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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1152

श्लोक २८ ]

  • साधक-संजीवनी *

११५१

पदार्थों आदिका संग्रह करता है, वे सब चीजें अपवित्र हो जाती हैं। वह जहाँ रहता है, वहाँका वायुमण्डल अपवित्र हो जाता है। वह जिन कपड़ोंको पहनता है, उन कपड़ोंमें भी अपवित्रता आ जाती है। यही कारण है कि आसक्ति-ममतावाले मनुष्यके मरनेपर उसके कपड़े आदिको कोई रखना नहीं चाहता। जिस स्थानपर उसके शवको जलाया जाता है, वहाँ कोई भजन-ध्यान करना चाहे तो उसका मन नहीं लगेगा। वहाँ भूलसे कोई सो जायगा तो उसको प्रायः खराब-खराब स्वप्न आयेंगे। तात्पर्य यह है कि

परिशिष्ट भाव—‘हिंसात्मकः’ —‘पहले तामस कर्ममें भी हिंसा बतायी गयी है, (इसी अध्यायका पचीसवाँ श्लोक); क्योंकि रजोगुण और तमोगुण—दोनों एक-दूसरेके नजदीक पड़ते हैं, पर सत्त्वगुण दोनोंसे दूर पड़ता है। रजोगुण रागात्मक होता है और तमोगुण मोहात्मक। रजोगुणमें तो होश और सावधानी रहती है, पर तमोगुणमें बेहोशी और असावधानी रहती है। राग, स्वार्थबुद्धि होनेसे जितनी हिंसा होती है, उतनी मोह होनेसे नहीं होती। इसलिये रजोगुणमें अधिक हिंसा होती है। राग, स्वार्थबुद्धिके कारण राजस मनुष्य ‘हिंसात्मक’ हो जाता है। उसकी हिंसामें तल्लीनता हो जाती है।

सम्बन्ध—अब तामस कर्ताके लक्षण बताते हैं।

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोऽनैष्कृतिकोऽलसः ।

विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥

कर्ता= ( जो ) कर्ताअनैष्कृतिकः= उपकारीका अपकारदीर्घसूत्री= दीर्घसूत्री है,
अयुक्तः= असावधान,करनेवाला,( वह )
प्राकृतः= अशिक्षित,अलसः= आलसी,तामसः= तामस
स्तब्धः= ऐंट-अकड़वाला,विषादी= विषादीउच्यते= कहा
शठः= जिद्दी,= औरजाता है ।

व्याख्या—‘अयुक्तः’ —‘तमोगुण मनुष्यको मूढ़ बना देता है (गीता—चौदहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इस कारण किस समयमें कौन-सा काम करना चाहिये? किस तरह करनेसे हमें लाभ है और किस तरह करनेसे हमें हानि है?—इस विषयमें तामस मनुष्य सावधान नहीं रहता अर्थात् वह कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सोचता ही नहीं। इसलिये वह ‘अयुक्त’ अर्थात् असावधान कहलाता है।

‘प्राकृतः’ —‘जिसने शास्त्र, सत्संग, अच्छी शिक्षा, उपदेश आदिसे न तो अपने जीवनको ठीक बनाया है और न अपने जीवनपर कुछ विचार ही किया है, माँ-बापसे जैसा पैदा हुआ है, वैसा-का-वैसा ही कोरा अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्यको शिक्षासे रहित रहा है, ऐसा मनुष्य

उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी तरफ आकृष्ट होते ही आसक्ति-ममतारूप मलिनता आने लगती है, जिससे मनुष्यका शरीर और शरीरकी हड्डियाँ अधिक अपवित्र हो जाती हैं।

‘हर्षशोकान्वितः’ —‘उसके सामने दिनमें कितनी बार सफलता-विफलता, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति, घटना आदि आते रहते हैं, उनको लेकर वह हर्ष-शोक, राग-द्वेष, सुख-दुःख आदिमें ही उलझा रहता है।

‘कर्ता राजसः परिकीर्तितः’ —‘उपर्युक्त लक्षणोंवाला कर्ता ‘राजस’ कहा गया है।

‘प्राकृत’ अर्थात् अशिक्षित कहलाता है।

‘स्तब्धः’ —‘तमोगुणकी प्रधानताके कारण उसके मन, वाणी और शरीरमें अकड़ रहती है। इसलिये वह अपने वर्ण-आश्रममें बड़े-बूढ़े माता, पिता, गुरु, आचार्य आदिके सामने कभी झुकता नहीं। वह मन, वाणी और शरीरसे कभी सरलता और नम्रताका व्यवहार नहीं करता, प्रत्युत कठोर व्यवहार करता है। ऐसा मनुष्य ‘स्तब्ध’ अर्थात् ऐंट-अकड़वाला कहलाता है।

‘शठः’ —‘तामस मनुष्य अपनी एक जिद होनेके कारण दूसरोंकी दी हुई अच्छी शिक्षाको, अच्छे विचारोंको नहीं मानता। उसको तो मूढ़ताके कारण अपने ही विचार अच्छे लगते हैं। इसलिये वह ‘शठ’ अर्थात् जिद्दी कहलाता है*।

  • मूर्खस्य पंच चिन्हानि गर्वी दुर्वचनी तथा। हठी चाप्रियवादी च परोक्त नैव मन्यते ॥