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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1133

११३२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १८

मालिकके पैसा देगा कौन? यदि कोई जंगलमें जाकर

दिनभर मेहनत करे तो क्या उसको पैसे मिल जायें? नहीं

मिल सकते। उसमें यह देखा जायगा कि किसके कहनेसे

काम किया और किसकी जिम्मेदारी रही।

अगर कोई नौकर कामको बड़ी तत्परता, चतुरता और

उत्साहसे करता है, पर करता है केवल मालिककी

प्रसन्नताके लिये तो मालिक उसको मजदूरीसे अधिक पैसे

भी दे देता है और तत्परता आदि गुणोंको देखकर उसको

अपने खेतका हिस्सेदार भी बना देता है। ऐसे ही भगवान्

मनुष्यको उसके कर्मोंके अनुसार फल देते हैं। अगर कोई

मनुष्य भगवान्की आज्ञाके अनुसार, उन्हींकी प्रसन्नताके

लिये सब कार्य करता है, उसे भगवान् दूसरोंकी अपेक्षा

अधिक ही देते हैं; परन्तु जो भगवान्के सर्वथा समर्पित

होकर सब कार्य करता है, उस भक्तके भगवान् भी भक्त

बन जाते हैं!* संसारमें कोई भी नौकरको अपना मालिक

नहीं बनाता; परन्तु भगवान् शरणागत भक्तको अपना

मालिक बना लेते हैं। ऐसी उदारता केवल प्रभुमें ही है।

ऐसे प्रभुके चरणोंकी शरण न होकर जो मनुष्य प्राकृत-

उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंके पराधीन रहते हैं, उनकी

बुद्धि सर्वथा ही भ्रष्ट हो चुकी है। वे इस बातको समझ

ही नहीं सकते कि हमारे सामने प्रत्यक्ष उत्पन्न और नष्ट

होनेवाले पदार्थ हमें कहाँतक सहारा दे सकते हैं।

सम्बन्ध-जिस प्रकार कर्मयोगमें कर्मोंका अपने साथ सम्बन्ध नहीं रहता, ऐसे ही सांख्यसिद्धान्तमें भी कर्मोंका अपने

साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता-इसका विवेचन आगे करते हैं।

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।

साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥ १३॥

महाबाहो = हे

महाबाहो!

कृतान्ते = कर्मोंका

अन्त

करनेवाले

साङ्ख्ये = सांख्यसिद्धान्तमें

सर्वकर्मणाम् = सम्पूर्ण

कर्मोंकी

सिद्धये = सिद्धिके

लिये

एतानि = ये

पञ्च = पाँच

कारणानि = कारण

प्रोक्तानि = बताये

गये हैं,

मे = (इनको तू)

मुझसे

निबोध = समझ।

व्याख्या-'पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि'-हे महाबाहो!

जिसमें सम्पूर्ण कर्मोंका अन्त हो जाता है, ऐसे सांख्यसिद्धान्तमें

सम्पूर्ण विहित और निषिद्ध कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बताये

गये हैं। 'स्वयं' (स्वरूप) उन कर्मोंमें हेतु नहीं है।

'निबोध मे'-इस अध्यायमें भगवान्ने जहाँ सांख्य-

सिद्धान्तका वर्णन आरम्भ किया है, वहाँ 'निबोध' क्रियाका

प्रयोग किया है (इसी अध्यायका तेरहवाँ और पचासवाँ

श्लोक), जबकि दूसरी जगह 'शृणु' क्रियाका प्रयोग

किया है (इसी अध्यायका चौथा, उन्नीसवाँ, उनतीसवाँ,

छत्तीसवाँ, पैंतालीसवाँ और चौंसठवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह

है कि सांख्यसिद्धान्तमें तो 'निबोध' पदसे अच्छी तरह

समझनेकी बात कही है और दूसरी जगह 'शृणु' पदसे

सुननेकी बात कही है। अतः सांख्यसिद्धान्तको गहरी

रीतिसे समझना चाहिये। अगर उसे अपने-आप (स्वयं)-

से गहरी रीतिसे समझा जाय, तो तत्काल तत्त्वका अनुभव

हो जाता है।

'साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्'-

कर्म चाहे शास्त्रविहित हों, चाहे शास्त्रनिषिद्ध हों, चाहे

शारीरिक हों, चाहे मानसिक हों, चाहे वाचिक हों, चाहे

स्थूल हों और चाहे सूक्ष्म हों-इन सम्पूर्ण कर्मोंकी

सिद्धिके लिये पाँच हेतु कहे गये हैं। जब पुरुषका इन

कर्मोंमें कर्तृत्व रहता है, तब कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह दोनों

होते हैं और जब पुरुषका इन कर्मोंके होनेमें कर्तृत्व नहीं

रहता, तब कर्मसिद्धि तो होती है, पर कर्मसंग्रह नहीं होता,

प्रत्युत क्रियामात्र होती है। जैसे, संसारमात्रमें परिवर्तन होता

है अर्थात् नदियाँ बहती हैं, वायु चलती है, वृक्ष बढ़ते हैं

आदि-आदि क्रियाएँ होती रहती हैं, परन्तु इन क्रियाओंसे

कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् ये क्रियाएँ पाप-पुण्यजनक

  • एवं स्वभक्तयो राजन् भगवान् भक्तभक्तिमान्। (श्रीमद्भा० १०।८६।५९)