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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ११] * साधक-सञ्जीवनी * १०४३

कुल-परम्परा की मर्यादा को नहीं मानते, प्रत्युत इनके विपरीत चलने में, इनको भ्रष्ट करने में ही वे अपनी बहादुरी, अपना गौरव समझते हैं। वे अकर्तव्य को ही कर्तव्य और कर्तव्य को ही अकर्तव्य मानते हैं, हित को ही अहित और अहित को ही हित मानते हैं, ठीक को ही बेठीक और

बेठीक को ही ठीक मानते हैं। इन असद्विचारों के कारण उनकी बुद्धि इतनी गिर जाती है कि वे यह कहने लग जाते हैं कि माता-पिता का हमारे पर कोई ऋण नहीं है। उनसे हमारा क्या सम्बन्ध है? झूठ, कपट, जालसाजी करके भी धन कैसे बचे? आदि उनके दुराग्रह होते हैं।

परिशिष्ट भाव—'काममाश्रित्य दुष्पूरम्'—तीसरे अध्याय में भी भगवान् ने कहा है कि यह काम बहुत खाने वाला है—'महाशन:' (३।३७) और अग्नि के समान कभी तृप्त न होने वाला है—'दुष्पूरेणानलेन च' (३।३९)। इसलिये सभी कामनाओं की पूर्ति कभी सम्भव नहीं है। अतः कामनापूर्ति ही जिनका उद्देश्य है, उनको कभी शान्ति नहीं मिलती। कामनापूर्ति में महान् परतन्त्रता है, पर आसुर मनुष्य इस परतन्त्रता में भी स्वतन्त्रता का अनुभव करते हैं कि धनादि पदार्थ मिल जायेंगे तो हम स्वतन्त्र हो जायेंगे। वे शास्त्र, गुरु, ईश्वर, धर्म आदिको मानते ही नहीं, फिर काम के सिवाय और किसका आश्रय लें?

सम्बन्ध—सत्कर्म, सद्भाव और सद्विचारों के अभाव में उन आसुरी प्रकृति वालों के नियम, भाव और आचरण किस उद्देश्य को लेकर और किस प्रकार के होते हैं, अब उनको आगे के दो श्लोकों में बताते हैं।

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११॥

प्रलयान्ताम् = (वे) मृत्युपर्यन्त रहने वाली अपरिमेयाम् = अपार चिन्ताम् = चिन्ताओं का उपाश्रिताः = आश्रय लेने वाले,

कामोपभोगपरमाः = पदार्थों का संग्रह और उनका भोग करने में ही लगे रहने वाले च = और

एतावत् = 'जो कुछ है, वह इतना ही है'— इति = ऐसा निश्चिताः = निश्चय करने वाले होते हैं।

व्याख्या—'चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः'—आसुरी-सम्पदा वाले मनुष्यों में ऐसी चिन्ताएँ रहती हैं, जिनका कोई माप-तौल नहीं है। जब तक प्रलय अर्थात् मौत नहीं आती, तब तक उनकी चिन्ताएँ मिटती नहीं। ऐसी प्रलय तक रहने वाली चिन्ताओं का फल भी प्रलय-ही-प्रलय अर्थात् बार-बार मरना ही होता है।

चिन्ता के दो विषय होते हैं—एक पारमार्थिक और दूसरा सांसारिक। मेरा कल्याण, मेरा उद्धार कैसे हो? परब्रह्म परमात्मा का निश्चय कैसे हो? ('चिन्ता परब्रह्मविनिश्चयाय') इस प्रकार जिनको पारमार्थिक चिन्ता होती है, वे श्रेष्ठ हैं। परन्तु आसुरी-सम्पदा वालों को ऐसी चिन्ता नहीं होती। वे तो इससे विपरीत सांसारिक चिन्ताओं के आश्रित रहते हैं कि हम कैसे जीयेंगे? अपना जीवन-निर्वाह कैसे करेंगे? हमारे बिना बड़े-बूढ़े किसके आश्रित जीयेंगे? हमारा मान, आदर, प्रतिष्ठा, इज्जत, प्रसिद्धि, नाम आदि कैसे बने रहेंगे? मरने के बाद हमारे

बाल-बच्चों की क्या दशा होगी? मर जायेंगे तो धन-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद का क्या होगा? धन के बिना हमारा काम कैसे चलेगा? धन के बिना मकान की मरम्मत कैसे होगी? आदि-आदि। मनुष्य व्यर्थ में चिन्ता करता है। निर्वाह तो होता रहेगा। निर्वाह की चीजें तो बाकी रहेंगी और उनके रहते हुए ही मरेंगे। अपने पास एक लंगोटी रखने वाले विरक्त-से-विरक्त की भी फटी लंगोटी और फूटी तूम्बी बाकी बचती है और मरता है पहले। ऐसे ही सभी व्यक्ति वस्तु आदि के रहते हुए ही मरते हैं। यह नियम नहीं है कि धन पास में होने से आदमी मरता न हो। धन पास में रहते ही मनुष्य मर जाता है और धन पड़ा रहता है, काम में नहीं आता। एक बहुत बड़ा धनी आदमी था। उसने तिजोरी की तरह लोहे का एक मजबूत मकान बना रखा था, जिसमें बहुत रत्न रखे हुए थे। उस मकान का दरवाजा ऐसा बना हुआ था, जो बंद होने पर चाबी के बिना खुलता नहीं था। एक बार वह

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

धनी आदमी बाहर चाबी छोड़कर उस मकानके भीतर चला गया और उसने भूलसे दरवाजा बंद कर लिया। अब चाबीके बिना दरवाजा न खुलनेसे अन्न, जल, हवाके अभावमें मरते हुए उसने लिखा कि 'इतनी धन-सम्पत्ति आज मेरे पास रहते हुए भी मैं मर रहा हूँ; क्योंकि मुझे भीतर अन्न-जल नहीं मिल रहा है, हवा नहीं मिल रही है।' ऐसे ही खाद्य पदार्थोंके रहनेसे नहीं मरेगा, यह भी नियम नहीं है। भोगोंके पासमें होते हुए भी ऐसे ही मरेगा। जैसे पेट आदिमें रोग लग जानेपर वैद्य-डॉक्टर उसको (अन्न पासमें रहते हुए भी) अन्न खाने नहीं देते, ऐसे ही मरना हो, तो पदार्थोंके रहते हुए भी मनुष्य मर जाता है। जो अपने पास एक कौड़ीका भी संग्रह नहीं करते, ऐसे विरक्त संतोंको भी प्रारब्धके अनुसार आवश्यकतासे अधिक चीजें मिल जाती हैं। अतः जीवन-निर्वाह चीजोंके अधीन नहीं है। परन्तु इस तत्त्वको आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य नहीं समझ सकते। वे तो यही समझते हैं कि हम चिन्ता करते हैं, कामना करते हैं, विचार करते हैं, उद्योग करते हैं, तभी चीजें

मिलती हैं। यदि ऐसा न करें, तो भूखों मरना पड़े!

'कामोपभोगपरमाः' —जो मनुष्य धनादि पदार्थोंका उपभोग करनेके परायण हैं, उनकी तो हरदम यही इच्छा रहती है कि सुख-सामग्रीका खूब संग्रह कर लें और भोग भोग लें। उनको तो भोगोंके लिये धन चाहिये; संसारमें बड़ा बननेके लिये धन चाहिये, सुख-आराम, स्वाद-शौकीनी आदिके लिये धन चाहिये। तात्पर्य है कि उनके लिये भोगोंसे बढ़कर कुछ नहीं है।

'एतावदिति निश्चितः' —उनका यह निश्चय होता है कि सुख भोगना और संग्रह करना—इसके सिवाय और कुछ नहीं है। इस संसारमें जो कुछ है, यही है। अतः उनकी दृष्टिमें परलोक एक ढकोसला है। उनकी मान्यता रहती है कि मरनेके बाद कहीं आना-जाना नहीं होता। बस, यहाँ शरीरके रहते हुए जितना सुख भोग लें, वही ठीक है; क्योंकि मरनेपर तो शरीर यहाँ बिखर जायगा। शरीर स्थिर रहनेवाला है ही नहीं, आदि-आदि भोगोंके निश्चयके सामने वे पाप-पुण्य, पुनर्जन्म आदिको भी नहीं मानते।

परिशिष्ट भाव —भोग और संग्रहमें लगा हुआ मनुष्य अन्ध हो जाता है। वह न तो संसारको जान सकता है और न परमात्माको ही जान सकता है। अस्वाभाविकमें स्वाभाविक बुद्धि होनेके कारण उसकी दृष्टि परमात्माकी तरफ जा ही नहीं सकती। वह अस्वाभाविक संसारको ही सच्चा मानता है।

वस्तुएँ विनाशी हैं, आप अविनाशी हैं, फिर पूर्ति कैसे हो? नाशवान्के द्वारा अविनाशीकी पूर्ति कैसे हो सकती है?

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।

ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥ १२ ॥

आशापाशशतैः = (वे) आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसेकामक्रोधपरायणाः = काम-क्रोधके परायण होकरअन्यायेन = अन्यायपूर्वक
बद्धाः = बँधे हुए मनुष्यकामभोगार्थम् = पदार्थोंका भोग करनेके लियेअर्थसञ्चयान् = धन-संचय करनेको
ईहन्ते = चेष्टा करते रहते हैं।

व्याख्या—‘आशापाशशतैर्बद्धाः’ —आसुरी सम्पत्तिवाले मनुष्य आशारूपी सैकड़ों पाशोंसे बँधे रहते हैं अर्थात् उनको ‘इतना धन हो जायगा, इतना मान हो जायगा, शरीरमें नीरोगता आ जायगी’ आदि सैकड़ों आशाओंकी

१-(१) प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर। तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्रीरघुवीर ॥

(२) मुरदेको हरि देत है, कपड़ो लकड़ी आग। जीवित नर चिन्ता करे, उनका बड़ा अभाग ॥

(३) धान नहीं धीणों नहीं, नहीं रुपेयो रोक। जीमण बैठे रामदास, आन मिले सब थोक ॥

२-ऐसे ही स्वर्गको माननेवाले सकाम मनुष्य भी कहते हैं कि स्वर्गसे बढ़कर और कुछ नहीं है—‘नान्द्यदस्तीति वादिनः’ (गीता २।४२)। उनकी यही कामना रहती है कि मरनेके बाद हम स्वर्गमें जायेंगे और वहाँके दिव्य भोगोंको भोगेंगे। स्वर्गके भोगोंके सामने यहाँके भोग कुछ भी नहीं हैं—ऐसा वे मानते हैं।

३-यावज्जीवैत् सुखं जीवैत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबैत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कृतः ॥

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०४५

फॉसियाँ लगी रहती हैं। आशाकी फॉसीसे बँधे हुए मनुष्योंके पास लाखों-करोड़ों रुपये हो जायें, तो भी उनका मँगतापन नहीं मिटता! उनकी तो यही आशा रहती है कि सन्तोसे कुछ मिल जाय, भगवान्से कुछ मिल जाय, मनुष्योंसे कुछ मिल जाय। इतना ही नहीं पशु-पक्षी, वृक्ष-लता, पहाड़-समुद्र आदिसे भी हमें कुछ मिल जाय। इस प्रकार उनमें सदा 'खाऊँ-खाऊँ' बनी रहती है। ऐसे व्यक्तियोंकी सांसारिक आशाएँ कभी पूरी नहीं होतीं (गीता—नवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। यदि पूरी हो भी जायें, तो भी कुछ फायदा नहीं है; क्योंकि यदि वे जीते रहेंगे, तो आशावाली वस्तु नष्ट हो जायगी और आशावाली वस्तु रहेगी, तो वे मर जायेंगे अथवा दोनों ही नष्ट हो जायेंगे।

जो आशारूपी फॉसीसे बँधे हुए हैं, वे कभी एक जगह स्थिर नहीं रह सकते और जो इस आशारूपी फॉसीसे छूट गये हैं, वे मौजसे एक जगह रहते हैं— आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यशृङ्खला। यया बद्धाः प्रधार्वन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पंगुवत्॥

'कामक्रोधपरायणाः'—उनका परम अयन, स्थान काम और क्रोध ही होते हैं* अर्थात् अपनी कामनापूर्ति करनेके लिये और क्रोधपूर्वक दूसरोंको कष्ट देनेके लिये ही उनका जीवन होता है। काम-क्रोधके परायण मनुष्योंका यह निश्चय रहता है कि कामनाके बिना मनुष्य जड़ हो जाता है। क्रोधके बिना उसका तेज भी नहीं रहता। कामनासे ही सब काम होता है, नहीं तो आदमी काम करे ही क्यों? कामनाके बिना तो आदमीका जीवन ही भार हो जायगा। संसारमें काम और क्रोध ही तो सार चीज है। इसके बिना लोग हमें संसारमें रहने ही नहीं देंगे। क्रोधसे ही शासन चलता है, नहीं तो शासनको मानेगा ही कौन?

