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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

११३६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

दृष्टिसे प्रबल विवेकके द्वारा इनसे सम्बन्ध तोड़ ले। दोनों ही साधनोंसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है।

जिस समष्टि-शक्तिसे संसारमात्रकी क्रियाएँ होती हैं, उसी समष्टि-शक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी स्वाभाविक होती हैं। विवेकको महत्त्व न देनेके कारण 'स्वयं' उन क्रियाओंमेंसे खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जगना आदि जिन क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है, वहाँ कर्मसंग्रह होता है अर्थात् वे क्रियाएँ बाँधनेवाली हो जाती

हैं। परन्तु जहाँ स्वयं अपनेको कर्ता नहीं मानता, वहाँ कर्मसंग्रह नहीं होता। वहाँ तो केवल क्रियामात्र होती है। इसलिये वे क्रियाएँ फलोत्पादक अर्थात् बाँधनेवाली नहीं होतीं। जैसे, बचपनसे जवान होना, श्वासका आना-जाना, भोजनका पाचन होना तथा रस आदि बन जाना आदि क्रियाएँ बिना कर्तृत्वाभिमानके प्रकृतिके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक होती हैं और उनका कोई कर्मसंग्रह अर्थात् पाप-पुण्य नहीं होता। ऐसे ही कर्तृत्वाभिमान न रहनेपर 'सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं'—ऐसा स्पष्ट अनुभव हो जाता है।

परिशिष्ट भाव —मनमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि होना मानसिक कर्म हैं।

'न्याय्यम् ' पदका अर्थ है—सात्त्विक कर्म, शास्त्रविहित कर्म अथवा शुभ कर्म। 'विपरीतम् ' पदका अर्थ है—राजस-तामस कर्म, शास्त्रनिषिद्ध कर्म अथवा अशुभ कर्म। 'न्याय्यं वा विपरीतं वा ' पदोंका तात्पर्य है—मात्र कर्म।

सम्बन्ध—भगवान्ने सांख्यसिद्धान्त बतानेके लिये जो उपक्रम किया है, उसमें कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बतानेका क्या आशय है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥

तु= परन्तुकेवलम्= केवल (शुद्ध)न, पश्यति= ठीक नहीं
एवम्= ऐसे पाँच हेतुओंकेआत्मानम्= आत्माकोदेखता;
सति= होनेपर भीकर्तारम्= कर्ताअकृतबुद्धित्वात्=(क्योंकि) उसकी
यः= जोपश्यति= देखता है,बुद्धि शुद्ध नहीं है
तत्र= उस (कर्मोंके) विषयमेंसः= वहअर्थात् उसने
दुर्मतिः= दुष्ट बुद्धिवालाविवेकको महत्त्व नहीं दिया है।

व्याख्या —'तत्रैवं सति '.....'पश्यति दुर्मतिः —' जितने भी कर्म होते हैं, वे सब अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव—इन पाँच हेतुओंसे ही होते हैं, अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु ऐसा होनेपर भी जो पुरुष अपने स्वरूपको कर्ता मान लेता है, उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है—'अकृतबुद्धित्वात् ' अर्थात् उसने विवेक-विचारको महत्त्व नहीं दिया है। जड़ और चेतनका, प्रकृति और पुरुषका जो वास्तविक विवेक है, अलगाव है, उसकी तरफ उसने ध्यान नहीं दिया है। इसलिये उसकी बुद्धिमें दोष आ गया है। उस दोषके कारण वह अपनेको कर्ता मान लेता है।

यहाँ आये 'अकृतबुद्धित्वात् ' और 'दुर्मतिः ' पदोंका समान अर्थ दीखते हुए भी इनमें थोड़ा फरक है।

'अकृतबुद्धित्वात् ' पद हेतुके रूपमें आया है और 'दुर्मतिः ' पद कर्ताके विशेषणके रूपमें आया है अर्थात् कर्ताके दुर्मति होनेमें अकृतबुद्धि ही हेतु है। तात्पर्य है कि बुद्धिको शुद्ध न करनेसे अर्थात् बुद्धिमें विवेक जाग्रत् न करनेसे ही वह दुर्मति है। अगर वह विवेकको जाग्रत् करता, तो वह दुर्मति नहीं रहता।

केवल (शुद्ध) आत्मा कुछ नहीं करता—'न करोति न लिप्यते ' (गीता १३।३१); परन्तु तादात्म्यके कारण 'मैं नहीं करता हूँ'—ऐसा बोध नहीं होता। बोध न होनेमें 'अकृतबुद्धि ' ही कारण है अर्थात् जिसने बुद्धिको शुद्ध नहीं किया है, वह दुर्मति ही अपनेको कर्ता मान लेता है; जब कि शुद्ध आत्मामें कर्तृत्व नहीं है।

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

११३७

‘केवलम्’ पद कर्मयोग और सांख्ययोग—दोनोंमें ही आया है। प्रकृति और पुरुषके विवेकको लेकर कर्मयोग और सांख्ययोग चलते हैं। कर्मयोगमें सब क्रियाएँ शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही होती हैं, पर उनके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता अर्थात् उनमें ममता नहीं होती। ममता न होनेसे शरीर, मन आदिकी संसारके साथ जो एकता है, वह एकता अनुभवमें आ जाती है। एकताका अनुभव होते ही स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। इसलिये कर्मयोगमें ‘केवलैः’ पद शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके साथ दिया गया है—‘कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि’ (गीता ५।११)।

सांख्ययोगमें विवेक-विचारकी प्रधानता है। जितने भी कर्म होते हैं, वे सब पाँच हेतुओंसे ही होते हैं, अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला

परिशिष्ट भाव—सब कारकोंमें कर्ता मुख्य है। कर्तामें चेतनकी झलक आती है, अन्य कारकोंमें नहीं। वास्तवमें ‘कर्ता’ नाम चेतनका नहीं है। यह माना हुआ कर्ता है—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। इसलिये भगवान्ने यहाँ अपने वास्तविक स्वरूपको कर्ता माननेवालेकी निन्दा की है कि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है, वह दुर्मीत है। कारण कि स्वरूपमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों ही नहीं हैं—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३।३१)। मूलमें ये नहीं हैं, तभी इनका त्याग होता है। ये कर्तृत्व-भोक्तृत्व न भगवान्के बनाये हुए हैं, न प्रकृतिके, प्रत्युत जीवके बनाये हुए हैं।

वास्तवमें कर्ता कोई नहीं है; न तो चेतन कर्ता है और न जड़ कर्ता है। अगर कर्ता मानना ही पड़े तो वह जड़में ही माना जायगा। इसको भगवान्ने गीतामें कई प्रकारसे बताया है; जैसे—सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं अर्थात् प्रकृति कर्ता है (तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक); सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंके द्वारा होती हैं; गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं अर्थात् गुण कर्ता है (तीसरे अध्यायका सताईसवाँ-अट्ठाईसवाँ और चौदहवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं अर्थात् इन्द्रियाँ कर्ता हैं (पाँचवें अध्यायका नवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि कर्तृत्व प्रकृतिमें ही है, स्वरूपमें नहीं। इसीलिये अपने चेतन स्वरूपमें स्थित तत्त्व महापुरुष ‘मैं कुछ भी नहीं करता हूँ’ ऐसा अनुभव करता है—‘नैव किञ्चिक्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्ववित्’ (गीता ५।८)। भगवान् भी कहते हैं कि जब मनुष्य गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता अर्थात् वह क्रियामात्रमें ऐसा अनुभव करता है कि गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है और अपनेको गुणोंसे बिलकुल असम्बद्ध अनुभव करता है, जो वास्तवमें है*, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है (चौदहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

साधक खाने-पीने, सोने-जागने आदि लौकिक क्रियाओंको तो विचारद्वारा प्रकृतिमें होनेवाली सुगमतासे मान सकता है, पर वह जप, ध्यान, समाधि आदि पारमार्थिक क्रियाओंको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये मानता है तो यह वास्तवमें साधकके लिये बाधक है। कारण कि ज्ञानयोगकी दृष्टिसे क्रिया चाहे ऊँची-से-ऊँची हो अथवा नीची-से-नीची, है वह एक जातिकी (प्राकृत) ही। लाठी घुमाना और माला फेरना—दोनों क्रियाएँ अलग-अलग होनेपर भी प्रकृतिमें ही हैं। तात्पर्य है कि खाने-पीने, सोने-जागने आदिसे लेकर जप, ध्यान, समाधितक सम्पूर्ण लौकिक-पारमार्थिक क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं। प्रकृतिका सम्बन्ध किये बिना क्रिया सम्भव ही नहीं है। अतः साधकको चाहिये कि वह पारमार्थिक

  • स्वरूप (आत्मा) गुणोंसे सर्वथा रहित है—‘निर्गुणत्वात्’ (गीता १३।३१)। गुण प्रकाश्य है, स्वरूप प्रकाशक है। गुण परिवर्तनशील हैं, स्वरूप अपरिवर्तनशील है। गुण अनित्य हैं, स्वरूप नित्य है। स्वरूप निर्गुण होते हुए भी जब यह गुणोंका संग कर लेता है, तब जन्म-मरणमें पड़ जाता है—‘कारणं गुणसंयोगस्य सदसद्योजिनजन्मसु’ (गीता १३।२१)।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

क्रियाओंका त्याग तो न करे, पर उनमें अपना कर्तृत्व न माने अर्थात् उनको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये न माने। क्रिया चाहे लौकिक हो, चाहे पारमार्थिक हो, उसका महत्त्व वास्तवमें जड़ताका ही महत्त्व है। शास्त्रविहित होनेके कारण पारमार्थिक क्रियाओंका अन्तःकरणमें जो विशेष महत्त्व रहता है, वह भी जड़ताका ही महत्त्व होनेसे साधकके लिये बाधक है*। पारमार्थिक क्रियाओंका उद्देश्य परमात्मा रहनेसे वे कल्याणकारक हो जाती हैं। ज्यों-ज्यों क्रियाकी गौणता और भगवत्सम्बन्धकी मुख्यता होती है, त्यों-त्यों अधिक लाभ होता है। क्रियाकी मुख्यता होनेपर वर्षातिक साधन करनेपर भी लाभ नहीं होता। अतः क्रियाका महत्त्व न होकर भगवान्में प्रियता होनी चाहिये। प्रियता ही भजन है, क्रिया नहीं।

जिसकी बुद्धि विवेकरहित है अर्थात् जिसने विवेकको महत्त्व नहीं दिया है, वह दुर्मीत है। बोधमें विवेक कारण है, बुद्धि नहीं। बुद्धि विवेकसे शुद्ध होती है। बुद्धिकी शुद्धिमें शुभ कर्म भी कुछ सहायक होते हैं, पर विवेक-विचारसे बुद्धिकी जैसी शुद्धि होती है, वैसी शुभ कर्मोंसे नहीं होती। विवेकको महत्त्व न देना जितना दोषी है, उतने मल-विक्षेप-आवरण दोषी नहीं हैं। विवेक अनादि और नित्य है। इसलिये मल-विक्षेप-आवरणके रहते हुए भी विवेक जाग्रत् हो सकता है। पापसे विवेक नष्ट नहीं होता, प्रत्युत विवेक जाग्रत् नहीं होता। विवेकको महत्त्व न देनेमें कारण है—क्रिया और पदार्थका महत्त्व। क्रिया और पदार्थको महत्त्व देनेवाला ही 'दुर्मीत' है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बताया कि शुद्ध स्वरूपको कर्ता देखनेवाला दुर्मीत ठीक नहीं देखता। तो ठीक देखनेवाला कौन है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।

हत्वापि स इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥

यस्य= जिसकायस्य= जिसकीहत्वा= मारकर
अहङ्कृतः,बुद्धिः= बुद्धिअपि= भी
भावः= अहंकृतभाव
(‘मैं कर्ता हूँ’—
ऐसा भाव)न, लिप्यते= लिप्त नहीं होती,= न
= नहीं है (और)सः= वह (युद्धमें)हन्ति= मारता है (और)
इमान्= इन= न
लोकान्= सम्पूर्ण प्राणियोंकोनिबध्यते= बँधता है।

व्याख्या —‘यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते’—जिसमें ‘मैं करता हूँ’—ऐसा अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें ‘मेरको फल मिलेगा’—ऐसे स्वार्थ-भावका लेप नहीं है। इसको ऐसे समझना चाहिये—जैसे शास्त्रविहित और शास्त्रनिषिद्ध—ये सभी क्रियाएँ एक प्रकारशमें होती हैं और प्रकाशके ही आश्रित होती हैं; परन्तु प्रकाश किसी भी क्रियाका ‘कर्ता’ नहीं बनता अर्थात् प्रकाश उन क्रियाओंको न करनेवाला है और न करनेवाला है। ऐसे ही स्वरूपकी सताके बिना विहित और निषिद्ध—कोई भी क्रिया नहीं होती; परन्तु वह सत्ता उन क्रियाओंको न करनेवाली है और न करनेवाली है—ऐसा जिसको साक्षात् अनुभव हो जाता है, उसमें ‘मैं क्रियाओंको करनेवाला हूँ’—

