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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1059

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

यः= जो मनुष्यसः= वह
शास्त्रविधिम्= शास्त्रविधिको= न
उत्सृज्य= छोड़करसिद्धिम्= सिद्धि ( अन्तः-करणकी शुद्धि)-को,
कामकारतः= अपनी इच्छासे मनमाना= न
वर्तते= आचरण करता है,सुखम्= सुख (शान्ति)-को

व्याख्या—[सत्रहवें अध्यायका अट्टाईसवाँ श्लोक भी इससे मिलता-जुलता है।]

'यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते'—जो लोग शास्त्रविधिकी अवहेलना करके शास्त्रविहित यज्ञ करते हैं, दान करते हैं, परोपकार करते हैं, दुनियाके लाभके लिये तरह-तरहके कई अच्छे-अच्छे काम करते हैं; परन्तु वह सब करते हैं—'कामकारतः' * अर्थात् शास्त्रविधिकी तरफ ध्यान न देकर अपने मनमाने ढंगसे करते हैं। मनमाने ढंगसे करनेमें कारण यह है कि उनके भीतर जो काम, क्रोध आदि पड़े रहते हैं, उनकी परवाह न करके वे बाहरी आचरणोंसे ही अपनेको बड़ा मानते हैं। तात्पर्य है कि वे बाहरके आचरणोंको ही श्रेष्ठ समझते हैं। दूसरे लोग भी बाहरके आचरणोंको ही विशेषतासे देखते हैं। भीतरके भावोंको, सिद्धान्तोंको जाननेवाले लोग बहुत कम होते हैं। परन्तु वास्तवमें भीतरके भावोंका ही विशेष महत्त्व है।

अगर भीतरमें दुर्गुण-दुर्भाव रहते हैं और बाहरसे बढ़े भारी त्यागी-तपस्वी बन जाते हैं, तो अभिमानमें आकर दूसरोंकी ताड़ना कर देते हैं। इस प्रकार भीतरमें बढ़े हुए देहाभिमानके कारण उनके गुण भी दोषमें परिणत हो जाते हैं, उनकी महिमा निन्दामें परिणत हो जाती है, उनका त्याग रागमें, आसक्तिमें, भोगोंमें परिणत हो जाता है और आगे चलकर वे पतनमें चले जाते हैं। इसलिये भीतरमें दोषोंके रहनेसे ही वे शास्त्रविधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करते हैं।

  • (अ) यहाँ आये, 'कामकारतः वर्तते' (शास्त्रविधिकी अवहेलना करके मनमाने ढंगसे बर्ताव करता है) और पाँचवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें आये 'कामकारेण फले सक्तः' (भोगोंकी, पदार्थकी इच्छासे फलमें आसक्त हुआ)—दोनोंमें थोड़ा अन्तर है। 'कामकारतः' में क्रिया करनेमें उच्छृङ्खल वृत्ति है और 'कामकारेण' में भोगोंकी इच्छा है। तात्पर्य है कि 'कामकारतः' की दृष्टि क्रियाकी तरफ है और 'कामकारेण' की दृष्टि क्रियाके परिणाम-(फल- ) की तरफ है कि परिणाममें मुझे अमुकामुक लाभ होगा। पर दोनोंमें मूल कारण तो 'काम' ही है।

(ब) एक बात ध्यान देनेकी है कि सातवें श्लोकसे लेकर इस तेईसवें श्लोकतक जो आसुरी-सम्पत्तिका वर्णन हुआ है, उसमें कुल नौ बार 'काम' शब्द आया है; जैसे—१—'कामहेतुकम्' (१६।८), २—'काममाश्रित्य' (१६।१०), ३—'कामोपभोगपरमाः' (१६।११), ४—'कामक्रोधपरायणाः' (१६।१२), ५—'कामभोगार्थम्' (१६।१२), ६—'कामभोगेषु' (१६।१६), ७—'कामम्' (१६।१८), ८—'कामः' (१६।२१) और ९—'कामकारतः' (१६।२३)। इससे यह बात सिद्ध होती है कि आसुरी-सम्पत्तिका मूल कारण 'काम' अर्थात् कामना ही है।

| | | (और) ---|---|---|--- न | = न | न | = न पराम् | = परम | पराम् | = परम गतिम् | = गतिको (ही) | गतिम् | = गतिको (ही) अवाप्नोति | = प्राप्त होता है। | अवाप्नोति | = प्राप्त होता है।

जैसे रोगी अपनी दृष्टिसे तो कुपथ्यका त्याग और पथ्यका सेवन करता है, पर वह आसक्तिवश कुपथ्य ले लेता है, जिससे उसका स्वास्थ्य और अधिक खराब हो जाता है। ऐसे ही वे लोग अपनी दृष्टिसे अच्छे-अच्छे काम करते हैं, पर भीतरमें काम, क्रोध और लोभका आवेश रहनेसे वे शास्त्रविधिकी अवहेलना करके मनमाने ढंगसे काम करने लग जाते हैं, जिससे वे अधोगतिमें चले जाते हैं।

'न स सिद्धिम्वाप्नोति'—आसुरी-सम्पदावाले जो लोग शास्त्र-विधिका त्याग करके यज्ञ आदि शुभ कर्म करते हैं, उनको धन, मान, आदर आदिके रूपमें कुछ प्रसिद्धिरूप सिद्धि मिल सकती है, पर वास्तवमें अन्तःकरणकी शुद्धिरूप जो सिद्धि है, वह उनको नहीं मिलती।

'न सुखम्'—उनको सुख भी नहीं मिलता; क्योंकि उनके भीतरमें काम-क्रोधादिकी जलन बनी रहती है। पदार्थिके संयोगसे होनेवाला सुख उन्हें मिल सकता है, पर वह सुख दुःखोंका कारण ही है अर्थात् उससे दुःख-ही-दुःख पैदा होते हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि पारमार्थिक मार्गमें मिलनेवाला सात्विक सुख उनको नहीं मिलता।

'न परां गतिम्'—उनको परमगति भी नहीं मिलती। परमगति मिले ही कैसे? पहले तो वे परमगतिको मानते ही नहीं और यदि मानते भी हैं, तो भी वह उनको मिल नहीं सकती; क्योंकि काम, क्रोध और लोभके कारण उनके कर्म ही ऐसे होते हैं।