परिशिष्ट भाव— 'आशापाशशतैर्बद्धाः'—'यहाँ 'शतैः' पद अनन्तका वाचक है। जबतक संसारके साथ सम्बन्ध है, तबतक कामनाओंका अन्त नहीं आता। दूसरे अध्यायके इकतालिसवें श्लोकमें आया है—'बहुशाखा ह्यन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्'—'अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं।' कारण कि उन्होंने अविनाशीसे विमुख होकर नाशवान्को सत्ता और महत्ता दे दी तथा उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया।

'कामक्रोधपरायणाः'—आसुर स्वभाववाले लोग काम और क्रोधको स्वाभाविक मानते हैं। काम और क्रोधके सिवाय उनको और कुछ दीखता ही नहीं, इनसे आगे उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। यही उनके परम अयन अर्थात् स्थान हैं।

मनुष्य समझता है कि क्रोध करनेसे दूसरा हमारे वशमें रहेगा। परन्तु जो मजबूर, लाचार होकर हमारे वशमें हुआ है, वह कबतक वशमें रहेगा? मौका पड़ते ही वह घात करेगा। अतः क्रोधका परिणाम बुरा ही होता है।

  • इसी अध्यायके दसवें श्लोकमें आये 'दम्भ, मान और मद' तो उनके साथी होते हैं और यहाँ आये 'काम और क्रोध' उनके आश्रय होते हैं।

क्रोधसे दबाकर दूसरोंको ठीक करना चाहिये, नहीं तो लोग हमारा सर्वस्व छीन लेंगे। फिर तो हमारा अपना कुछ अस्तित्व ही नहीं रहेगा, आदि।

'ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान्'—आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्योंका उददेश्य धनका संग्रह करना और विषयोंका भोग करना होता है। इस उददेश्यकी पूर्तिके लिये वे बेईमानी, धोखेबाजी, विश्वासघात, टैक्सकी चोरी आदि करके; दूसरोंका हक मारकर; मन्दिर, बालक, विधवा आदिका धन दबाकर और इस तरह अनेक अन्याय पाप करके धनका संचय करना चाहते हैं। कारण कि उनके मनमें यह बात गहराईसे बैठी रहती है कि आजकलके जमानेमें ईमानदारीसे, न्यायसे कोई धनी थोड़े ही हो सकता है? ये जितने धनी हुए हैं, सब अन्याय, चोरी, धोखेबाजी करके ही हुए हैं। ईमानदारीसे, न्यायसे काम करनेकी जो बात है, वह तो कहनेमात्रकी है; काममें नहीं आ सकती। यदि हम न्यायके अनुसार काम करेंगे, तो हमें दुःख पाना पड़ेगा और जीवन-धारण करना मुश्किल हो जायगा। ऐसा उन आसुर स्वभाववाले व्यक्तियोंका निश्चय होता है।

जो व्यक्ति न्यायपूर्वक स्वर्गके भोगोंकी प्राप्तिके लिये लगे हुए हैं, उनके लिये भी भगवान्ने कहा है कि उन लोगोंकी बुद्धिमें 'हमें परमात्माकी प्राप्ति करना है' यह निश्चय हो ही नहीं सकता (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। फिर जो अन्यायपूर्वक धन कमाकर प्राणोंके पोषणमें लगे हुए हैं, उनकी बुद्धिमें परमात्मप्राप्तिका निश्चय कैसे हो सकता है? परन्तु वे भी यदि चाहें तो परमात्मप्राप्तिका निश्चय करके साधनपरायण हो सकते हैं। ऐसा निश्चय करनेके लिये किसीको भी मना नहीं है; क्योंकि मनुष्य-जन्म परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है।

१०४६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

सम्बन्ध—आसुर स्वभाववाले व्यक्ति लोभ, क्रोध और अभिमानको लेकर किस प्रकारके मनोरथ किया करते हैं, उसे क्रमशः आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्ये मनोरथम्।

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥

वे इस प्रकारके मनोरथ किया करते हैं कि—

इदम्= इतनी वस्तुएँ तोमनोरथम्= मनोरथकोअस्ति= है ही,
मया= हमनेप्राप्ये= प्राप्त (पूरा)इदम्= इतना
अद्य= आजकर लेंगे।(धन)
लब्धम्= प्राप्त कर लीं
(और अब)इदम्= इतनापुनः= फिर
इमम्= इसधनम्= धन तोअपि= भी
मे= हमारे पासभविष्यति= हो जायगा।

व्याख्या—‘इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्ये मनोरथम्’ —आसुरी प्रकृतिवाले व्यक्ति लोभके परायण होकर मनोरथ करते रहते हैं कि हमने अपने उद्योगसे, बुद्धिमानीसे, चतुराईसे, होशियारीसे, चालाकीसे इतनी वस्तुएँ तो आज प्राप्त कर लीं, इतनी और प्राप्त कर लेंगे। इतनी वस्तुएँ तो हमारे पास हैं, इतनी और वहाँसे आ जायँगी। इतना धन व्यापारसे आ जायगा। हमारा बड़ा लड़का इतना पढ़ा हुआ है; अतः इतना धन और वस्तुएँ तो उसके विवाहमें आ ही जायँगी। इतना धन टैक्सकी चोरीसे बच जायगा, इतना जमीनसे आ जायगा, इतना मकानोंके किरायेसे आ जायगा, इतना ब्याजका आ जायगा, आदि-आदि।

‘इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्’ —जैसे-जैसे उनका लोभ बढ़ता जाता है, वैसे-ही-वैसे उनके मनोरथ भी बढ़ते जाते हैं। जब उनका चिन्तन बढ़ जाता है, तब वे चलते-फिरते हुए, काम-धंधा करते हुए, भोजन करते हुए, मल-मूत्रका त्याग करते हुए और यदि नित्यकर्म (पाठ-पूजा-जप आदि) करते हैं तो उसे करते हुए भी ‘धन कैसे बढ़े’ इसका चिन्तन करते रहते हैं। इतनी दूकानें, मिल, कारखाने तो हमने खोल दिये हैं, इतने और खुल जायँ। इतनी गायें-भैंसे, भेड़-बकरियाँ आदि तो हैं ही, इतनी और हो जायँ। इतनी जमीन तो हमारे पास है, पर यह बहुत थोड़ी है, किसी तरहसे और मिल जाय तो बहुत अच्छा हो जायगा। इस प्रकार धन आदि बढ़ानेके विषयमें उनके मनोरथ होते हैं।

जब उनकी दृष्टि अपने शरीर तथा परिवारपर जाती है, तब वे उस विषयमें मनोरथ करने लग जाते हैं कि

अमुक-अमुक दवाई सेवन करनेसे शरीर ठीक रहेगा। अमुक-अमुक चीजें इकट्ठी कर ली जायँ, तो हम सुख और आरामसे रहेंगे। एयरकण्डीशनवाली गाड़ी मँगवा लें, जिससे बाहरकी गरमी न लगे। ऊनके ऐसे वस्त्र मँगवा लें, जिससे सरदी न लगे। ऐसा बरसाती कोट या छाता मँगवा लें, जिससे वर्षासे शरीर गीला न हो। ऐसे-ऐसे गहने-कपड़े और शृंगार आदिकी सामग्री मँगवा लें, जिससे हम खूब सुन्दर दिखायी दें, आदि-आदि।

ऐसे मनोरथ करते-करते उनको यह याद नहीं रहता कि हम बूढ़े हो जायँगे तो इस सामग्रीका क्या करेंगे और मरते समय यह सामग्री हमारे क्या काम आयेगी? अन्तमें इस सम्पत्तिका मालिक कौन होगा? बेटा तो कपूत है; अतः वह सब नष्ट कर देगा। मरते समय यह धन-सम्पत्ति खुदको दुःख देगी। इस सामग्रीके लोभके कारण ही मुझे बेटा-बेटीसे डरना पड़ता है और नौकरोंसे डरना पड़ता है कि कहीं ये लोग हड़ताल न कर दें।

प्रश्न— दैवी-सम्पत्तिको धारण करके साधन करनेवाले साधकके मनमें भी कभी-कभी व्यापार आदिके कार्यको लेकर (इस श्लोककी तरह) ‘इतना काम हो गया, इतना काम करना बाकी है और इतना काम आगे हो जायगा; इतना पैसा आ गया है और इतना वहाँपर टैक्स देना है’ आदि स्फुरणार्ण्व होती हैं। ऐसी ही स्फुरणार्ण्व जड़ताका उद्देश्य रखनेवाले आसुरी-सम्पत्तिवालोंके मनमें भी होती हैं, तो इन दोनोंकी वृत्तियोंमें क्या अन्तर हुआ?

उत्तर— दोनोंकी वृत्तियाँ एक-सी दीखनेपर भी उनमें बड़ा अन्तर है। साधकका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका होता है; अतः वह उन वृत्तियोंमें तल्लीन नहीं होता। परन्तु आसुरी

श्लोक १४-१५ ]

  • साधक-संजीवनी *

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प्रकृतिवालोंका उद्देश्य धन इकट्ठा करने और भोग | हैं। तालपत्र यह है कि दोनोंके उद्देश्य भिन्न-भिन्न होनेसे भोगनेका रहता है; अतः वे उन वृत्तियोंमें ही तल्लीन होते | दोनोंमें बड़ा भारी अन्तर है।

परिशिष्ट भाव— यहाँ भगवान् ग्यारहवें श्लोकमें कहे 'कामोपभोगपरमाः' पदकी व्याख्या करते हैं।

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।

ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥

असौ= वहअपि= भी (हम)भोगी= भोग भोगनेवाले हैं।
शत्रुः= शत्रु तोहनिष्ये= मार डालेंगे।अहम्= हम
मया= हमारे द्वाराअहम्= हमसिद्धः= सिद्ध हैं।
हतः= मारा गयाईश्वरः= ईश्वरबलवान्= (हम) बड़े
= और(सर्वसमर्थ)बलवान्
अपरान्= (उन) दूसरेहैं।(और)
शत्रुओंकोअहम्= हमसुखी= सुखी हैं।

व्याख्या —आसुरी-सम्पदावाले व्यक्ति क्रोधके परायण होकर इस प्रकारके मनोरथ करते हैं—'असौ मया हतः शत्रुः —'वह हमारे विपरीत चलता था, हमारे साथ वैर रखता था, उसको तो हमने मार दिया है और 'हनिष्ये चापरानपि —'दूसरे जो भी हमारे विपरीत चलते हैं, हमारे साथ वैर रखते हैं, हमारा अनिष्ट सोचते हैं, उनको भी हम मजा चखा देंगे, मार डालेंगे। 'ईश्वरोऽहम् —'हम धन, बल, बुद्धि आदिमें सब तरहसे समर्थ हैं। हमारे पास क्या नहीं है? हमारी बराबरी कोई कर सकता है क्या? 'अहं भोगी —'हम भोग भोगनेवाले हैं। हमारे पास स्त्री, मकान, कार आदि कितनी भोग सामग्री है! 'सिद्धोऽहम् —'हम सब तरहसे सिद्ध हैं। हमने तो पहले ही कह दिया था न? वैसा हो गया कि नहीं? हमारेको तो पहलेसे ही ऐसा दीखता है; ये जो लोग भजन, स्मरण, जप, ध्यान आदि

करते हैं, ये सभी किसीके बहकावेमें आये हुए हैं। अतः इनकी क्या दशा होगी, उसको हम जानते हैं। हमारे समान सिद्ध और कोई है संसारमें? हमारे पास अणिमा, गरिमा आदि सभी सिद्धियाँ हैं। हम एक फूँकमें सबको भस्म कर सकते हैं। 'बलवान् —'हम बड़े बलवान् हैं। अमुक आदमीने हमारेसे टक्कर लेनी चाही, तो उसका क्या नतीजा हुआ? आदि। परन्तु जहाँ स्वयं हार जाते हैं, वह बात दूसरोंको नहीं कहते, जिससे कि कोई हमें कमजोर न समझ ले। उन्हें अपने हारनेकी बात तो याद भी नहीं रहती, पर अभिमानकी बात उन्हें याद रहती है। 'सुखी —'हमारे पास कितना सुख है, आराम है। हमारे समान सुखी संसारमें कौन है?

