श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1060, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २४ ]
- साधक-संजीवनी *
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सिद्धि, सुख और परमगतिके न मिलनेका तात्पर्य यह है कि वे आचरण तो श्रेष्ठ करते हैं, जिससे उन्हें सिद्धि, सुख और परमगतिकी प्राप्ति हो सके; परन्तु भीतरमें काम, क्रोध, लोभ, अभिमान आदि रहनेसे उनके अच्छे आचरण भी बुराईमें ही चले जाते हैं। इससे उनको उपर्युक्त चीजें
नहीं मिलतीं। यदि ऐसा मान लिया जाय कि उनके आचरण ही बुरे होते हैं, तो भगवान्का 'न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्'—ऐसा कहना बनेगा ही नहीं; क्योंकि प्राप्ति होनेपर ही निषेध होता है—'प्राप्नोत्सत्यां निषेधः'।
परिशिष्ट भाव —आसुर मनुष्य अभिमानके कारण अपनेको सिद्ध और सुखी मानते हैं—'सिद्धोऽहं बलवान्मुखी' (गीता १६।१४), पर वास्तवमें वे सिद्ध और सुखी होते नहीं—'न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखम्'। उनके हृदयमें अभिमान और द्वेषकी अग्नि जलती रहती है!
सम्बन्ध—शास्त्रविधिका त्याग करनेसे मनुष्यको सिद्धि आदिकी प्राप्ति नहीं होती, इसलिये मनुष्यको क्या करना चाहिये—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥
| तस्मात् | = अतः | प्रमाणम् | = प्रमाण है | कर्म | = कर्तव्य-कर्म |
|---|---|---|---|---|---|
| ते | = तेरे लिये | ज्ञात्वा | = (—ऐसा) जानकर | ||
| (तू) | कर्तुम् | = करने | |||
| कार्याकार्य- | इह | = इस लोकमें | अर्हसि | = योग्य है | |
| व्यवस्थितौ | = कर्तव्य- | शास्त्र- | अर्थात् तुझे | ||
| अकर्तव्यकी | विधानोक्तम् | = शास्त्रविधिसे | शास्त्रविधिके | ||
| व्यवस्थामें | नियत | अनुसार कर्तव्य-कर्म | |||
| शास्त्रम् | = शास्त्र (ही) | करने चाहिये। |
व्याख्या —'तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य-व्यवस्थितौ'—जिन मनुष्योंको अपने प्राणोंसे मोह होता है, वे प्रवृत्ति और निवृत्ति अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्यको न जाननेसे विशेषरूपसे आसुरी-सम्पत्तिमें प्रवृत्त होते हैं। इसलिये तू कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय करनेके लिये शास्त्रको सामने रख।
जिनकी महिमा शास्त्रोंने गायी है और जिनका बर्ताव शास्त्रीय सिद्धान्तके अनुसार होता है, ऐसे संत-महापुरुषोंके आचरणों और वचनोंके अनुसार चलना भी शास्त्रोंके अनुसार ही चलना है। कारण कि उन महापुरुषोंने शास्त्रोंको आदर दिया है और शास्त्रोंके अनुसार चलनेसे ही वे श्रेष्ठ पुरुष बने हैं। वास्तवमें देखा जाय तो जो महापुरुष परमात्मतत्त्वको प्राप्त हुए हैं, उनके आचरणों, आदर्शों, भावों आदिसे ही शास्त्र बनते हैं।
'शास्त्रं प्रमाणम्' का तात्पर्य यह है कि लोक-
परलोकका आश्रय लेकर चलनेवाले मनुष्योंके लिये कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है।
'ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि'— प्राणपोषण-परायण मनुष्य शास्त्रविधिको (कि किसमें प्रवृत्त होना है और किससे निवृत्त होना है) नहीं जानते (गीता—सोलहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक); इसलिये उनको सिद्धि आदिकी प्राप्ति नहीं होती। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तू तो दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त है; अतः तू शास्त्रविधिको जानकर कर्तव्यका पालन करनेयोग्य है।
अर्जुन पहले अपनी धारणासे कहते थे कि युद्ध करनेसे मुझे पाप लगेगा, जबकि भाग्यशाली श्रेष्ठ क्षत्रियोंके लिये अपने-आप प्राप्त हुआ युद्ध स्वर्गको देनेवाला है (गीता—दूसरे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। भगवान् कहते हैं कि भैया! तू पाप-पुण्यका निर्णय अपने मनमाने ढंगसे कर रहा है; तुझे तो इस विषयमें शास्त्रको प्रमाण
- यहाँ 'इह' पद देनेका तात्पर्य है कि इस संसारमें मनुष्य-शरीर केवल श्रेष्ठ कर्म करके परमात्माको प्राप्त करनेके लिये ही मिला है। अतः यह अवसर कभी वृथा न जाने दे।