ऐसा अहंकृतभाव नहीं रहता और ‘अमुक चीज चाहिये, अमुक चीज नहीं चाहिये’; ‘अमुक घटना होनी चाहिये, अमुक घटना नहीं होनी चाहिये’—ऐसा बुद्धिमें लेप (द्रष्टमोह) नहीं रहता। अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेसे उसके कर्तृत्व और भोक्तृत्व—दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् अपनेमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व—ये दोनों ही नहीं हैं, इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है।

प्रकृतिका कार्य स्वतः-स्वाभाविक ही चल रहा है, परिवर्तित हो रहा है और अपना स्वरूप केवल उसका प्रकाशक है—ऐसा समझकर जो अपने स्वरूपमें स्थित रहता है, उसमें ‘मैं करता हूँ’ ऐसा अहंकृतभाव नहीं होता; क्योंकि अहंकृतभाव प्रकृतिके कार्य शरीरको स्वीकार

  • भगवान्के लिये की गयी उपासनामें भगवान्की कृपा प्रधान होती है; अतः इसमें साधकका कर्तृत्व नहीं है। क्रिया, कर्म, उपासना और विवेक—चारों अलग-अलग हैं। ‘क्रिया’ किसीके भी साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ती। ‘कर्म’ अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति (फल)-के साथ सम्बन्ध जोड़ता है। ‘उपासना’ भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ती है। ‘विवेक’ जड़-चेतनका सम्बन्ध-विच्छेद करता है।

श्लोक १७ ]

  • साधक-संजीवनी *

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करनेसे ही होता है। अहंकृतभाव सर्वथा मिटनेपर उसकी बुद्धिमें 'फल मेरेको मिले' ऐसा लेप भी नहीं होता अर्थात् फलकी कामना नहीं होती।

अहंकृतभाव एक मनोवृत्ति है। मनोवृत्ति होते हुए भी यह भाव स्वयं-(कर्ता-)-में रहता है; क्योंकि कर्तृत्व और अकर्तृत्व भाव स्वयं ही स्वीकार करता है।

'हत्वापि स इमाल्लोकान् हन्ति न निबध्यते' —वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको एक साथ मार डाले, तो भी वह मारता नहीं; क्योंकि उसमें कर्तृत्व नहीं है और वह बंधता भी नहीं; क्योंकि उसमें भोक्तृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि उसका न क्रियाओंके साथ सम्बन्ध है और न फलके साथ सम्बन्ध है।

वास्तवमें प्रकृति ही क्रिया और फलमें परिणत होती है। परन्तु इस वास्तविकताका अनुभव न होनेसे ही पुरुष (चेतन) कर्ता और भोक्ता बनता है। कारण कि जब अहंकारपूर्वक क्रिया होती है, तब कर्ता, करण और कर्म—तीनों मिलते हैं और तभी कर्मसंग्रह होता है। परन्तु जिसमें अहंकृतभाव नहीं रहा, केवल सबका प्रकाशक, आश्रय, सामान्य चेतन ही रहा, फिर वह कैसे किसको मारे? और कैसे किससे बंधे? उसका 'मारना' और 'बंधना' सम्भव ही नहीं है (गीता—दूसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

सम्पूर्ण प्राणियोंको मारना क्या है? जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लेप नहीं है—ऐसे मनुष्यका शरीर जिस वर्ण और आश्रममें रहता है, उसके अनुसार उसके सामने जो परिस्थिति आ जाती है, उसमें प्रवृत्त होनेपर उसे पाप नहीं लगता। जैसे, किसी जीवन्मुक्त क्षत्रियके लिये स्वतः युद्धकी परिस्थिति प्राप्त हो जाय तो वह उसके अनुसार सबको मारकर भी न तो मारता है और न बंधता है। कारण कि उसमें अभिमान और स्वार्थभाव नहीं है।

यहाँ अर्जुनके सामने भी युद्धका प्रसंग है। इसलिये भगवान्ने 'हत्वापि' पदसे अर्जुनको युद्धके लिये प्रेरणा की है। 'अपि' पदका भाव है—'कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः' (गीता ४।२०) 'कर्मोंमें अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी वह कुछ नहीं करता।' 'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' (गीता ६।३१) 'सर्वथा बर्ताव करता हुआ भी वह योगी मेरेमें रहता है।' 'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते' (गीता १३।३१) 'शरीरमें स्थित होनेपर भी न करता है और न लिप्त होता है।' तात्पर्य यह है कि कर्मोंमें सांगोपांग

प्रवृत्त होनेके समय और जिस समय कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं है, उस समय भी स्वरूपकी निर्विकल्पता ज्यों-की-त्यों रहती है अर्थात् क्रिया करनेसे अथवा क्रिया न करनेसे स्वरूपमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। कारण कि क्रिया विभाग प्रकृतिमें है, स्वरूपमें नहीं।

वास्तवमें यह अहंभाव (व्यक्तित्व) ही मनुष्यमें भिन्नता करनेवाला है। अहंभाव न रहनेसे परमात्माके साथ भिन्नताका कोई कारण ही नहीं है। फिर तो केवल सबका आश्रय, प्रकाशक सामान्य चेतन रहता है। वह न तो क्रियाका कर्ता बनता है और न फलका भोक्ता ही बनता है। क्रियाओंका कर्ता और फलका भोक्ता तो वह पहले भी नहीं था। केवल नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर जिस अहंभावको स्वीकार किया है, उसी अहंभावसे उसमें कर्तापन और भोक्तापन आया है।

'अहम्' दो प्रकारका होता है—'अहंस्फूर्ति और अहंकृति। गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको अपने होनेपन-(सत्तामात्र-)-का भान होता है, इसको 'अहंस्फूर्ति' कहते हैं। इसके बाद वह अपनेमें 'मैं अमुक नाम, वर्ण, आश्रम आदिका हूँ'—ऐसा आरोप करता है, यही असत्का सम्बन्ध है। असत्के सम्बन्धसे अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको लेकर 'मैं करता हूँ'—ऐसा भाव उत्पन्न होता है, इसको 'अहंकृति' कहते हैं।

'अहम्' को लेकर ही अपनेमें परिच्छिन्नता आती है। इसलिये अहंस्फूर्तिमें भी किञ्चित् परिच्छिन्नता (व्यक्तित्व) रह सकती है। परन्तु यह परिच्छिन्नता बन्धनकारक नहीं होती अर्थात् परिच्छिन्नता रहनेपर भी अहंस्फूर्ति दोषी नहीं होती। कारण कि अहंकृति अर्थात् कर्तृत्वके बिना अपनेमें गुण-दोषका आरोप नहीं होता। अहंकृति आनेसे ही अपनेमें गुण-दोषका आरोप होता है, जिससे शुभ-अशुभ कर्म बनते हैं। बोध होनेपर अहंस्फूर्तिमें जो परिच्छिन्नता है, वह जल जाती है और स्फूर्तिमात्र रह जाती है। ऐसी स्थितिमें मनुष्य न मारता है और न बंधता है।

'न हन्ति न निबध्यते' (न मारता है और न बंधता है) का क्या भाव है? एक निर्विकल्प-अवस्था होती है और एक निर्विकल्प-बोध होता है। निर्विकल्प-अवस्था साधन-साध्य है और उसका उत्थान भी होता है अर्थात् वह एकरस नहीं रहती। इस निर्विकल्प-अवस्थासे भी असंगता होनेपर स्वतःसिद्ध निर्विकल्प-बोधका अनुभव होता है। निर्विकल्प-बोध साधन-साध्य नहीं है और उसमें निर्विकल्पता किसी

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

भी अवस्थामें किंचिन्मात्र भी भंग नहीं होती। निर्विकल्प-बोधमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। तात्पर्य है कि उस निर्विकल्प-बोधमें कभी हलचल आदि नहीं होते, यही 'न हन्ति न निबध्यते' का भाव है।

अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेका उपाय क्या है? क्रियारूपसे परिवर्तन केवल प्रकृतिमें ही होता है और

परिशिष्ट भाव —अहंकृतभाव नहीं होनेका तात्पर्य है—अहंतारहित होना और बुद्धि लिप्त नहीं होनेका तात्पर्य है—कामना, ममता और स्वार्थभावसे रहित होना।

अर्जुनने कहा था कि इन आततायियोंको मारनेसे हमारेको पाप लगेगा—'पापमेवाश्रयेदस्माद्भूतैतानातातयिनः' (गीता १।३६) और गुरुजनोंको मारनेसे पाप लगेगा—'गुरुन्हन्त्वा हि महानुभावान्' (गीता २।५)। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि इनको मारनेसे पाप लगनेकी तो बात ही क्या है, सम्पूर्ण प्राणियोंको मारनेसे भी पाप नहीं लगेगा, क्योंकि पाप लगनेमें हेतु अहंता और बुद्धिकी लिप्तता है। बुद्धि कामना, ममता और स्वार्थभावसे लिप्त होती है। गंगाजीमें कोई डूबकर मर जाता है तो गंगाजीको पाप नहीं लगता और कोई उसका जल पीता है, स्नान करता है, खेती करता है तो उससे गंगाजीको पुण्य नहीं लगता है। वर्षासे कई जीव मर जाते हैं और कड़ियोंको जीवन मिल जाता है, पर वर्षाको पाप-पुण्य नहीं लगते। कारण कि गंगाजीमें और वर्षामें अहंकृतभाव और बुद्धिका लेप नहीं है। अगर डॉक्टरमें कामना, ममता और स्वार्थबुद्धि न हो तो ऑपरेशनमें अंग काटनेपर भी उसको पाप नहीं लगता। अगर उसमें अहंकृतभाव भी न हो तो फिर पाप लगनेकी बात ही क्या है।

ज्ञानयोगसे 'अहंकृतभाव' का नाश होता है और कर्मयोगसे 'बुद्धिकी लिप्तता' नष्ट होती है। दोनोंमेंसे किसी एकका नाश होनेपर दूसरा भी नष्ट हो जाता है। अहंकृतभावके कारण ही जीवमें भोग और मोक्षकी इच्छा पैदा होती है। अहंकृतभाव मिटनेसे भोगेच्छा भी मिट जाती है—'बुद्धिर्यस्य न लिप्यते'। भोगेच्छा मिटनेपर मोक्षकी इच्छा स्वतः पूरी हो जाती है; क्योंकि मोक्ष स्वतःसिद्ध है।

सम्बन्ध—ज्ञान और प्रवृत्ति (क्रिया) दोषी नहीं होते, प्रत्युत कर्तृत्वाभिमान ही दोषी होता है; क्योंकि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसंग्रह होता है—यह बात आगेके श्लोकमें बताते हैं।

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।

करणं कर्म कर्तैति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ १८ ॥

ज्ञानम्= ज्ञान,कर्मचोदना= कर्मप्रेरणा होती हैकर्ता= कर्ता—
ज्ञेयम्= ज्ञेय (और)(तथा)इति= इन
परिज्ञाता= परिज्ञाताकरणम्= करण,त्रिविधः= तीनोंसे
त्रिविधा= इन तीनोंसेकर्म= कर्म (और)कर्मसङ्ग्रहः= कर्मसंग्रह होता है।

व्याख्या —[इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मके बननेमें पाँच हेतु बताये—अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव (संस्कार)। इन पाँचोंमें भी मूल हेतु है—कर्ता। इसी मूल हेतुको मिटानेके लिये भगवान्ने सोलहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव रखनेवालेकी बड़ी निन्दा की और सत्रहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव न रखनेवालेकी बड़ी प्रशंसा की। कर्तृत्वभाव बिलकुल न रहे,

यह साफ-साफ समझानेके लिये ही अठारहवाँ श्लोक कहा गया है।]

'ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना'—ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता—इन तीनोंसे कर्म-प्रेरणा होती है। 'ज्ञान' को सबसे पहले कहनेमें यह भाव है कि हरेक मनुष्यकी कोई भी प्रवृत्ति होती है तो प्रवृत्तिसे पहले ज्ञान होता है। जैसे, जल पीनेकी प्रवृत्तिसे पहले प्यासका ज्ञान

श्लोक १९ ]

  • साधक-संजीवनी *

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होता है, फिर वह जलसे प्यास बुझाता है। जल आदि जिस विषयका ज्ञान होता है, वह 'ज्ञेय' कहलाता है और जिसको ज्ञान होता है, वह 'परिज्ञाता' कहलाता है। ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता— तीनों होनेसे ही कर्म करनेकी प्रेरणा होती है। यदि इन तीनोंमेंसे एक भी न हो तो कर्म करनेकी प्रेरणा नहीं होती।

