श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
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है। इसी प्रकार जो स्वर्गप्राप्तिकी कामनासे यहाँ शुभ कर्म करते हैं, और मरनेके बाद उन कर्मोंके अनुसार स्वर्गमें जाते हैं, वहाँ उनके कर्मोंका फलभाग तो हो जाता है, पर
उनके स्वभावका परिवर्तन नहीं होता अर्थात् उनकी अहंतामें परिवर्तन नहीं होता। स्वभावको बदलनेका, शुद्ध बनानेका मौका तो मनुष्य-शरीरमें ही है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि ये जीव मनुष्य-शरीरमें मेरी प्राप्तिका अवसर पाकर भी मुझे प्राप्त नहीं करते, जिससे मुझे उनको अधम योनिमें भेजना पड़ता है। उनका अधम योनिमें और अधम गति-(नरक-) में जानेका मूल कारण क्या है—इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥
| कामः | = काम, | त्रिविधम् | = तीन प्रकारके | तस्मात् | = इसलिये |
|---|---|---|---|---|---|
| क्रोधः | = क्रोध | नरकस्य | = नरकके | एतत् | = इन |
| तथा | = और | द्वारम् | = दरवाजे | त्रयम् | = तीनोंका |
| लोभः | = लोभ— | आत्मनः | = जीवात्माका | त्यजेत् | = त्याग कर देना |
| इदम् | = ये | नाशनम् | = पतन करनेवाले हैं, | चाहिये। |
व्याख्या—‘कामः क्रोधस्तथा लोभस्त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम्’—भगवान्ने पाँचवें श्लोकमें कहा था कि दैवी-सम्पत्ति मोक्षके लिये और आसुरी-सम्पत्ति बन्धनके लिये है। तो वह आसुरी-सम्पत्ति आती कहाँसे है? जहाँ संसारकी कामना होती है। संसारके भोग-पदार्थोंका संग्रह, मान, बड़ाई, आराम आदि जो अच्छे दीखते हैं, उनमें जो महत्त्वबुद्धि या आकर्षण है, बस, वही मनुष्यको नरकोंकी तरफ ले जानेवाला है। इसलिये काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—ये षड्रिपु माने गये हैं। इनमेंसे कहींपर तीनका, कहींपर दोका और कहींपर एकका कथन किया जाता है, पर वे सब मिले-जुले हैं, एक ही धातुके हैं। इन सबमें ‘काम’ ही मूल है; क्योंकि कामनाके कारण ही
आदमी बँधता है (गीता—पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि मनुष्य न चाहता हुआ भी पापका आचरण क्यों करता है? उसके उत्तरमें भगवान्ने ‘काम’ और ‘क्रोध’—ये दो शत्रु बताये। परन्तु उन दोनोंमें भी ‘एष’ शब्द देकर कामनाको ही मुख्य बताया; क्योंकि कामनामें विघ्न पड़नेपर क्रोध आता है। यहाँ काम, क्रोध और लोभ—ये तीन शत्रु बताते हैं। तात्पर्य है कि भोगोंकी तरफ वृत्तियोंका होना ‘काम’ है और संग्रहकी तरफ वृत्तियोंका होना ‘लोभ’ है। जहाँ ‘काम’ शब्द अकेला आता है, वहाँ उसके अन्तर्गत ही भोग और संग्रहकी इच्छा आती है। परन्तु जहाँ ‘काम’ और ‘लोभ’—दोनों स्वतन्त्ररूपसे आते हैं, वहाँ भोगकी
१-अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्। नीचप्रसंगः कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम् ॥ (चाणक्यनीति ७।१७)
‘नरकसे आये हुए लोगोंमें ये लक्षण रहा करते हैं—अत्यन्त क्रोध, कटु वचन बोलना, दरिद्रता, स्वजनोंसे वैर, नीचोंका संग और कुलहीन-(नीच-) की सेवा।’
(कार्पण्यवृत्तिः स्वजनेषु निन्दा कुचैलता नीचजनेषु भक्तिः। अतीव रोषः कटुका च वाणी नरस्य चिह्नं नरकागतस्य ॥) (पद्मपुराण, सूक्ति० ५१।१३२)
२-स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे। दानप्रसंगो मधुरा च वाणी देवार्वचनं ब्राह्मणतर्पणं च ॥ (चाणक्यनीति ७।१६)
‘स्वर्गसे लौटकर मनुष्यलोकमें आये हुए लोगोंकी देहमें चार लक्षण रहा करते हैं—दान करनेमें प्रवृत्ति, मधुर वाणी बोलना, देवताओंका पूजन और ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट रखना।’
(स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि तेषां हृदये वसन्ति। दानं प्रशस्तं मधुरा च वाणी देवार्वचनं ब्राह्मणतर्पणं च ॥) (पद्मपुराण, सूक्ति० ५१।१३१)