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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक २६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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परिशिष्ट भाव —तामस मनुष्य अपनी शक्ति, परिणाम आदिका विचार न करके मूढ़तासे काम करता है*। वह स्वाभाविक ही ऐसे काम करता है, जिनसे दूसरोंको बाधा पहुँचे; जैसे—रास्तेमें खड़े होकर बात करने लग जाना, रास्तेमें साइकिल खड़ी कर देना आदि। दूसरोंको लगनेवाली बाधाकी तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता।

सात्त्विक स्वभाव स्वतः उत्थानकी तरफ जाता है, राजस स्वभावमें उन्नति रुक जाती है और तामस स्वभाव स्वतः पतनकी तरफ जाता है।

सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विक कर्ताके लक्षण बताते हैं।

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।

सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥

कर्ता | = (जो) कर्ता | समन्वितः | = धैर्य और उत्साहयुक्त | निर्विकारः | = निर्विकार है, (वह) ---|---|---|---|---|--- मुक्तसङ्गः | = रागरहित, | | (तथा) | सात्त्विकः | = सात्त्विक अनहंवादी | = कर्तृत्वाभिमानसे रहित, | सिद्ध्यसिद्धयोः | = सिद्धि और असिद्धिमें | उच्यते | = कहा जाता है।

व्याख्या —‘मुक्तसंगः’—जैसे सांख्ययोगीका कर्मके साथ राग नहीं होता, ऐसे सात्त्विक कर्ता भी रागरहित होता है।

कामना, वासना, आसक्ति, स्पृहा, ममता आदिसे अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिमें आसक्ति, लिप्तता होती है। सात्त्विक कर्ता इस लिप्ततासे सर्वथा रहित होता है।

‘अनहंवादी’—पदार्थ, वस्तु, परिस्थिति आदिको लेकर अपनेमें जो एक विशेषताका अनुभव करना है—यह अहंवदनशीलता है। यह अहंवदनशीलता आसुरी-सम्पत्ति होनेसे अत्यन्त निकृष्ट है। सात्त्विक कर्तामें यह अहंवदनशीलता, अभिमान तो रहता ही नहीं, प्रत्युत ‘मैं इन चीजोंका त्यागी हूँ, मेरेमें यह अभिमान नहीं है, मैं निर्विकार हूँ, मैं सम हूँ, मैं सर्वथा निष्काम हूँ, मैं संसारके सम्बन्धसे रहित हूँ’—इस तरहके अहंभावका भी उसमें अभाव रहता है।

‘धृत्युत्साहसमन्वितः’—कर्तव्य-कर्म करते हुए विघ्न-बाधाएँ आ जायँ, उस कर्मका परिणाम ठीक न निकले, लोगोंमें निन्दा हो जाय, तो भी विघ्न-बाधा आदि न

आनेपर जैसा धैर्य रहता है, वैसा ही धैर्य विघ्न-बाधा आनेपर भी नित्य-निरन्तर बना रहे—इसका नाम ‘धृति’ है और सफलता-ही-सफलता मिलती चली जाय, उन्नति होती चली जाय, लोगोंमें मान, आदर, महिमा आदि बढ़ते चले जायँ—ऐसी स्थितिमें मनुष्यके मनमें जैसी उम्मेदवारी, सफलताके प्रति उत्साह रहता है, वैसी ही उम्मेदवारी इससे विपरीत अर्थात् असफलता, अवनति, निन्दा आदि हो जानेपर भी बनी रहे—इसका नाम ‘उत्साह’ है। सात्त्विक कर्ता इस प्रकारकी धृति और उत्साहसे युक्त रहता है।

‘सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः’—सिद्धि और असिद्धिमें अपनेमें कुछ भी विकार न आये, अपनेपर कुछ भी असर न पड़े अर्थात् कार्य ठीक तरहसे सांगोपांग पूर्ण हो जाय अथवा पूरा उद्योग करते हुए अपनी शक्ति, समझ, समय, सामर्थ्य आदिको पूरा लगाते हुए भी कार्य पूरा न हो; फल प्राप्त हो अथवा न हो, तो भी अपने अन्तःकरणमें प्रसन्नता और खिन्नता, हर्ष और शोकका न होना ही सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार रहना है।

‘कर्ता सात्त्विक उच्यते’—ऐसा आसक्ति तथा अहंकारसे

*बिना बिचारे जो करै, सो पाछे पछिताय। काम बिगारे आपनो, जग में होत हैसाय॥ जग में होत हैसाय, चित्त में चैन न पावै॥ खान पान सनमान, राग-रैग मन नहि भावै॥ कह गिरधर कविराय करमगति टरत न टारे। खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