श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
दृष्टिसे प्रबल विवेकके द्वारा इनसे सम्बन्ध तोड़ ले। दोनों ही साधनोंसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है।
जिस समष्टि-शक्तिसे संसारमात्रकी क्रियाएँ होती हैं, उसी समष्टि-शक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी स्वाभाविक होती हैं। विवेकको महत्त्व न देनेके कारण 'स्वयं' उन क्रियाओंमेंसे खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जगना आदि जिन क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है, वहाँ कर्मसंग्रह होता है अर्थात् वे क्रियाएँ बाँधनेवाली हो जाती
हैं। परन्तु जहाँ स्वयं अपनेको कर्ता नहीं मानता, वहाँ कर्मसंग्रह नहीं होता। वहाँ तो केवल क्रियामात्र होती है। इसलिये वे क्रियाएँ फलोत्पादक अर्थात् बाँधनेवाली नहीं होतीं। जैसे, बचपनसे जवान होना, श्वासका आना-जाना, भोजनका पाचन होना तथा रस आदि बन जाना आदि क्रियाएँ बिना कर्तृत्वाभिमानके प्रकृतिके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक होती हैं और उनका कोई कर्मसंग्रह अर्थात् पाप-पुण्य नहीं होता। ऐसे ही कर्तृत्वाभिमान न रहनेपर 'सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं'—ऐसा स्पष्ट अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —मनमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि होना मानसिक कर्म हैं।
'न्याय्यम् ' पदका अर्थ है—सात्त्विक कर्म, शास्त्रविहित कर्म अथवा शुभ कर्म। 'विपरीतम् ' पदका अर्थ है—राजस-तामस कर्म, शास्त्रनिषिद्ध कर्म अथवा अशुभ कर्म। 'न्याय्यं वा विपरीतं वा ' पदोंका तात्पर्य है—मात्र कर्म।
सम्बन्ध—भगवान्ने सांख्यसिद्धान्त बतानेके लिये जो उपक्रम किया है, उसमें कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बतानेका क्या आशय है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥
| तु | = परन्तु | केवलम् | = केवल (शुद्ध) | न, पश्यति | = ठीक नहीं |
|---|---|---|---|---|---|
| एवम् | = ऐसे पाँच हेतुओंके | आत्मानम् | = आत्माको | देखता; | |
| सति | = होनेपर भी | कर्तारम् | = कर्ता | अकृतबुद्धित्वात्= | (क्योंकि) उसकी |
| यः | = जो | पश्यति | = देखता है, | बुद्धि शुद्ध नहीं है | |
| तत्र | = उस (कर्मोंके) विषयमें | सः | = वह | अर्थात् उसने | |
| दुर्मतिः | = दुष्ट बुद्धिवाला | विवेकको महत्त्व नहीं दिया है। |
व्याख्या —'तत्रैवं सति '.....'पश्यति दुर्मतिः —' जितने भी कर्म होते हैं, वे सब अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव—इन पाँच हेतुओंसे ही होते हैं, अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु ऐसा होनेपर भी जो पुरुष अपने स्वरूपको कर्ता मान लेता है, उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है—'अकृतबुद्धित्वात् ' अर्थात् उसने विवेक-विचारको महत्त्व नहीं दिया है। जड़ और चेतनका, प्रकृति और पुरुषका जो वास्तविक विवेक है, अलगाव है, उसकी तरफ उसने ध्यान नहीं दिया है। इसलिये उसकी बुद्धिमें दोष आ गया है। उस दोषके कारण वह अपनेको कर्ता मान लेता है।
यहाँ आये 'अकृतबुद्धित्वात् ' और 'दुर्मतिः ' पदोंका समान अर्थ दीखते हुए भी इनमें थोड़ा फरक है।
'अकृतबुद्धित्वात् ' पद हेतुके रूपमें आया है और 'दुर्मतिः ' पद कर्ताके विशेषणके रूपमें आया है अर्थात् कर्ताके दुर्मति होनेमें अकृतबुद्धि ही हेतु है। तात्पर्य है कि बुद्धिको शुद्ध न करनेसे अर्थात् बुद्धिमें विवेक जाग्रत् न करनेसे ही वह दुर्मति है। अगर वह विवेकको जाग्रत् करता, तो वह दुर्मति नहीं रहता।
केवल (शुद्ध) आत्मा कुछ नहीं करता—'न करोति न लिप्यते ' (गीता १३।३१); परन्तु तादात्म्यके कारण 'मैं नहीं करता हूँ'—ऐसा बोध नहीं होता। बोध न होनेमें 'अकृतबुद्धि ' ही कारण है अर्थात् जिसने बुद्धिको शुद्ध नहीं किया है, वह दुर्मति ही अपनेको कर्ता मान लेता है; जब कि शुद्ध आत्मामें कर्तृत्व नहीं है।