श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८
नहीं। तात्पर्य है कि शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता होनेसे फलेच्छाकी अवहेलना हो जाती है और फलेच्छाकी मुख्यता होनेसे शरीरके सुख-आरामकी अवहेलना हो जाती है।
लोगोंके सामने कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक मिलनेसे और शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता न होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें परिश्रम नहीं मालूम देता। परन्तु एकान्तमें कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक न मिलनेसे और शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।
'तद्राजसमुदाहृतम्'—ऐसे फलकी इच्छावाले मनुष्यके द्वारा अहंकार और परिश्रमपूर्वक किया हुआ जो कर्म है, वह 'राजस' कहा गया है।
परिशिष्ट भाव—राजस मनुष्य अपनी आवश्यकताओंको अधिक बढ़ा लेता है, जिससे प्रत्येक काममें उसको अधिक वस्तुओंकी जरूरत पड़ती है। अधिक वस्तुओंको जुटानेमें परिश्रम भी अधिक होता है। राजस मनुष्य कर्मोंका विस्तार अधिक करता है, इसलिये भी उसको परिश्रम अधिक होता है। शरीरमें राग रहनेके कारण राजस मनुष्य शरीरका आराम चाहता है, जिससे उसको थोड़े काममें भी अधिक परिश्रम मालूम देता है।
सम्बन्ध—अब तामस कर्मका वर्णन करते हैं।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ २५॥
यत् = जो कर्म = कर्म अनुबन्धम् = परिणाम, क्षयम् = हानि, हिंसाम् = हिंसा च = और पौरुषम् = सामर्थ्यको अनवेक्ष्य = न देखकर मोहात् = मोहपूर्वक आरभ्यते = आरम्भ किया जाता है, तत् = वह तामसम् = तामस उच्यते = कहा जाता है।
व्याख्या—'अनुबन्धम्'—जिसको फलकी कामना होती है, वह मनुष्य तो फलप्राप्तिके लिये विचारपूर्वक कर्म करता है, परन्तु तामस मनुष्यमें मूढ़ताकी प्रधानता होनेसे वह कर्म करनेमें विचार करता ही नहीं। इस कार्यको करनेसे मेरा तथा दूसरोंके प्राणियोंका अभी और परिणाममें कितना नुकसान होगा, कितना अहित होगा—इस अनुबन्ध अर्थात् परिणामको न देखकर वह कार्य आरम्भ कर देता है।
'क्षयम्'—इस कार्यको करनेसे अपने और दूसरोंके शरीरोंकी कितनी हानि होगी; धन और समयका कितना खर्चा होगा; इससे दुनियामें मेरा कितना अपमान, निन्दा, तिरस्कार आदि होगा, मेरा लोक-परलोक बिगड़ जायगा आदि नुकसानको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।
'हिंसाम्'—इस कर्मसे कितने जीवोंकी हत्या होगी; कितने श्रेष्ठ व्यक्तियोंके सिद्धान्तों और मान्यताओंकी हत्या हो जायगी; दूसरे मनुष्योंकी मनुष्यताकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी; अभीके और भावी जीवोंके शुद्ध भाव, आचरण, वेश-भूषा, खान-पान आदिकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी; इससे मेरा और दुनियाका कितना अध:पतन होगा आदि हिंसाको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।
'अनवेक्ष्य च पौरुषम्'—इस कामको करनेकी मेरेमें कितनी योग्यता है, कितना बल, सामर्थ्य है; मेरे पास कितना समय है, कितनी बुद्धि है, कितनी कला है, कितना ज्ञान है आदि अपने पौरुष-(पुरुषार्थ-) को न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।
'मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते'—तामस मनुष्य कर्म करते समय उसके परिणाम, उससे होनेवाले नुकसान, हिंसा और अपनी सामर्थ्यका कुछ भी विचार न करके, जब जैसा मनमें भाव आया, उसी समय बिना विवेक-विचारके वैसा ही कर बैठता है। इस प्रकार किया गया कर्म 'तामस' कहलाता है।