'परिज्ञाता' उसको कहते हैं, जो 'परितः' ज्ञाता है अर्थात् जो सब तरहकी क्रियाओंकी स्फुरणाका ज्ञाता है। वह केवल 'ज्ञाता' मात्र है अर्थात् उसे क्रियाओंकी स्फुरणामात्रका ज्ञान होता है, उसमें अपने लिये कुछ चाहनेका अथवा उस क्रियाको करनेका अभिमान आदि बिलकुल नहीं होता।

कोई भी क्रिया करनेकी स्फुरणा एक व्यक्तिविशेषमें ही होती है। इसलिये शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध— इन विषयोंको लेकर सुननेवाला, स्पर्श करनेवाला, देखनेवाला, खचनेवाला और सृष्टिनेवाला—इस तरह अनेक 'कर्ता' हो सकते हैं; परन्तु उन सबको जाननेवाला एक ही रहता है, उसे ही यहाँ 'परिज्ञाता' कहा है।

'करणं कर्म कर्तौति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः'— कर्मसंग्रहके तीन हेतु हैं—करण, कर्म तथा कर्ता। इन तीनोंके सहयोगसे कर्म पूरा होता है। जिन साधनोंसे कर्ता कर्म करता है, उन क्रिया करनेके साधनों—(इन्द्रियों

आदि- )को 'करण' कहते हैं। खाना-पीना, उठना-बैठना, चलना-फिरना, आना-जाना आदि जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनको 'कर्म' कहते हैं। कारण और क्रियासे अपना सम्बन्ध जोड़कर कर्म करनेवालेको 'कर्ता' कहते हैं। इस प्रकार इन तीनोंके मिलनेसे ही कर्म बनता है।

भगवान्को यहाँ खास बात यह बतानी है कि कर्मसंग्रह कैसे होता है? अर्थात् कर्म बाँधनेवाला कैसे होता है? कर्म बननेके तीन हेतु बताते हुए भगवान्का लक्ष्य मूल हेतु 'कर्ता' को बतानेमें है; क्योंकि कर्मसंग्रहका खास सम्बन्ध कर्तासे है। यदि कर्तापन न हो तो कर्मसंग्रह नहीं होता, केवल क्रियामात्र होती है।

कर्म-संग्रहमें 'करण' हेतु नहीं है; क्योंकि कारण कर्ताके अधीन होता है। कर्ता जैसा कर्म करना चाहता है, वैसा ही कर्म होता है, इसलिये 'कर्म' भी कर्मसंग्रहमें खास हेतु नहीं है। सांख्यसिद्धान्तके अनुसार खास बाँधनेवाला है—अहंकृतभाव और इसीसे कर्मसंग्रह होता है। अहंकृतभाव न रहनेसे कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् कर्म फलजनक नहीं होता। इस मूलका अर्थात् अहंकृतभावका ज्ञान करानेके लिये ही भगवान्ने कारण और कर्मको पहले रखकर कर्ताको कर्मसंग्रहके पासमें रखा है, जिससे यह खयालमें आ जाय कि बाँधनेवाला 'कर्ता' ही है।

परिशिष्ट भाव —अर्जुनने ज्ञानयोग और कर्मयोगका तत्त्व जाननेकी इच्छा प्रकट की थी (अठारहवें अध्यायका पहला श्लोक), इसलिये भगवान्ने बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका वर्णन किया। फिर भगवान्ने ज्ञानयोगकी दृष्टिसे कर्मोंका विवेचन करते हुए पहले कर्मोंकी सिद्धिके लिये पाँच हेतु बताये (अठारहवें अध्यायका तेरहवाँ, चौदहवाँ तथा पन्द्रहवाँ श्लोक)। उसी बातको अब प्रकारान्तरसे कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रहके रूपमें वर्णन करते हैं।

जब मनुष्यके भीतर अहंकार और लिप्तता रहती है, तब ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयरूप त्रिपुटीसे 'कर्मप्रेरणा' अर्थात् कर्म करनेमें प्रवृत्ति होती है कि मैं अमुक कार्य करूँगा तो मेरेको अमुक फल मिलेगा। कर्मप्रेरणा होनेसे 'कर्मसंग्रह' अर्थात् पाप और पुण्यका संग्रह होता है। वे पाप और पुण्य-कर्म कैसे होते हैं—यह आगे बीसवें श्लोकसे विस्तारपूर्वक बतायेंगे।

सम्बन्ध—गुणातीत होनेके उद्देश्यसे अब आगेके श्लोकसे त्रिगुणात्मक पदार्थोंका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।

प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥

गुणसङ्ख्याने= गुणोंका विवेचन करनेवाले शास्त्रमेंकर्म= कर्मप्रोच्यते= कहे जाते हैं,
गुणभेदतः= गुणोंके भेदसे= तथातानि= उनको
ज्ञानम्= ज्ञानकर्ता= कर्ताअपि= भी (तुम)
= औरत्रिधा= तीन-तीन प्रकारसेयथावत्= यथार्थरूपसे
एव= हीशृणु= सुनो।

११४२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

व्याख्या—‘प्रोच्यते गुणसङ्ग्रह्याने’ —जिस शास्त्रमें गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना की गयी है, उसी शास्त्रके अनुसार मैं तुम्हें ज्ञान, कर्म तथा कर्ताके भेद बता रहा हूँ।

‘ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः’ —पीछेके श्लोकमें भगवान्ने कर्मकी प्रेरणा होनेमें तीन हेतु बताये तथा तीन ही हेतु कर्मके बननेमें बताये। इस प्रकार कर्मसंग्रह होनेतकमें कुल छः बातें बतायीं*। अब इस श्लोकमें भगवान् ज्ञान, कर्म तथा कर्ता—इन तीनोंका विवेचन करनेकी ही बात कहते हैं। कर्म-प्रेरक-विभागमेंसे विवेचन करनेके लिये केवल ‘ज्ञान’ लिया गया है, क्योंकि किसी भी कर्मकी प्रेरणामें पहले ज्ञान ही होता है। ज्ञानके बाद ही कार्यका आरम्भ होता है। कर्मसंग्रह-विभागमेंसे केवल ‘कर्म’ और ‘कर्ता’ लिये गये हैं। यद्यपि कर्मके होनेमें कर्ता मुख्य है, तथापि साथमें कर्मको भी लेनेका कारण यह है कि कर्ता जब कर्म करता है, तभी कर्मसंग्रह होता है। अगर कर्ता कर्म न करे तो कर्मसंग्रह होगा ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मप्रेरणामें ‘ज्ञान’ तथा कर्मसंग्रहमें ‘कर्म’ और ‘कर्ता’ मुख्य हैं। इन तीनों—(ज्ञान, कर्म और कर्ता—)-के सात्त्विक होनेसे ही मनुष्य निर्लिप्त हो सकता है, राजस और तामस होनेसे नहीं। अतः यहाँ कर्मप्रेरक-विभागमें ‘ज्ञाता’ और ‘ज्ञेय’ को तथा कर्मसंग्रह-विभागमें ‘करण’ को नहीं लिया गया है।

कर्मप्रेरक-विभागके ‘ज्ञाता’ और ‘ज्ञेय’ का विवेचन क्यों नहीं किया? कारण कि ज्ञाता जब क्रियासे सम्बन्ध जोड़ता है, तब वह ‘कर्ता’ कहलाता है और उस कर्ताके तीन (सात्त्विक, राजस और तामस) भेदोंके अन्तर्गत ही ज्ञाताके भी तीन भेद हो जाते हैं। परन्तु ज्ञाता जब ज्ञपिमात्र रहता है, तब उसके तीन भेद नहीं होते; क्योंकि उसमें गुणोंका संग नहीं है। गुणोंका संग होनेसे ही उसके तीन भेद होते हैं। इसलिये वृत्ति-ज्ञान ही सात्त्विक, राजस तथा तामस होता है।

जिसे जाना जाय, उस विषयको ‘ज्ञेय’ कहते हैं। जाननेके विषय अनेक हैं, इसलिये इसके अलग भेद नहीं किये गये। परन्तु जाननेयोग्य सब विषयोंका एकमात्र लक्ष्य ‘सुख’ प्राप्त करना ही रहता है। जैसे, कोई विद्या पढ़ता है, कोई धन कमाता है, कोई अधिकार पानेकी चेष्टा करता

है तो इन सब विषयोंको जानने, पानेकी चेष्टाका लक्ष्य एकमात्र ‘सुख’ ही रहता है। विद्या पढ़नेमें यही भाव रहता है कि ज्यादा पढ़कर ज्यादा धन कमाऊँगा, मान पाऊँगा और उनसे मैं सुखी होऊँगा। ऐसे ही हरेक कर्मका लक्ष्य परम्परासे सुख ही रहता है। इसलिये भगवान्ने ज्ञेयके तीन भेद सात्त्विक, राजस और तामस ‘सुख’ के नामसे आगे (छत्तीसवेंसे उन्नतालीसवें श्लोकतक) किये हैं।

ऐसे ही भगवान्ने करणके भी तीन भेद नहीं किये; क्योंकि इन्द्रियाँ आदि जितने भी करण हैं, वे सब साधनमात्र हैं। इसलिये उनके तीन भेद नहीं होते। परन्तु इन सभी करणोंमें ‘बुद्धि’ की ही प्रधानता है; क्योंकि मनुष्य करणोंसे जो कुछ भी काम करता है, उसको वह बुद्धिपूर्वक (विचारपूर्वक) ही करता है। इसलिये भगवान्ने करणके तीन भेद सात्त्विक, राजस और तामस ‘बुद्धि’ के नामसे आगे (तीसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक) किये हैं।

बुद्धिको दृढ़तासे रखनेमें ‘धृति’ बुद्धिकी सहायक बनती है। ज्ञानयोगकी साधनामें भगवान्ने दो जगह (छठे अध्यायके पचीसवें तथा अठारहवें अध्यायके इक्यावनवें श्लोकमें) बुद्धिके साथ ‘धृति’ पद भी दिया है। इससे यह मालूम देता है कि ज्ञानमार्गमें बुद्धिके साथ धृतिकी विशेष आवश्यकता है। इसलिये भगवान्ने धृतिके भी तीन भेद (तैंतीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक) बताये हैं।

‘त्रिधैव’ पदमें यह भाव है कि ये भेद तीन (सात्त्विक, राजस और तामस) ही होते हैं, कम और ज्यादा नहीं होते अर्थात् न दो होते हैं और न चार होते हैं। कारण कि सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही प्रकृतिसे उत्पन्न हैं—‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः’ (गीता १४।५)। इसलिये इन तीनों गुणोंको लेकर तीन ही भेद होते हैं।

‘यथावत्’ —गुणसंख्यान-शास्त्रमें इस विषयका जैसा वर्णन हुआ है, वैसा-का-वैसा तुम्हें सुना रहा हूँ; अपनी तरफसे कुछ कम या अधिक करके नहीं सुना रहा हूँ।

‘शृणु’ —इस विषयको ध्यानसे सुनो। कारण कि सात्त्विक, राजस और तामस—इन तीनोंमेंसे ‘सात्त्विक’ चीजें तो कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्मतत्त्वका बोध करानेवाली हैं, ‘राजस’ चीजें जन्म-मरण देनेवाली हैं; और ‘तामस’ चीजें पतन करनेवाली अर्थात् नरकों और नीच योनियोंमें ले जानेवाली हैं। इसलिये इनका वर्णन सुनकर

  • कर्मप्रेरणा तो सूक्ष्म है और कर्मसंग्रह स्थूल है अर्थात् ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता—ये तीनों सूक्ष्म सामग्री हैं तथा कर्म, करण और कर्ता—ये तीनों स्थूल सामग्री हैं।

श्लोक २० ] * साधक-संजीवनी * ११४३

सात्त्विक चीजोंका ग्रहण तथा राजस-तामस चीजोंका त्याग करना चाहिये।

'तानि'—इन ज्ञान आदिका तुम्हारे स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा स्वरूप तो सदा निर्लेप है।

'अपि'—इनके भेदोंको जाननेकी भी बड़ी भारी आवश्यकता है; क्योंकि इनको ठीक तरहसे जाननेपर 'यस्य नाहंकृतो भावो ...... न हन्ति न निबध्यते' (१८।१७)—इस श्लोकका ठीक अनुभव हो जायगा अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जायगा।

सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हैं।

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ २०॥

येन = जिस ज्ञानके द्वारा (साधक) विभक्तेषु, सर्वभूतेषु = सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें

अविभक्तम् = विभागरहित एकम् = एक अव्ययम् = अविनाशी भावम् = भाव (सत्ता) को ईक्षते = देखता है,