ऐसे व्यक्तियोंके भीतर तो जलन होती रहती है, पर ऊपरसे इस प्रकारकी डींग हाँकते हैं।

परिशिष्ट भाव— यहाँ भगवान् बारहवें श्लोकमें कहे 'कामक्रोधपरायणाः ' पदकी व्याख्या करते हैं। आसुर स्वभाववाले मनुष्योंमें 'हम सुखी हैं'—यह केवल अभिमान होता है। वास्तवमें वे सुखी नहीं होते। सुखी वास्तवमें वही है, जिसपर अनुकूलता-प्रतिकूलताका असर नहीं पड़ता (गीता—पाँचवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। आसुर स्वभाववाले मनुष्योंके पास काम और क्रोधका ही बल होता है। वे नाशवान्के सम्बन्धसे अपनेको बलवान् मानते हैं। हिरण्यकशिपु आदिकी तरह वे अपनेको ही सर्वोपरि मानते हैं; क्योंकि दूसरे लोग उनको निकृष्ट दीखते हैं।

आद्युद्योऽभिजनवानसि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।

यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

आदयः= हम धनवान् हैं,सदृशः= समानदास्यामि= दान देंगे (और)
अभिजनवान्,अन्यः= दूसरामोदिष्ये= मौज करेंगे—
अस्मि= बहुत-सेकः= कौनइति= इस तरह
मनुष्य हमारे पासअस्ति= है?(वे)
हैं,यक्ष्ये= (हम) खूब यज्ञअज्ञानविमोहिताः= अज्ञानसे मोहित
मया= हमारेकरेंगे,रहते हैं।

व्याख्या —आसुर स्वभाववाले व्यक्ति अभिमानके परायण होकर इस प्रकारके मनोरथ करते हैं—

‘आदयोऽभिजनवानस्मि’ —कितना धन हमारे पास है! कितना सोना-चाँदी, मकान, खेत, जमीन हमारे पास है! कितने अच्छे आदमी, ऊँचे पदाधिकारी हमारे पक्षमें हैं! हम धन और जनके बलपर, रिश्चत और सिफारिशके बलपर जो चाहें, वही कर सकते हैं।

‘कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया’ —आप इतने घूमे-फिरे हो, आपको कई आदमी मिले होंगे; पर आप बताओ, हमारे समान आपने कोई देखा है क्या? ‘यक्ष्ये दास्यामि’ —हम ऐसा यज्ञ करेंगे, ऐसा दान करेंगे कि सबपर टाँग फेर देंगे! थोड़ा-सा यज्ञ करनेसे, थोड़ा-सा दान देनेसे, थोड़े-से ब्राह्मणोंको भोजन कराने आदिसे क्या होता है? हम तो ऐसे यज्ञ, दान आदि करेंगे, जैसे आजतक किसीने न किये हैं। क्योंकि मामूली यज्ञ, दान करनेसे लोगोंको क्या पता

लगेगा कि इन्होंने यज्ञ किया, दान दिया। बड़े यज्ञ, दानसे हमारा नाम अखबारोंमें निकलेगा। किसी धर्मशालामें मकान बनवायेंगे, तो उसमें हमारा नाम खुदवाया जायगा, जिससे हमारी यादगारी रहेगी। ‘मोदिष्ये’ —हम कितने बड़े आदमी हैं! हमें सब तरहसे सब सामग्री सुलभ है! अतः हम आनन्दसे मौज करेंगे।

इस प्रकार अभिमानको लेकर मनोरथ करनेवाले आसुर लोग केवल ‘करेंगे, करेंगे’—ऐसा मनोरथ ही करते रहते हैं, वास्तवमें करते-काराते कुछ नहीं। वे करेंगे भी, तो वह भी नाममात्रके लिये करेंगे (जिसका उल्लेख आगे सत्रहवें श्लोकमें आया है)। कारण कि ‘इत्यज्ञानविमोहिताः’ —इस प्रकार तेरहवें, चौदहवें और पन्द्रहवें श्लोकमें वर्णित मनोरथ करनेवाले आसुर लोग अज्ञानसे मोहित रहते हैं अर्थात् मूढ़ताके कारण ही उनकी ऐसे मनोरथवाली वृत्ति होती है।

सम्बन्ध—परमात्मासे विमुख हुए आसुरी सम्पदावालोंको जीते-जी अशान्ति, जलन, संताप आदि तो होते ही हैं, पर मरनेपर उनकी क्या गति होती है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥

अनेकचित्त-समावृताः= मोह-जालमेंआसक्त
विभ्रान्ताःअच्छी तरहसे फँसेरहनेवाले
हुए (तथा)मनुष्य
कामभोगेषु= पदार्थों औरअशुचौ= भयंकर
भोगोंमेंनरके= नरकोंमें
मोहजाल-प्रसक्ताः= अत्यन्तपतन्ति

व्याख्या‘अनेकचित्तविभ्रान्ताः’ —उन मनुष्योंका एक निश्चय न होनेसे उनके मनमें अनेक तरहकी चाहना होती है और उस एक-एक चाहनाकी पूर्तिके लिये अनेक तरहके उपाय होते हैं तथा उन उपायोंके विषयमें उनका अनेक तरहका चिन्तन होता है। उनका

चित्त किसी एक बातपर स्थिर नहीं रहता, अनेक तरहसे भटकता ही रहता है।

‘मोहजालसमावृताः’ —जड़का उद्देश्य होनेसे वे मोहजालसे ढके रहते हैं। मोहजालका तात्पर्य है कि तेरहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक काम, क्रोध और अभिमानको

श्लोक १७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०४९

लेकर जितने मनोरथ बताये गये हैं, उन सबसे वे अच्छी तरहसे आवृत रहते हैं; अतः उनसे वे कभी छूटते नहीं। जैसे मछली जालमें फँस जाती है, ऐसे ही वे प्राणी मनोरथरूप मोहजालमें फँसे रहते हैं। उनके मनोरथोंमें भी केवल एक तरफ ही वृत्ति नहीं होती, प्रत्युत दूसरी तरफ भी वृत्ति रहती है; जैसे—इतना धन तो मिल जायगा, पर उसमें अमुक-अमुक बाधा लग जायगी तो? हमारे पास दो नम्बरकी इतनी पूँजी है, इसका पता राजकीय अधिकारियोंको लग जायगा तो? हमारे मुनीम, नौकर आदि हमारी शिकायत कर देंगे तो? हम अमुक व्यक्तिको मार देंगे, पर हमारी न चली और दशा विपरीत हो गयी तो? हम अमुकका नुकसान करेंगे, पर उससे हमारा नुकसान हो गया तो?—इस प्रकार मोहजालमें फँसे हुए आसुरी सम्पदावालोंमें काम, क्रोध और अभिमानके साथ-साथ भय भी बना रहता है। इसलिये वे निश्चय नहीं कर

पाते। कहींपर जाते हैं ठीक करनेके लिये, पर हो जाता है बेटीक! मनोरथ सिद्ध न होनेसे उनको जो दुःख होता है, उसको तो वे ही जानते हैं!

‘प्रसक्ताः कामभोगेषु’ —वस्तु आदिका संग्रह करने और उसका उपभोग करनेमें तथा मान-बड़ाई, सुख-आराम आदिमें वे अत्यन्त आसक्त रहते हैं।

‘पतन्ति नरकेऽशुचौ’ —मोहजाल उनके लिये जीते-जी ही नरक है और मरनेके बाद उन्हें कुम्भीपाक, महारौरव आदि स्थान-विशेष नरकोंकी प्राप्ति होती है। उन नरकोंमें भी वे घोर यातनावाले नरकोंमें गिरते हैं। ‘नरके अशुचौ’ कहनेका तात्पर्य यह है कि जिन नरकोंमें महान् असह्य यातना और भयंकर दुःख दिया जाता है, ऐसे घोर नरकोंमें वे गिरते हैं; क्योंकि जिनकी जैसी स्थिति होती है, मरनेके बाद भी उनकी वैसी (स्थितिके अनुसार) ही गति होती है।

परिशिष्ट भाव —वास्तवमें आसुर मनुष्य काम-क्रोधपरायण होनेके कारण पहलेसे ही नरकमें पड़े हैं और अभावरूपी अग्निमें जल रहे हैं। परिणाममें उनको भयंकर नरकोंकी प्राप्ति होती है।

ऊँचे लोकोंमें अथवा नरकोंमें जानेमें पदार्थ और क्रिया मुख्य कारण नहीं हैं, प्रत्युत भाव मुख्य कारण है। भावका विशेष मूल्य है। जैसा भाव होता है, वैसी क्रिया अपने-आप होती है। इसलिये भगवान्ने आसुर मनुष्योंके भावों (मनोरथ आदि)-का वर्णन किया है।

सम्बन्ध—भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे विमुख हुए आसुरी-सम्पदावालोंके दुराचारोंका फल नरक-प्राप्ति बताकर, दुराचारोंद्वारा बोये गये दुर्भावोंसे वर्तमानमें उनकी कितनी भयंकर दुर्दशा होती है और भविष्यमें उसका क्या परिणाम होता है—इसे बतानेके लिये आगेका (चार श्लोकोंका) प्रकरण आरम्भ करते हैं।

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥

आत्म-सम्भाविताः = अपनेको सबसे अधिक पूज्य माननेवाले,धनमान-मदान्विताः = धन और मानके मदमें चूर रहनेवालेअविधि-पूर्वकम् = अविधिपूर्वक
स्तब्धाः = अकड़ रखनेवाले (तथा)ते = वे मनुष्यनामयज्ञैः = नाममात्रके यज्ञोंसे
दम्भेन = दम्भसेयजन्ते = यजन करते हैं।

व्याख्या—‘आत्मसम्भाविताः’ —वे धन, मान, बड़ाई, आदर आदिकी दृष्टिसे अपने मनसे ही अपने-आपको बड़ा मानते हैं, पूज्य समझते हैं कि हमारे समान कोई नहीं है; अतः हमारा पूजन होना चाहिये, हमारा आदर होना चाहिये,

  • नरकोंमें जानेवाले प्राणीको ‘यातनाशरीर’ की प्राप्ति होती है। उस यातनाशरीरके टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायें, तेलमें डालकर उबाला जाय, आगमें फेंककर जलाया जाय, तो भी वह मरता नहीं। प्राणी जबतक अपने पापकर्मोंका फल (दण्ड) न भोग ले, तबतक भयंकर यातना देनेपर भी वह शरीर मरता नहीं।

१०५०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

हमारी प्रशंसा होनी चाहिये। वर्ण, आश्रम, विद्या, बुद्धि, पद, अधिकार, योग्यता आदिमें हम सब तरहसे श्रेष्ठ हैं; अतः सब लोगोंको हमारे अनुकूल चलना चाहिये।

‘सत्त्वाः’ —वे किसीके सामने नम्र नहीं होते, नमते नहीं। कोई सन्त-महात्मा या अवतारी भगवान् ही सामने क्यों न आ जायें, तो भी वे उनको नमस्कार नहीं करेंगे। वे तो अपने-आपको ही ऊँचा समझते हैं, फिर किसके सामने नम्रता करें और किसको नमस्कार करें! कहीं किसी कारणसे परवश होकर लोगोंके सामने झुकना भी पड़े, तो अभिमानसहित ही झुकेंगे। इस प्रकार उनमें बहुत ज्यादा ऐंट-अकड़ रहती है।

‘धनमानमदान्विताः’ —वे धन और मानके मदसे सदा चूर रहते हैं। उनमें धनका, अपने जनोंका, जमीन-जायदाद और मकान आदिका मद (नशा) होता है। इधर-उधर पहचान हो जाती है, तो उसका भी उनके मनमें मद होता है कि हमारी तो बड़े-बड़े मिनिस्टरोंतक पहचान है। हमारे पास ऐसी शक्ति है, जिससे चाहे जो प्राप्त कर सकते हैं और चाहे जिसका नाश कर सकते हैं। इस प्रकार धन और मान ही उनका सहारा होता है। इनका ही उन्हें नशा होता है, गरमी होती है। अतः वे इनको ही श्रेष्ठ मानते हैं।

‘यजन्ते नामयज्ञेस्ते दम्भेन’ —वे लोग (पन्द्रहवें श्लोकमें आये ‘यक्ष्ये दास्यामि’ पदोंके अनुसार) दम्भपूर्वक नाममात्रके यज्ञ करते हैं। वे केवल लोगोंको दिखानेके लिये और अपनी महिमाके लिये ही यज्ञ करते हैं तथा इस भावसे करते हैं कि दूसरोंपर असर पड़ जाय और वे हमारे प्रभावसे प्रभावित हो जायें; उनकी आँख खुल जाय कि हम क्या हैं, उन्हें चेत हो जाय आदि।

लोगोंमें हमारा नाम हो जाय, प्रसिद्धि हो जाय, आदर हो जाय—इसके लिये वे यज्ञके नामपर अपने नामका खूब प्रचार करेंगे, अपने नामका छापा (पैम्फलेट) छपवायेंगे। ब्राह्मणोंके लिये भोजन करेंगे, तो खीरमें कपूर डाल देंगे, जिससे वे अधिक न खा सकें; क्योंकि उससे खर्चा भी अधिक नहीं होगा और नाम भी हो जायगा। ऐसे ही पंक्तिमें भोजनके लिये दो-दो, चार-चार, पाँच-पाँच सकोर और पतलें एक साथ परोस देंगे, जिससे उन सकोर और पतलोंको बाहर फेंकनेपर उनका ढेर लग जाय और लोगोंको यह पता चल जाय कि ये कितने अच्छे व्यक्ति हैं, जिन्होंने इतने ब्राह्मणोंको भोजन कराया है। इस प्रकार ये आसुरी-सम्पदावालोंके भीतरके भाव होते

हैं और भावोंके अनुसार ही उनके आचरण होते हैं।

आसुरी-सम्पत्तिवाले व्यक्ति शास्त्रोक्त यज्ञ, दान, पूजन आदि कर्म तो करते हैं और उनके लिये पैसे भी खर्च करते हैं, पर करते हैं शास्त्रविधिकी परवाह न करके और दम्भपूर्वक ही।

