़नेपर भी कर्तव्यका ज्ञान नहीं होगा, उल्टे अज्ञान बढ़ेगा कि हम अधिक जानते हैं!
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
दैवासुरसम्पद्भिभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषद्सु श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'दैवासुरसम्पद्भिभागयोग' नामक सोलहवें अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥
इस (सोलहवें) अध्यायका नाम 'दैवासुरसम्पद्-भिभागयोग' है; क्योंकि इस अध्यायमें जो दोनों सम्पत्तियोंका वर्णन हुआ है, वह परस्पर एक-दूसरेसे बिलकुल विरुद्ध है अर्थात् दैवी-सम्पत्ति कल्याण करनेवाली है और आसुरी-सम्पत्ति बाँधनेवाली तथा नीच योनियों और नरकोंमें ले जानेवाली है। जो साधक इन दोनों विभागोंको ठीक रीतिसे जान लेगा, वह आसुरी-सम्पत्तिका सर्वथा त्याग कर देगा। आसुरी-सम्पत्तिका सर्वथा त्याग होते ही दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट हो जायगी। दैवी-सम्पत्ति प्रकट होते ही एकमात्र परमात्मासे सम्बन्ध रह जायगा।
सोलहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें 'अथ षोडशोऽध्यायः' के तीन, 'श्रीभगवानुवाच' के दो, श्लोकोंके दो सौ सत्तासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदीका योग
स्वभावनियत कर्म करता हुआ सर्वथा स्वार्थरहित मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इनके स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो आज्ञा दी है, उसके अनुसार कर्म करनेसे मनुष्यको पाप नहीं लगता। पाप लगता है—स्वार्थसे, अभिमानसे और दूसरोंका अनिष्ट सोचनेसे।
मनुष्य-जन्मकी सार्थकता यही है कि वह शरीर-प्राणोंके मोहमें न फँसकर केवल परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे शास्त्रविहित कर्मोंको करे।
कि आसुर स्वभाववाले मनुष्य कर्तव्य-अकर्तव्यको नहीं
जानते। यहाँ भगवान् बताते हैं कि वह आसुर स्वभाव शास्त्रके अनुसार आचरण करनेसे ही मिटेगा।
यहाँ शंका हो सकती है कि जो शास्त्र पढ़े हुए नहीं हैं, उनको कर्तव्यका ज्ञान कैसे होगा? इसका समाधान है कि अगर उनका अपने कल्याणका उद्देश्य होगा तो अपने कर्तव्यका ज्ञान स्वतः होगा; क्योंकि आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य नहीं होगा तो शास्त्र पढ़नेपर भी कर्तव्यका ज्ञान नहीं होगा, उल्टे अज्ञान बढ़ेगा कि हम अधिक जानते हैं!
तीन सौ पाँच है।
(२) इस अध्यायमें 'अथ षोडशोऽध्यायः' के सात, 'श्रीभगवानुवाच' के सात, श्लोकोंके सात सौ अड़सठ और पुष्पिकाके बावन अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग आठ सौ चौतीस है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—'श्रीभगवानुवाच'।
सोलहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके चौबीस श्लोकोंमेंसे—छठे श्लोकके प्रथम चरणमें, दसवें श्लोकके तृतीय चरणमें और बाईसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; तथा ग्यारहवें, तेरहवें और उन्नीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष अठारह श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।