तत् = उस ज्ञानम् = ज्ञानको (तुम) सात्त्विकम् = सात्त्विक विद्धि = समझो।

व्याख्या—'सर्वभूतेषु येनैकं .......... अविभक्तं विभक्तेषु'—व्यक्ति, वस्तु आदिमें जो 'है' पन दीखता है, वह उन व्यक्ति, वस्तु आदिका नहीं है, प्रत्युत सबमें परिपूर्ण परमात्माका ही है। उन व्यक्ति, वस्तु आदिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है; क्योंकि उनमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। कोई भी व्यक्ति, वस्तु आदि ऐसी नहीं है, जिसमें परिवर्तन न होता हो; परन्तु अपनी अज्ञता-(बेसमझ-)से उनकी सत्ता दीखती है। जब अज्ञता मिट जाती है, ज्ञान हो जाता है, तब साधककी दृष्टि उस अविनाशी तत्त्वकी तरफ ही जाती है, जिसकी सत्तासे यह सब सत्तावान् हो रहा है।

ज्ञान होनेपर साधककी दृष्टि परिवर्तनशील वस्तुओंको भेदकर परिवर्तनरहित तत्त्वकी ओर ही जाती है (गीता—तेरहवें अध्यायका सत्ताइसवाँ श्लोक)। फिर वह विभक्त अर्थात् अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदिमें विभागरहित एक ही तत्त्वको देखता है (गीता—तेरहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति आदिका अलग-अलग ज्ञान और यथायोग्य अलग-अलग व्यवहार होते हुए भी वह इन विकारी वस्तुओंमें उस स्वतःसिद्ध निर्विकार एक तत्त्वको देखता है। उसके देखनेकी यही पहचान है कि उसके अन्तःकरणमें राग-द्वेष नहीं होते।

'तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्'—उस ज्ञानको तू सात्त्विक जान। परिवर्तनशील वस्तुओं, वृत्तियोंके सम्बन्धसे ही इसे 'सात्त्विक ज्ञान' कहते हैं। सम्बन्धरहित होनेपर यही ज्ञान 'वास्तविक बोध' कहलाता है, जिसको भगवान्ने सब साधनोंसे जाननेयोग्य ज्ञेय-तत्त्व बताया है—'ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते' (गीता १३।१२)।

मार्मिक बात

संसारका ज्ञान इन्द्रियोंसे होता है, इन्द्रियोंका ज्ञान बुद्धिसे होता है और बुद्धिका ज्ञान 'मैं'से होता है। वह 'मैं' बुद्धि, इन्द्रियाँ और विषय—इन तीनोंको जानता है। परन्तु उस 'मैं' का भी एक प्रकाशक है, जिसमें 'मैं'का भी भान होता है। वह प्रकाश सर्वदेशीय और असीम है, जबकि 'मैं' एकदेशीय और सीमित है। उस प्रकाशमें जैसे 'मैं'का भान होता है, वैसे ही 'तू', 'यह' और 'वह' का भी भान होता है। वह प्रकाश किसीका भी विषय नहीं है। वास्तवमें वह प्रकाश निर्गुण ही है; परन्तु व्यक्ति-विशेषमें रहनेवाला होनेसे (वृत्तियोंके सम्बन्धसे) उसे 'सात्त्विक ज्ञान' कहते हैं।

इस सात्त्विक ज्ञानको दूसरे ढंगसे इस प्रकार समझना चाहिये—'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये चारों ही किसी प्रकाशमें काम करते हैं। इन चारोंके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी आ जाते हैं, जो विभक्त हैं; परन्तु इनका जो प्रकाशक है, वह अविभक्त (विभागरहित) है।

बोलनेवाला 'मैं', उसके सामने सुननेवाला 'तू' और पासवाला 'यह' तथा दूरवाला 'वह' कहा जाता है अर्थात् बोलनेवाला अपनेको 'मैं' कहता है, सामनेवालेको 'तू'

११४४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

कहता है, पासवालेको 'यह' कहता है और दूरवालेको 'वह' कहता है। जो 'तू' बना हुआ था, वह 'मैं' हो जाय तो 'मैं' बना हुआ 'तू' हो जायगा और 'यह' तथा 'वह' वही रहेंगे। इसी प्रकार 'यह' कहलानेवाला अगर 'मैं' बन जाय तो 'तू' कहलानेवाला 'यह' बन जायगा और 'मैं' कहलानेवाला 'तू' बन जायगा। 'वह' परोक्ष होनेसे अपनी जगह ही रहा। अब 'वह' कहलानेवाला 'मैं' बन जायगा तो उसकी दृष्टिमें 'मैं', 'तू' और 'यह' कहलानेवाले सब 'वह' हो जायेंगे*। इस प्रकार 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये चारों ही एक-दूसरेकी दृष्टिमें चारों ही बन सकते हैं।

इससे यह सिद्ध हुआ कि 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये सब परिवर्तनशील हैं अर्थात् टिकनेवाले नहीं हैं, वास्तविक नहीं हैं। अगर वास्तविक होते तो एक ही रहते। वास्तविक तो इन सबका प्रकाशक और आश्रय है, जिसके प्रकाशमें 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह' का भान हो रहा है। उस प्रकाशकमें 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये चारों ही

नहीं हैं, प्रत्युत उसीसे इन चारोंको सत्ता मिलती है। अपनी मान्यताके कारण 'मैं', 'तू', 'यह', 'वह' का तो भान होता है, पर प्रकाशकका भान नहीं होता। वह प्रकाशक सबको प्रकाशित करता है, स्वयंप्रकाश-स्वरूप है और सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—यह सब विभक्त प्राणियोंका स्वरूप है और जो वास्तविक प्रकाशक है, वह विभागरहित है। यही वास्तवमें 'सात्त्विक ज्ञान' है।

विभागवाली, परिवर्तनशील और नष्ट होनेवाली जितनी वस्तुएँ हैं, यह ज्ञान उन सबका प्रकाशक है और स्वयं भी निर्मल तथा विकाररहित है—'तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम्' (गीता १४। ६)। इसलिये इस ज्ञानको 'सात्त्विक' कहा जाता है।

वास्तवमें यह 'सात्त्विक ज्ञान' प्रकाशयकी दृष्टि—(सम्बन्ध—)से 'प्रकाशक' और विभक्तकी दृष्टिसे 'अविभक्त' कहा जाता है। प्रकाश और विभक्तसे रहित होनेपर तो यह निर्गुण, निरपेक्ष 'वास्तविक ज्ञान' ही है।

परिशिष्ट भाव —जैसे साधारण मनुष्य शरीरमें अपनेको व्यापक मानता है, ऐसे ही साधक संसारमें परमात्माको व्यापक मानता है। जैसे शरीर और संसार एक हैं, ऐसे ही स्वयं और परमात्मा एक हैं।

साधककी दृष्टिमें प्राणियोंकी भी सत्ता रहनेके कारण यह 'सात्त्विक ज्ञान' (विवेक) कहा गया है। अगर उसकी दृष्टिमें प्राणियोंकी सत्ता न रहे, केवल अविनाशी सत्ता ही रहे तो यह गुणातीत 'तत्त्वज्ञान' (ब्रह्मकी प्राप्ति) ही है। वह अविनाशी सत्ता सब जगह समानरूपसे विद्यमान है। उस सत्ताके साथ हमारी स्वाभाविक एकता है।

सम्बन्ध—अब राजस ज्ञानका वर्णन करते हैं।

पृथक्त्वेन तु यज्ञानं नानाभावान्युत्थगिधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥

तु= परन्तुभूतेषु= प्राणियोंमेंतत्= उस
यत्= जोपृथक्त्वेन= अलग-अलगज्ञानम्= ज्ञानको
ज्ञानम्= ज्ञान अर्थात् जिस
ज्ञानके द्वारा मनुष्यनानाभावान्= अनेक भावोंको(तुम)
सर्वेषु= सम्पूर्णपृथगिधान्= अलग-अलग रूपसेराजसम्= राजस
वेत्ति= जानता है,विद्धि= समझो।
  • उदाहरणके रूपमें—राम, श्याम, गोविन्द और गोपाल—ये चार व्यक्ति हैं। राम और श्याम एक-दूसरेके सामने हैं, गोविन्द उनके पास है और गोपाल उनसे दूर है। राम अपनेको 'मैं' कहता है, अपने सामनेवाले श्यामको 'तू' कहता है, पासवाले गोविन्दको 'यह' कहता है और दूरवाले गोपालको 'वह' कहता है। अब यदि श्याम अपनेको 'मैं' कहे तो रामको वह 'तू' कहेगा, गोविन्दको 'यह' कहेगा तथा गोपालको 'वह' कहेगा। इसी तरह अगर गोविन्द अपनेको 'मैं' कहे तो वह श्यामको 'यह' कहेगा और रामको 'तू' कहेगा अथवा श्यामको 'तू' और रामको 'यह' कहेगा, तथा दूरवाले गोपालको 'वह' कहेगा। अब अगर गोपाल अपनेको 'मैं' कहे तो वह राम, श्याम और गोविन्द—तीनोंको 'वह' कहेगा। इस प्रकार राम, श्याम, गोविन्द और गोपाल—ये चारों ही एक-दूसरेकी दृष्टिमें 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह' बन सकते हैं।

श्लोक २२ ]

  • साधक-संजीवनी *

११४५

व्याख्या—'पृथक्त्वेन तु' यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान्'—राजस ज्ञानमें 'राग' की मुख्यता होती है—'रजो रागात्मकं विद्धि' (गीता १४। ७)। रागका यह नियम है कि वह जिसमें आ जाता है, उसमें किसीके प्रति आसक्ति, प्रियता पैदा करा देता है और किसीके प्रति द्वेष पैदा करा देता है। इस रागके कारण ही मनुष्य, देवता, यक्ष-राक्षस, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि जितने भी चर-अचर प्राणी हैं, उन प्राणियोंकी विभिन्न आकृति, स्वभाव, नाम, रूप, गुण आदिको लेकर राजस ज्ञानवाला मनुष्य उनमें रहनेवाली एक ही अविनाशी आत्माको तत्त्वसे अलग-अलग समझता है। 'वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्'—इसी तरह जिस ज्ञानसे मनुष्य अलग-अलग शरीरोंमें अन्तःकरण, स्वभाव, इन्द्रियाँ, प्राण आदिके सम्बन्धसे प्राणियोंको भी अलग-अलग मानता है, वह ज्ञान 'राजस' कहलाता है। राजस ज्ञानमें जड-चेतनका विवेक नहीं होता।

परिशिष्ट भाव—क्रिया और पदार्थ—दोनोंको सत्ता देकर उनके साथ रागपूर्वक सम्बन्ध जोड़नेके कारण सब अलग-अलग दीखते हैं।

सम्बन्ध—अब तामस ज्ञानका वर्णन करते हैं।

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥ २२॥

तु = किन्तु, यत् = जो (ज्ञान), अर्थात्, जिस ज्ञानके द्वारा, मनुष्य, एकस्मिन् = एक, कार्ये = कार्यरूप, शरीरमें ही, कृत्स्नवत् = सम्पूर्णकी तरह, सक्तम् = आसक्त रहता है, च = तथा (जो), अहैतुकम् = युक्तिरहित, अतत्त्वार्थवत् = वास्तविक, ज्ञानसे, रहित, (और), अल्पम् = तुच्छ है, तत् = वह, तामसम् = तामस, उदाहृतम् = कहा गया है।

व्याख्या—'यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तम्'—तामस मनुष्य एक ही शरीरमें सम्पूर्णकी तरह आसक्त रहता है अर्थात् उत्पन्न और नष्ट होनेवाले इस पांचभौतिक शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है। वह मानता है कि मैं ही छोटा बच्चा था, मैं ही जवान हूँ और मैं ही बूढ़ा हो जाऊँगा; मैं भोगी, बलवान् और सुखी हूँ; मैं धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ; मेरे समान दूसरा कौन है; इत्यादि। ऐसी मान्यता मूढ़ताके कारण ही होती है—'इत्यज्ञानविमोहिताः' (१६। १५)। 'अहैतुकम्'—तामस मनुष्यकी मान्यता युक्ति और शास्त्रप्रमाणसे विरुद्ध होती है। यह शरीर हरदम बदल रहा है, शरीरादि वस्तुमात्र अभावमें परिवर्तित हो रही है, दृश्यमात्र अदृश्य हो रहा है और इनमें तू सदा ज्यों-का-त्यों रहता है; अतः यह शरीर और तू कैसे हो सकते हैं?—इस प्रकारकी युक्तियोंको वह स्वीकार नहीं करता। 'अतत्त्वार्थवदल्पं च'—यह शरीर और मैं दोनों अलग-अलग हैं—इस वास्तविक ज्ञान-(विवेक) से वह रहित है। उसकी समझ अत्यन्त तुच्छ है अर्थात् तुच्छताकी प्राप्ति करानेवाली है। इसलिये इसको 'ज्ञान' कहनेमें भगवान्को संकोच हुआ है। कारण कि तामस पुरुषमें मूढ़ताकी प्रधानता होती है। मूढ़ता और ज्ञानका आपसमें विरोध है। अतः भगवान्ने 'ज्ञान' पद न देकर 'यत्' और 'तत्' पदसे ही काम चलाया है।

