श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
अत्र | = इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) | च | = और पृथिविधम् | = अनेक प्रकारके | पृथक् | = अलग-अलग ---|---|---|---|---|---|--- अधिष्ठानम् | = अधिष्ठान | करणम् | = करण | च, एव | = और वैसे ही | चेष्टा | = चेष्टाएँ तथा | = तथा | च | = एवम् | | पञ्चमम् | = पाँचवाँ कारण कर्ता | = कर्ता | विविधाः | = विविध प्रकारकी | | दैवम् | = दैव (संस्कार) है।
व्याख्या—‘अधिष्ठानम्’ —शरीर और जिस देशमें यह शरीर स्थित है, वह देश—ये दोनों ‘अधिष्ठान’ हैं।
‘कर्ता’ —सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्योंके द्वारा ही होती हैं। वे क्रियाएँ चाहे समष्टि हों, चाहे व्यक्ति हों; परन्तु उन क्रियाओंका कर्ता ‘स्वयं’ नहीं है। केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अर्थात् जिसको चेतन और जडका ज्ञान नहीं है—ऐसा अविवेकी पुरुष ही जब प्रकृतिसे होनेवाली क्रियाओंको अपनी मान लेता है, तब वह ‘कर्ता’ बन जाता है*। ऐसा ‘कर्ता’ ही कर्मोंकी सिद्धिमें हेतु बनता है।
‘करणं च पृथिविधम्’ —कुल तरह करण हैं। पाणि, पाद, वाक्, उपस्थ और पायु—ये पाँच कर्मन्द्रियाँ और श्रोत्र, चक्षु, त्वक्, रसना और घ्राण—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—ये दस ‘बहिःकरण’ हैं तथा मन, बुद्धि और अहंकार—ये तीन ‘अन्तःकरण’ हैं।
‘विविधाश्च पृथक्चेष्टाः’ —उपर्युक्त तरह करणोंकी अलग-अलग चेष्टाएँ होती हैं; जैसे—पाणि (हाथ)—आदान-प्रदान करना, पाद (पैर)—आना-जाना, चलना-फिरना, वाक् —बोलना, उपस्थ —मूत्रका त्याग करना, पायु (गुदा)—मलका त्याग करना, श्रोत्र —सुनना, चक्षु —
देखना, त्वक् —स्पर्श करना, रसना —चखना, घ्राण —सूँघना, मन —मनन करना, बुद्धि —निश्चय करना और अहंकार —‘मैं ऐसा हूँ’आदि अभिमान करना।
‘दैवं चैवात्र पञ्चमम्’ —कर्मोंकी सिद्धिमें पाँचवें हेतुका नाम ‘दैव’ है। यहाँ दैव नाम संस्कारोंका है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही संस्कार उसके अन्तःकरणपर पड़ता है। शुभ-कर्मका शुभ संस्कार पड़ता है और अशुभ-कर्मका अशुभ संस्कार पड़ता है। वे ही संस्कार आगे कर्म करनेकी स्फुरणा पैदा करते हैं। जिसमें जिस कर्मका संस्कार जितना अधिक होता है, उस कर्ममें वह उतनी ही सुगमतासे लग सकता है और जिस कर्मका विशेष संस्कार नहीं है, उसको करनेमें उसे कुछ परिश्रम पड़ सकता है। इसी प्रकार मनुष्य सुनता है, पुस्तके पढ़ता है और विचार भी करता है तो वे भी अपने-अपने संस्कारोंके अनुसार ही करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यके अन्तःकरणमें शुभ और अशुभ— जैसे संस्कार होते हैं, उन्हींके अनुसार कर्म करनेकी स्फुरणा होती है।
इस श्लोकमें कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताये गये हैं—अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव। इसका कारण यह है कि आधारके बिना कोई भी काम कहाँ किया
- सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं—इसका वर्णन गीतामें कई रीतियोंसे आता है; जैसे— (१) सब कर्म प्रकृतिके द्वारा ही किये जाते हैं—‘प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः’ (१३।२९), सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं—‘प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः’ (३।२७)।
(२) गुण ही गुणोंमें भरते हैं—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (३।२८); द्रष्टा गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता—‘नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति’ (१४।१९)।
(३) सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों-(विषयों)- में भरती हैं—‘इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते’ (५।९)।
(४) यहाँ (१८।१४ में) कर्मोंकी सिद्धिमें अधिष्ठान आदि पाँच हेतु बताये गये हैं।
इन सबका तात्पर्य यह है कि प्रकृति और पुरुष—इन दोनोंमेंसे केवल प्रकृतिमें ही क्रियाएँ होती हैं, पुरुषमें नहीं। प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेसे ही पुरुष उन क्रियाओंको अपनी मान लेता है। जैसे, कोई मनुष्य वायुयानमें बैठकर यह मान लेता है कि मैं वायुयानद्वारा जा रहा हूँ, जबकि वास्तवमें वायुयान ही चलता है, मनुष्य नहीं। ऐसे ही पुरुष अपनेको प्रकृतिकी क्रियाओंका कर्ता मान लेता है—‘अहंकारविमुद्वात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (३।२७)।
तत्त्वको जाननेवाला विवेकी पुरुष ऐसा अनुभव करता है कि सब क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्यमें ही हो रही हैं, इनमें मैं कुछ भी नहीं करता हूँ—‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्ववित्’ (५।८)।