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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1140

श्लोक १७ ]

  • साधक-संजीवनी *

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करनेसे ही होता है। अहंकृतभाव सर्वथा मिटनेपर उसकी बुद्धिमें 'फल मेरेको मिले' ऐसा लेप भी नहीं होता अर्थात् फलकी कामना नहीं होती।

अहंकृतभाव एक मनोवृत्ति है। मनोवृत्ति होते हुए भी यह भाव स्वयं-(कर्ता-)-में रहता है; क्योंकि कर्तृत्व और अकर्तृत्व भाव स्वयं ही स्वीकार करता है।

'हत्वापि स इमाल्लोकान् हन्ति न निबध्यते' —वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको एक साथ मार डाले, तो भी वह मारता नहीं; क्योंकि उसमें कर्तृत्व नहीं है और वह बंधता भी नहीं; क्योंकि उसमें भोक्तृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि उसका न क्रियाओंके साथ सम्बन्ध है और न फलके साथ सम्बन्ध है।

वास्तवमें प्रकृति ही क्रिया और फलमें परिणत होती है। परन्तु इस वास्तविकताका अनुभव न होनेसे ही पुरुष (चेतन) कर्ता और भोक्ता बनता है। कारण कि जब अहंकारपूर्वक क्रिया होती है, तब कर्ता, करण और कर्म—तीनों मिलते हैं और तभी कर्मसंग्रह होता है। परन्तु जिसमें अहंकृतभाव नहीं रहा, केवल सबका प्रकाशक, आश्रय, सामान्य चेतन ही रहा, फिर वह कैसे किसको मारे? और कैसे किससे बंधे? उसका 'मारना' और 'बंधना' सम्भव ही नहीं है (गीता—दूसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

सम्पूर्ण प्राणियोंको मारना क्या है? जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लेप नहीं है—ऐसे मनुष्यका शरीर जिस वर्ण और आश्रममें रहता है, उसके अनुसार उसके सामने जो परिस्थिति आ जाती है, उसमें प्रवृत्त होनेपर उसे पाप नहीं लगता। जैसे, किसी जीवन्मुक्त क्षत्रियके लिये स्वतः युद्धकी परिस्थिति प्राप्त हो जाय तो वह उसके अनुसार सबको मारकर भी न तो मारता है और न बंधता है। कारण कि उसमें अभिमान और स्वार्थभाव नहीं है।

यहाँ अर्जुनके सामने भी युद्धका प्रसंग है। इसलिये भगवान्ने 'हत्वापि' पदसे अर्जुनको युद्धके लिये प्रेरणा की है। 'अपि' पदका भाव है—'कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः' (गीता ४।२०) 'कर्मोंमें अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी वह कुछ नहीं करता।' 'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' (गीता ६।३१) 'सर्वथा बर्ताव करता हुआ भी वह योगी मेरेमें रहता है।' 'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते' (गीता १३।३१) 'शरीरमें स्थित होनेपर भी न करता है और न लिप्त होता है।' तात्पर्य यह है कि कर्मोंमें सांगोपांग

प्रवृत्त होनेके समय और जिस समय कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं है, उस समय भी स्वरूपकी निर्विकल्पता ज्यों-की-त्यों रहती है अर्थात् क्रिया करनेसे अथवा क्रिया न करनेसे स्वरूपमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। कारण कि क्रिया विभाग प्रकृतिमें है, स्वरूपमें नहीं।

वास्तवमें यह अहंभाव (व्यक्तित्व) ही मनुष्यमें भिन्नता करनेवाला है। अहंभाव न रहनेसे परमात्माके साथ भिन्नताका कोई कारण ही नहीं है। फिर तो केवल सबका आश्रय, प्रकाशक सामान्य चेतन रहता है। वह न तो क्रियाका कर्ता बनता है और न फलका भोक्ता ही बनता है। क्रियाओंका कर्ता और फलका भोक्ता तो वह पहले भी नहीं था। केवल नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर जिस अहंभावको स्वीकार किया है, उसी अहंभावसे उसमें कर्तापन और भोक्तापन आया है।

'अहम्' दो प्रकारका होता है—'अहंस्फूर्ति और अहंकृति। गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको अपने होनेपन-(सत्तामात्र-)-का भान होता है, इसको 'अहंस्फूर्ति' कहते हैं। इसके बाद वह अपनेमें 'मैं अमुक नाम, वर्ण, आश्रम आदिका हूँ'—ऐसा आरोप करता है, यही असत्का सम्बन्ध है। असत्के सम्बन्धसे अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको लेकर 'मैं करता हूँ'—ऐसा भाव उत्पन्न होता है, इसको 'अहंकृति' कहते हैं।

'अहम्' को लेकर ही अपनेमें परिच्छिन्नता आती है। इसलिये अहंस्फूर्तिमें भी किञ्चित् परिच्छिन्नता (व्यक्तित्व) रह सकती है। परन्तु यह परिच्छिन्नता बन्धनकारक नहीं होती अर्थात् परिच्छिन्नता रहनेपर भी अहंस्फूर्ति दोषी नहीं होती। कारण कि अहंकृति अर्थात् कर्तृत्वके बिना अपनेमें गुण-दोषका आरोप नहीं होता। अहंकृति आनेसे ही अपनेमें गुण-दोषका आरोप होता है, जिससे शुभ-अशुभ कर्म बनते हैं। बोध होनेपर अहंस्फूर्तिमें जो परिच्छिन्नता है, वह जल जाती है और स्फूर्तिमात्र रह जाती है। ऐसी स्थितिमें मनुष्य न मारता है और न बंधता है।

'न हन्ति न निबध्यते' (न मारता है और न बंधता है) का क्या भाव है? एक निर्विकल्प-अवस्था होती है और एक निर्विकल्प-बोध होता है। निर्विकल्प-अवस्था साधन-साध्य है और उसका उत्थान भी होता है अर्थात् वह एकरस नहीं रहती। इस निर्विकल्प-अवस्थासे भी असंगता होनेपर स्वतःसिद्ध निर्विकल्प-बोधका अनुभव होता है। निर्विकल्प-बोध साधन-साध्य नहीं है और उसमें निर्विकल्पता किसी