मन्दिरोंमें जब कोई मेला-महोत्सव हो और ज्यादा लोगोंके आनेकी उम्मीद हो तथा बड़े-बड़े धनी लोग आनेवाले हों, तब मन्दिरको अच्छी तरह सजायेंगे, ठाकुरजीको खूब बढ़िया-बढ़िया गहने-कपड़े पहनायेंगे, जिससे ज्यादा लोग आ जायें और खूब भेंट-चढ़ावा इकट्ठा हो जाय। इस प्रकार ठाकुरजीका तो नाममात्रका पूजन होता है, पर वास्तवमें पूजन होता है लोगोंका। ऐसे ही कोई मिनिस्टर या अफसर आनेवाला हो, तो उनको राजी करनेके लिये ठाकुरजीको खूब सजायेंगे और जब वे मन्दिरमें आयेंगे, तब उनका खूब आदर-सत्कार करेंगे, उनको ठाकुरजीकी माला देंगे, प्रसाद (जो उनके लिये विशेषरूपसे तैयार रखा रहता है) देंगे, इसलिये कि वे राजी हो जायेंगे, तो हमारे व्यापारमें, घरेलू कामोंमें हमारी सहायता करेंगे, मुकदमे आदिमें हमारा पक्ष लेंगे, आदि। इन भावोंसे वे ठाकुरजीका जो पूजन करते हैं, वह तो नाममात्रका पूजन है। वास्तवमें पूजन होता है—अपने व्यापारका, घरेलू कामोंका, लड़ाई-झगड़ोंका; क्योंकि उनका उद्देश्य ही वही है।

गौ-सेवी-संस्था-संचालक भी गोशालाओंमें प्रायः दूध देनेवाली स्वस्थ गायोंको ही रखेंगे और उनको अधिक चारा देंगे; पर लूली-लँगड़ी, अपाहिज, अन्थी और दूध न देनेवाली गायोंको नहीं रखेंगे तथा किसीको रखेंगे भी तो उसको दूध देनेवाली गायोंको अपेक्षा बहुत कम चारा देंगे। परन्तु हमारी गोशालामें कितना गोपालन हो रहा है, इसकी असलियतकी तरफ खयाल न करके केवल लोगोंको दिखानेके लिये उसका झूठा प्रचार करेंगे। छापा, लेख, विज्ञापन, पुस्तिका आदि छपवाकर बाँटेंगे, जिससे पैसा तो अधिक-से-अधिक आये, पर खर्चा कम-से-कम हो।

धार्मिक संस्थाओंमें भी जो संचालक कहलाते हैं, वे प्रायः उन धार्मिक संस्थाओंके पैसोंसे अपने घरका काम चलायेंगे। अपनेको नफा किस प्रकार हो, हमारी दूकान किस तरह चले, पैसे कैसे मिलें—इस प्रकार अपने स्वार्थको लेकर केवल दिखावटीपनसे सारा काम करेंगे।

प्रायः साधन-भजन करनेवाले भी दूसरोंको आता देखकर

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५१

आसन लगाकर बैठ जायेंगे, भजन-ध्यान करने लग जायेंगे, माला घुमाने लग जायेंगे। परन्तु कोई देखनेवाला न हो तो बातचीतमें लग जायेंगे, ताश-चौपड़ खेलेंगे अथवा सो जायेंगे। ऐसा जो साधन-भजन होता है, वह केवल इसलिये कि दूसरे मुझे अच्छा मानें, भक्त मानें और मेरी प्रशंसा करें, मेरा आदर-सम्मान करें, मुझे पैसे मिलें, लोगोंमें मेरा नाम हो जाय, आदि। इस प्रकार यह साधन-भजन भगवान्‌का तो नाममात्रके लिये होता है, पर वास्तवमें साधन-भजन होता है अपने नामका, अपने शरीरका, पैसोंका। इस प्रकार आसुरी

प्रकृतिवालोंके विषयमें कहाँतक कहा जाय? 'अविधिपूर्वकम्'—वे आसुर मनुष्य शास्त्रविधिको तो मानते ही नहीं, सदा शास्त्रनिषिद्ध काम करते हैं। वे यज्ञ, दान आदि तो करेंगे, पर उनको विधिपूर्वक नहीं करेंगे। दान करेंगे तो सुपात्रको न देकर कुपात्रको देंगे। कुपात्रोंके साथ ही एकता रखेंगे। इस प्रकार उलटे-उलटे काम करेंगे। बुद्धि सर्वथा विपरीत होनेके कारण उनको उलटी बात भी सुलटी ही दीखती है—'सर्वार्थान् विपरीतांश्च' (गीता १८।३२)।

परिशिष्ट भाव—आसुर स्वभाववाले मनुष्य दूसरोंसे प्रतिस्पर्धा रखते हैं और इसलिये यज्ञ करते हैं कि दूसरोंकी अपेक्षा हमारेमें कोई कमी न रह जाय, कोई हमारेको यज्ञ करनेवालोंकी अपेक्षा नीचा न मान ले। वे केवल लोगोंमें अपनी प्रसिद्धि करनेके लिये यज्ञ करते हैं, फलपर विश्वास नहीं रखते। दूसरा व्यक्ति यज्ञ करता है तो वे ऐसा समझते हैं कि वह भी अपनी प्रसिद्धिके लिये ही यज्ञ करता है। ईश्वर और परलोकपर विश्वास न होनेके कारण उनकी दृष्टि विधिपर नहीं रहती। विधिका विचार वही करते हैं, जो ईश्वर और परलोकको मानते हैं कि अमुक कर्मका अमुक फल होगा। आसुर मनुष्योंकी सब चेष्टाएँ दिखावटी होती हैं। परन्तु उनके भीतरमें अभिमान होता है कि हम दूसरोंसे भी बढ़िया यज्ञ करेंगे। उनमें अपनी जानकारीका भी अभिमान होता है कि हम समझदार हैं, दूसरे सब मूर्ख हैं, समझते नहीं। वास्तवमें उनमें कोरी मूर्खता भरी होती है।

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥१८॥

अहङ्कारम् = (वे) अहंकार, बलम् = हठ, दर्पम् = घमण्ड, कामम् = कामना च = और क्रोधम् = क्रोधका

संश्रिताः = आश्रय लेनेवाले मनुष्य आत्म-परदेहेषु = अपने और दूसरोंके शरीरमें (रहनेवाले)

माम् = मुझ अन्तर्यामीके साथ प्रद्विषन्तः = द्वेष करते हैं (तथा) अभ्यसूयकाः = (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोषदृष्टि रखते हैं।

व्याख्या—'अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः'—वे आसुर मनुष्य जो कुछ काम करेंगे, उसको अहंकार, हठ, घमण्ड, काम और क्रोधसे ही करेंगे। जैसे भक्त भगवान्‌के आश्रित रहता है, ऐसे ही वे आसुर लोग अहंकार, हठ, काम आदिके आश्रित रहते हैं। उनके मनमें यह बात अच्छी तरहसे जँची हुई रहती है कि अहंकार, हठ, घमण्ड, काम और क्रोधके बिना काम नहीं चलेगा; संसारमें ऐसा होनेसे ही काम चलता है, नहीं तो मनुष्योंको दुःख ही पाना पड़ता है; जो इनका (अहंकार, हठ आदिका) आश्रय नहीं लेते, वे बुरी तरहसे कुचले जाते हैं; सीधे-सादे व्यक्तिको संसारमें कौन मानेगा? इसलिये

अहंकारादिके रहनेसे ही अपना मान होगा, सत्कार होगा और लोगोंमें नाम होगा, जिससे लोगोंपर हमारा दबाव, आधिपत्य रहेगा। 'मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तः'—भगवान्‌ कहते हैं कि मैं जो उनके शरीरमें और दूसरोंके शरीरमें रहता हूँ, उस मेरे साथ वे आसुर मनुष्य वैर रखते हैं। भगवान्‌के साथ वैर रखना क्या है?- श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे य उल्लङ्घ्य प्रवर्तते। आज्ञाभंगी मम द्वेषी नरके पतति ध्रुवम्॥ 'श्रुति और स्मृति-ये दोनों मेरी आज्ञाएँ हैं। इनका उल्लंघन करके जो मनमाने ढंगसे बर्ताव करता है, वह मेरी

१०५२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

आज्ञा-भंग करके मेरे साथ द्वेष रखनेवाला मनुष्य निश्चित ही नरकोंमें गिरता है।'

वे अपने अन्तःकरणमें विराजमान परमात्माके साथ भी विरोध करते हैं अर्थात् हृदयमें जो अच्छी स्फुरणाएँ होती हैं, सिद्धान्तकी अच्छी बातें आती हैं, उनकी वे उपेक्षा-तिरस्कार करते हैं, उनको मानते नहीं। वे दूसरे लोगोंकी अवज्ञा करते हैं, उनका तिरस्कार करते हैं, अपमान करते हैं, उनको दुःख देते हैं, उनसे अच्छी तरहसे द्वेष रखते हैं। यह सब उन प्राणियोंके रूपमें भगवान्के साथ द्वेष करना है।

‘अध्यमूयकाः’ —वे मेरे और दूसरोंके गुणोंमें दोष-दृष्टि रखते हैं। मेरे विषयमें वे कहते हैं कि भगवान् बड़े पक्षपाती हैं; वे भक्तोंकी तो रक्षा करते हैं और दूसरोंका विनाश करते हैं, यह बात बढ़िया नहीं है। आजतक जितने

परिशिष्ट भाव —आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य अपनी जिदपर पक्के रहते हैं और अपनी बातको ही सच्चा मानते हैं। यह सिद्धान्त है कि जो खुद दुःखी होता है, वही दूसरोंको दुःख देता है। आसुर मनुष्य खुद दुःखी रहते हैं, इसलिये वे दूसरोंको भी दुःख देते हैं। उनको कहीं भी गुण नहीं दीखता, प्रत्युत दोष-ही-दोष दीखते हैं। उनकी ऐसी मान्यता होती है कि सब अच्छाई हमारेमें ही है। उनको संसारमें कोई अच्छा आदमी दीखता ही नहीं।

तानहं द्विषतः कूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्वमशुभानासुरीब्धेव

योनिषु ॥ १९ ॥

तान्= उननराधमान्= महान् नीच,आसुरीषु= आसुरी
द्विषतः= द्वेष करनेवाले,अशुभान्= अपवित्रयोनिषु= योनियोंमें
कूरान्= क्रूर स्वभाववालेमनुष्योंकोएव= ही
(और)अहम्= मैंक्षिपामि= गिराता
संसारेषु= संसारमेंअजस्वम्= बार-बाररहता हूँ।

व्याख्या —‘तानहं द्विषतः कूरान्संसारेषु नराधमान्’—सातवें अध्यायके पंद्रहवें और नवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें वर्णित आसुरी-सम्पदाका इस अध्यायके सातवेंसे अठारहवें श्लोकतक विस्तारसे वर्णन किया गया। अब आसुरी-सम्पदाके विषयका इन दो (उन्नीसवें-बीसवें) श्लोकोंमें उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं कि ऐसे आसुर मनुष्य बिना ही कारण सबसे वैर रखते हैं और सबका अनिष्ट करनेपर ही तुले रहते हैं। उनके कर्म बड़े क्रूर होते हैं, जिनके द्वारा दूसरोंकी हिंसा आदि हुआ करती है। ऐसे वे क्रूर, निर्दयी, हिंसक मनुष्य नराधम अर्थात् मनुष्योंमें महान् नीच हैं—‘नराधमान्’। उनको मनुष्योंमें नीच कहनेका मतलब यह है कि नरकोंमें रहनेवाले और

संत-महात्मा हुए हैं और अभी भी जो संत-महात्मा तथा अच्छी स्थितिवाले साधक हैं, उनके विषयमें वे आसुर लोग कहते हैं कि उनमें भी राग-द्वेष, काम-क्रोध, स्वार्थ, दिखावटीपन आदि दोष पाये जाते हैं; किसी भी संत महात्माका चरित्र ऐसा नहीं है, जिसमें ये दोष न आये हों; अतः यह सब पाखण्ड है; हमने भी इन सब बातोंको करके देखा है; हमने भी संयम किया है, भजन किया है, व्रत किये हैं, तीर्थ किये हैं, पर वास्तवमें इनमें कोई दम नहीं है; हमें तो कुछ नहीं मिला, मुफ्तमें ही दुःख पाया; उनके करनेमें वह समय हमारा व्यर्थमें ही बरबाद हुआ है; वे लोग भी किसीके बहकावेमें आकर अपना समय बरबाद कर रहे हैं; अभी ये ऐसे प्रवाहमें बहे हुए हैं और उल्टे रास्तेपर जा रहे हैं; अभी इनको होश नहीं है, पर जब कभी चेतेंगे, तब उनको भी पता लगेगा; आदि-आदि।

पशु-पक्षी आदि (चौरासी लाख योनियों) अपने पूर्वकर्मीका फल भोगकर शुद्ध हो रहे हैं और ये आसुर मनुष्य अन्याय-पाप करके पशु-पक्षी आदिसे भी नीचेकी ओर जा रहे हैं। इसलिये इन लोगोंका संग बहुत बुरा कहा गया है—

बक भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देई बिधाता ॥

(मानस ५। ४६। ४)

