सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1153, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1153

१५२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

'अनेच्छुतिकः' —जिनसे कुछ उपकार पाया है, उनका प्रत्युपकार करनेका जिसका स्वभाव होता है, वह 'नैच्छुतिक' कहलाता है। परन्तु तामस मनुष्य दूसरोंसे उपकार पा करके भी उनका उपकार नहीं करता, प्रत्युत उनका अपकार करता है, इसलिये वह 'अनेच्छुतिक' कहलाता है।

'अलसः' —अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार आवश्यक कर्तव्य-कर्म प्राप्त हो जानेपर भी तामस मनुष्योंको मूढ़ताके कारण वह कर्म करना अच्छा नहीं लगता, प्रत्युत सांसारिक निरर्थक बातोंको पड़े-पड़े सोचते रहना अथवा नींदमें पड़े रहना अच्छा लगता है। इसलिये उसे आलसी कहा गया है।

'विषादी' —यद्यपि तामस मनुष्यमें यह विचार होता ही नहीं कि क्या कर्तव्य होता है और क्या अकर्तव्य होता है तथा निद्रा, आलस्य, प्रमाद आदिमें मेरी शक्ति, मेरे जीवनके अमूल्य समयका कितना दुरुपयोग हो रहा है, तथापि अच्छे मार्गसे और कर्तव्यसे च्युत होनेसे उसके भीतर स्वाभाविक ही एक विषाद (दुःख, अशान्ति) होता रहता है। इसलिये उसे 'विषादी' कहा गया है।

'दीर्घसूत्री' —अमुक काम किस तरीकेसे बढ़िया और जल्दी हो सकता है—इस बातको वह सोचता ही नहीं। इसलिये वह किसी काममें अविवेकपूर्वक लग भी जाता है तो थोड़े समयमें होनेवाले काममें भी बहुत ज्यादा समय लगा देता है और उससे काम भी सुचारूपसे नहीं होता। ऐसा मनुष्य 'दीर्घसूत्री' कहलाता है।

'कर्ता तामस उच्यते' —उपर्युक्त आठ लक्षणोंवाला कर्ता 'तामस' कहलाता है।

विशेष बात

छब्बीसवें, सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें श्लोकमें जितनी बातें आयी हैं, वे सब कर्ताको लेकर ही कही गयी हैं। कर्ताके जैसे लक्षण होते हैं, उन्हींके अनुसार कर्म होते हैं। कर्ता जिन गुणोंको स्वीकार करता है, उन गुणोंके अनुसार ही कर्माका रूप होता है। कर्ता जिस साधनको करता है, वह साधन कर्ताका रूप हो जाता है। कर्ताके आगे जो करण होते हैं, वे भी कर्ताके अनुरूप होते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसा कर्ता होता है, वैसे ही कर्म, करण आदि होते हैं। कर्ता सात्त्विक, राजस अथवा तामस होगा तो कर्म

आदि भी सात्त्विक, राजस अथवा तामस होंगे।

सात्त्विक कर्ता अपने कर्म, बुद्धि आदिको सात्त्विक बनाकर सात्त्विक सुखका अनुभव करते हुए असंगतापूर्वक परमात्मत्वसे अभिन्न हो जाता है—'दुःखान्तं च निगच्छति' (गीता १८।३६)। कारण कि सात्त्विक कर्ताका ध्येय परमात्मा होता है। इसलिये वह कर्तृत्व-भोक्तृत्वसे रहित होकर चिन्मय तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है; क्योंकि वह तात्त्विक स्वरूपसे अभिन्न ही था। परन्तु राजस-तामस कर्ता राजस-तामस कर्म, बुद्धि आदिके साथ तन्मय होकर राजस-तामस सुखमें लिप्त होता है। इसलिये वह परमात्मत्वसे अभिन्न नहीं हो सकता। कारण कि राजस-तामस कर्ताका उद्देश्य परमात्मा नहीं होता और उसमें जड़ताका बन्धन भी अधिक होता है।

अब यहाँ शंका हो सकती है कि कर्ताका सात्त्विक होना तो ठीक है, पर कर्म सात्त्विक कैसे होते हैं? इसका समाधान यह है कि जिस कर्मके साथ कर्ताका राग नहीं है, कर्तृत्वाभिमान नहीं है, लेप (फलेच्छा) नहीं है, वह कर्म सात्त्विक हो जाता है। ऐसे सात्त्विक कर्मसे अपना और दुनियाका बड़ा भला होता है। उस सात्त्विक कर्मका जिन-जिन वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, वायुमण्डल आदिके साथ सम्बन्ध होता है, उन सबमें निर्मलता आ जाती है; क्योंकि निर्मलता सत्त्वगुणका स्वभाव है—'तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्' (गीता १४।६)।

दूसरी बात, पतंजलि महाराजने रजोगुणको क्रियात्मक ही माना है—'प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्' (योगदर्शन २।१८)। परन्तु गीता रजोगुणको क्रियात्मक मानते हुए भी मुख्यरूपसे रागात्मक ही मानती है—'रजो रागात्मकं विद्धि' (१४।७)। वास्तवमें देखा जाय तो 'राग' ही बाँधनेवाला है, 'क्रिया' नहीं।

गीतामें कर्म तीन प्रकारके बताये गये हैं—सात्त्विक, राजस और तामस (इसी अध्यायके तेईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक)। कर्म करनेवालेका भाव सात्त्विक होगा तो वे कर्म 'सात्त्विक' हो जायेंगे, भाव राजस होगा तो वे कर्म 'राजस' हो जायेंगे और भाव तामस होगा तो वे कर्म 'तामस' हो जायेंगे। इसलिये भगवान्ने केवल क्रियाको रजोगुणी नहीं माना है।

परिशिष्ट भाव —'विषादी' पद रजोगुणमें आना चाहिये, पर यहाँ तमोगुणमें आया है। तामस वृत्तिका विवेकसे विरोध है, इसलिये तामस मनुष्यमें विषाद अधिक होता है।