श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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जायगा ? इसलिये 'अधिष्ठान' पद आया है। कर्ताके बिना क्रिया कौन करेगा ? इसलिये 'कर्ता' पद आया है। क्रिया करनेके साधन (करण) होनेसे ही तो कर्ता क्रिया करेगा, इसलिये 'करण' पद आया है। करनेके साधन होनेपर भी क्रिया नहीं की जायगी तो कर्मसिद्धि कैसे होगी ?
परिशिष्ट भाव—‘कर्ता’ —अहंकार अपरा प्रकृति है और जीव परा प्रकृति है। जीवका सम्बन्ध (सजातीयता) परमात्माके साथ है, पर वह अहंकारके साथ सम्बन्ध जोड़कर अपनेको कर्ता मान लेता है।
‘दैवम्’ —अच्छे-बुरे संस्कार सबके भीतर रहते हैं—‘सुमति कुमति सब के उर रहहीं’ (मानस, सुन्दर० ४०।३)। संग, शास्त्र और विचार—इन तीनोंसे अच्छे या बुरे संस्कारोंको बल मिलता है, जिससे नये कर्म होते हैं।
शरीरवाइमनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
| नरः | = मनुष्य | विपरीतम् | = शास्त्रविरुद्ध | तस्य | = उसके |
|---|---|---|---|---|---|
| शरीरवाइमनोभिः | = शरीर, वाणी और मनके द्वारा | यत् | = जो कुछ | एते | = ये (पूर्वोक्त) |
| न्याय्यम् | = शास्त्रविहित | वा | = भी | पञ्च | = पाँचों |
| वा | = अथवा | कर्म | = कर्म | हेतवः | = हेतु होते हैं। |
| प्रारभते | = आरम्भ करता है, |
व्याख्या—‘शरीरवाइमनोभिर्यत्कर्म’ —‘पञ्चैते तस्य हेतवः’—पीछेके (चौदहवें) श्लोकमें कर्मके होनेमें जो अधिष्ठान आदि पाँच हेतु बताये गये हैं, वे पाँचों हेतु इन पदोंमें आ जाते हैं; जैसे—‘शरीर’ पदमें अधिष्ठान आ गया, ‘वाक्’ पदमें बहिःकरण और ‘मन’ पदमें अन्तःकरण आ गया, ‘नरः’ पदमें कर्ता आ गया और ‘प्रारभते’ पदमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी चेष्टा आ गयी। अब रही ‘दैव’ की बात। यह दैव अर्थात् संस्कार अन्तःकरणमें ही रहता है; परन्तु उसका स्पष्ट रीतिसे पता नहीं लगता। उसका पता तो उससे उत्पन्न हुई वृत्तियोंसे और उसके अनुसार किये हुए कर्मोंसे ही लगता है।
मनुष्य शरीर, वाणी और मनसे जो कर्म आरम्भ करता है अर्थात् कहीं शरीरकी प्रधानतासे, कहीं वाणीकी प्रधानतासे और कहीं मनकी प्रधानतासे जो कर्म करता है, वह चाहे न्याय्य—शास्त्रविहित हो, चाहे विपरीत—शास्त्र-विरुद्ध हो, उसमें ये (पूर्वश्लोकमें आये) पाँच हेतु होते हैं।
शरीर, वाणी और मन—इन तीनोंके द्वारा ही सम्पूर्ण कर्म होते हैं। इनके द्वारा किये गये कर्मोंको ही कायिक, वाचिक और मानसिक कर्मकी संज्ञा दी जाती है। इन तीनोंमें अशुद्धि आनेसे ही बन्धन होता है। इसीलिये इन
इसलिये ‘चेष्टा’ पद आया है। कर्ता अपने-अपने संस्कारोंके अनुसार ही क्रिया करेगा, संस्कारोंके विरुद्ध अथवा संस्कारोंके बिना क्रिया नहीं कर सकेगा, इसलिये ‘दैव’ पद आया है। इस प्रकार इन पाँचोंके होनेसे ही कर्मसिद्धि होती है।
तीनों—(शरीर, वाणी और मन—) की शुद्धिके लिये सत्रहवें अध्यायके चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें क्रमशः कायिक, वाचिक और मानसिक तपका वर्णन किया गया है। तात्पर्य यह है कि शरीर, वाणी और मनसे कोई भी शास्त्रनिषिद्ध कर्म न किया जाय, केवल शास्त्रविहित कर्म ही किये जायें, तो वह ‘तप’ हो जाता है। सत्रहवें अध्यायके ही सत्रहवें श्लोकमें ‘अफलाकाइक्षिभिः’ पद देकर यह बताया है कि निष्कामभावसे किया हुआ तप सात्त्विक होता है। सात्त्विक तप बाँधनेवाला नहीं होता, प्रत्युत मुक्ति देनेवाला होता है। परन्तु राजस-तामस तप बाँधनेवाले होते हैं।
इन शरीर, वाणी आदिको अपना समझकर अपने लिये कर्म करनेसे ही इनमें अशुद्धि आती है, इसलिये इनको शुद्ध किये बिना केवल विचारसे बुद्धिके द्वारा सांख्यसिद्धान्तकी बातें तो समझमें आ सकती हैं; परन्तु ‘कर्मके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है’—ऐसा स्पष्ट बोध नहीं हो सकता। ऐसी हालतमें साधक शरीर आदिको अपना न समझे और अपने लिये कोई कर्म न करे तो वे शरीरादि बहुत जल्दी शुद्ध हो जायेंगे; अतः चाहे कर्मयोगकी दृष्टिसे इनको शुद्ध करके इनसे सम्बन्ध तोड़ ले, चाहे सांख्ययोगकी