श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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अथवा बन्धनकारक नहीं होती। तात्पर्य यह हुआ कि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह होता है। कर्तृत्वाभिमान मिटनेपर क्रियामात्रमें अधिष्ठान, करण, चेष्टा और दैव—ये चार हेतु ही होते हैं (गीता—इसी अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)।
यहाँ सांख्यसिद्धान्तका वर्णन हो रहा है। सांख्यसिद्धान्तमें विवेक-विचारकी प्रधानता होती है, फिर भगवान्ने 'सर्वकर्माणां सिद्धये' वाली कर्मोंकी बात यहाँ क्यों छेड़ी? कारण कि अर्जुनके सामने युद्धका प्रसंग है। क्षत्रिय होनेके नाते युद्ध उनका कर्तव्य-कर्म है। इसलिये कर्मयोगसे अथवा सांख्ययोगसे ऐसे कर्म करने चाहिये, जिससे कर्म करते हुए भी कर्मोंसे सर्वथा निलिप्त रहे—यह बात भगवान्को कहनी है। अर्जुनने सांख्यका तत्त्व पूछा है, इसलिये भगवान् सांख्यसिद्धान्तसे कर्म करनेकी बात कहना आरम्भ करते हैं।
अर्जुन स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करना चाहते थे; अतः
परिशिष्ट भाव —आत्माको अकर्ता बतानेके लिये पाँच कारणोंका वर्णन करते हैं। इन पाँचोंमें कर्तृत्वका त्याग होनेपर कर्मोंका सर्वथा अन्त (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जाता है।
सम्बन्ध—सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु कौन-से हैं? अब यह बताते हैं।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ १४ ॥
- साक्षात् परमात्माका अंश होनेसे इस जीवकी परमात्माके साथ स्वतःसिद्ध आत्मीयता है। उस परमात्मासे विमुख होकर जीवने अहंताके साथ ममता कर ली, जिससे स्वयंको 'मैं संसारी हूँ, मैं त्यागी हूँ, मैं विवेकी हूँ, मैं पढ़ा-लिखा समझदार हूँ'—ऐसा व्यक्तित्व (मैंपन) प्रिय लगता है और यह छूट न जाय—इसका भय लगता है। यह अहंताके साथ ममता है। इसका त्याग करनेके लिये कर्मयोगमें 'मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिये और मेरे लिये कुछ नहीं करना है' इसी भावसे संसारके हितके लिये सब क्रियाएँ करे (कारण कि कर्मका सम्बन्ध 'पर'के प्रति है, 'स्व' के प्रति नहीं)। ऐसा करनेसे ममता छूट जायगी। ममता छूटते ही अहंता भी सर्वथा छूट जायगी।
कर्मयोगमें स्थूलशरीरसे क्रिया, सूक्ष्मशरीरसे परहितचिन्तन और कारणशरीरसे स्थिरता (एकाग्रता)—ये तीनों ही संसारके हितार्थ होते हैं। इसलिये दूसरोंके हितके लिये कर्म करते-करते सबके हितका चिन्तन होता है। हितका चिन्तन होते-होते स्वतः ही स्थिरता आती है, उस स्थिरतामें अहंता और ममता दोनोंका त्याग होता है और त्याग होनेसे शान्ति मिलती है।
संसारके त्यागसे जो शान्ति मिलती है, वह स्वरूप अथवा साध्य नहीं है, प्रत्युत वह तो एक साधन है—'योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते' (गीता ६।३)। परन्तु परमात्माकी प्राप्तिसे जो शान्ति मिलती है, वह साध्य है अर्थात् परमात्माका स्वरूप है—'शान्ति निर्वाणपरमाम्' (गीता ६।१५)।
अब साधकको सावधानी यह रखनी है कि वह उस साधनजन्य शान्तिका भोग न करे। भोग न करनेसे स्वतः वास्तविकताकी अनुभूति हो जायगी और यदि भोग करेगा तो वहींपर अटक जायगा।