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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

इच्छाको लेकर 'काम' और संग्रहकी इच्छाको लेकर 'लोभ' आता है और इन दोनोंमें बाधा पड़नेपर 'क्रोध' आता है। जब काम, क्रोध और लोभ—तीनों अधिक बढ़ जाते हैं, तब 'मोह' होता है।

कामसे क्रोध पैदा होता है और क्रोधसे सम्मोह हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। यदि कामनामें बाधा न पड़े, तो लोभ पैदा होता है और लोभसे सम्मोह हो जाता है। वास्तवमें यह 'काम' ही क्रोध और लोभका रूप धारण कर लेता है। सम्मोह हो जानेपर तमोगुण आ जाता है। फिर तो पूरी आसुरी-सम्पत्ति आ जाती है।

'नाशनमात्मनः' —काम, क्रोध और लोभ—ये तीनों मनुष्यका पतन करनेवाले हैं। जिनका उद्देश्य भोग भोगना और संग्रह करना होता है, वे लोग (अपनी समझसे)

अपनी उन्नति करनेके लिये इन तीनों दोषोंको हितकारी मान लेते हैं। उनका यही भाव रहता है कि हमलोग काम आदिसे सुख पायेंगे, आरामसे रहेंगे, खूब भोग भोगेंगे। यह भाव ही उनका पतन कर देता है।

'तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्' —ये काम, क्रोध आदि नरकोंके दरवाजे हैं। इसलिये मनुष्य इनका त्याग कर दे। इनका त्याग कैसे करे? तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर राग (काम) और द्वेष (क्रोध) स्थित रहते हैं। साधकको चाहिये कि वह इनके वशीभूत न हो। वशीभूत न होनेका अर्थ है कि काम, क्रोध, लोभको लेकर अर्थात् इनके आश्रित होकर कोई कार्य न करे; क्योंकि इनके वशीभूत होकर शास्त्र, धर्म और लोकमर्यादाके विरुद्ध कार्य करनेसे मनुष्यका पतन हो जाता है।

परिशिष्ट भाव —भोग भोगना 'काम' है। संग्रह करना 'लोभ' है। भोग और संग्रहमें बाधा देनेवालेपर 'क्रोध' आता है। ये तीनों आसुरी-सम्पत्तिके मूल हैं। सब पाप इन तीनोंसे ही होते हैं।

व्यक्ति और पदार्थ तो यहीं छूट जाते हैं, पर भीतरका भाव आसुर मनुष्योंको नरकोंमें ले जाता है।

सम्बन्ध—अब भगवान् काम, क्रोध और लोभसे रहित होनेका माहात्म्य बताते हैं—

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्भ्राऐस्त्रिभिर्नरः ।

आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन !विमुक्तः= रहित हुआकरता है, (वह)
एतैः= इननरः= (जो) मनुष्यततः
त्रिभिः,आत्मनः= अपनेपराम्
तमोद्भ्राः= नरकके तीनोंश्रेयः= कल्याणकागतिम्
दरवाजोंसेआचरति= आचरणयाति= प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या —'एतैर्विमुक्तः कौन्तेय' ततो याति परां गतिम्'—पूर्वश्लोकमें जिनको नरकका दरवाजा बताया गया है, उन्हीं काम, क्रोध और लोभको यहाँ 'तमोद्भ्रा' कहा गया है। 'तम' नाम अन्धकारका है, जो अज्ञानसे उत्पन्न होता है—'तमस्त्वज्ञानजं विद्धि' (गीता १४।८)। तात्पर्य है कि इन काम आदिके कारण 'मेरे साथ ये धन-सम्पत्ति, स्त्री-पुरुष, घर-परिवार आदि पहले भी नहीं थे और पीछे भी नहीं रहेंगे और अब भी इनसे प्रतिक्षण वियोग हो रहा है; अतः इनमें ममता करनेसे आगे मेरी क्या दशा होगी' आदि बातोंकी तरफ दृष्टि जाती ही नहीं अर्थात् बुद्धिमें अन्धकार छाया रहता है। अतः इन

काम आदिसे मुक्त होकर जो अपने कल्याणका आचरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। इसलिये साधकको इस बातकी विशेष सावधानी रखनी चाहिये कि वह काम, क्रोध और लोभ—तीनोंसे सावधान रहे। कारण कि इन तीनोंको साथमें रखते हुए जो साधन करता है, वह वास्तवमें असली साधक नहीं है। असली साधक वह होता है, जो इन दोषोंको अपने साथ रहने ही नहीं देता। ये दोष उसको हर समय खटकते रहते हैं; क्योंकि इनको साथमें रहनेका अवसर देना ही बड़ी भारी गलती है।

मनुष्य साधनकी तरफ तो ध्यान देते हैं, पर साथमें जो काम-क्रोधादि दोष रहते हैं, उनसे हमारा कितना अहित