१-यहाँ 'तु' पद राजस ज्ञानको सात्त्विक ज्ञानसे भिन्न बतानेके लिये आया है। २-इस श्लोकमें राजस ज्ञानसे भी तामस ज्ञानको भिन्न बतानेके लिये 'तु' पद आया है।

११४६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

‘ततामसमुदाहृतम्’—युक्तिरहित, अल्प और अत्यन्त तुच्छ समझको ही महत्त्व देना ‘तामस’ कहा गया है। जब तामस समझ ‘ज्ञान’ है ही नहीं और भगवान्को भी इसको ‘ज्ञान’ कहनेमें संकोच हुआ है, तो फिर इसका

परिशिष्ट भाव —तामस ज्ञानमें आसुरी सम्पत्ति विशेष है। इस श्लोकमें ‘ज्ञान’ शब्द न देनेका तात्पर्य है कि वास्तवमें यह ज्ञान नहीं है, प्रत्युत अज्ञान ही है। यह तामस मनुष्योंकी बुद्धि है, जिसको ‘पशुबुद्धि’ कहा गया है— त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि। न जातः प्रागभूतोऽद्य देहवत्त्वं न नृश्यसि॥

(श्रीमद्भा० ११।५।२)

(श्रीशुकदेवजी बोले—) ‘हे राजन्! अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा। जैसे शरीर पहले नहीं था, पीछे पैदा हुआ और फिर मर जायगा, ऐसे तुम पहले नहीं थे, पीछे पैदा हुए और फिर मर जाओगे—यह बात नहीं है।’

सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विक कर्मका वर्णन करते हैं।

नियतं सद्गुरुहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥

यत्= जोसद्गुरुहितम्= कर्तृत्वाभिमानसे रहितअरागद्वेषतः= बिना राग-द्वेषके
कर्म= कर्मही (तथा)कृतम्= किया हुआ हो,
नियतम्= शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ (और)अफलप्रेप्सुना= फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारातत्= वह
सात्त्विकम्= सात्त्विक
उच्यते= कहा जाता है।

व्याख्या —‘नियतं सद्गुरुहितम्’……‘सात्त्विक-मुच्यते’—जिस व्यक्तिके लिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जिस परिस्थितिमें और जिस समय शास्त्रोंने जैसा करनेके लिये कहा है, उसके लिये वह कर्म ‘नियत’ हो जाता है।

यहाँ ‘नियतम्’ पदसे एक तो कर्मिका स्वरूप बताया है और दूसरे, शास्त्रनिषिद्ध कर्मका निषेध किया है।

‘सद्गुरुहितम्’ पदका तात्पर्य है कि वह नियत-कर्म कर्तृत्वाभिमानसे रहित होकर किया जाय। कर्तृत्वाभिमानसे रहित कहनेका भाव है कि जैसे वृक्ष आदिमें मूढ़ता होनेके कारण उनको कर्तृत्वका भान नहीं होता, पर उनकी भी वृद्धि आनेपर पत्तीका झड़ना, नये पत्तीका निकलना, शाखा कटनेपर घावका मिल जाना, शाखाओंका बढ़ना, फल-फूलका लगना आदि सभी क्रियाएँ समष्टि शक्तिके द्वारा

अपने-आप ही होती हैं; ऐसे ही इन सभी शरीरोंका बढ़ना-घटना, खाना-पीना, चलना-फिरना आदि सभी क्रियाएँ भी समष्टि शक्तिके द्वारा अपने-आप ही रही हैं। इन क्रियाओंके साथ न अभी कोई सम्बन्ध है, न पहले कोई सम्बन्ध था और न आगे ही कोई सम्बन्ध होगा। इस प्रकार जब साधकको प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है, तो फिर उसमें कर्तृत्व नहीं रहता। कर्तृत्व न रहनेपर उसके द्वारा जो कर्म होता है, वह संगरहित अर्थात् कर्तृत्वाभिमानरहित ही होता है।

यहाँ सांख्य-प्रकरणमें कर्तृत्वका त्याग मुख्य होनेसे और आगे ‘अरागद्वेषतः कृतम्’ पदोंमें भी आसक्तिके त्यागकी बात आनेसे यहाँ ‘सद्गुरुहितम्’ पदका अर्थ कर्तृत्व-अभिमानरहित लिया गया है*।

‘अरागद्वेषतः कृतम्’ पदोंका तात्पर्य है कि राग-द्वेषसे

  • यहाँ संन्यास-(सांख्ययोग-) में ‘सद्गुरुहितम्’ पदसे कर्तृत्व-अभिमानसे रहित होनेकी बात आयी है और त्याग-(कर्मयोग-) में ‘सद्गुरुत्वका फलं चैव’ (१८।१) पदोंसे आसक्ति तथा फलेच्छासे रहित होनेकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि सांख्ययोगीका शरीरमें थोड़ा भी अभिमान रहेगा तो उसका शरीरके साथ सम्बन्ध बना रहेगा, जो कि

श्लोक २४ ] * साधक-संजीवनी * ११४७

रहित हो करके कर्म किया जाय अर्थात् कर्मका ग्रहण

रागपूर्वक न हो और कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक न हो तथा

कर्म करनेके जितने साधन (शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण

आदि) हैं, उनमें भी राग-द्वेष न हो।

'अरागद्वेषतः' पदसे वर्तमानमें रागका अभाव बताया

है और 'अफलप्रेप्सुना' पदसे भविष्यमें रागका अभाव

बताया है। तात्पर्य यह है कि भविष्यमें मिलनेवाले फलकी

इच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा कर्म किया जाय अर्थात् क्रिया

और पदार्थोंसे निर्लिप्त रहते हुए असंगतापूर्वक कर्म किया

जाय तो वह सात्त्विक कहा जाता है।

इस सात्त्विक कर्ममें सात्त्विकता तभीतक है, जबतक

अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है। जब

प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब यह कर्म

'अकर्म' हो जाता है।

सम्बन्ध-अब राजस कर्मका वर्णन करते हैं।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।

क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥

तु = परन्तु | वा = अथवा | क्रियते = किया जाता है,

यत् = जो | साहङ्कारेण = अहंकारसे | तत् = वह

कर्म = कर्म | पुनः = और | राजसम् = राजस

कामेप्सुना = भोगोंकी इच्छासे | बहुलायासम् = परिश्रमपूर्वक | उदाहृतम् = कहा गया है।

व्याख्या-'यत्तु* कामेप्सुना कर्म'-हम कर्म करेंगे

तो हमें पदार्थ मिलेंगे, सुख-आराम मिलेगा, भोग मिलेंगे,

आदर-सम्मान-बड़ाई मिलेगी आदि फलकी इच्छासे कर्म

किया जाय।

अपनी विशेषताको लेकर (अहंकारपूर्वक) कर्म किया

जाय-इन दोनों भावोंमेंसे एक भाव होनेपर भी वह

कर्म राजस हो जाता है, यह बतानेके लिये यहाँ 'वा

पुनः' पद आये हैं। तात्पर्य है कि फलेच्छा और

अहंकार-इन दोनोंमेंसे जब एक भाव होनेपर भी कर्म

'राजस' हो जाता है, तब दोनों भाव होनेपर वह कर्म राजस

हो ही जायगा।

'साहंकारेण'-लोगोंके सामने कर्म करनेसे लोग

देखते हैं और वाह-वाह करते हैं तो अभिमान आता है

और जहाँ लोग सामने नहीं होते, वहाँ (एकान्तमें) कर्म

करनेसे दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विलक्षणता, विशेषता

देखकर अभिमान आता है। जैसे-दूसरे आदमी हमारी

तरह सुचारुरूपसे सांगोपांग कार्य नहीं कर सकते; हमारेमें

काम करनेकी जो योग्यता, विद्या, चतुरता आदि है, वह

हरेक आदमीमें नहीं मिलेगी; हम जो भी काम करते हैं,

उसको बहुत ही ईमानदारीसे और जल्दी करते हैं, आदि-

आदि। इस प्रकार अहंकारपूर्वक किया गया कर्म राजस

कहलाता है।

'क्रियते बहुलायासम्'-कर्म करते समय हरेक

व्यक्तिके शरीरमें परिश्रम तो होता ही है, पर जिस व्यक्तिमें

शरीरके सुख-आरामकी इच्छा मुख्य होती है, उसको कर्म

करते समय शरीरमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।

जिस व्यक्तिमें कर्मफलकी इच्छा तो मुख्य है, पर

शारीरिक सुख-आरामकी इच्छा मुख्य नहीं है, अर्थात् सुख-

आराम लेनेकी स्वाभाविक ही प्रकृति नहीं है, उसको कर्म

करते हुए भी शरीरमें परिश्रम नहीं मालूम देता। कारण कि

'वा पुनः'-आगे भविष्यमें मिलनेवाले फलको

लेकर (फलेच्छापूर्वक) कर्म किया जाय अथवा वर्तमानमें

भीतरमें भोगों और संग्रहकी जोरदार कामना होनेसे उसकी

वृत्ति कामनापूर्तिकी तरफ ही लगी रहती है; शरीरकी तरफ

तत्त्वप्राप्तिमें बाधक होगा; परन्तु कर्मयोगीका शरीरमें थोड़ा अभिमान रह भी जायगा तो वह सांख्ययोगीकी तरह उतना बाधक

नहीं होगा। कारण कि (कोई भी कर्म अपने लिये न करनेसे) कर्मयोगीका कर्तृत्व-अभिमान केवल कर्तव्य-पालनके लिये

ही होता है अर्थात् वह जिस समय जो कार्य करता है, उसी समय उसमें तात्कालिक कर्तृत्व-अभिमान रहता है। कार्यका अन्त

होनेपर वह कर्तृत्व-अभिमान उसी कार्यमें लीन हो जाता है।

  • राजस कर्मको सात्त्विक कर्मसे भिन्न बतानेके लिये यहाँ 'तु' पदका प्रयोग हुआ है।

११८४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८

नहीं। तात्पर्य है कि शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता होनेसे फलेच्छाकी अवहेलना हो जाती है और फलेच्छाकी मुख्यता होनेसे शरीरके सुख-आरामकी अवहेलना हो जाती है।

लोगोंके सामने कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक मिलनेसे और शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता न होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें परिश्रम नहीं मालूम देता। परन्तु एकान्तमें कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक न मिलनेसे और शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।

'तद्राजसमुदाहृतम्'—ऐसे फलकी इच्छावाले मनुष्यके द्वारा अहंकार और परिश्रमपूर्वक किया हुआ जो कर्म है, वह 'राजस' कहा गया है।

परिशिष्ट भाव—राजस मनुष्य अपनी आवश्यकताओंको अधिक बढ़ा लेता है, जिससे प्रत्येक काममें उसको अधिक वस्तुओंकी जरूरत पड़ती है। अधिक वस्तुओंको जुटानेमें परिश्रम भी अधिक होता है। राजस मनुष्य कर्मोंका विस्तार अधिक करता है, इसलिये भी उसको परिश्रम अधिक होता है। शरीरमें राग रहनेके कारण राजस मनुष्य शरीरका आराम चाहता है, जिससे उसको थोड़े काममें भी अधिक परिश्रम मालूम देता है।

सम्बन्ध—अब तामस कर्मका वर्णन करते हैं।

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ २५॥

यत् = जो कर्म = कर्म अनुबन्धम् = परिणाम, क्षयम् = हानि, हिंसाम् = हिंसा च = और पौरुषम् = सामर्थ्यको अनवेक्ष्य = न देखकर मोहात् = मोहपूर्वक आरभ्यते = आरम्भ किया जाता है, तत् = वह तामसम् = तामस उच्यते = कहा जाता है।

व्याख्या—'अनुबन्धम्'—जिसको फलकी कामना होती है, वह मनुष्य तो फलप्राप्तिके लिये विचारपूर्वक कर्म करता है, परन्तु तामस मनुष्यमें मूढ़ताकी प्रधानता होनेसे वह कर्म करनेमें विचार करता ही नहीं। इस कार्यको करनेसे मेरा तथा दूसरोंके प्राणियोंका अभी और परिणाममें कितना नुकसान होगा, कितना अहित होगा—इस अनुबन्ध अर्थात् परिणामको न देखकर वह कार्य आरम्भ कर देता है।

'क्षयम्'—इस कार्यको करनेसे अपने और दूसरोंके शरीरोंकी कितनी हानि होगी; धन और समयका कितना खर्चा होगा; इससे दुनियामें मेरा कितना अपमान, निन्दा, तिरस्कार आदि होगा, मेरा लोक-परलोक बिगड़ जायगा आदि नुकसानको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।