नरकोंका वास बहुत अच्छा है, पर विधाता (ब्रह्मा) हमें दुष्टका संग कभी न दे; क्योंकि नरकोंके वाससे तो पाप नष्ट होकर शुद्धि आती है, पर दुष्टोंके संगसे अशुद्धि आती है, पाप बनते हैं; पापके ऐसे बीज बोये जाते हैं, जो आगे नरक तथा चौरासी लाख योनियों भोगनेपर भी पूरे नष्ट नहीं होते।

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५३

प्रकृतिके अंश शरीरमें राग अधिक होनेसे आसुरी-सम्पत्ति अधिक आती है; क्योंकि भगवान्ने कामना-(राग-) को सम्पूर्ण पापोंमें हेतु बताया है (तीसरे अध्यायका सैतीसवाँ श्लोक)। उस कामनाके बढ़ जानेसे आसुरी-सम्पत्ति बढ़ती ही चली जाती है। जैसे धनकी अधिक कामना बढ़नेसे झूठ, कपट, छल आदि दोष विशेषतासे बढ़ जाते हैं और वृत्तियोंमें भी अधिक-से-अधिक धन कैसे मिले—ऐसा लोभ बढ़ जाता है। फिर मनुष्य अनुचित रीतिसे, छिपावसे, चोरीसे धन लेनेकी इच्छा करता है। इससे भी अधिक लोभ बढ़ जाता है, तो फिर मनुष्य डकैती करने लग जाता है और थोड़े धनके लिये मनुष्यकी हत्या कर देनेमें भी नहीं हिचकता। इस प्रकार उसमें क्रूरता बढ़ती रहती है और उसका स्वभाव राक्षसों-जैसा बन जाता है। स्वभाव बिगड़नेपर उसका पतन होता चला जाता है और अन्तमें उसे कीट-पतंग आदि आसुरी योनियों और घोर नरकोंकी महान् यातना भोगनी पड़ती है।

‘क्षिपाम्यजस्त्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु’—जिनका नाम लेना, दर्शन करना, स्मरण करना आदि भी महान् अपवित्र करनेवाला है—‘अशुभान्’, ऐसे क्रूर, निर्दयी, सबके वैरी मनुष्योंके स्वभावके अनुसार ही भगवान् उनको आसुरी योनि देते हैं। भगवान् कहते हैं—‘आसुरीष्वेव योनिषु क्षिपामि’ अर्थात् मैं उनको उनके स्वभावके लायक ही कुत्ता, साँप, बिच्छू, बाघ, सिंह आदि आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ। वह भी एक-दो बार नहीं, प्रत्युत बार-बार

गिराता हूँ—‘अजस्त्रम्’, जिससे वे अपने कर्मोंका फल भोगकर शुद्ध, निर्मल होते रहें।

भगवान्का उनको आसुरी योनियोंमें गिरानेका तात्पर्य क्या है?

भगवान्का उन क्रूर, निर्दयी मनुष्योंपर भी अपनापन है। भगवान् उनको पराया नहीं समझते, अपना द्वेषी-वैरी नहीं समझते, प्रत्युत अपना ही समझते हैं। जैसे, जो भक्त जिस प्रकार भगवान्की शरण लेते हैं, भगवान् भी उनको उसी प्रकार आश्रय देते हैं (गीता—चौथे अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। ऐसे ही जो भगवान्के साथ द्वेष करते हैं, उनके साथ भगवान् द्वेष नहीं करते, प्रत्युत उनको अपना ही समझते हैं। दूसरे साधारण मनुष्य जिस मनुष्यसे अपनापन करते हैं, उस मनुष्यको ज्यादा सुख-आराम देकर उसको लौकिक सुखमें फँसा देते हैं; परन्तु भगवान् जिनसे अपनापन करते हैं, उनको शुद्ध बनानेके लिये वे प्रतिकूल परिस्थिति भेजते हैं, जिससे वे सदाके लिये सुखी हो जायें—उनका उद्धार हो जाय।

जैसे, हिंतेषी अध्यापक विद्यार्थियोंपर शासन करके, उनकी ताड़ना करके पढ़ाते हैं, जिससे वे विद्वान् बन जायें, उन्नत बन जायें, सुन्दर बन जायें, ऐसे ही जो प्राणी परमात्माको जानते नहीं, मानते नहीं और उनका खण्डन करते हैं, उनको भी परम कृपालु भगवान् जानते हैं, अपना मानते हैं और उनको आसुरी योनियोंमें गिराते हैं, जिससे उनके किये हुए पाप दूर हो जायें और वे शुद्ध, निर्मल बनकर अपना कल्याण कर लें।

आसुरी योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्यधर्मां गतिम् ॥ २० ॥

कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन ! | जन्मनि, जन्मनि | = जन्म-जन्मान्तरमें | अधिक | ---|---|---|---|---|--- मूढाः | = (वे) मूढ़ | आसुरीम् | = आसुरी | अधमाम् | = अधम | मनुष्य | योनिम् | = योनिको | गतिम् | = गतिमें अर्थात् माम् | = मुझे | आपन्नाः | = प्राप्त होते हैं, | | भयंकर अप्राप्य | = प्राप्त न करके | ततः | = (फिर) | | नरकोंमें एव | = ही | | उससे भी | यान्ति | = चले जाते हैं।

व्याख्या—‘आसुरी योनिमापन्ना’………‘मामप्राप्यैव कौन्तेय’—पीछेके श्लोकमें भगवान्ने आसुर मनुष्योंको बार-बार पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें गिरानेकी बात कही। अब उसी बातको लेकर भगवान् यहाँ कहते हैं कि

मनुष्य-जन्ममें मुझे प्राप्त करनेका दुर्लभ अवसर पाकर भी वे आसुर मनुष्य मेरी प्राप्ति न करके पशु, पक्षी आदि आसुरी योनियोंमें चले जाते हैं और बार-बार उन आसुरी योनियोंमें ही जन्म लेते रहते हैं।

१०५४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

‘मामप्राप्यैव’ पदसे भगवान् पश्चात्तापके साथ कहते हैं कि अत्यन्त कृपा करके मैंने जीवोंको मनुष्यशरीर देकर इन्हें अपना उद्धार करनेका मौका दिया और यह विश्वास किया कि ये अपना उद्धार अवश्य कर लेंगे; परन्तु ये नराधम इतने मूढ़ और विश्वासघाती निकले कि जिस शरीरसे मेरी प्राप्ति करनी थी, उससे मेरी प्राप्ति न करके उलटे अधम गतिको चले गये!

मनुष्यशरीर प्राप्त हो जानेके बाद वह कैसा ही आचरणवाला क्यों न हो अर्थात् दुराचारी-से-दुराचारी क्यों न हो, वह भी यदि चाहे तो थोड़े-से-थोड़े समयमें (गीता—नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ श्लोक) और जीवनके अन्तकालमें (गीता—आठवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) भी भगवान्को प्राप्त कर सकता है। कारण कि ‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ (गीता ९।२९) कहकर भगवान्ने अपनी प्राप्ति सबके लिये अर्थात् प्राणिमात्रके लिये खुली रखी है। हाँ, यह बात हो सकती है कि पशु-पक्षी आदिमें उनको प्राप्त करनेकी योग्यता नहीं है; परन्तु भगवान्की तरफसे तो किसीके लिये भी मना नहीं है। ऐसा अवसर सर्वथा प्राप्त हो जानेपर भी ये आसुर मनुष्य भगवान्को प्राप्त न करके अधम गतिमें चले जाते हैं, तो इनकी इस दुर्गतिको देखकर परम दयालु प्रभु दुःखी होते हैं।

‘ततो यान्त्यधमां गतिम्’—आसुरी योनियोंमें जानेपर भी उनके सभी पाप पूरे नष्ट नहीं होते। अतः उन बचे हुए पापोंको भोगनेके लिये वे उन आसुरी योनियोंसे भी भयंकर अधम गतिको अर्थात् नरकोंको प्राप्त होते हैं। यहाँ शंका हो सकती है कि आसुरी योनियोंको प्राप्त हुए मनुष्योंको तो उन योनियोंमें भगवान्को प्राप्त करनेका अवसर ही नहीं है और उनमें वह योग्यता भी नहीं है, फिर भगवान्ने ऐसा क्यों कहा कि वे मेरेको प्राप्त न करके उससे भी अधम गतिमें चले जाते हैं? इसका समाधान यह है कि भगवान्का ऐसा कहना आसुरी योनियोंको प्राप्त होनेसे पूर्व मनुष्यशरीरको लेकर ही है। तात्पर्य है कि मनुष्यशरीरको पाकर, मेरी प्राप्तिका अधिकार पाकर भी वे मनुष्य मेरी प्राप्ति न करके जन्म-जन्मान्तरमें आसुरी योनियोंको प्राप्त होते हैं। इतना ही नहीं, वे उन आसुरी योनियोंसे भी नीचे कुम्भीपाक आदि घोर नरकोंमें चले जाते हैं।

विशेष बात

भगवत्प्राप्तिके अथवा कल्याणके उद्देश्यसे दिये गये मनुष्यशरीरको पाकर भी मनुष्य कामना, स्वार्थ एवं अभिमानके वशीभूत होकर चोरी-डकैती, झूठ-कपट धोखा, विश्वासघात, हिंसा आदि जिन कर्मोंको करते हैं उनके दो परिणाम होते हैं—(१) बाहरी फल-अंश और (२) भीतरी संस्कार-अंश। दूसरोंको दुःख देनेपर उनका (जिनको दुःख दिया गया है) तो वही नुकसान होता है, जो प्रारब्धसे होनेवाला है; परन्तु जो दुःख देते हैं, वे नया पाप करते हैं, जिसका फल नरक उन्हें भोगना ही पड़ता है। इतना ही नहीं, दुराचारोंके द्वारा जो नये पाप होनेके बीज बोये जाते हैं अर्थात् उन दुराचारोंके द्वारा अहंतामें जो दुर्भाव बैठ जाते हैं, उनसे मनुष्यका बहुत भयंकर नुकसान होता है। जैसे, चोरीरूप कर्म करनेसे पहले मनुष्य स्वयं चोर बनता है; क्योंकि वह चोर बनकर ही चोरी करेगा और चोरी करनेसे अपनेमें (अहंतामें) चोरका भाव दृढ़ हो जायगा*। इस प्रकार चोरीके संस्कार उसकी अहंतामें बैठ जाते हैं। ये संस्कार मनुष्यका बड़ा भारी पतन करते हैं—उससे बार-बार चोरीरूप पाप करवाते हैं और फलस्वरूप नरकोंमें ले जाते हैं। अतः जबतक वह मनुष्य अपना कल्याण नहीं कर लेता अर्थात् जबतक वह अपनी अहंतामें बैठये हुए दुर्भावोंको नहीं मिटाता, तबतक वे दुर्भाव जन्म-जन्मान्तरतक दुराचारोंको बल देते रहेंगे, उकसाते रहेंगे और उनके कारण वे आसुरी योनियोंमें तथा उससे भी भयंकर नरक आदिमें दुःख, सन्ताप, आफत आदि पाते ही रहेंगे।

उन आसुरी योनियोंमें भी उनकी प्रकृति और प्रवृत्तिके अनुसार यह देखा जाता है कि कई पशु-पक्षी, भूत-पिशाच, कीट-पतंग आदि सौम्य-प्रकृति-प्रधान होते हैं और कई क्रूर-प्रकृति-प्रधान होते हैं। इस तरह उनकी प्रकृति-(स्वभाव-) में भेद उनकी अपनी बनायी हुई शुद्ध या अशुद्ध अहंताके कारण ही होते हैं। अतः उन योनियोंमें अपने-अपने कर्मोंका फलभोग होनेपर भी उनकी प्रकृतिके भेद वैसे ही बने रहते हैं। इतना ही नहीं, सम्पूर्ण योनियोंको और नरकोंको भोगनेके बाद किसी क्रमसे अथवा भगवत्कृपासे उनको मनुष्यशरीर प्राप्त हो भी जाता है, तो भी उनकी अहंतामें बैठे हुए काम-क्रोधादि दुर्भाव पहले-जैसे ही रहते

  • दुर्भावोंसे दुराचार पैदा होते हैं और दुराचारोंसे दुर्भाव पुष्ट होते हैं।

श्लोक २१ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५५

है। इसी प्रकार जो स्वर्गप्राप्तिकी कामनासे यहाँ शुभ कर्म करते हैं, और मरनेके बाद उन कर्मोंके अनुसार स्वर्गमें जाते हैं, वहाँ उनके कर्मोंका फलभाग तो हो जाता है, पर

उनके स्वभावका परिवर्तन नहीं होता अर्थात् उनकी अहंतामें परिवर्तन नहीं होता। स्वभावको बदलनेका, शुद्ध बनानेका मौका तो मनुष्य-शरीरमें ही है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि ये जीव मनुष्य-शरीरमें मेरी प्राप्तिका अवसर पाकर भी मुझे प्राप्त नहीं करते, जिससे मुझे उनको अधम योनिमें भेजना पड़ता है। उनका अधम योनिमें और अधम गति-(नरक-) में जानेका मूल कारण क्या है—इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥

