श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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होता है—इस तरफ वे ध्यान कम देते हैं। इस कमीके कारण ही साधन करते हुए सदाचार भी होते रहते हैं और दुराचार भी होते रहते हैं; सदगुण भी आते हैं और दुर्गुण भी साथ रहते हैं। जप, ध्यान, कीर्तन, सत्संग, स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत आदि करके हम अपनेको शुद्ध बना लेंगे—ऐसा भाव साधकमें विशेष रहता है; परन्तु जो हमें अशुद्ध कर रहे हैं, उन दुर्गुण-दुराचारोंको हटानेका खयाल साधकमें कम रहता है, इसलिये—
आसुप्तेरामुते कालं नयेद् वेदान्तचित्तया। न वा दद्यादवसरं कामादीनां मनागपि॥
नींद खुलनेसे लेकर नींद आनेतक और जिस दिन पता लगे, उस दिनेसे लेकर मौत आनेतक—सब-का-सब समय परमात्मतत्त्वके (सगुण-निर्गुणके) चिन्तनमें ही लगाये। चिन्तनके सिवाय काम आदिको किंचिन्मात्र भी अवसर न दे।
‘ऐतैर्विमुक्तः’ का यह मतलब नहीं है कि जब हम दुर्गुण-दुराचारोंसे सर्वथा छूट जायेंगे, तब साधन करेंगे; किंतु साधकको भगवत्प्राप्तिका मुख्य उद्देश्य रखकर इनसे छूटनेका भी लक्ष्य रखना है। कारण कि झूठ, कपट, बेईमानी, काम, क्रोध आदि हमारे साथमें रहेंगे, तो नयी-नयी अशुद्धि—नये-नये पाप होते रहेंगे, जिससे साधनका
साक्षात् लाभ नहीं होगा। यही कारण है कि वर्षांतक साधनमें लगे रहनेपर भी साधक अपनी वास्तविक उन्नति नहीं देखते, उनको अपनेमें विशेष परिवर्तनका अनुभव नहीं होता। इन दोषोंसे रहित होनेपर शुद्ध स्वतःस्वाभाविक आती है। जीवमें अशुद्धि तो संसारकी तरफ लगनेसे ही आयी है, अन्यथा परमात्माका अंश होनेसे वह तो स्वतः ही शुद्ध है—
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥
(मानस ७। ११७। १)
‘श्रेयः आचरति’ का तात्पर्य यह है कि काम, क्रोध और लोभ—इनमेंसे किसीको भी लेकर आचरण नहीं होना चाहिये अर्थात् असाधन-(निषिद्ध आचरण-) से रहित शुद्ध साधन होना चाहिये। भीतरमें कभी कोई वृत्ति आ भी जाय, तो उसको आचरणमें न आने दे। अपनी तरफसे तो (काम, क्रोधादिकी) वृत्तियोंको दूर करनेका ही उद्योग करे। अगर अपने उद्योगसे न दूर हों तो ‘हे नाथ! हे नाथ!! हे नाथ!!!’ ऐसे भगवान्को पुकारे। गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज कहते हैं—
मम हृदय भवन प्रभु तोरा। तहं बसे आइ बहु चोरा॥ अति कठिन करहिं बरजोरा। मानहिं नहिं बिनय निहोरा॥
(विनय-पत्रिका १२५। २-३)
परिशिष्ट भाव—‘ऐतैर्विमुक्तः’—काम-क्रोध-लोभसे रहित होनेका तात्पर्य है—इनके त्यागका उद्देश्य रखना, इनके वशमें न होना। कामसे, क्रोधसे अथवा लोभसे किया गया शुभकर्म भी कल्याणकारक नहीं होता। इसलिये इनके त्यागकी तरफ विशेष ध्यान देना चाहिये। काम-क्रोध-लोभको पकड़े रहनेसे कल्याणका आचरण (जप, ध्यान आदि) करनेपर भी कल्याण नहीं होता; क्योंकि ये सम्पूर्ण पापोंके कारण हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सैतीसवाँ श्लोक)।
काम-क्रोध-लोभके कारण धर्म और समाजकी मर्यादा नष्ट हो जाती है, जिससे दुनियाका बड़ा अहित होता है। आसुरी स्वभाववाले मनुष्य काम-क्रोध-लोभके परायण होते हैं। वे यज्ञ, दान आदि सब शुभकर्म नाममात्रके लिये करते हैं, अपने कल्याणके लिये कुछ नहीं करते। परन्तु दैवी-सम्पत्तिवाले साधक काम-क्रोध-लोभके वशमें न होकर अपने कल्याणका आचरण करते हैं, जिससे दुनियाका स्वतः हित होता है। आसुरी मनुष्य ऐसे साधकोंको बेसमझ समझते हैं और इनसे द्वेष रखते हैं, पर इन साधकोंको उन आसुरी मनुष्योंपर दया आती है और वे उनको सदुद्दिष्ट देनेके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं।
सम्बन्ध—जो अपने कल्याणके लिये शास्त्रविधिके अनुसार चलते हैं, उनको तो परमगतिकी प्राप्ति होती है, पर जो ऐसा न करके मनमाने ढंगसे आचरण करते हैं, उनकी क्या गति होती है—यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिंमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ २३॥