'हिंसाम्'—इस कर्मसे कितने जीवोंकी हत्या होगी; कितने श्रेष्ठ व्यक्तियोंके सिद्धान्तों और मान्यताओंकी हत्या हो जायगी; दूसरे मनुष्योंकी मनुष्यताकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी; अभीके और भावी जीवोंके शुद्ध भाव, आचरण, वेश-भूषा, खान-पान आदिकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी; इससे मेरा और दुनियाका कितना अध:पतन होगा आदि हिंसाको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।

'अनवेक्ष्य च पौरुषम्'—इस कामको करनेकी मेरेमें कितनी योग्यता है, कितना बल, सामर्थ्य है; मेरे पास कितना समय है, कितनी बुद्धि है, कितनी कला है, कितना ज्ञान है आदि अपने पौरुष-(पुरुषार्थ-) को न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।

'मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते'—तामस मनुष्य कर्म करते समय उसके परिणाम, उससे होनेवाले नुकसान, हिंसा और अपनी सामर्थ्यका कुछ भी विचार न करके, जब जैसा मनमें भाव आया, उसी समय बिना विवेक-विचारके वैसा ही कर बैठता है। इस प्रकार किया गया कर्म 'तामस' कहलाता है।

श्लोक २६ ]

  • साधक-संजीवनी *

११४९

परिशिष्ट भाव —तामस मनुष्य अपनी शक्ति, परिणाम आदिका विचार न करके मूढ़तासे काम करता है*। वह स्वाभाविक ही ऐसे काम करता है, जिनसे दूसरोंको बाधा पहुँचे; जैसे—रास्तेमें खड़े होकर बात करने लग जाना, रास्तेमें साइकिल खड़ी कर देना आदि। दूसरोंको लगनेवाली बाधाकी तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता।

सात्त्विक स्वभाव स्वतः उत्थानकी तरफ जाता है, राजस स्वभावमें उन्नति रुक जाती है और तामस स्वभाव स्वतः पतनकी तरफ जाता है।

सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विक कर्ताके लक्षण बताते हैं।

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।

सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥

कर्ता | = (जो) कर्ता | समन्वितः | = धैर्य और उत्साहयुक्त | निर्विकारः | = निर्विकार है, (वह) ---|---|---|---|---|--- मुक्तसङ्गः | = रागरहित, | | (तथा) | सात्त्विकः | = सात्त्विक अनहंवादी | = कर्तृत्वाभिमानसे रहित, | सिद्ध्यसिद्धयोः | = सिद्धि और असिद्धिमें | उच्यते | = कहा जाता है।

व्याख्या —‘मुक्तसंगः’—जैसे सांख्ययोगीका कर्मके साथ राग नहीं होता, ऐसे सात्त्विक कर्ता भी रागरहित होता है।

कामना, वासना, आसक्ति, स्पृहा, ममता आदिसे अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिमें आसक्ति, लिप्तता होती है। सात्त्विक कर्ता इस लिप्ततासे सर्वथा रहित होता है।

‘अनहंवादी’—पदार्थ, वस्तु, परिस्थिति आदिको लेकर अपनेमें जो एक विशेषताका अनुभव करना है—यह अहंवदनशीलता है। यह अहंवदनशीलता आसुरी-सम्पत्ति होनेसे अत्यन्त निकृष्ट है। सात्त्विक कर्तामें यह अहंवदनशीलता, अभिमान तो रहता ही नहीं, प्रत्युत ‘मैं इन चीजोंका त्यागी हूँ, मेरेमें यह अभिमान नहीं है, मैं निर्विकार हूँ, मैं सम हूँ, मैं सर्वथा निष्काम हूँ, मैं संसारके सम्बन्धसे रहित हूँ’—इस तरहके अहंभावका भी उसमें अभाव रहता है।

‘धृत्युत्साहसमन्वितः’—कर्तव्य-कर्म करते हुए विघ्न-बाधाएँ आ जायँ, उस कर्मका परिणाम ठीक न निकले, लोगोंमें निन्दा हो जाय, तो भी विघ्न-बाधा आदि न

आनेपर जैसा धैर्य रहता है, वैसा ही धैर्य विघ्न-बाधा आनेपर भी नित्य-निरन्तर बना रहे—इसका नाम ‘धृति’ है और सफलता-ही-सफलता मिलती चली जाय, उन्नति होती चली जाय, लोगोंमें मान, आदर, महिमा आदि बढ़ते चले जायँ—ऐसी स्थितिमें मनुष्यके मनमें जैसी उम्मेदवारी, सफलताके प्रति उत्साह रहता है, वैसी ही उम्मेदवारी इससे विपरीत अर्थात् असफलता, अवनति, निन्दा आदि हो जानेपर भी बनी रहे—इसका नाम ‘उत्साह’ है। सात्त्विक कर्ता इस प्रकारकी धृति और उत्साहसे युक्त रहता है।

‘सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः’—सिद्धि और असिद्धिमें अपनेमें कुछ भी विकार न आये, अपनेपर कुछ भी असर न पड़े अर्थात् कार्य ठीक तरहसे सांगोपांग पूर्ण हो जाय अथवा पूरा उद्योग करते हुए अपनी शक्ति, समझ, समय, सामर्थ्य आदिको पूरा लगाते हुए भी कार्य पूरा न हो; फल प्राप्त हो अथवा न हो, तो भी अपने अन्तःकरणमें प्रसन्नता और खिन्नता, हर्ष और शोकका न होना ही सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार रहना है।

‘कर्ता सात्त्विक उच्यते’—ऐसा आसक्ति तथा अहंकारसे

*बिना बिचारे जो करै, सो पाछे पछिताय। काम बिगारे आपनो, जग में होत हैसाय॥ जग में होत हैसाय, चित्त में चैन न पावै॥ खान पान सनमान, राग-रैग मन नहि भावै॥ कह गिरधर कविराय करमगति टरत न टारे। खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥

११५०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८

रहित, धैर्य तथा उत्साहसे युक्त और सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार कर्ता 'सात्त्विक' कहा जाता है।

इस श्लोकमें छ: बातें बतायी गयी हैं-संग,

अहंवदनशीलता, धृति, उत्साह, सिद्धि और असिद्धि। इनमेंसे पहली दो बातोंसे रहित, बीचकी दो बातोंसे युक्त और अन्तकी दो बातोंमें निर्विकार रहनेके लिये कहा गया है।

परिशिष्ट भाव-सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार, सम रहनेकी बात गीतामें तीन बार आयी है-'सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा' (२।४८), 'सम: सिद्धावसिद्धौ च' (४।२२) और यहाँ 'सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकार:'। तात्पर्य है कि सिद्धि-असिद्धि हाथकी बात नहीं है, पर उसमें निर्विकार रहना हाथकी बात है। जो हाथकी बात है, उसको ठीक करना है।

'अनहंवादी'-सात्त्विक मनुष्य 'जैसा मैं कर सकता हूँ, वैसा दूसरा नहीं कर सकता'-इस तरह न तो बाहरसे बोलता है और न भीतरसे बोलता है। अपनेमें विशेषताका अनुभव करना ही भीतरसे बोलना है।

सम्बन्ध-अब राजस कर्ताके लक्षण बताते हैं।

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचि:। हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित:॥ २७॥

कर्ता =(जो) कर्ता

रागी =रागी

कर्मफलप्रेप्सु: =कर्मफलकी इच्छावाला,

लुब्ध: =लोभी,

हिंसात्मक: =हिंसाके स्वभाववाला,

अशुचि: =अशुद्ध (और)

हर्षशोकान्वित: =हर्ष-शोकसे युक्त है, (वह)

राजस: =राजस

परिकीर्तित: =कहा गया है।

व्याख्या-'रागी'-रागका स्वरूप रजोगुण होनेके कारण भगवान्ने राजस कर्ताके लक्षणोंमें सबसे पहले 'रागी' पद दिया है। रागका अर्थ है-कर्मोंमें, कर्मोंके फलोंमें तथा वस्तु, पदार्थ आदिमें मनका खिंचाव होना, मनकी प्रियता होना। इन चीजों जिसपर रंग चढ़ जाता है, वह 'रागी' होता है।

'कर्मफलप्रेप्सु:':-राजस मनुष्य कोई भी काम करेगा तो वह किसी फलकी चाहनाको लेकर ही करेगा; जैसे-मैं ऐसा-ऐसा अनुष्ठान कर रहा हूँ, दान दे रहा हूँ, उससे यहाँ धन, मान, बड़ाई आदि मिलेंगे और परलोकमें स्वर्गादिके भोग, सुख आदि मिलेंगे; मैं ऐसी-ऐसी दवाइयोंका सेवन कर रहा हूँ तो उनसे मेरा शरीर नीरोग रहेगा, आदि।

'लुब्ध:':-राजस मनुष्यको जितना जो कुछ मिलता है, उसमें वह संतोष नहीं करता, प्रत्युत 'जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई' की तरह 'और मिलता रहे, और मिलता रहे' अर्थात् आदर, सत्कार, महिमा आदि अधिक-से-अधिक होते रहें; धन, पुत्र, परिवार आदि अधिक-से-अधिक बढ़ते रहें-इस प्रकारकी लाग लगी रहती है, लोभ लगा रहता है।

'हिंसात्मक:':-वह हिंसाके स्वभाववाला होता है। अपने स्वार्थके लिये वह दूसरोंके नुकसानकी, दु:खकी परवाह नहीं करता। वह ज्यों-ज्यों अधिक भोग-सामग्री इकट्ठी करके भोग भोगता है, त्यों-ही-त्यों दूसरे अभावग्रस्त लोगोंके हृदयमें जलन पैदा होती है। अतः दूसरोंके दु:खकी परवाह न करना तथा भोग भोगना हिंसा ही है।

तामस कर्म (इसी अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) और राजस कर्ता-दोनोंमें हिंसा बतानेका तात्पर्य यह है कि मूढ़ता रहनेके कारण तामस मनुष्यकी क्रियाएँ विवेकपूर्वक नहीं होतीं; अतः चलने-फिरने, उठने-बैठने आदिमें उसके द्वारा हिंसा होती है। राजस मनुष्य अपने सुखके लिये बढ़िया-बढ़िया भोग भोगता है तो उसको देखकर जिनको वे भोग नहीं मिलते, उनके हृदयमें जलन होती है, यह हिंसा उस भोग भोगनेवालेको ही लगती है। कारण कि कोई भी भोग बिना हिंसाके होता ही नहीं। तात्पर्य यह है कि तामस मनुष्यके द्वारा तो कर्ममें हिंसा होती है और राजस मनुष्य स्वयं हिंसात्मक होता है।

'अशुचि:':-रागी पुरुष भोग-बुद्धिसे जिन वस्तुओं,

श्लोक २८ ]

  • साधक-संजीवनी *

११५१

पदार्थों आदिका संग्रह करता है, वे सब चीजें अपवित्र हो जाती हैं। वह जहाँ रहता है, वहाँका वायुमण्डल अपवित्र हो जाता है। वह जिन कपड़ोंको पहनता है, उन कपड़ोंमें भी अपवित्रता आ जाती है। यही कारण है कि आसक्ति-ममतावाले मनुष्यके मरनेपर उसके कपड़े आदिको कोई रखना नहीं चाहता। जिस स्थानपर उसके शवको जलाया जाता है, वहाँ कोई भजन-ध्यान करना चाहे तो उसका मन नहीं लगेगा। वहाँ भूलसे कोई सो जायगा तो उसको प्रायः खराब-खराब स्वप्न आयेंगे। तात्पर्य यह है कि

परिशिष्ट भाव—‘हिंसात्मकः’ —‘पहले तामस कर्ममें भी हिंसा बतायी गयी है, (इसी अध्यायका पचीसवाँ श्लोक); क्योंकि रजोगुण और तमोगुण—दोनों एक-दूसरेके नजदीक पड़ते हैं, पर सत्त्वगुण दोनोंसे दूर पड़ता है। रजोगुण रागात्मक होता है और तमोगुण मोहात्मक। रजोगुणमें तो होश और सावधानी रहती है, पर तमोगुणमें बेहोशी और असावधानी रहती है। राग, स्वार्थबुद्धि होनेसे जितनी हिंसा होती है, उतनी मोह होनेसे नहीं होती। इसलिये रजोगुणमें अधिक हिंसा होती है। राग, स्वार्थबुद्धिके कारण राजस मनुष्य ‘हिंसात्मक’ हो जाता है। उसकी हिंसामें तल्लीनता हो जाती है।

सम्बन्ध—अब तामस कर्ताके लक्षण बताते हैं।

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोऽनैष्कृतिकोऽलसः ।

विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥

कर्ता= ( जो ) कर्ताअनैष्कृतिकः= उपकारीका अपकारदीर्घसूत्री= दीर्घसूत्री है,
अयुक्तः= असावधान,करनेवाला,( वह )
प्राकृतः= अशिक्षित,अलसः= आलसी,तामसः= तामस
स्तब्धः= ऐंट-अकड़वाला,विषादी= विषादीउच्यते= कहा
शठः= जिद्दी,= औरजाता है ।