कामः= काम,त्रिविधम्= तीन प्रकारकेतस्मात्= इसलिये
क्रोधः= क्रोधनरकस्य= नरककेएतत्= इन
तथा= औरद्वारम्= दरवाजेत्रयम्= तीनोंका
लोभः= लोभ—आत्मनः= जीवात्माकात्यजेत्= त्याग कर देना
इदम्= येनाशनम्= पतन करनेवाले हैं,चाहिये।

व्याख्या—‘कामः क्रोधस्तथा लोभस्त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम्’—भगवान्ने पाँचवें श्लोकमें कहा था कि दैवी-सम्पत्ति मोक्षके लिये और आसुरी-सम्पत्ति बन्धनके लिये है। तो वह आसुरी-सम्पत्ति आती कहाँसे है? जहाँ संसारकी कामना होती है। संसारके भोग-पदार्थोंका संग्रह, मान, बड़ाई, आराम आदि जो अच्छे दीखते हैं, उनमें जो महत्त्वबुद्धि या आकर्षण है, बस, वही मनुष्यको नरकोंकी तरफ ले जानेवाला है। इसलिये काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—ये षड्रिपु माने गये हैं। इनमेंसे कहींपर तीनका, कहींपर दोका और कहींपर एकका कथन किया जाता है, पर वे सब मिले-जुले हैं, एक ही धातुके हैं। इन सबमें ‘काम’ ही मूल है; क्योंकि कामनाके कारण ही

आदमी बँधता है (गीता—पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि मनुष्य न चाहता हुआ भी पापका आचरण क्यों करता है? उसके उत्तरमें भगवान्ने ‘काम’ और ‘क्रोध’—ये दो शत्रु बताये। परन्तु उन दोनोंमें भी ‘एष’ शब्द देकर कामनाको ही मुख्य बताया; क्योंकि कामनामें विघ्न पड़नेपर क्रोध आता है। यहाँ काम, क्रोध और लोभ—ये तीन शत्रु बताते हैं। तात्पर्य है कि भोगोंकी तरफ वृत्तियोंका होना ‘काम’ है और संग्रहकी तरफ वृत्तियोंका होना ‘लोभ’ है। जहाँ ‘काम’ शब्द अकेला आता है, वहाँ उसके अन्तर्गत ही भोग और संग्रहकी इच्छा आती है। परन्तु जहाँ ‘काम’ और ‘लोभ’—दोनों स्वतन्त्ररूपसे आते हैं, वहाँ भोगकी

१-अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्। नीचप्रसंगः कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम् ॥ (चाणक्यनीति ७।१७)

‘नरकसे आये हुए लोगोंमें ये लक्षण रहा करते हैं—अत्यन्त क्रोध, कटु वचन बोलना, दरिद्रता, स्वजनोंसे वैर, नीचोंका संग और कुलहीन-(नीच-) की सेवा।’

(कार्पण्यवृत्तिः स्वजनेषु निन्दा कुचैलता नीचजनेषु भक्तिः। अतीव रोषः कटुका च वाणी नरस्य चिह्नं नरकागतस्य ॥) (पद्मपुराण, सूक्ति० ५१।१३२)

२-स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे। दानप्रसंगो मधुरा च वाणी देवार्वचनं ब्राह्मणतर्पणं च ॥ (चाणक्यनीति ७।१६)

‘स्वर्गसे लौटकर मनुष्यलोकमें आये हुए लोगोंकी देहमें चार लक्षण रहा करते हैं—दान करनेमें प्रवृत्ति, मधुर वाणी बोलना, देवताओंका पूजन और ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट रखना।’

(स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि तेषां हृदये वसन्ति। दानं प्रशस्तं मधुरा च वाणी देवार्वचनं ब्राह्मणतर्पणं च ॥) (पद्मपुराण, सूक्ति० ५१।१३१)

१०५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

इच्छाको लेकर 'काम' और संग्रहकी इच्छाको लेकर 'लोभ' आता है और इन दोनोंमें बाधा पड़नेपर 'क्रोध' आता है। जब काम, क्रोध और लोभ—तीनों अधिक बढ़ जाते हैं, तब 'मोह' होता है।

कामसे क्रोध पैदा होता है और क्रोधसे सम्मोह हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। यदि कामनामें बाधा न पड़े, तो लोभ पैदा होता है और लोभसे सम्मोह हो जाता है। वास्तवमें यह 'काम' ही क्रोध और लोभका रूप धारण कर लेता है। सम्मोह हो जानेपर तमोगुण आ जाता है। फिर तो पूरी आसुरी-सम्पत्ति आ जाती है।

'नाशनमात्मनः' —काम, क्रोध और लोभ—ये तीनों मनुष्यका पतन करनेवाले हैं। जिनका उद्देश्य भोग भोगना और संग्रह करना होता है, वे लोग (अपनी समझसे)

अपनी उन्नति करनेके लिये इन तीनों दोषोंको हितकारी मान लेते हैं। उनका यही भाव रहता है कि हमलोग काम आदिसे सुख पायेंगे, आरामसे रहेंगे, खूब भोग भोगेंगे। यह भाव ही उनका पतन कर देता है।

'तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्' —ये काम, क्रोध आदि नरकोंके दरवाजे हैं। इसलिये मनुष्य इनका त्याग कर दे। इनका त्याग कैसे करे? तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर राग (काम) और द्वेष (क्रोध) स्थित रहते हैं। साधकको चाहिये कि वह इनके वशीभूत न हो। वशीभूत न होनेका अर्थ है कि काम, क्रोध, लोभको लेकर अर्थात् इनके आश्रित होकर कोई कार्य न करे; क्योंकि इनके वशीभूत होकर शास्त्र, धर्म और लोकमर्यादाके विरुद्ध कार्य करनेसे मनुष्यका पतन हो जाता है।

परिशिष्ट भाव —भोग भोगना 'काम' है। संग्रह करना 'लोभ' है। भोग और संग्रहमें बाधा देनेवालेपर 'क्रोध' आता है। ये तीनों आसुरी-सम्पत्तिके मूल हैं। सब पाप इन तीनोंसे ही होते हैं।

व्यक्ति और पदार्थ तो यहीं छूट जाते हैं, पर भीतरका भाव आसुर मनुष्योंको नरकोंमें ले जाता है।

सम्बन्ध—अब भगवान् काम, क्रोध और लोभसे रहित होनेका माहात्म्य बताते हैं—

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्भ्राऐस्त्रिभिर्नरः ।

आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन !विमुक्तः= रहित हुआकरता है, (वह)
एतैः= इननरः= (जो) मनुष्यततः
त्रिभिः,आत्मनः= अपनेपराम्
तमोद्भ्राः= नरकके तीनोंश्रेयः= कल्याणकागतिम्
दरवाजोंसेआचरति= आचरणयाति= प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या —'एतैर्विमुक्तः कौन्तेय' ततो याति परां गतिम्'—पूर्वश्लोकमें जिनको नरकका दरवाजा बताया गया है, उन्हीं काम, क्रोध और लोभको यहाँ 'तमोद्भ्रा' कहा गया है। 'तम' नाम अन्धकारका है, जो अज्ञानसे उत्पन्न होता है—'तमस्त्वज्ञानजं विद्धि' (गीता १४।८)। तात्पर्य है कि इन काम आदिके कारण 'मेरे साथ ये धन-सम्पत्ति, स्त्री-पुरुष, घर-परिवार आदि पहले भी नहीं थे और पीछे भी नहीं रहेंगे और अब भी इनसे प्रतिक्षण वियोग हो रहा है; अतः इनमें ममता करनेसे आगे मेरी क्या दशा होगी' आदि बातोंकी तरफ दृष्टि जाती ही नहीं अर्थात् बुद्धिमें अन्धकार छाया रहता है। अतः इन

काम आदिसे मुक्त होकर जो अपने कल्याणका आचरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। इसलिये साधकको इस बातकी विशेष सावधानी रखनी चाहिये कि वह काम, क्रोध और लोभ—तीनोंसे सावधान रहे। कारण कि इन तीनोंको साथमें रखते हुए जो साधन करता है, वह वास्तवमें असली साधक नहीं है। असली साधक वह होता है, जो इन दोषोंको अपने साथ रहने ही नहीं देता। ये दोष उसको हर समय खटकते रहते हैं; क्योंकि इनको साथमें रहनेका अवसर देना ही बड़ी भारी गलती है।

मनुष्य साधनकी तरफ तो ध्यान देते हैं, पर साथमें जो काम-क्रोधादि दोष रहते हैं, उनसे हमारा कितना अहित

श्लोक २३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५७

होता है—इस तरफ वे ध्यान कम देते हैं। इस कमीके कारण ही साधन करते हुए सदाचार भी होते रहते हैं और दुराचार भी होते रहते हैं; सदगुण भी आते हैं और दुर्गुण भी साथ रहते हैं। जप, ध्यान, कीर्तन, सत्संग, स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत आदि करके हम अपनेको शुद्ध बना लेंगे—ऐसा भाव साधकमें विशेष रहता है; परन्तु जो हमें अशुद्ध कर रहे हैं, उन दुर्गुण-दुराचारोंको हटानेका खयाल साधकमें कम रहता है, इसलिये—

आसुप्तेरामुते कालं नयेद् वेदान्तचित्तया। न वा दद्यादवसरं कामादीनां मनागपि॥

नींद खुलनेसे लेकर नींद आनेतक और जिस दिन पता लगे, उस दिनेसे लेकर मौत आनेतक—सब-का-सब समय परमात्मतत्त्वके (सगुण-निर्गुणके) चिन्तनमें ही लगाये। चिन्तनके सिवाय काम आदिको किंचिन्मात्र भी अवसर न दे।

‘ऐतैर्विमुक्तः’ का यह मतलब नहीं है कि जब हम दुर्गुण-दुराचारोंसे सर्वथा छूट जायेंगे, तब साधन करेंगे; किंतु साधकको भगवत्प्राप्तिका मुख्य उद्देश्य रखकर इनसे छूटनेका भी लक्ष्य रखना है। कारण कि झूठ, कपट, बेईमानी, काम, क्रोध आदि हमारे साथमें रहेंगे, तो नयी-नयी अशुद्धि—नये-नये पाप होते रहेंगे, जिससे साधनका

साक्षात् लाभ नहीं होगा। यही कारण है कि वर्षांतक साधनमें लगे रहनेपर भी साधक अपनी वास्तविक उन्नति नहीं देखते, उनको अपनेमें विशेष परिवर्तनका अनुभव नहीं होता। इन दोषोंसे रहित होनेपर शुद्ध स्वतःस्वाभाविक आती है। जीवमें अशुद्धि तो संसारकी तरफ लगनेसे ही आयी है, अन्यथा परमात्माका अंश होनेसे वह तो स्वतः ही शुद्ध है—

ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥

(मानस ७। ११७। १)

‘श्रेयः आचरति’ का तात्पर्य यह है कि काम, क्रोध और लोभ—इनमेंसे किसीको भी लेकर आचरण नहीं होना चाहिये अर्थात् असाधन-(निषिद्ध आचरण-) से रहित शुद्ध साधन होना चाहिये। भीतरमें कभी कोई वृत्ति आ भी जाय, तो उसको आचरणमें न आने दे। अपनी तरफसे तो (काम, क्रोधादिकी) वृत्तियोंको दूर करनेका ही उद्योग करे। अगर अपने उद्योगसे न दूर हों तो ‘हे नाथ! हे नाथ!! हे नाथ!!!’ ऐसे भगवान्को पुकारे। गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज कहते हैं—

मम हृदय भवन प्रभु तोरा। तहं बसे आइ बहु चोरा॥ अति कठिन करहिं बरजोरा। मानहिं नहिं बिनय निहोरा॥

(विनय-पत्रिका १२५। २-३)

परिशिष्ट भाव—‘ऐतैर्विमुक्तः’—काम-क्रोध-लोभसे रहित होनेका तात्पर्य है—इनके त्यागका उद्देश्य रखना, इनके वशमें न होना। कामसे, क्रोधसे अथवा लोभसे किया गया शुभकर्म भी कल्याणकारक नहीं होता। इसलिये इनके त्यागकी तरफ विशेष ध्यान देना चाहिये। काम-क्रोध-लोभको पकड़े रहनेसे कल्याणका आचरण (जप, ध्यान आदि) करनेपर भी कल्याण नहीं होता; क्योंकि ये सम्पूर्ण पापोंके कारण हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सैतीसवाँ श्लोक)।

काम-क्रोध-लोभके कारण धर्म और समाजकी मर्यादा नष्ट हो जाती है, जिससे दुनियाका बड़ा अहित होता है। आसुरी स्वभाववाले मनुष्य काम-क्रोध-लोभके परायण होते हैं। वे यज्ञ, दान आदि सब शुभकर्म नाममात्रके लिये करते हैं, अपने कल्याणके लिये कुछ नहीं करते। परन्तु दैवी-सम्पत्तिवाले साधक काम-क्रोध-लोभके वशमें न होकर अपने कल्याणका आचरण करते हैं, जिससे दुनियाका स्वतः हित होता है। आसुरी मनुष्य ऐसे साधकोंको बेसमझ समझते हैं और इनसे द्वेष रखते हैं, पर इन साधकोंको उन आसुरी मनुष्योंपर दया आती है और वे उनको सदुद्दिष्ट देनेके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं।

