श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
‘मामप्राप्यैव’ पदसे भगवान् पश्चात्तापके साथ कहते हैं कि अत्यन्त कृपा करके मैंने जीवोंको मनुष्यशरीर देकर इन्हें अपना उद्धार करनेका मौका दिया और यह विश्वास किया कि ये अपना उद्धार अवश्य कर लेंगे; परन्तु ये नराधम इतने मूढ़ और विश्वासघाती निकले कि जिस शरीरसे मेरी प्राप्ति करनी थी, उससे मेरी प्राप्ति न करके उलटे अधम गतिको चले गये!
मनुष्यशरीर प्राप्त हो जानेके बाद वह कैसा ही आचरणवाला क्यों न हो अर्थात् दुराचारी-से-दुराचारी क्यों न हो, वह भी यदि चाहे तो थोड़े-से-थोड़े समयमें (गीता—नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ श्लोक) और जीवनके अन्तकालमें (गीता—आठवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) भी भगवान्को प्राप्त कर सकता है। कारण कि ‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ (गीता ९।२९) कहकर भगवान्ने अपनी प्राप्ति सबके लिये अर्थात् प्राणिमात्रके लिये खुली रखी है। हाँ, यह बात हो सकती है कि पशु-पक्षी आदिमें उनको प्राप्त करनेकी योग्यता नहीं है; परन्तु भगवान्की तरफसे तो किसीके लिये भी मना नहीं है। ऐसा अवसर सर्वथा प्राप्त हो जानेपर भी ये आसुर मनुष्य भगवान्को प्राप्त न करके अधम गतिमें चले जाते हैं, तो इनकी इस दुर्गतिको देखकर परम दयालु प्रभु दुःखी होते हैं।
‘ततो यान्त्यधमां गतिम्’—आसुरी योनियोंमें जानेपर भी उनके सभी पाप पूरे नष्ट नहीं होते। अतः उन बचे हुए पापोंको भोगनेके लिये वे उन आसुरी योनियोंसे भी भयंकर अधम गतिको अर्थात् नरकोंको प्राप्त होते हैं। यहाँ शंका हो सकती है कि आसुरी योनियोंको प्राप्त हुए मनुष्योंको तो उन योनियोंमें भगवान्को प्राप्त करनेका अवसर ही नहीं है और उनमें वह योग्यता भी नहीं है, फिर भगवान्ने ऐसा क्यों कहा कि वे मेरेको प्राप्त न करके उससे भी अधम गतिमें चले जाते हैं? इसका समाधान यह है कि भगवान्का ऐसा कहना आसुरी योनियोंको प्राप्त होनेसे पूर्व मनुष्यशरीरको लेकर ही है। तात्पर्य है कि मनुष्यशरीरको पाकर, मेरी प्राप्तिका अधिकार पाकर भी वे मनुष्य मेरी प्राप्ति न करके जन्म-जन्मान्तरमें आसुरी योनियोंको प्राप्त होते हैं। इतना ही नहीं, वे उन आसुरी योनियोंसे भी नीचे कुम्भीपाक आदि घोर नरकोंमें चले जाते हैं।
विशेष बात
भगवत्प्राप्तिके अथवा कल्याणके उद्देश्यसे दिये गये मनुष्यशरीरको पाकर भी मनुष्य कामना, स्वार्थ एवं अभिमानके वशीभूत होकर चोरी-डकैती, झूठ-कपट धोखा, विश्वासघात, हिंसा आदि जिन कर्मोंको करते हैं उनके दो परिणाम होते हैं—(१) बाहरी फल-अंश और (२) भीतरी संस्कार-अंश। दूसरोंको दुःख देनेपर उनका (जिनको दुःख दिया गया है) तो वही नुकसान होता है, जो प्रारब्धसे होनेवाला है; परन्तु जो दुःख देते हैं, वे नया पाप करते हैं, जिसका फल नरक उन्हें भोगना ही पड़ता है। इतना ही नहीं, दुराचारोंके द्वारा जो नये पाप होनेके बीज बोये जाते हैं अर्थात् उन दुराचारोंके द्वारा अहंतामें जो दुर्भाव बैठ जाते हैं, उनसे मनुष्यका बहुत भयंकर नुकसान होता है। जैसे, चोरीरूप कर्म करनेसे पहले मनुष्य स्वयं चोर बनता है; क्योंकि वह चोर बनकर ही चोरी करेगा और चोरी करनेसे अपनेमें (अहंतामें) चोरका भाव दृढ़ हो जायगा*। इस प्रकार चोरीके संस्कार उसकी अहंतामें बैठ जाते हैं। ये संस्कार मनुष्यका बड़ा भारी पतन करते हैं—उससे बार-बार चोरीरूप पाप करवाते हैं और फलस्वरूप नरकोंमें ले जाते हैं। अतः जबतक वह मनुष्य अपना कल्याण नहीं कर लेता अर्थात् जबतक वह अपनी अहंतामें बैठये हुए दुर्भावोंको नहीं मिटाता, तबतक वे दुर्भाव जन्म-जन्मान्तरतक दुराचारोंको बल देते रहेंगे, उकसाते रहेंगे और उनके कारण वे आसुरी योनियोंमें तथा उससे भी भयंकर नरक आदिमें दुःख, सन्ताप, आफत आदि पाते ही रहेंगे।
उन आसुरी योनियोंमें भी उनकी प्रकृति और प्रवृत्तिके अनुसार यह देखा जाता है कि कई पशु-पक्षी, भूत-पिशाच, कीट-पतंग आदि सौम्य-प्रकृति-प्रधान होते हैं और कई क्रूर-प्रकृति-प्रधान होते हैं। इस तरह उनकी प्रकृति-(स्वभाव-) में भेद उनकी अपनी बनायी हुई शुद्ध या अशुद्ध अहंताके कारण ही होते हैं। अतः उन योनियोंमें अपने-अपने कर्मोंका फलभोग होनेपर भी उनकी प्रकृतिके भेद वैसे ही बने रहते हैं। इतना ही नहीं, सम्पूर्ण योनियोंको और नरकोंको भोगनेके बाद किसी क्रमसे अथवा भगवत्कृपासे उनको मनुष्यशरीर प्राप्त हो भी जाता है, तो भी उनकी अहंतामें बैठे हुए काम-क्रोधादि दुर्भाव पहले-जैसे ही रहते
- दुर्भावोंसे दुराचार पैदा होते हैं और दुराचारोंसे दुर्भाव पुष्ट होते हैं।