व्याख्या—‘अयुक्तः’ —‘तमोगुण मनुष्यको मूढ़ बना देता है (गीता—चौदहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इस कारण किस समयमें कौन-सा काम करना चाहिये? किस तरह करनेसे हमें लाभ है और किस तरह करनेसे हमें हानि है?—इस विषयमें तामस मनुष्य सावधान नहीं रहता अर्थात् वह कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सोचता ही नहीं। इसलिये वह ‘अयुक्त’ अर्थात् असावधान कहलाता है।

‘प्राकृतः’ —‘जिसने शास्त्र, सत्संग, अच्छी शिक्षा, उपदेश आदिसे न तो अपने जीवनको ठीक बनाया है और न अपने जीवनपर कुछ विचार ही किया है, माँ-बापसे जैसा पैदा हुआ है, वैसा-का-वैसा ही कोरा अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्यको शिक्षासे रहित रहा है, ऐसा मनुष्य

उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी तरफ आकृष्ट होते ही आसक्ति-ममतारूप मलिनता आने लगती है, जिससे मनुष्यका शरीर और शरीरकी हड्डियाँ अधिक अपवित्र हो जाती हैं।

‘हर्षशोकान्वितः’ —‘उसके सामने दिनमें कितनी बार सफलता-विफलता, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति, घटना आदि आते रहते हैं, उनको लेकर वह हर्ष-शोक, राग-द्वेष, सुख-दुःख आदिमें ही उलझा रहता है।

‘कर्ता राजसः परिकीर्तितः’ —‘उपर्युक्त लक्षणोंवाला कर्ता ‘राजस’ कहा गया है।

‘प्राकृत’ अर्थात् अशिक्षित कहलाता है।

‘स्तब्धः’ —‘तमोगुणकी प्रधानताके कारण उसके मन, वाणी और शरीरमें अकड़ रहती है। इसलिये वह अपने वर्ण-आश्रममें बड़े-बूढ़े माता, पिता, गुरु, आचार्य आदिके सामने कभी झुकता नहीं। वह मन, वाणी और शरीरसे कभी सरलता और नम्रताका व्यवहार नहीं करता, प्रत्युत कठोर व्यवहार करता है। ऐसा मनुष्य ‘स्तब्ध’ अर्थात् ऐंट-अकड़वाला कहलाता है।

‘शठः’ —‘तामस मनुष्य अपनी एक जिद होनेके कारण दूसरोंकी दी हुई अच्छी शिक्षाको, अच्छे विचारोंको नहीं मानता। उसको तो मूढ़ताके कारण अपने ही विचार अच्छे लगते हैं। इसलिये वह ‘शठ’ अर्थात् जिद्दी कहलाता है*।

  • मूर्खस्य पंच चिन्हानि गर्वी दुर्वचनी तथा। हठी चाप्रियवादी च परोक्त नैव मन्यते ॥

१५२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

'अनेच्छुतिकः' —जिनसे कुछ उपकार पाया है, उनका प्रत्युपकार करनेका जिसका स्वभाव होता है, वह 'नैच्छुतिक' कहलाता है। परन्तु तामस मनुष्य दूसरोंसे उपकार पा करके भी उनका उपकार नहीं करता, प्रत्युत उनका अपकार करता है, इसलिये वह 'अनेच्छुतिक' कहलाता है।

'अलसः' —अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार आवश्यक कर्तव्य-कर्म प्राप्त हो जानेपर भी तामस मनुष्योंको मूढ़ताके कारण वह कर्म करना अच्छा नहीं लगता, प्रत्युत सांसारिक निरर्थक बातोंको पड़े-पड़े सोचते रहना अथवा नींदमें पड़े रहना अच्छा लगता है। इसलिये उसे आलसी कहा गया है।

'विषादी' —यद्यपि तामस मनुष्यमें यह विचार होता ही नहीं कि क्या कर्तव्य होता है और क्या अकर्तव्य होता है तथा निद्रा, आलस्य, प्रमाद आदिमें मेरी शक्ति, मेरे जीवनके अमूल्य समयका कितना दुरुपयोग हो रहा है, तथापि अच्छे मार्गसे और कर्तव्यसे च्युत होनेसे उसके भीतर स्वाभाविक ही एक विषाद (दुःख, अशान्ति) होता रहता है। इसलिये उसे 'विषादी' कहा गया है।

'दीर्घसूत्री' —अमुक काम किस तरीकेसे बढ़िया और जल्दी हो सकता है—इस बातको वह सोचता ही नहीं। इसलिये वह किसी काममें अविवेकपूर्वक लग भी जाता है तो थोड़े समयमें होनेवाले काममें भी बहुत ज्यादा समय लगा देता है और उससे काम भी सुचारूपसे नहीं होता। ऐसा मनुष्य 'दीर्घसूत्री' कहलाता है।

'कर्ता तामस उच्यते' —उपर्युक्त आठ लक्षणोंवाला कर्ता 'तामस' कहलाता है।

विशेष बात

छब्बीसवें, सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें श्लोकमें जितनी बातें आयी हैं, वे सब कर्ताको लेकर ही कही गयी हैं। कर्ताके जैसे लक्षण होते हैं, उन्हींके अनुसार कर्म होते हैं। कर्ता जिन गुणोंको स्वीकार करता है, उन गुणोंके अनुसार ही कर्माका रूप होता है। कर्ता जिस साधनको करता है, वह साधन कर्ताका रूप हो जाता है। कर्ताके आगे जो करण होते हैं, वे भी कर्ताके अनुरूप होते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसा कर्ता होता है, वैसे ही कर्म, करण आदि होते हैं। कर्ता सात्त्विक, राजस अथवा तामस होगा तो कर्म

आदि भी सात्त्विक, राजस अथवा तामस होंगे।

सात्त्विक कर्ता अपने कर्म, बुद्धि आदिको सात्त्विक बनाकर सात्त्विक सुखका अनुभव करते हुए असंगतापूर्वक परमात्मत्वसे अभिन्न हो जाता है—'दुःखान्तं च निगच्छति' (गीता १८।३६)। कारण कि सात्त्विक कर्ताका ध्येय परमात्मा होता है। इसलिये वह कर्तृत्व-भोक्तृत्वसे रहित होकर चिन्मय तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है; क्योंकि वह तात्त्विक स्वरूपसे अभिन्न ही था। परन्तु राजस-तामस कर्ता राजस-तामस कर्म, बुद्धि आदिके साथ तन्मय होकर राजस-तामस सुखमें लिप्त होता है। इसलिये वह परमात्मत्वसे अभिन्न नहीं हो सकता। कारण कि राजस-तामस कर्ताका उद्देश्य परमात्मा नहीं होता और उसमें जड़ताका बन्धन भी अधिक होता है।

अब यहाँ शंका हो सकती है कि कर्ताका सात्त्विक होना तो ठीक है, पर कर्म सात्त्विक कैसे होते हैं? इसका समाधान यह है कि जिस कर्मके साथ कर्ताका राग नहीं है, कर्तृत्वाभिमान नहीं है, लेप (फलेच्छा) नहीं है, वह कर्म सात्त्विक हो जाता है। ऐसे सात्त्विक कर्मसे अपना और दुनियाका बड़ा भला होता है। उस सात्त्विक कर्मका जिन-जिन वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, वायुमण्डल आदिके साथ सम्बन्ध होता है, उन सबमें निर्मलता आ जाती है; क्योंकि निर्मलता सत्त्वगुणका स्वभाव है—'तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्' (गीता १४।६)।

दूसरी बात, पतंजलि महाराजने रजोगुणको क्रियात्मक ही माना है—'प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्' (योगदर्शन २।१८)। परन्तु गीता रजोगुणको क्रियात्मक मानते हुए भी मुख्यरूपसे रागात्मक ही मानती है—'रजो रागात्मकं विद्धि' (१४।७)। वास्तवमें देखा जाय तो 'राग' ही बाँधनेवाला है, 'क्रिया' नहीं।

गीतामें कर्म तीन प्रकारके बताये गये हैं—सात्त्विक, राजस और तामस (इसी अध्यायके तेईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक)। कर्म करनेवालेका भाव सात्त्विक होगा तो वे कर्म 'सात्त्विक' हो जायेंगे, भाव राजस होगा तो वे कर्म 'राजस' हो जायेंगे और भाव तामस होगा तो वे कर्म 'तामस' हो जायेंगे। इसलिये भगवान्ने केवल क्रियाको रजोगुणी नहीं माना है।

परिशिष्ट भाव —'विषादी' पद रजोगुणमें आना चाहिये, पर यहाँ तमोगुणमें आया है। तामस वृत्तिका विवेकसे विरोध है, इसलिये तामस मनुष्यमें विषाद अधिक होता है।

श्लोक २९ ]

  • साधक-संजीवनी *

११५३

सम्बन्ध—सभी कर्म विचारपूर्वक किये जाते हैं। उन कर्मोंके विचारमें बुद्धि और धृति—इन कर्मसंग्राहक करणोंकी प्रधानता होनेसे अब आगे उनके भेद बताते हैं।

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥ २९॥

धनञ्जय = हे धनंजय! (अब तू) गुणतः = गुणोंके अनुसार बुद्धेः = बुद्धि च = और धृतेः = धृतिके एव = भी त्रिविधम् = तीन प्रकारके भेदम् = भेद पृथक्त्वेन = अलग-अलगरूपसे शृणु = सुन, अशेषेण = (जो कि मेरे द्वारा) पूर्णरूपसे प्रोच्यमानम् = कहे जा रहे हैं।

व्याख्या—[ इसी अध्यायके अठारहवें श्लोकमें कर्म-संग्रहके तीन हेतु बताये गये हैं—करण, कर्म और कर्ता। इनमेंसे कर्म करनेके जो इन्द्रियाँ आदि करण हैं, उनके सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन भेद नहीं होते। उन इन्द्रियोंमें बुद्धिकी ही प्रधानता रहती है और सभी इन्द्रियाँ बुद्धिके अनुसार ही काम करती हैं। इसलिये यहाँ बुद्धिके भेदसे करणोंके भेद बता रहे हैं।

बुद्धिके निश्चयको, विचारको दृढ़तासे ठीक तरह रखनेवाली और अपने लक्ष्यसे विचलित न होने देनेवाली धारण-शक्तिका नाम धृति है। धारण-शक्ति अर्थात् धृतिके बिना बुद्धि अपने निश्चयपर दृढ़ नहीं रह सकती। इसलिये बुद्धिके साथ-ही-साथ धृतिके तीन भेद बताने आवश्यक हो गये*।

मनुष्य जो कुछ भी करता है, बुद्धिपूर्वक ही करता है अर्थात् ठीक सोच-समझकर ही किसी कार्यमें प्रवृत्त होता है। उस कार्यमें प्रवृत्त होनेपर भी उसको धैर्यकी बड़ी भारी आवश्यकता होती है। उसकी बुद्धिमें विचार-शक्ति तेज है और उसे धारण करनेवाली शक्ति—धृति श्रेष्ठ है, तो उसकी बुद्धि अपने निश्चित किये हुए लक्ष्यसे विचलित नहीं होती। जब बुद्धि अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहती है, तब मनुष्यका कार्य सिद्ध हो जाता है।

अभी साधकोंके लिये कर्मप्रेरक और कर्म-संग्रहका जो प्रकरण चला है, उसमें ज्ञान, कर्म और कर्ताकी ही खास आवश्यकता है। ऐसे ही साधक अपनी साधनामें दृढ़तापूर्वक लगा रहे, इसके लिये बुद्धि और धृतिके भेदको जाननेकी विशेष आवश्यकता है; क्योंकि उनके भेदको ठीक जानकर ही वह संसारसे ऊँचा उठ सकता है। किस प्रकारकी

बुद्धि और धृतिको धारण करके साधक संसारसे ऊँचा उठ सकता है और किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिके रहनेसे उसे ऊँचा उठनेमें बाधा लग सकती है—यह जानना साधकके लिये बहुत जरूरी है। इसलिये भगवान्ने उन दोनोंके भेद बताये हैं। भेद बतानेमें भगवान्का भाव यह है कि सात्त्विकी बुद्धि और धृतिसे ही साधक ऊँचा उठ सकता है, राजसी-तामसी बुद्धि और धृतिसे नहीं।]

'धनंजय'—जब पाण्डवोंने राजसूय यज्ञ किया था, तब अर्जुन अनेक राजाओंको जीतकर बहुत-सा धन लेकर आये थे। इसीसे उनका नाम 'धनंजय' पड़ा था। अब भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि अपनी साधनामें सात्त्विकी बुद्धि और धृतिको ग्रहण करके गुणातीत तत्त्वकी प्राप्ति करना ही वास्तविक धन है; इसलिये तुम इस वास्तविक धनको धारण करो, इसीमें तुम्हारे 'धनंजय' नामकी सार्थकता है।

'बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु'—भगवान् कहते कि बुद्धि भी एक है और धृति भी एक है; परन्तु गुणोंकी प्रधानतासे उस बुद्धि और धृतिके भी सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन-तीन भेद हो जाते हैं। उनका मैं ठीक-ठीक विवेचन करूँगा और थोड़ेमें बहुत विशेष बात कहूँगा, उनको तुम मन लगाकर, ध्यान देकर ठीक तरहसे सुनो।

धृति श्रोत्रादि करणोंमें नहीं आयी है। इसलिये भगवान् 'चैव' पदका प्रयोग करके कह रहे हैं कि जैसे बुद्धिके तीन भेद बताऊँगा, ऐसे ही धृतिके भी तीन भेद बताऊँगा। साधारण दृष्टिसे देखनेपर तो धृति भी बुद्धिका ही एक गुण

  • सांख्ययोगमें तो बुद्धि और धृतिकी खास आवश्यकता है ही; परमात्मप्राप्तिके अन्य जितने भी साधन हैं, उन सबमें भी बुद्धि और धृतिकी बड़ी भारी आवश्यकता है। इसलिये गीतामें बुद्धि और धृति—दोनोंको साथ-साथ कहा है; जैसे—'शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया' (६। २५), और 'बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च' (१८। ५१)।

१९५४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

दीखती है। बुद्धिका एक गुण होते हुए भी धृति बुद्धिसे अलग और विलक्षण है; क्योंकि धृति स्वयं अर्थात् कर्तामें रहती है। उस धृतिके कारण ही मनुष्य बुद्धिका ठीक-ठीक उपयोग कर सकता है। धृति जितनी श्रेष्ठ अर्थात् सात्त्विकी होगी, साधककी (साधनमें) बुद्धि उतनी ही स्थिर रहेगी। साधनमें बुद्धिकी स्थिरताकी जितनी आवश्यकता है, उतनी आवश्यकता मनकी स्थिरताकी नहीं है। हाँ, एक अंशमें अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्तिमें मनकी स्थिरताकी आवश्यकता है; परन्तु पारमार्थिक उन्नतिमें तो बुद्धिके अपने उद्देश्यपर स्थिर रहनेकी ही ज्यादा आवश्यकता है।

साधककी बुद्धि भी सात्त्विकी हो और धृति भी सात्त्विकी हो, तभी साधक अपने साधनमें दृढ़तासे लगा रहेगा। इसलिये इन दोनोंके ही भेद जाननेकी आवश्यकता है।

‘पृथक्त्वेन’ —उनके भेद अलग-अलग ठीक तरहसे कहुँगा अर्थात् बुद्धि और धृतिके विषयोंमें भी क्या-क्या भेद होते हैं, उनको भी कहुँगा।

‘प्रोच्यमानमशेषेण’ —भगवान् कहते हैं कि बुद्धि और धृतिके विषयमें जाननेकी जो-जो आवश्यक बातें हैं, उन सबको मैं पूरा-पूरा कहुँगा, जिसके बाद फिर जानना बाकी नहीं रहेगा।

सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विकी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्यं भयाभये ।

बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन !कार्याकार्यं= कर्तव्य और= और
या= जोअकर्तव्यको,मोक्षम्= मोक्षको
(बुद्धि)भयाभये= भय औरवेत्ति= जानती है,
प्रवृत्तिम्= प्रवृत्तिअभयकोसा= वह
= और= तथाबुद्धिः= बुद्धि
निवृत्तिम्= निवृत्तिको,बन्धम्= बन्धनसात्त्विकी= सात्त्विकी है।

व्याख्या—‘प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च’ —साधकमात्रकी प्रवृत्ति और निवृत्ति—ये दो अवस्थाएँ होती हैं। कभी वह संसारका काम-धंधा करता है, तो यह प्रवृत्ति-अवस्था है और कभी संसारका काम-धंधा छोड़कर एकान्तमें भजन-ध्यान करता है, तो यह निवृत्ति-अवस्था है। परन्तु इन दोनोंमें सांसारिक कामनासहित प्रवृत्ति और वासनासहित निवृत्ति—ये दोनों ही अवस्थाएँ ‘प्रवृत्ति’ हैं अर्थात् संसारमें लगानेवाली हैं तथा सांसारिक कामनारहित प्रवृत्ति और वासनारहित निवृत्ति—ये दोनों ही अवस्थाएँ ‘निवृत्ति’ हैं अर्थात् परमात्माकी तरफ ले जानेवाली हैं। इसलिये साधक इनको ठीक-ठीक जानकर कामना-वासनारहित

प्रवृत्ति और निवृत्तिको ही ग्रहण करें।

वास्तवमें गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो कामना-वासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति भी यदि अपने सुख, आराम आदिके लिये की जायँ तो वे दोनों ही ‘प्रवृत्ति’ हैं; क्योंकि वे दोनों ही बाँधनेवाली हैं अर्थात् उनसे अपना व्यक्तित्व नहीं मिटता। परन्तु यदि कामना-वासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों केवल दूसरोंके सुख, आराम और हितके लिये ही की जायँ, तो वे दोनों ही ‘निवृत्ति’ हैं; क्योंकि उन दोनोंसे ही अपना व्यक्तित्व नहीं रहता। वह व्यक्तित्व कब नहीं रहता ? जब प्रवृत्ति और निवृत्ति जिसके प्रकाशसे प्रकाशित होती हैं तथा जो प्रवृत्ति और निवृत्तिसे रहित है, उस प्रकाशक अर्थात्

१-बुद्धिके द्वारा तो अपना ध्येय (लक्ष्य) ठीक-ठीक समझमें आता है और धृतिके द्वारा कर्ता स्वयं उस लक्ष्यपर दृढ़ रहता है। साधक पहले कैसे ही भावों और आचरणोंवाला अर्थात् पापी-से-पापी और दुराचारी-से-दुराचारी क्यों न रहा हो, वह भी ‘मुझे तो परमात्मप्राप्ति ही करनी है’—इस उद्देश्यपर दृढ़ रहता है, तो उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं (गीता—नवें अध्यायका तीसवाँ श्लोक)।

२-प्रवृत्तिको छोड़कर कोई एकान्तमें भजन-ध्यान करता है तो वहाँ उसके सामने द्रव्य, पदार्थ तो नहीं हैं, पर ‘लोग मेरेको ज्ञानी, ध्यानी, साधक समझेंगे, तो मेरा आदर-सत्कार होगा’ इस प्रकार भीतर एक सूक्ष्म इच्छा रहती है, जिसे ‘वासना’ कहते हैं।

श्लोक ३० ]

  • साधक-संजीवनी *

११५५

तत्त्वकी प्रापतिके उद्देश्यसे ही प्रवृत्ति और निवृत्ति की जाय। प्रवृत्ति तो की जाय प्राणिमात्रकी सेवाके लिये और निवृत्ति की जाय परम विश्राम अर्थात् स्वरूप-स्थितिके लिये।

‘कार्याकार्य’ —शास्त्र, वर्ण, आश्रमकी मर्यादाके अनुसार जो काम किया जाता है, वह ‘कार्य’ है और शास्त्र आदिकी मर्यादासे विरुद्ध जो काम किया जाता है वह ‘अकार्य’ है।

जिसको हम कर सकते हैं, जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे जीवका जरूर कल्याण होता है, वह ‘कार्य’ अर्थात् कर्तव्य कहलाता है और जिसको हमें नहीं करना चाहिये तथा जिससे जीवका बन्धन होता है, वह ‘अकार्य’ अर्थात् अकर्तव्य कहलाता है। जिसको हम नहीं कर सकते, वह अकर्तव्य नहीं कहलाता, वह तो अपनी असामर्थ्य है।

‘भयाभये’ —भय और अभयके कारणको देखना चाहिये। जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका अनिष्ट होनेकी सम्भावना है, वह कर्म ‘भय’ अर्थात् भयदायक है और जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका हित होनेकी सम्भावना है, वह कर्म ‘अभय’ अर्थात् सबको अभय करनेवाला है। मनुष्य जब करनेलायक कार्यसे च्युत होकर अकार्यमें प्रवृत्त होता है, तब उसके मनमें अपनी मान-बड़ाईकी हानि और निन्दा-अपमान होनेकी आशंकासे भय पैदा होता है। परन्तु जो अपनी मर्यादासे कभी विचलित नहीं होता, अपने मनसे किसीका भी अनिष्ट नहीं चाहता और केवल परमात्मामें ही लगा रहता है, उसके मनमें सदा अभय बना रहता है। यह अभय ही मनुष्यको सर्वथा अभयपद—परमात्माको प्राप्त करा देता है।

‘बन्धं मोक्षं च या वेत्ति’ —जो बाहरसे तो यज्ञ, दान, तीर्थ, व्रत आदि उत्तम-से-उत्तम कार्य करता है; परन्तु भीतरसे असत्, जड़, नाशवान् पदार्थोंको और स्वर्ग आदि लोकोंको चाहता है, उसके लिये वे सभी कर्म ‘बन्ध’ अर्थात् बन्धनकारक ही हैं। केवल परमात्मासे ही सम्बन्ध रखना, परमात्माके सिवाय कभी किसी अवस्थामें असत् संसारके साथ लेशमात्र

भी सम्बन्ध न रखना ‘मोक्ष’ अर्थात् मोक्षदायक है।

अपनेको जो वस्तुएँ नहीं मिली हैं, उनकी कामना होनेसे मनुष्य उनके अभावका अनुभव करता है। वह अपनेको उन वस्तुओंके परतन्त्र मानता है और वस्तुओंके मिलनेपर अपनेको स्वतन्त्र मानता है। वह समझता तो यह है कि मेरे पास वस्तुएँ होनेसे मैं स्वतन्त्र हो गया हूँ, पर हो जाता है उन वस्तुओंके परतन्त्र! वस्तुओंके अभाव और वस्तुओंके भाव—इन दोनोंकी परतन्त्रतामें इतना ही फर्क पड़ता है कि वस्तुओंके अभावमें परतन्त्रता दीखती है, खटकती है और वस्तुओंके होनेपर वस्तुओंकी परतन्त्रता परतन्त्रताके रूपमें दीखती ही नहीं; क्योंकि उस समय मनुष्य अन्धा हो जाता है। परन्तु हैं ये दोनों ही परतन्त्रता, और परतन्त्रता ही बन्धन है। अभावकी परतन्त्रता प्रकट विष है और भावकी परतन्त्रता छिपा हुआ मीठा विष है, पर हैं दोनों ही विष। विष तो मारनेवाला ही होता है।

निष्कर्ष यह निकला कि सांसारिक वस्तुओंकी कामनासे ही बन्धन होता है और परमात्माके सिवाय किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, देश, काल आदिकी कामना न होनेसे मुक्ति होती है*। यदि मनमें कामना है तो वस्तु पासमें हो तो बन्धन और पासमें न हो तो बन्धन! यदि मनमें कामना नहीं है तो वस्तु पासमें हो तो मुक्ति और पासमें न हो तो मुक्ति!

‘बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी’ —इस प्रकार जो प्रवृत्ति-निवृत्ति, कार्य-अकार्य, भय-अभय और बन्ध-मोक्षके वास्तविक तत्त्वको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।

इनके वास्तविक तत्त्वको जानना क्या है? प्रवृत्ति-निवृत्ति, कार्य-अकार्य, भय-अभय और बन्ध-मोक्ष—इनको गहरी रीतिसे समझकर, जिसके साथ वास्तवमें हमारा सम्बन्ध नहीं है, उस संसारके साथ सम्बन्ध न मानना और जिसके साथ हमारा स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, ऐसे (प्रवृत्ति-निवृत्ति आदिके आश्रय तथा प्रकाशक) परमात्माको तत्त्वसे ठीक-ठीक जानना—यही सात्त्विकी बुद्धिके द्वारा वास्तविक तत्त्वको ठीक-ठीक जानना है।

परिशिष्ट भाव —प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको—दोनोंको जाननेका तात्पर्य संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे ही है। अगर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद न हो तो वह जानना वास्तवमें जानना नहीं है, प्रत्युत सीखना है।

  • एक कामना होती है और एक आवश्यकता होती है। संसारकी कामना होती है और परमात्माकी आवश्यकता। कामनाकी कभी पूर्ति होती ही नहीं, उसकी तो निवृत्ति होती है, पर आवश्यकताकी पूर्ति ही होती है।

परमात्माकी आवश्यकता भी संसारकी कामना होनेसे ही पैदा होती है। कामनाका अत्यन्त अभाव होनेपर आवश्यकता रहती ही नहीं अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।