सम्बन्ध—जो अपने कल्याणके लिये शास्त्रविधिके अनुसार चलते हैं, उनको तो परमगतिकी प्राप्ति होती है, पर जो ऐसा न करके मनमाने ढंगसे आचरण करते हैं, उनकी क्या गति होती है—यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिंमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ २३॥

१०५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

यः= जो मनुष्यसः= वह
शास्त्रविधिम्= शास्त्रविधिको= न
उत्सृज्य= छोड़करसिद्धिम्= सिद्धि ( अन्तः-करणकी शुद्धि)-को,
कामकारतः= अपनी इच्छासे मनमाना= न
वर्तते= आचरण करता है,सुखम्= सुख (शान्ति)-को

व्याख्या—[सत्रहवें अध्यायका अट्टाईसवाँ श्लोक भी इससे मिलता-जुलता है।]

'यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते'—जो लोग शास्त्रविधिकी अवहेलना करके शास्त्रविहित यज्ञ करते हैं, दान करते हैं, परोपकार करते हैं, दुनियाके लाभके लिये तरह-तरहके कई अच्छे-अच्छे काम करते हैं; परन्तु वह सब करते हैं—'कामकारतः' * अर्थात् शास्त्रविधिकी तरफ ध्यान न देकर अपने मनमाने ढंगसे करते हैं। मनमाने ढंगसे करनेमें कारण यह है कि उनके भीतर जो काम, क्रोध आदि पड़े रहते हैं, उनकी परवाह न करके वे बाहरी आचरणोंसे ही अपनेको बड़ा मानते हैं। तात्पर्य है कि वे बाहरके आचरणोंको ही श्रेष्ठ समझते हैं। दूसरे लोग भी बाहरके आचरणोंको ही विशेषतासे देखते हैं। भीतरके भावोंको, सिद्धान्तोंको जाननेवाले लोग बहुत कम होते हैं। परन्तु वास्तवमें भीतरके भावोंका ही विशेष महत्त्व है।

अगर भीतरमें दुर्गुण-दुर्भाव रहते हैं और बाहरसे बढ़े भारी त्यागी-तपस्वी बन जाते हैं, तो अभिमानमें आकर दूसरोंकी ताड़ना कर देते हैं। इस प्रकार भीतरमें बढ़े हुए देहाभिमानके कारण उनके गुण भी दोषमें परिणत हो जाते हैं, उनकी महिमा निन्दामें परिणत हो जाती है, उनका त्याग रागमें, आसक्तिमें, भोगोंमें परिणत हो जाता है और आगे चलकर वे पतनमें चले जाते हैं। इसलिये भीतरमें दोषोंके रहनेसे ही वे शास्त्रविधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करते हैं।

  • (अ) यहाँ आये, 'कामकारतः वर्तते' (शास्त्रविधिकी अवहेलना करके मनमाने ढंगसे बर्ताव करता है) और पाँचवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें आये 'कामकारेण फले सक्तः' (भोगोंकी, पदार्थकी इच्छासे फलमें आसक्त हुआ)—दोनोंमें थोड़ा अन्तर है। 'कामकारतः' में क्रिया करनेमें उच्छृङ्खल वृत्ति है और 'कामकारेण' में भोगोंकी इच्छा है। तात्पर्य है कि 'कामकारतः' की दृष्टि क्रियाकी तरफ है और 'कामकारेण' की दृष्टि क्रियाके परिणाम-(फल- ) की तरफ है कि परिणाममें मुझे अमुकामुक लाभ होगा। पर दोनोंमें मूल कारण तो 'काम' ही है।

(ब) एक बात ध्यान देनेकी है कि सातवें श्लोकसे लेकर इस तेईसवें श्लोकतक जो आसुरी-सम्पत्तिका वर्णन हुआ है, उसमें कुल नौ बार 'काम' शब्द आया है; जैसे—१—'कामहेतुकम्' (१६।८), २—'काममाश्रित्य' (१६।१०), ३—'कामोपभोगपरमाः' (१६।११), ४—'कामक्रोधपरायणाः' (१६।१२), ५—'कामभोगार्थम्' (१६।१२), ६—'कामभोगेषु' (१६।१६), ७—'कामम्' (१६।१८), ८—'कामः' (१६।२१) और ९—'कामकारतः' (१६।२३)। इससे यह बात सिद्ध होती है कि आसुरी-सम्पत्तिका मूल कारण 'काम' अर्थात् कामना ही है।

| | | (और) ---|---|---|--- न | = न | न | = न पराम् | = परम | पराम् | = परम गतिम् | = गतिको (ही) | गतिम् | = गतिको (ही) अवाप्नोति | = प्राप्त होता है। | अवाप्नोति | = प्राप्त होता है।

जैसे रोगी अपनी दृष्टिसे तो कुपथ्यका त्याग और पथ्यका सेवन करता है, पर वह आसक्तिवश कुपथ्य ले लेता है, जिससे उसका स्वास्थ्य और अधिक खराब हो जाता है। ऐसे ही वे लोग अपनी दृष्टिसे अच्छे-अच्छे काम करते हैं, पर भीतरमें काम, क्रोध और लोभका आवेश रहनेसे वे शास्त्रविधिकी अवहेलना करके मनमाने ढंगसे काम करने लग जाते हैं, जिससे वे अधोगतिमें चले जाते हैं।

'न स सिद्धिम्वाप्नोति'—आसुरी-सम्पदावाले जो लोग शास्त्र-विधिका त्याग करके यज्ञ आदि शुभ कर्म करते हैं, उनको धन, मान, आदर आदिके रूपमें कुछ प्रसिद्धिरूप सिद्धि मिल सकती है, पर वास्तवमें अन्तःकरणकी शुद्धिरूप जो सिद्धि है, वह उनको नहीं मिलती।

'न सुखम्'—उनको सुख भी नहीं मिलता; क्योंकि उनके भीतरमें काम-क्रोधादिकी जलन बनी रहती है। पदार्थिके संयोगसे होनेवाला सुख उन्हें मिल सकता है, पर वह सुख दुःखोंका कारण ही है अर्थात् उससे दुःख-ही-दुःख पैदा होते हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि पारमार्थिक मार्गमें मिलनेवाला सात्विक सुख उनको नहीं मिलता।

'न परां गतिम्'—उनको परमगति भी नहीं मिलती। परमगति मिले ही कैसे? पहले तो वे परमगतिको मानते ही नहीं और यदि मानते भी हैं, तो भी वह उनको मिल नहीं सकती; क्योंकि काम, क्रोध और लोभके कारण उनके कर्म ही ऐसे होते हैं।

श्लोक २४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५९

सिद्धि, सुख और परमगतिके न मिलनेका तात्पर्य यह है कि वे आचरण तो श्रेष्ठ करते हैं, जिससे उन्हें सिद्धि, सुख और परमगतिकी प्राप्ति हो सके; परन्तु भीतरमें काम, क्रोध, लोभ, अभिमान आदि रहनेसे उनके अच्छे आचरण भी बुराईमें ही चले जाते हैं। इससे उनको उपर्युक्त चीजें

नहीं मिलतीं। यदि ऐसा मान लिया जाय कि उनके आचरण ही बुरे होते हैं, तो भगवान्का 'न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्'—ऐसा कहना बनेगा ही नहीं; क्योंकि प्राप्ति होनेपर ही निषेध होता है—'प्राप्नोत्सत्यां निषेधः'।

परिशिष्ट भाव —आसुर मनुष्य अभिमानके कारण अपनेको सिद्ध और सुखी मानते हैं—'सिद्धोऽहं बलवान्मुखी' (गीता १६।१४), पर वास्तवमें वे सिद्ध और सुखी होते नहीं—'न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखम्'। उनके हृदयमें अभिमान और द्वेषकी अग्नि जलती रहती है!

सम्बन्ध—शास्त्रविधिका त्याग करनेसे मनुष्यको सिद्धि आदिकी प्राप्ति नहीं होती, इसलिये मनुष्यको क्या करना चाहिये—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥

तस्मात्= अतःप्रमाणम्= प्रमाण हैकर्म= कर्तव्य-कर्म
ते= तेरे लियेज्ञात्वा= (—ऐसा) जानकर
(तू)कर्तुम्= करने
कार्याकार्य-इह= इस लोकमेंअर्हसि= योग्य है
व्यवस्थितौ= कर्तव्य-शास्त्र-अर्थात् तुझे
अकर्तव्यकीविधानोक्तम्= शास्त्रविधिसेशास्त्रविधिके
व्यवस्थामेंनियतअनुसार कर्तव्य-कर्म
शास्त्रम्= शास्त्र (ही)करने चाहिये।

व्याख्या —'तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य-व्यवस्थितौ'—जिन मनुष्योंको अपने प्राणोंसे मोह होता है, वे प्रवृत्ति और निवृत्ति अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्यको न जाननेसे विशेषरूपसे आसुरी-सम्पत्तिमें प्रवृत्त होते हैं। इसलिये तू कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय करनेके लिये शास्त्रको सामने रख।

जिनकी महिमा शास्त्रोंने गायी है और जिनका बर्ताव शास्त्रीय सिद्धान्तके अनुसार होता है, ऐसे संत-महापुरुषोंके आचरणों और वचनोंके अनुसार चलना भी शास्त्रोंके अनुसार ही चलना है। कारण कि उन महापुरुषोंने शास्त्रोंको आदर दिया है और शास्त्रोंके अनुसार चलनेसे ही वे श्रेष्ठ पुरुष बने हैं। वास्तवमें देखा जाय तो जो महापुरुष परमात्मतत्त्वको प्राप्त हुए हैं, उनके आचरणों, आदर्शों, भावों आदिसे ही शास्त्र बनते हैं।

'शास्त्रं प्रमाणम्' का तात्पर्य यह है कि लोक-

परलोकका आश्रय लेकर चलनेवाले मनुष्योंके लिये कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है।

'ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि'— प्राणपोषण-परायण मनुष्य शास्त्रविधिको (कि किसमें प्रवृत्त होना है और किससे निवृत्त होना है) नहीं जानते (गीता—सोलहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक); इसलिये उनको सिद्धि आदिकी प्राप्ति नहीं होती। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तू तो दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त है; अतः तू शास्त्रविधिको जानकर कर्तव्यका पालन करनेयोग्य है।

अर्जुन पहले अपनी धारणासे कहते थे कि युद्ध करनेसे मुझे पाप लगेगा, जबकि भाग्यशाली श्रेष्ठ क्षत्रियोंके लिये अपने-आप प्राप्त हुआ युद्ध स्वर्गको देनेवाला है (गीता—दूसरे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। भगवान् कहते हैं कि भैया! तू पाप-पुण्यका निर्णय अपने मनमाने ढंगसे कर रहा है; तुझे तो इस विषयमें शास्त्रको प्रमाण

  • यहाँ 'इह' पद देनेका तात्पर्य है कि इस संसारमें मनुष्य-शरीर केवल श्रेष्ठ कर्म करके परमात्माको प्राप्त करनेके लिये ही मिला है। अतः यह अवसर कभी वृथा न जाने दे।

१०६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

रचना चाहिये। शास्त्रकी आज्ञा समझकर ही तुझे कर्तव्य-कर्म करना चाहिये। इसका तात्पर्य यह है कि युद्धरूप क्रिया बाँधनेवाली नहीं है, प्रत्युत स्वार्थ और अभिमान रखकर की हुई शास्त्रीय क्रिया (यज्ञ, दान आदि) ही बाँधनेवाली होती है; और मनमाने ढंगसे (शास्त्र-विपरीत)-की हुई क्रिया तो पतन करनेवाली होती है।

स्वतः प्राप्त युद्धरूप क्रिया क्रूर और हिंसारूप दीखती हुई भी पापजनक नहीं होती (गीता—अठारहवें अध्यायका सैंतालीसवें श्लोक)। तात्पर्य है कि

परिशिष्ट भाव —सातवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि आसुर स्वभाववाले मनुष्य कर्तव्य-अकर्तव्यको नहीं जानते। यहाँ भगवान् बताते हैं कि वह आसुर स्वभाव शास्त्रके अनुसार आचरण करनेसे ही मिटेगा।

यहाँ शंका हो सकती है कि जो शास्त्र पढ़े हुए नहीं हैं, उनको कर्तव्यका ज्ञान कैसे होगा? इसका समाधान है कि अगर उनका अपने कल्याणका उद्देश्य होगा तो अपने कर्तव्यका ज्ञान स्वतः होगा; क्योंकि आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य नहीं होगा तो शास्त्र पढ़नेपर भी कर्तव्यका ज्ञान नहीं होगा, उल्टे अज्ञान बढ़ेगा कि हम अधिक जानते हैं!

