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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1148, कुल 1299 में से

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पृष्ठ 1148

श्लोक २४ ] * साधक-संजीवनी * ११४७

रहित हो करके कर्म किया जाय अर्थात् कर्मका ग्रहण

रागपूर्वक न हो और कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक न हो तथा

कर्म करनेके जितने साधन (शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण

आदि) हैं, उनमें भी राग-द्वेष न हो।

'अरागद्वेषतः' पदसे वर्तमानमें रागका अभाव बताया

है और 'अफलप्रेप्सुना' पदसे भविष्यमें रागका अभाव

बताया है। तात्पर्य यह है कि भविष्यमें मिलनेवाले फलकी

इच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा कर्म किया जाय अर्थात् क्रिया

और पदार्थोंसे निर्लिप्त रहते हुए असंगतापूर्वक कर्म किया

जाय तो वह सात्त्विक कहा जाता है।

इस सात्त्विक कर्ममें सात्त्विकता तभीतक है, जबतक

अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है। जब

प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब यह कर्म

'अकर्म' हो जाता है।

सम्बन्ध-अब राजस कर्मका वर्णन करते हैं।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।

क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥

तु = परन्तु | वा = अथवा | क्रियते = किया जाता है,

यत् = जो | साहङ्कारेण = अहंकारसे | तत् = वह

कर्म = कर्म | पुनः = और | राजसम् = राजस

कामेप्सुना = भोगोंकी इच्छासे | बहुलायासम् = परिश्रमपूर्वक | उदाहृतम् = कहा गया है।

व्याख्या-'यत्तु* कामेप्सुना कर्म'-हम कर्म करेंगे

तो हमें पदार्थ मिलेंगे, सुख-आराम मिलेगा, भोग मिलेंगे,

आदर-सम्मान-बड़ाई मिलेगी आदि फलकी इच्छासे कर्म

किया जाय।

अपनी विशेषताको लेकर (अहंकारपूर्वक) कर्म किया

जाय-इन दोनों भावोंमेंसे एक भाव होनेपर भी वह

कर्म राजस हो जाता है, यह बतानेके लिये यहाँ 'वा

पुनः' पद आये हैं। तात्पर्य है कि फलेच्छा और

अहंकार-इन दोनोंमेंसे जब एक भाव होनेपर भी कर्म

'राजस' हो जाता है, तब दोनों भाव होनेपर वह कर्म राजस

हो ही जायगा।

'साहंकारेण'-लोगोंके सामने कर्म करनेसे लोग

देखते हैं और वाह-वाह करते हैं तो अभिमान आता है

और जहाँ लोग सामने नहीं होते, वहाँ (एकान्तमें) कर्म

करनेसे दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विलक्षणता, विशेषता

देखकर अभिमान आता है। जैसे-दूसरे आदमी हमारी

तरह सुचारुरूपसे सांगोपांग कार्य नहीं कर सकते; हमारेमें

काम करनेकी जो योग्यता, विद्या, चतुरता आदि है, वह

हरेक आदमीमें नहीं मिलेगी; हम जो भी काम करते हैं,

उसको बहुत ही ईमानदारीसे और जल्दी करते हैं, आदि-

आदि। इस प्रकार अहंकारपूर्वक किया गया कर्म राजस

कहलाता है।

'क्रियते बहुलायासम्'-कर्म करते समय हरेक

व्यक्तिके शरीरमें परिश्रम तो होता ही है, पर जिस व्यक्तिमें

शरीरके सुख-आरामकी इच्छा मुख्य होती है, उसको कर्म

करते समय शरीरमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।

जिस व्यक्तिमें कर्मफलकी इच्छा तो मुख्य है, पर

शारीरिक सुख-आरामकी इच्छा मुख्य नहीं है, अर्थात् सुख-

आराम लेनेकी स्वाभाविक ही प्रकृति नहीं है, उसको कर्म

करते हुए भी शरीरमें परिश्रम नहीं मालूम देता। कारण कि

'वा पुनः'-आगे भविष्यमें मिलनेवाले फलको

लेकर (फलेच्छापूर्वक) कर्म किया जाय अथवा वर्तमानमें

भीतरमें भोगों और संग्रहकी जोरदार कामना होनेसे उसकी

वृत्ति कामनापूर्तिकी तरफ ही लगी रहती है; शरीरकी तरफ

तत्त्वप्राप्तिमें बाधक होगा; परन्तु कर्मयोगीका शरीरमें थोड़ा अभिमान रह भी जायगा तो वह सांख्ययोगीकी तरह उतना बाधक

नहीं होगा। कारण कि (कोई भी कर्म अपने लिये न करनेसे) कर्मयोगीका कर्तृत्व-अभिमान केवल कर्तव्य-पालनके लिये

ही होता है अर्थात् वह जिस समय जो कार्य करता है, उसी समय उसमें तात्कालिक कर्तृत्व-अभिमान रहता है। कार्यका अन्त

होनेपर वह कर्तृत्व-अभिमान उसी कार्यमें लीन हो जाता है।

  • राजस कर्मको सात्त्विक कर्मसे भिन्न बतानेके लिये यहाँ 'तु' पदका प्रयोग हुआ है।