श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1151, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें११५०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८
रहित, धैर्य तथा उत्साहसे युक्त और सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार कर्ता 'सात्त्विक' कहा जाता है।
इस श्लोकमें छ: बातें बतायी गयी हैं-संग,
अहंवदनशीलता, धृति, उत्साह, सिद्धि और असिद्धि। इनमेंसे पहली दो बातोंसे रहित, बीचकी दो बातोंसे युक्त और अन्तकी दो बातोंमें निर्विकार रहनेके लिये कहा गया है।
परिशिष्ट भाव-सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार, सम रहनेकी बात गीतामें तीन बार आयी है-'सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा' (२।४८), 'सम: सिद्धावसिद्धौ च' (४।२२) और यहाँ 'सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकार:'। तात्पर्य है कि सिद्धि-असिद्धि हाथकी बात नहीं है, पर उसमें निर्विकार रहना हाथकी बात है। जो हाथकी बात है, उसको ठीक करना है।
'अनहंवादी'-सात्त्विक मनुष्य 'जैसा मैं कर सकता हूँ, वैसा दूसरा नहीं कर सकता'-इस तरह न तो बाहरसे बोलता है और न भीतरसे बोलता है। अपनेमें विशेषताका अनुभव करना ही भीतरसे बोलना है।
सम्बन्ध-अब राजस कर्ताके लक्षण बताते हैं।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचि:। हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित:॥ २७॥
कर्ता =(जो) कर्ता
रागी =रागी
कर्मफलप्रेप्सु: =कर्मफलकी इच्छावाला,
लुब्ध: =लोभी,
हिंसात्मक: =हिंसाके स्वभाववाला,
अशुचि: =अशुद्ध (और)
हर्षशोकान्वित: =हर्ष-शोकसे युक्त है, (वह)
राजस: =राजस
परिकीर्तित: =कहा गया है।
व्याख्या-'रागी'-रागका स्वरूप रजोगुण होनेके कारण भगवान्ने राजस कर्ताके लक्षणोंमें सबसे पहले 'रागी' पद दिया है। रागका अर्थ है-कर्मोंमें, कर्मोंके फलोंमें तथा वस्तु, पदार्थ आदिमें मनका खिंचाव होना, मनकी प्रियता होना। इन चीजों जिसपर रंग चढ़ जाता है, वह 'रागी' होता है।
'कर्मफलप्रेप्सु:':-राजस मनुष्य कोई भी काम करेगा तो वह किसी फलकी चाहनाको लेकर ही करेगा; जैसे-मैं ऐसा-ऐसा अनुष्ठान कर रहा हूँ, दान दे रहा हूँ, उससे यहाँ धन, मान, बड़ाई आदि मिलेंगे और परलोकमें स्वर्गादिके भोग, सुख आदि मिलेंगे; मैं ऐसी-ऐसी दवाइयोंका सेवन कर रहा हूँ तो उनसे मेरा शरीर नीरोग रहेगा, आदि।
'लुब्ध:':-राजस मनुष्यको जितना जो कुछ मिलता है, उसमें वह संतोष नहीं करता, प्रत्युत 'जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई' की तरह 'और मिलता रहे, और मिलता रहे' अर्थात् आदर, सत्कार, महिमा आदि अधिक-से-अधिक होते रहें; धन, पुत्र, परिवार आदि अधिक-से-अधिक बढ़ते रहें-इस प्रकारकी लाग लगी रहती है, लोभ लगा रहता है।
'हिंसात्मक:':-वह हिंसाके स्वभाववाला होता है। अपने स्वार्थके लिये वह दूसरोंके नुकसानकी, दु:खकी परवाह नहीं करता। वह ज्यों-ज्यों अधिक भोग-सामग्री इकट्ठी करके भोग भोगता है, त्यों-ही-त्यों दूसरे अभावग्रस्त लोगोंके हृदयमें जलन पैदा होती है। अतः दूसरोंके दु:खकी परवाह न करना तथा भोग भोगना हिंसा ही है।
तामस कर्म (इसी अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) और राजस कर्ता-दोनोंमें हिंसा बतानेका तात्पर्य यह है कि मूढ़ता रहनेके कारण तामस मनुष्यकी क्रियाएँ विवेकपूर्वक नहीं होतीं; अतः चलने-फिरने, उठने-बैठने आदिमें उसके द्वारा हिंसा होती है। राजस मनुष्य अपने सुखके लिये बढ़िया-बढ़िया भोग भोगता है तो उसको देखकर जिनको वे भोग नहीं मिलते, उनके हृदयमें जलन होती है, यह हिंसा उस भोग भोगनेवालेको ही लगती है। कारण कि कोई भी भोग बिना हिंसाके होता ही नहीं। तात्पर्य यह है कि तामस मनुष्यके द्वारा तो कर्ममें हिंसा होती है और राजस मनुष्य स्वयं हिंसात्मक होता है।
'अशुचि:':-रागी पुरुष भोग-बुद्धिसे जिन वस्तुओं,