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे

दैवासुरसम्पद्भिभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषद्सु श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'दैवासुरसम्पद्भिभागयोग' नामक सोलहवें अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥

इस (सोलहवें) अध्यायका नाम 'दैवासुरसम्पद्-भिभागयोग' है; क्योंकि इस अध्यायमें जो दोनों सम्पत्तियोंका वर्णन हुआ है, वह परस्पर एक-दूसरेसे बिलकुल विरुद्ध है अर्थात् दैवी-सम्पत्ति कल्याण करनेवाली है और आसुरी-सम्पत्ति बाँधनेवाली तथा नीच योनियों और नरकोंमें ले जानेवाली है। जो साधक इन दोनों विभागोंको ठीक रीतिसे जान लेगा, वह आसुरी-सम्पत्तिका सर्वथा त्याग कर देगा। आसुरी-सम्पत्तिका सर्वथा त्याग होते ही दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट हो जायगी। दैवी-सम्पत्ति प्रकट होते ही एकमात्र परमात्मासे सम्बन्ध रह जायगा।

सोलहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथ षोडशोऽध्यायः' के तीन, 'श्रीभगवानुवाच' के दो, श्लोकोंके दो सौ सत्तासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदीका योग

स्वभावनियत कर्म करता हुआ सर्वथा स्वार्थरहित मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इनके स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो आज्ञा दी है, उसके अनुसार कर्म करनेसे मनुष्यको पाप नहीं लगता। पाप लगता है—स्वार्थसे, अभिमानसे और दूसरोंका अनिष्ट सोचनेसे।

मनुष्य-जन्मकी सार्थकता यही है कि वह शरीर-प्राणोंके मोहमें न फँसकर केवल परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे शास्त्रविहित कर्मोंको करे।

कि आसुर स्वभाववाले मनुष्य कर्तव्य-अकर्तव्यको नहीं

जानते। यहाँ भगवान् बताते हैं कि वह आसुर स्वभाव शास्त्रके अनुसार आचरण करनेसे ही मिटेगा।

यहाँ शंका हो सकती है कि जो शास्त्र पढ़े हुए नहीं हैं, उनको कर्तव्यका ज्ञान कैसे होगा? इसका समाधान है कि अगर उनका अपने कल्याणका उद्देश्य होगा तो अपने कर्तव्यका ज्ञान स्वतः होगा; क्योंकि आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य नहीं होगा तो शास्त्र पढ़नेपर भी कर्तव्यका ज्ञान नहीं होगा, उल्टे अज्ञान बढ़ेगा कि हम अधिक जानते हैं!

तीन सौ पाँच है।

(२) इस अध्यायमें 'अथ षोडशोऽध्यायः' के सात, 'श्रीभगवानुवाच' के सात, श्लोकोंके सात सौ अड़सठ और पुष्पिकाके बावन अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग आठ सौ चौतीस है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—'श्रीभगवानुवाच'।

सोलहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके चौबीस श्लोकोंमेंसे—छठे श्लोकके प्रथम चरणमें, दसवें श्लोकके तृतीय चरणमें और बाईसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; तथा ग्यारहवें, तेरहवें और उन्नीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष अठारह श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ सप्तदशोऽध्यायः

अवतरणिका—

सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भगवान्ने शास्त्रविधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करनेवाले पुरुषोंको सिद्धि, सुख और परमगति न मिलनेकी बात कही। यह सुननेपर अर्जुनके मनमें आया कि शास्त्रविधिको ठीक-ठीक जाननेवाले लोग तो बहुत कम हैं। अधिक संख्यामें ऐसे ही लोग हैं, जो शास्त्रविधिको तो जानते नहीं, पर अपनी कुल-परम्परा, वर्ण, आश्रम, संस्कार आदिके अनुसार देवता आदिका श्रद्धापूर्वक यजन (पूजन) करते हैं। शास्त्रविधिका त्याग होनेसे ऐसे पुरुषोंकी नीची (आसुरी) स्थिति होनी चाहिये और श्रद्धा होनेसे ऊँची (दैवी) स्थिति होनी चाहिये। इसलिये वास्तवमें उनकी क्या स्थिति है—यह जाननेके लिये अर्जुन पहले श्लोकमें प्रश्न करते हैं१।

अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥

अर्जुन बोले—

कृष्ण= हे कृष्ण !यजन्ते= (देवता आदिका)का= कौन-सी है ?
ये= जो मनुष्यपूजन करते हैं,सत्त्वम्= सात्त्विकी है
शास्त्रविधिम्= शास्त्रविधिकातेषाम्= उनकीआहो= अथवा
उत्सृज्य= त्याग करकेनिष्ठा= निष्ठारजः, तमः= राजसी-
श्रद्धया, अन्विताः= श्रद्धापूर्वकतु= फिरतामसी

व्याख्या—[ यह सत्रहवाँ अध्याय सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकपर चला है। उसीको लेकर अर्जुन वहाँ आये 'यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य' (जो शास्त्रविधिका त्याग करके) की जगह यहाँ 'ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य' ही कहकर 'कामकारतः' (मनमाने ढंगसे) की जगह 'श्रद्धयान्विताः' (श्रद्धासे) कहते हैं; 'वर्तते' (बर्ताव करता है) की जगह 'यजन्ते' (यजन करता है) कहते हैं; और 'न स सिद्धिंमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्' (वह सिद्धि, सुख और परमगतिको प्राप्त नहीं होता) की जगह 'तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः' (उनकी निष्ठा कौन-सी है? सात्त्विकी—दैवी-सम्पत्तिवाली अथवा राजसी-

तामसी—आसुरी-सम्पत्तिवाली?) कहकर भगवान्से प्रश्न करते हैं। ]

'ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य' सत्त्वमाहो रजस्तमः'—

श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवाद सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये है। उन दोनोंके सामने कलियुगकी जनता थी; क्योंकि द्वारपयुग समाप्त हो रहा था। आगे आनेवाले कलियुगी जीवोंकी तरफ दृष्टि रहनेसे अर्जुन पूछते हैं कि महाराज! जिन मनुष्योंका भाव बड़ा अच्छा है, श्रद्धा-भक्ति भी है, पर शास्त्रविधिको जानते नहीं। यदि वे जान जायँ, तो पालन करने लग जायँ, पर उनको पता नहीं। अतः उनकी क्या स्थिति होती है?

१-इस (सत्रहवें) अध्यायको नवें अध्यायके सत्ताईसवें श्लोक (यत्करोषि यदृशनासि.....तत्कुरुष्व मदर्पणम्) की व्याख्या मानना विचारसे युक्तिसंगत नहीं बैठता। कारण कि नवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक 'भगवदर्पण-विषयक' प्रकरणमें आया है, जो छब्बीसवें श्लोकसे आरम्भ हुआ है और अठ्ठाईसवें श्लोकमें (भगवदर्पणका फल बतलाकर) समाप्त हुआ है। परन्तु यहाँ मनुष्योंकी श्रद्धाको पहचाननेका प्रसंग है; क्योंकि इस (सत्रहवें) अध्यायके आरम्भमें अर्जुनका प्रश्न मनुष्योंकी निष्ठा, श्रद्धाको लेकर ही है। अतः भगवान् उसका उत्तर भी श्रद्धाको लेकर ही देते हैं।

२-शास्त्रविधिका त्याग तीन कारणोंसे होता है—(१) अज्ञतासे, (२) उपेक्षासे और (३) विरोधसे।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

आगे आनेवाली जनतामें शास्त्रका ज्ञान बहुत कम रहेगा। उन्हें अच्छा सत्संग मिलना भी कठिन होगा; क्योंकि अच्छे सन्त-महात्मा पहले युगोंमें भी कम हुए हैं, फिर कलियुगमें तो और भी कम होंगे। कम होनेपर भी यदि भीतर चाहना हो तो उन्हें सत्संग मिल सकता है। परन्तु मुश्किल यह है कि कलियुगमें दम्भ, पाखण्ड ज्वादा होनेसे कई दम्भी और पाखण्डी पुरुष सन्त बन जाते हैं। अतः सच्चे सन्त पहचानमें आने मुश्किल हैं। इस प्रकार पहले तो सन्त-महात्मा मिलने कठिन हैं और मिल भी जायें तो उनमेंसे कौन-से संत कैसे हैं—इस बातकी पहचान प्रायः नहीं होती और पहचान हुए बिना उनका संग करके विशेष लाभ ले लें—ऐसी बात भी नहीं है। अतः जो शास्त्र-विधिको भी नहीं जानते और असली सन्तोंका संग भी नहीं मिलता, परन्तु जो कुछ यजन-पूजन करते हैं, श्रद्धासे करते हैं—ऐसे मनुष्योंकी निष्ठा कौन-सी होती है? सात्त्विकी अथवा राजसी-तामसी?

‘सत्त्वमाहो रजस्तमः’ ‘पदोंमें सत्त्वगुणको दैवी-सम्पत्तिमें और रजोगुण तथा तमोगुणको आसुरी-सम्पत्तिमें ले लिया गया है। रजोगुणको आसुरी-सम्पत्तिमें लेनेका कारण यह है कि रजोगुण-तमोगुणके बहुत निकट हैं। गीतामें कई जगह ऐसी बात आयी है; जैसे—दूसरे अध्यायके बासठवें-तिरसठवें श्लोकोंमें काम अर्थात् रजोगुणसे क्रोध और क्रोधसे मोहरूप तमोगुणका उत्पन्न होना बताया गया है। ऐसे ही अठारहवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें हिंसात्मक और शोकान्वितको रजोगुणी कर्ताका लक्षण बताया गया है और अठारहवें अध्यायके ही पचीसवें श्लोकमें ‘हिंसा’ को तामस कर्मका लक्षण और पैंतीसवें श्लोकमें ‘शोक’ को तामस धृतिका लक्षण बताया गया है। इस प्रकार रजोगुण और तमोगुणके बहुत-से लक्षण आपसमें मिलते हैं।

सात्त्विक भाव, आचरण और विचार दैवी-सम्पत्तिके होते हैं और राजसी-तामसी भाव, आचरण और विचार

आसुरी-सम्पत्तिके होते हैं। सम्पत्तिके अनुसार ही निष्ठा होती है अर्थात् मनुष्यके जैसे भाव, आचरण और विचार होते हैं, उन्हींके अनुसार उसकी स्थिति (निष्ठा) होती है। स्थितिके अनुसार ही आगे गति होती है। आप कहते हैं कि शास्त्र-विधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करनेपर सिद्धि, सुख और परमगति नहीं मिलती, तो जब उनकी निष्ठाका ही पता नहीं, फिर उनकी गतिका क्या पता लगे? इसलिये आप उनकी निष्ठा बताइये, जिससे पता लग जाय कि वे सात्त्विकी गतिमें जानेवाले हैं या राजसी-तामसी गतिमें।

‘कृष्ण’ का अर्थ है—खींचनेवाला। यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधनका तात्पर्य यह मालूम देता है कि आप ऐसे मनुष्योंको अन्तिम समयमें किस ओर खींचेंगे? उनको किस गतिकी तरफ ले जायेंगे? छठे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भी अर्जुनने गति-विषयक प्रश्नमें ‘कृष्ण’ सम्बोधन दिया है—‘कां गतिं कृष्ण गच्छति’। यहाँ भी अर्जुनका निष्ठा पूछनेका तात्पर्य गतिमें ही है।

मनुष्यको भगवान् खींचते हैं या वह कर्मोंके अनुसार स्वयं खींचा जाता है? वस्तुतः कर्मोंके अनुसार ही फल मिलता है, पर कर्मफलके विधायक होनेसे भगवान्का खींचना सम्पूर्ण फलोंमें होता है। तामसी कर्मोंका फल नरक होगा, तो भगवान् नरकोंकी तरफ खींचेंगे। वास्तवमें नरकोंके द्वारा पापोंका नाश करके प्रकाशन्तरसे भगवान् अपनी तरफ ही खींचते हैं। उनका किसीसे भी वैर या द्वेष नहीं है। तभी तो आसुरी योनियोंमें जानेवालोंके लिये भगवान् कहते हैं कि वे मेरेको प्राप्त न होकर अधोगतिमें चले गये (सोलहवें अध्यायका बीसवों श्लोक)। कारण कि उनका अधोगतिमें जाना भगवान्को सुहाता नहीं है। इसलिये सात्त्विक मनुष्य हो, राजस मनुष्य हो या तामस मनुष्य हो, भगवान् सबको अपनी तरफ ही खींचते हैं। इसी भावसे यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधन आया है।

सम्बन्ध—शास्त्रविधिको न जाननेपर भी मनुष्यमात्रमें किसी-न-किसी प्रकारकी स्वभावजा श्रद्धा तो रहती ही है। उस श्रद्धाके भेद आगेके श्लोकमें बताते हैं।

श्रीभगवानुवाच

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥

१-तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण—तीनों गुणोंमें परस्पर दसगुना अन्तर है। जैसे एकका दसगुना दस; और दसका दसगुना सौ है, उसी तरह तमोगुण (१) से दसगुना श्रेष्ठ रजोगुण (१०) है और रजोगुणसे दसगुना श्रेष्ठ सत्त्वगुण (१००) है। तात्पर्य है कि तमोगुण और रजोगुण पास-पासमें हैं, जबकि सत्त्वगुण दोनोंसे बहुत दूर है।

२-क्रोधका कारण रजोगुण है और कार्य तमोगुण है।