श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
‘ततामसमुदाहृतम्’—युक्तिरहित, अल्प और अत्यन्त तुच्छ समझको ही महत्त्व देना ‘तामस’ कहा गया है। जब तामस समझ ‘ज्ञान’ है ही नहीं और भगवान्को भी इसको ‘ज्ञान’ कहनेमें संकोच हुआ है, तो फिर इसका
परिशिष्ट भाव —तामस ज्ञानमें आसुरी सम्पत्ति विशेष है। इस श्लोकमें ‘ज्ञान’ शब्द न देनेका तात्पर्य है कि वास्तवमें यह ज्ञान नहीं है, प्रत्युत अज्ञान ही है। यह तामस मनुष्योंकी बुद्धि है, जिसको ‘पशुबुद्धि’ कहा गया है— त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि। न जातः प्रागभूतोऽद्य देहवत्त्वं न नृश्यसि॥
(श्रीमद्भा० ११।५।२)
(श्रीशुकदेवजी बोले—) ‘हे राजन्! अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा। जैसे शरीर पहले नहीं था, पीछे पैदा हुआ और फिर मर जायगा, ऐसे तुम पहले नहीं थे, पीछे पैदा हुए और फिर मर जाओगे—यह बात नहीं है।’
सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विक कर्मका वर्णन करते हैं।
नियतं सद्गुरुहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥
| यत् | = जो | सद्गुरुहितम् | = कर्तृत्वाभिमानसे रहित | अरागद्वेषतः | = बिना राग-द्वेषके |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्म | = कर्म | ही (तथा) | कृतम् | = किया हुआ हो, | |
| नियतम् | = शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ (और) | अफलप्रेप्सुना | = फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा | तत् | = वह |
| सात्त्विकम् | = सात्त्विक | ||||
| उच्यते | = कहा जाता है। |
व्याख्या —‘नियतं सद्गुरुहितम्’……‘सात्त्विक-मुच्यते’—जिस व्यक्तिके लिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जिस परिस्थितिमें और जिस समय शास्त्रोंने जैसा करनेके लिये कहा है, उसके लिये वह कर्म ‘नियत’ हो जाता है।
यहाँ ‘नियतम्’ पदसे एक तो कर्मिका स्वरूप बताया है और दूसरे, शास्त्रनिषिद्ध कर्मका निषेध किया है।
‘सद्गुरुहितम्’ पदका तात्पर्य है कि वह नियत-कर्म कर्तृत्वाभिमानसे रहित होकर किया जाय। कर्तृत्वाभिमानसे रहित कहनेका भाव है कि जैसे वृक्ष आदिमें मूढ़ता होनेके कारण उनको कर्तृत्वका भान नहीं होता, पर उनकी भी वृद्धि आनेपर पत्तीका झड़ना, नये पत्तीका निकलना, शाखा कटनेपर घावका मिल जाना, शाखाओंका बढ़ना, फल-फूलका लगना आदि सभी क्रियाएँ समष्टि शक्तिके द्वारा
अपने-आप ही होती हैं; ऐसे ही इन सभी शरीरोंका बढ़ना-घटना, खाना-पीना, चलना-फिरना आदि सभी क्रियाएँ भी समष्टि शक्तिके द्वारा अपने-आप ही रही हैं। इन क्रियाओंके साथ न अभी कोई सम्बन्ध है, न पहले कोई सम्बन्ध था और न आगे ही कोई सम्बन्ध होगा। इस प्रकार जब साधकको प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है, तो फिर उसमें कर्तृत्व नहीं रहता। कर्तृत्व न रहनेपर उसके द्वारा जो कर्म होता है, वह संगरहित अर्थात् कर्तृत्वाभिमानरहित ही होता है।
यहाँ सांख्य-प्रकरणमें कर्तृत्वका त्याग मुख्य होनेसे और आगे ‘अरागद्वेषतः कृतम्’ पदोंमें भी आसक्तिके त्यागकी बात आनेसे यहाँ ‘सद्गुरुहितम्’ पदका अर्थ कर्तृत्व-अभिमानरहित लिया गया है*।
‘अरागद्वेषतः कृतम्’ पदोंका तात्पर्य है कि राग-द्वेषसे
- यहाँ संन्यास-(सांख्ययोग-) में ‘सद्गुरुहितम्’ पदसे कर्तृत्व-अभिमानसे रहित होनेकी बात आयी है और त्याग-(कर्मयोग-) में ‘सद्गुरुत्वका फलं चैव’ (१८।१) पदोंसे आसक्ति तथा फलेच्छासे रहित होनेकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि सांख्ययोगीका शरीरमें थोड़ा भी अभिमान रहेगा तो उसका शरीरके साथ सम्बन्ध बना रहेगा, जो कि